हमने इस बात की चर्चा की थी कि कुछ लोग आशूरा की एतिहासिक व महान घटना को एक सामान्य घटना समझते हैं जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है।

आशूरा वह महान व एतिहासिक महाआंदोलन है जो कर्बला से आरंभ हुआ और आज तक जारी है। आशूरा के दिन जो विशेष ज़ियारत पढ़ी जाती है उसके एक भाग में हम पढ़ते हैं” हम उससे सुलह करेंगे जो आपसे सुलह करेगा और हम उससे युद्ध करेंगे जो आपसे युद्ध करेगा”

इस समय यह सवाल किया जा सकता है कि आशूरा से हमें क्या सीख मिलती है? किस चीज़ ने इस महान घटना को अमर बना दिया है?

 

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम की पावन शैली को व्यवहारिक बनाने के लिए इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों ने दर्शा दिया कि एक सच्चा मुसलमान वह है जिसके अंदर समान विचार रखने वालों के प्रति आकर्षण हो और काफिरों एवं मिथ्याचारियों के मुकाबले में प्रतिरोध की भावना हो। इसी तरह दुश्मन की पहचान और उसके षडयंत्रों से पर्दा उठाना आशूरा की राजनीतिक उपलब्धियों मेले हैं। इसी तरह गुमराहियों के मुकाबले में लोगों को जागरुक बनाना, अत्याचारी शासकों के मुकाबले में प्रतिरोध की भावना पैदा करना, लापरवाही से काम न लेना और अत्याचारों के मुकाबले में मौन धारण न करना, मंच पर आने के लिए विद्वानों का आह्वान, अत्याचारियों से सांठ- गांठ न करना, अत्याचारियों एवं अनेकेश्वरवादियों के प्रतीकों से भयभीत न होना, आज़ादी की संस्कृति को पुनर्जीवित करना, अपमान के जीवन पर प्रतिष्ठित जीवन को प्राथमिकता देना और राजनीति, धर्म से अलग की विचारधारा को नकारना आदि आशूरा की अन्य उपलब्धियां हैं।

त्याग व परित्याग की भावना को जीवित करना, जीवन को धोखा देने वाली चीज़ों से मुंह मोड़ लेना, धार्मिक ज्ञान एवं सूझ- बूझ को अधिक करना, अज्ञानता से संघर्ष, किसी चीज़ को सरसरी दृष्टि से न देखना और जानकारी के साथ इमामत का अनुसरण जैसी बातें आशूरा की कुछ सांस्कृतिक उपलब्धियां हैं। इस संबंध में एक बहुत महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि आशूरा की समस्त उपलब्धियां आध्यात्मिकता एवं नैतिकता का प्रतिबिंम्बन हैं। वास्तव में अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथी महाआंदोलन कर सके और वह पूरे इतिहास में विश्व वासियों के लिए प्रेरणादायक है तो इसका कारण यह है कि उनकी आत्मा अध्यात्म से ओत- प्रोत थी और यह वास्तविकता आशूरा की रात को प्रतिबिंबित हुई। आशूरा की रात को जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को इस बात की जानकारी मिली कि दुश्मन उनके तंबू के निकट आ गये हैं तो उन्होंने अपने प्राणप्रिय भाई हज़रत अब्बास को अपने कुछ साथियों के साथ दुश्मन की सेना के पास भेजा और कहा कि वे उन्हें एक रात का एक अवसर दें ताकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके साथी एक रात और महान ईश्वर की उपासना कर लें। स्वयं इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने आशूरा की रात को फरमाया था कि मुझे नमाज़ पढ़ना, पवित्र कुरआन की तिलावत करना, दुआ करना और ईश्वर की बारगाह में क्षमा याचना करना बहुत पसंद है।“

 

रोचक बात यह है कि दुश्मन से यह मांग उस समय की गयी थी जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों को इस बात का पूर्ण विश्वास हो गया था कि अगले दिन उन सबको शहीद कर दिया जायेगा परंतु उन्होंने किसी भी प्रकार की परेशानी व व्याकुलता के बिना अनउदाहरणीय नमूना पेश किया। महान ईश्वर के प्रति प्रेम का यह अनउदाहरणीय नमूना दसवीं मोहर्रम की दोपहर को अपने शिखर बिन्दु पर पहुंच गया यानी ठीक दोपहर को जब नमाज़ का समय हो गया और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कुछ साथी नमाज़ पढ़ने के लिए इमाम के पीछे खड़े हो गये और उनके कुछ साथी इमाम के आगे खड़े हो गये और वे बढ़ बढ़ कर दुश्मन की सेना की ओर से आ रहे बाणों को अपने सीनों से रोकते रहे। इससे ईश्वरीय मार्ग पर चलने वालों को यह सीख मिलती है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों ने किस तरह जीवन की कठिनतम परिस्थिति में नमाज़ को कायेम रखा।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों ने महान ईश्वर के उस कथन से प्रेरणा ली थी जिसमें महान ईश्वर ने कहा है कि हे ईमान लाने वालो नमाज़ और धैर्य से काम लो निः संदेह ईश्वर धैर्य करने वालों के साथ है।

                       

