हमारी चर्चा यज़ीद बिन मोआविया के हाथ में इस्लामी शासन की लगाम आने के बाद शहीदों के सरदार हुसैन बिन अली अलैहेमस्सलाम के व्यवहार के बारे में है।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मदीना से निकलने के बाद आम और ख़ास लोगों को जागरुक बनाने के लिए सॉफ़्ट वॉर की शैली अपनायी। आपने लोगों से मुलाक़ातें कीं, भाषण दिए और ख़त लिखे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कहीं पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के नैतिक गुणों व सदाचारिता की व्याख्या की तो कहीं उमवी परिवार और ख़ास तौर पर मोआविया और यज़ीद के अस्ली चेहरे से पर्दा उठाया ताकि लोग जान सकें कि उनकी ओर से यज़ीद का आज्ञापालन न करने की वजह क्या है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम सत्य को फैलाने की कोशिश में थे और यज़ीद उसे मिटाना चाहता था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को इस्लाम को बचाने की चिंता थी जबकि यज़ीद इस्लाम को ख़त्म करना चाहता था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पीड़ितों को मुक्ति दिलाने और न्याय की स्थापना की फ़िक़्र में थे जबकि यज़ीद के शासन का आधार ही अत्याचार पर टिका था। इसलिए यज़ीद का आज्ञापालन करने का कोई सवाल नहीं उठता था। सबसे अहम बिन्दु यह था कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मानवता का मार्गदर्शन करके उसके लिए परलोक को बसाने की कोशिश में थे जबकि यज़ीद परलोक को तबाह कर मानवता को नरक की ओर ढकेलना चाहता था।

महान शिया धर्मगुरु व मोहद्दिस शैख़ सदूक़ कहते हैं कि एक दिन एक व्यक्ति इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सेवा में आया और उसने उनसे पवित्र क़ुरआन के इस्रा नामक सूरे की आयत नंबर 71 की व्याख्या पूछी कि जिसका अनुवाद है, "क़यामत में हम लोगों को उनके मार्गदर्शकों के साथ बुलाएंगे।" इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जवाब में फ़रमाया, "मार्गदर्शक लोगों को सही मार्ग और ईश्वर की बंदगी की ओर बुलाता है। एक गुट उसे क़ुबूल करता और उस पर अमल करता है। एक दूसरा अगुआ भी होता है जो समाज को पतन की ओर ढकेलता है और दूसरा गुट उसका अनुसरण करता है।" इसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने शूरा सूरे की आयत नंबर 7 का हवाला दिया जिसमें ईश्वर कह रहा है कि "पहला गुट स्वर्ग में और दूसरा गुट नरक में जाएगा।"

 

