हमारी चर्चा यहां पहुंची थी कि मोआविया के काल में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम उसके अत्याचार पर ख़ामोश नहीं रहते थे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हज के दिनों में और मक्का के मिना नामक स्थान पर 58 हिजरी कमरी में यानी मोआविया की मौत से दो साल पहले ऐतिहासिक भाषण दिया था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मिना में जो ऐतिहासिक भाषण दिया था वह बहुत महत्पूर्ण था। उस समय अंसार के 700 लोग, पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों को देखने वाले 200 लोग और बनी हाशिम के 300 लोग मौजूद थे। जब ये लोग एक स्थान पर एकत्रित हो गये तो सबसे पहले इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने महान ईश्वर का गुणगान किया और उसके बाद मोआविया की नीतियों को बयान किया और कहा यह व्यक्ति उद्दंडी है, हमारे और हमारे शीयों के साथ जो व्यवहार किया है उसे आप सबने देखा, जानते हैं और उसके साक्षी हैं। इस समय मैं आपसे यह कहना  चाहता हूं कि अगर मैंने सही कहा तो मेरी बात की पुष्टि कीजिये और अगर मैंने ग़लत कहा तो उसका खंडन कीजिये। उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फरमाया आपको उस अधिकार की क़सम, जो आप पर ईश्वर का है, पैग़म्बरे इस्लाम के अधिकार और उनकी निकटता की क़सम जो मेरी उनसे है मैं आपसे चाहता हूं कि आज जो बात मैं कहूं उसे आप छिपाये नहीं और मेरी बातों को दूसरों के लिए बयान करें।

 

उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने पैगम्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के सदगुणों व विशेषताओं को बयान करना शुरु किया और फरमाया आपको ईश्वर की सौगंद क्या आप लोग जानते हैं कि जब पैग़म्बर ने अपने साथियों व अनुयाइयों को एक दूसरे का भाई बना दिया तो अली इब्ने अबीतालिब से जो पैग़म्बर के भाई थे फरमाया, तुम मेरे भाई हो और मैं लोक- परलोक में तुम्हारा भाई हूं। उसके बाद सबने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बात की पुष्टि करते हुए कहा कि ईश्वर की सौगंद हां ऐसा ही है। उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने फरमाया तुम्हें ईश्वर की सौगंद क्या पैग़म्बरे इस्लाम ने मेरे पिता अली के दरवाज़े के अलावा मस्जिद की ओर खुलने वाले समस्त दरवाजों को बंद करने का आदेश नहीं दिया था और जब दूसरों ने इस पर आपत्ति की तो पैग़म्बरे इस्लाम ने उनसे कहा कि ईश्वर ने मुझे आदेश दिया है कि तुम सबके घरों के दरवाज़ों को बंद कर दूं और मैं केवल अली के घर के दरवाज़े को खुला छोड़ दूं" इस पर सबने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बात की पुष्टि करते हुए कहा कि ईश्वर की सौगंध हां ऐसा ही है।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने भाषण के एक अन्य भाग में इस प्रकार फरमाया" तुम्हें ईश्वर की सौगंद क्या पैग़म्बरे इस्लाम ने ग़दीर के दिन अली को इमाम ओर उत्तराधिकारी नहीं बनाया और उनकी की सूचना लोगों तक ऊंची आवाज में पहुंचाई और यह नहीं फरमाया कि जो लोग मौजूद हैं वे इस संदेश को अनुपस्थित लोगों तक पहुंचायें? इस पर लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से कहा कि हां ईश्वर की सौगंद हम गवाही देते हैं कि ऐसा ही है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इसी प्रकार अपना भाषण जारी रखते हुए फरमाया क्या पैग़म्बर ने तबूक युद्ध में नहीं फरमाया था कि हे अली तुम्हारा मुझसे वहीं संबंध है जो हारून का मूसा से था और तुम मेरे बाद हर मोमिन के अभिभावक हो? क्या पैग़म्बर ने ख़ैबर युद्ध में पताका अली के हाथों में नहीं दी थी और पताका देने में एक उन्होंने यह भी कहा था कि कल मैं पताका उसे दूंगा जिसे ईश्वर और उसके दूत दोस्त रखते होंगे और वह भी ईश्वर और उसके दूत को दोस्त रखता होगा, बढ़- बढ़ कर हमला करने वाला होगा और वह दुश्मन के मुकाबले में भागेगा नहीं और ईश्वर ख़ैबर के अजेय दुर्ग को उसके हाथों जीत दिलायेगा? क्या यह बात जानते हो कि पैग़म्बरे इस्लाम ने कुरआन के सूरे बराअत अर्थात तौबा को अली के माध्यम से मक्का के अनेकेश्वरवादियों के पास भेजा जबकि पैग़म्बर ने फरमाया था कि मेरी तरफ से कोई भी यह संदेश लोगों तक नहीं पहुंचा सकता किन्तु यह कि खुद मैं जाऊं या वह जो मुझसे हो?