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का समूचा अस्तित्व महान ईश्वर के प्रेम रूपी सागर में डूबा हुआ था। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने एक दुआ मक्का के अरफात मरुस्थल में पढ़ी थी जो दुआये अरफा के नाम से मशहूर है। यह दुआ महान ईश्वर से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की बंदगी के शिखर बिन्दु को दर्शाती है। यह दुआ इसी प्रकार इस बात की सूचक है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम महान ईश्वर के बंदों से भी गहरा संबंध रखते थे। इस तरह वह अपने अनुयाइयों को यह समझाना चाहते हैं कि सृष्टि और सृष्टि के रचयिता से प्रेम एक दूसरे से विरोधास नहीं रखते बल्कि दोनों आवश्यक है और यह समस्त ईश्वरीय दूतों विशेषकर पैग़म्बरे इस्लाम की शैली है जो समस्त कालों के लिए है। इस संबंध में विभिन्न नमूनों को देखा जा सकता है जो इस बात के सूचक हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम किस प्रकार लोगों के साथ मानवीय संबंध रखते थे। चूंकि कार्यक्रम का समय सीमित है इसलिए यहां केवल एक ही उदाहरण बयान करेंगे और वह भी इस आशा के साथ कि महान ईश्वर हम सबको उनके पथ पर चलने का सामर्थ्य प्रदान करे।         

 

एक दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम एक रास्ते से गुज़र रहे थे। कुछ निर्धन व दरिद्र लोग ज़मीन पर बैठे सूखी रोटी खा रहे थे। उन्होंने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अनुरोध किया कि वे भी उनके साथ आ जायें। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने तुरंत उनके निमंत्रण को स्वीकार कर लिया और जाकर उनके साथ सूखी रोटी खाई। उसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने उन सबको अपने घर बुलाया और बहुत अच्छी तरह से उन सबका आतिथ्य सत्कार किया। इस प्रकार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने सदाचरण से लोगों को मानव प्रेम का पाठ दिया। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद उनकी पीठ पर निशान देखे गये। लोगों ने इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम से इसका कारण पूछा तो इमाम ने इसके उत्तर में कहा यह खाद्य पदार्थों के उन थैलों के चिन्ह हैं जो हमारे पिता रात के अंधेरों में उन घरों में पहुंचाते थे जिनमें अनाथ व निर्धन बच्चे होते थे और उन घरों की अभिभावक महिलाएं होती थीं।

इसके अलावा भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपने सच्चे अनुयाइयों को मानव सेवा का आदेश दिया है जिनमें से हम कुछ की ओर संकेत कर रहे हैं। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” जो कोई एक मुसलमान के दुःख को दूर करे तो ईश्वर लोक- परलोक के दुःख को उससे दूर रखेगा। इसी तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” जो दूसरे के साथ भलाई करे तो ईश्वर उसके साथ भलाई करेगा और ईश्वर अच्छाई करने वालों को पसंद करता है।

इसी प्रकार जो ज़रुरत मंद अपनी ज़रुरत को लोगों से बयान करते हैं उनके संबंध में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” ज़रूरतमंदों का अपनी जरुरतों को तुम से बयान करना ईश्वरीय अनुकंपा है। जब लोग अपनी मुश्किलों को तुमसे बयान करें तो तुम क्षुब्ध व अप्रसन्न न हो और यथासंभव उनकी आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करो अन्यथा कभी एसा भी हो सकता है कि वह ईश्वरीय अनुकंपा तुम्हारे दुर्भाग्य में परिवर्तित हो जाये और मौका तुम्हारे हाथ से निकल जाये कि बाद में पछताने का कोई लाभ नहीं है।

समाज सेवा और लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति इस्लाम की दृष्टि में बहुत महत्वपूर्ण है परंतु नैतिक एवं मानवीय सदगुणों से सुसज्जित होना उसके महत्व में वृद्धि कर देता है और उसका मूल्य कई गुना अधिक हो जाता है। इसी कारण इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” हे लोगो उच्च व नैतिक सदगुणों को प्राप्त करने में एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करो और इस क्षेत्र में एक दूसरे से आगे बढ़ने की कोशिश करो।“

 

 “समू अलमाअना फी समू अज़्ज़ात” नामक किताब के प्रसिद्ध मिस्री लेखक अल्लामा अब्दुल्लाह अलाएली लिखते हैं” हम इतिहास में बड़ी- बड़ी हस्तियों को देखते हैं जिन्होंने किसी एक क्षेत्र में विश्व ख्याति प्राप्त कर ली। कोई बहादुरी के क्षेत्र में, कोई परित्याग के मैदान में, कोई दान- दक्षिणा के क्षेत्र में परंतु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम एसी महान हस्ती हैं जिनके जीवन के अनगिनत पहलु मानव इतिहास को प्रकाशमयी बना रहे हैं। मानो वह समस्त मानवीय व नैतिक सदगुणों के संग्रह हैं।“

जी हां! इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के नाती हैं और न्याय की प्रतिमूर्ति, पुरुषार्थ और परित्याग के उदाहरण हज़रत अली और समस्त सदगुणों की स्वामी हज़रत फातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा के बेटे हैं। इस प्रकार की हस्ती किस प्रकार इंसानों का उत्कृष्टतम उदाहरण न हो?

 

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Jul ०३, २०१८ १५:३६ Asia/Kolkata
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