इस आधार पर शुद्ध इस्लाम में मार्गदर्शक व इमाम का चयन केवल राजनैतिक व सामाजिक मामला नहीं है बल्कि इसके चयन का संबंध इंसान के अमर जीवन से है। जो लोग ईश्वर की ओर से निर्धारित मार्गदर्शक का पालन करते हैं वे स्वर्ग में जाएंगे और जो लोग भ्रष्ट  व अत्याचारी नेताओं का अनुसरण करते हैं वे हमेशा नरक में रहेंगे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इंसानों को नरक में गिरने से बचाने के लिए अत्याचारी शासकों के मुक़ाबले में इंसान की अहम ज़िम्मेदारी को बयान करते हुए फ़रमाते हैं, "हे लोगो! पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, जिस किसी को ऐसे अत्याचारी शासक का सामना हो जो ईश्वर की ओर से वैध चीज़ों को हराम करे, ईश्वर के साथ हुए क़रार को तोड़े, पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण का विरोध करे, ईश्वर के बंदों के लिए पाप का रास्ता खोले, लेकिन ऐसे अत्याचारी शासक के विरुद्ध आवाज़ न उठाए, उसका मुक़ाबला न करे, ईश्वर की सौगंध ऐसा उदासीन  व्यक्ति का ठिकाना उसी उद्दंडी की तरह नरक है।" इस बात में शक नहीं कि अगर पूरे इतिहास में समाज में लोग उद्दंडी शासक के मुक़ाबले पर उठ खड़े होते, ख़तरों से न डरते तो आज दुनिया में अत्याचार व रूढ़ीवाद का वजूद न होता, राष्ट्रों को जंग, लूटपाट व रक्पात न देखना पड़ता।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने इसी दृष्टिकोण के आधार पर अपने दौर के समाज में ज़िम्मेदारी की भावना को जागृत करने और उन्हें नरक में जाने से बचाने की कोशिश क्योंकि नरक अत्याचारियों और उन लोगों का ठिकाना है जो अत्याचारियों के अत्याचार के सामने ख़ामोश रहते हैं। लेकिन आराम पसंद लोगों ने इन चेतावनियों पर ध्यान न दिया जिसकी वजह से आशूरा जैसी त्रासदी घटी। शहीदों के सरदार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने एक अन्य भाषण में बनी उमय्या के क्रियाकलापों से पर्दा उठाते हुए फ़रमाया "हे लोगो! जान लो कि उन्होंने ईश्वर का आज्ञापालन छोड़ दिया है, शैतान का अनुसरण कर रहे हैं, भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और ईश्वरीय सीमाओं को फलांग गए हैं, ईश्वर की ओर से वर्जित व अवैध चीज़ों में बदलाव कर दिया है। मैं मुसलमानों के नेतृत्व के लिए इन धर्मविरोधियों व उद्दंडियों से अधिक योग्य हूं जिन्होंने मेरे नाना के धर्म के नियम व सिद्धांतों को बदल दिया है।"

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने इस भाषण में जनमत को जागरुक बनाने के साथ साथ उमवी वंश की वैधता को नकार दिया और समाज के नेतृत्व के लिए अपनी योग्यता को साबित किया और साथ ही यज़ीद का आज्ञापालन का प्रण न लेने का कारण भी पेश किया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ईश्वरीय धर्म और पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण को जीवित करने की कोशिश में हैं जबकि यज़ीद इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम के आचरण को मिटाने के बारे में सोच रहा है। इस हालत में यह कैसे मुमकिन है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम यज़ीद से हाथ मिला लें? यही वजह है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मदीना के गवर्नर के जवाब में, जब उसने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से यज़ीद की बैअत करने के लिए कहा तो फ़रमाया, "अगर मैं यज़ीद की बैअत कर लूं तो इस्लाम का अंतिम संस्कार समझो!"

सवाल यह उठता है कि क्या सिर्फ़ इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफ़ादार साथियों की यह ज़िम्मेदारी थी कि वे इस्लाम को बचाने के लिए आंदोलन करें और नवस्थापित इस्लाम के पौधे को अपने पवित्र ख़ून से सींचे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इस ग़लत व इस्लाम विरोधी दृष्टिकोण को निरस्त करने के लिए, धर्मगुरुओं को संबोधित करते हुए उनकी आलोचना करते हैं ताकि उन्हें याद दिलाएं कि आम लोगों से पहले धर्मगुरुओं व विद्वानों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे अत्याचारी व भ्रष्ट शासक के ख़िलाफ़ उठ खड़े हों। इसी वजह से आपने एक मशहूर भाषण दिया जो अच्छाईयों के आदेश और बुराइयों से मना करने वाले भाषण के नाम से मशहूर है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपना भाषण हे लोगो! से शुरु करते हैं ताकि इस बिन्दु को समझाएं कि उनका संदेश उनके दौर के लोगों से विशेष नहीं है, बल्कि सभी लोग इस संदेश पर ध्यान दें। अलबत्ता इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के मुख्य संबोधक धर्मगुरु हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम यह सवाल करते हैं कि क्या तुम लोग जानते हो कि यहूदी और ईसाई धर्मगुरुओं की क़ुरआन में क्यों आलोचना की गयी है? जैसा कि ईश्वर मायदा सूरे की आयत नंबर 63 में फ़रमाता है, "यहूदी और ईसाई धर्मगुरु लोगों को बुरी बातों और हराम व वर्जित चीज़ों को खाने से नहीं रोकते थे।" इस महाज़िम्मेदारी को अंजाम देने में इस लापरवाही की वजह से बनी इस्राईल सही मार्ग से भटक गए और ईश्वरीय धिक्कार का निशाना बने जैसा कि मायदा सूरे की आयत नंबर 78 और 79 में ईश्वर कह रहा है, "बनी इस्राईल का वह गुट जो धिक्कार का पात्र बना, एक दूसरे को बुरे काम से नहीं रोकता था और कितना बुरा व्यवहार उसने अपना रखा था।"