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की इन समस्त बातों को समस्त लोगों ने स्वीकार किया कि ईश्वर की सौगंद ऐसा ही है जैसा आप कह रहे हैं। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सद्गुणों के एक भाग को बयान कर चुके तो फरमाया क्या इस बात को स्वीकार करते हो कि पैग़म्बरे इस्लाम ने जो आखिरी भाषण दिया था उसमें उन्होंने कहा था कि मैं तुम लोगों के बीच दो कीमती चीज़ें छोड़ कर जा रहा हूं एक ईश्वर की किताब और दूसरे अपने पवित्र परिजनों को। अगर तुम इन दोनों से जुड़े रहे तो कदापि पथभ्रष्ट नहीं होगे? सबने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से कहा कि ईश्वर की सौगंद हैं ऐसा ही है। उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उन सबको ईश्वर की सौगंद दी और फरमाया क्या तुम लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम से यह सुना है कि उन्होंने कहा था कि जो यह सोचता है कि वह मुझे दोस्त रखता है जबकि वह अली से दुश्मनी रखता है तो वह झूठ कहता है। ऐसा हो ही नहीं हो सकता कि कोई अली से दुश्मनी रखता हो और मुझे दोस्त भी रखता हो। उस समय एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम से कहा हे ईश्वरीय दूत ऐसा क्यों नहीं हो सकता? पैग़म्बरे इस्लाम ने उसके जवाब में फरमाया क्योंकि अली मुझसे हैं और मैं अली से हूं। जो अली को दोस्त रखता होगा वह मुझे भी दोस्त रखेगा और जो मुझे दोस्त रखेगा वह ईश्वर को दोस्त रखेगा और जो अली से दुश्मनी रखेगा वह मेरा दुश्मन है और जो मेरा दुश्मन होगा वह ईश्वर का दुश्मन होगा” उसके बाद सबने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से कहा कि ईश्वर की सौगंद ऐसा ही है जैसा आप कह रहे हैं।  

 

मिना की पवित्र भूमि में और पैग़म्बरे इस्लाम के कुछ साथियों, साथियों को देखने वालों और बनी हाशिम की उपस्थिति में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के ऐतिहासिक भाषण पर ध्यान देने से यह सवाल पैदा होता है कि क्यों इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इस सीमा तक हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सद्गुणों को बयान किया और वहां मौजूद समस्त लोगों से स्वीकारोक्ति ली?

 

ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार इसका कारण यह है कि मोआविया ने कुछ हदीस अर्थात पैग़म्बरे इस्लाम के कथनों का करने वालों को लालच देकर हज़रत अली अलैहिस्सलाम की निंदा में बहुत सी हदीसें गढ़वाई थीं ताकि इस प्रकार से वह हज़रत अली अलैहिस्सलाम की छवि को खराब कर सके। जब वह बहुत सारी हदीसें गढ़वा चुका तो उसने आदेश दिया कि मक्का और मदीना की समस्त मस्जिदों, जुमा की नमाजों और इस्लामी जगत के बहुत से महत्वपूर्ण शहरों में हज़रत अली अलैहिस्सलाम को बुरा भला कहा जाये और उन पर लानत भेजी जाये। मोआविया के छलावे में आने वाले सामान्य लोग भी अपनी नमाज़ों के बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम को बुरा- भला कहते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के खिलाफ इतना अधिक दुष्प्रचार किया गया था कि जब रमज़ान के पवित्र महीने में सुबह की नमाज़ पढ़ाते समय उन पर जानलेवा हमला किया गया और २१ रमज़ान को उसी हमले की वजह से वह शहीद हो गये तो लोगों ने बड़े आश्चर्य से पूछा कि क्या अली नमाज़ भी पढ़ते थे? इस आधार पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सदगुणों को बयान करने से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का उद्देश्य उनके बारे में मौजूद भ्रांति को दूर करना, मोआविया के षडयंत्रों से पर्दा उठाना और वास्तविकता से लोगों को अवगत करना था।

इसी प्रकार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम चाहते थे कि पैग़म्बरे इस्लाम के साथियों, इन साथियों को देखने वालों और बनी हाशिम के एक गुट की उपस्थिति में यह बात कह दें ताकि किसी के पास इस बात का बहाना न रहे कि हमें पता नहीं था अगर हमें पता होता तो हम आपके साथ होते। ठीक उसी तरह जिस तरह इस्लाम के आरंभिक इतिहास का विश्लेषण करने वाले कुछ विश्लेषक गलत तरीके से आशूरा की घटना का विश्लेषण करते और उसका औचित्य इस प्रकार दर्शाते और कहते हैं” मोआविया के काल के लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम के समय को नहीं देखा था, हज़रत अली के न्याय के दौर की जानकारी उन्हें अधिक नहीं थी और मोआविया ने इस्लामी रूप धारण करके बड़े पैमाने पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम के खिलाफ दुष्प्रचार किया और लोगों के दिलों में पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के प्रति द्वेष का बीज बो दिया। इस आधार पर स्वाभाविक रूप से लोग हज़रत अलैहिस्सलाम और उनकी संतान से अधिक अवगत नहीं थे इसलिए उन्होंने अमवी शासकों के साथ हज़रत अली और इमाम हुसैन के खिलाफ युद्ध किया। इस प्रकार के तर्क से प्रतीत यह हो रहा है कि मानो ये लोग उन लोगों के कृत्यों का औचित्य दर्शाना चाहते हैं जो आशूरा जैसी हृदय विदारक घटना को अस्तित्व में लाये और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के खिलाफ युद्ध किया और ये लोग कर्बला जैसी घटना का औचित्य दर्शाकर उसे सामान्य घटना बताने की चेष्टा में हैं जबकि उस समय भी लोगों के मध्य पैग़म्बरे इस्लाम के साथी और उनके साथियों को देखने वाले मौजूद थे और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को बुलाने के लिए इराकियों ने लगभग 30 हज़ार पत्र भेजे थे और इन पत्रों में इमाम का आह्वान किया गया था कि वह शाम अर्थात वर्तमान सीरिया की ओर चलें ताकि वे उनकी सहायता करके बनी उमय्या के शासन का अंत कर दें। इस आधार पर वचन तोड़कर और पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों को छोड़कर बनी उमय्या के अत्याचारी शासकों की शरण में जाने वालों के कृत्यों का किसी प्रकार से औचित्य नहीं दर्शाया जा सकता। जब हज़रत ज़ैनब और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने कूफा और शाम के बाज़ारों में ऐतिहासिक व साहसिक भाषण दिया तो वही दुनिया के भूखे लोग निश्चेतना की नींद से उठ गये और अपनी ग़लती की भरपाई के लिए उन्होंने तव्वाबीन और मुख्तार जैसा आंदोलन किया।

 

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Jul ०३, २०१८ १३:०६ Asia/Kolkata
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