वास्तव में ईश्वर ने इसलिए बनी इस्राईल को फटकार लगायी क्योंकि वे अपनी आंखों से यह देखते हुए कि अत्याचारी भ्रष्टाचार फैला रहे हैं, धार्मिक, मानवीय और इंसानी हदों को पार कर रहे हैं, भौतिक संसाधनों के आकर्षण और उनकी शक्ति के डर से ख़ामोश रहे और किसी तरह की उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखायी हालांकि ईश्वर मायदा सूरे की आयत नंबर 44 में कहता है, "लोगों और खोखली ताक़तों से न डरो बल्कि मुझसे डरो।"

उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बुराइयों के संबंध में धर्मगुरुओं और लोगों के ग़लत व्यवहार की आलोचना करने के बाद उस गुट की सराहना करते हैं जो मूल्यों की रक्षा और बुराइयों को रोकने के लिए कोशिश करते हैं। जैसा कि तौबा सूरे की आयत नंबर 71 में ईश्वर कहता है, "ईमान वाले मर्द और औरतें आपस में दोस्त और एक दूसरे के मददगार हैं। अच्छाइयों व भले कर्म का आदेश देते और बुराइयों से रोकते हैं।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम समाज में भलाई के चलन और बुरायी से रोकने को अपने आंदोलन का एक उद्देश्य और इसे पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शैली बताते हुए इन दो अहम धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक कर्तव्य के चलन की उपलब्धियों के बारे में फ़रमाते हैं, "अगर भलाई का आदेश और बुरायी से दूरी पर पूरे आयाम के साथ व्यक्तिगत व सामाजिक स्तर पर अमल हो, तो सभी ईश्वरीय आदेश चाहे आसान हों या मुश्किल, व्यवहारिक होंगे और इस्लाम की ओर निमंत्रण और उसके फैलने की पृष्ठिभूमि मुहैया होगी।" इस तरह पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा होगी और अत्याचारी व अतिक्रमणकारी शासकों के ख़िलाफ़ संघर्ष की भावना जागृह होगी। राष्ट्रीय संपत्ति का न्यायपूर्ण बंटवारा होगा। दान और टैक्स सही तरीक़े से जमा होंगे और आय ईश्वरीय क़ानून के अनुसार वितरित व ख़र्च होगी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के इस मुख्य निर्देश के मद्देनज़र इस्लामी जगत की सभी मुश्किलों का अंत तभी होगा जब समाज का एक एक व्यक्ति ख़ास तौर पर धर्मगुरु, विद्वान, लेखक और सुधारक भलाई के आदेश और बुराई से दूरी के सिद्धांत को अहमियत दे और विश्व साम्राज्य और उनके पिट्ठुओं के ख़िलाफ़ उठ खड़ा हो। इस हालत में न सिर्फ़ मुसलमान बल्कि पूरे मानव समाज का भविष्य उज्जवल होगा।

 

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Jul ०३, २०१८ १३:५४ Asia/Kolkata
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