इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़़ामेनई ने हालिया दिनों में इमाम हुसैन कैडिट कॉलेज के दीक्षांत सामारोह में भाग लिया ।

यह कॅालेज, आईआरजीसी के सदस्यों को प्रशिक्षण देने का काम करता है। वरिष्ठ नेता , ईरान के संविधान के अनुसार, सशस्त्र सेना के सुप्रीम कमांडर हैं इस लिए वह क्रांति संरक्षक बल के विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेकर, कैडिटों का मार्गदर्शन करते हैं। इस कार्यक्रम में भी वरिष्ठ नेता ने कैडिट कॅालेज के छात्रों को प्रोत्साहित करने के बाद इस्लामी गणतंत्र ईरान की शक्ति के तत्वों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख किया। वरिष्ठ नेता ने कहा कि मूल रूप से किसी भी राष्ट्र का जीवन और ताज़गी, इस पर निर्भर होती है कि वह  अपनी शक्ति के तत्वों को मज़बूत करे और ज़रूरत पड़ने पर और सही समय पर उनसे लाभ उठाए। आज इस जगह पर हम जो कुछ देख रहे हैं वह इसी सिद्धान्त का एक व्यवहारिक रूप है।

 

 

वरिष्ठ नेता ने आईआरजीसी के कैडिटों के मध्य अपने भाषण मे आरंभ में  दुश्मनों से मुक़ाबले में  " संयम"  और " ईश्वरीय भय" की भूमिका का उल्लेख किया। कुरआने मजीद के सूरए आले इमरान की आयत नंबर 118 से 120 तक में मुसलमानों के दुश्मनों की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। आयत नंबर 118 में हम पढ़ते हैं " उनके स्वर से दुश्मनी झलकती है किंतु उनके सीनो में जो छुपा होता है वह उससे कहीं बड़ा होता है। " इसी प्रकार कुरआने मजीद में कहा गया है कि अगर तुम को कोई सफलता मिलती है तो उन्हें गहरा दुख होता है और अगर तुम्हारे साथ कोई दुखद घटना हो जाए तो वह खुश होते हैं। वरिष्ठ नेता ने इस प्रकार के दुश्मनों की साज़िशों को नाकाम बनाने के लिए कहा कि कुरआने मजीद की इन आयतों के बाद कहा जाता है कि अगर तुम संयम रखो और अल्लाह से डरो तो उनकी धूर्तता से तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। यह  इस सृष्टि का एक नियम है। संयम और ईश्वरीय भय इस बात का कारण बनता है कि  धूर्त दुश्मन अपनी समस्त धूर्तता के बावजूद आप का कुछ न बिगाड़ पाए, अर्थात उनकी धूर्तता से आप को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा लेकिन इसके लिए शर्त क्या है? शर्त है कि आप ई्श्वर से डरें और संयम रखें। इसके बाद वरिष्ठ नेता ने संयम और ईश्वरीय भय के बारे में कुछ बातें बतायीं।

 

वरिष्ठ नेता ने दुश्मनों के मुकाबले में संयम को इस प्रकार से स्पष्ट कियाः संयम अर्थात मैदान में डटे रहना, मैदान से बाहर न जाना , कुछ लोग मैदान  से भाग खड़े होते हैं, कुछ लोग भागते तो नहीं लेकिन धीरे धीरे मैदान के किनारे चले जाते हैं , यह संयम नहीं है, संयम यानि डटे रहना, मैदान में खड़े रहना है। संयम अर्थात, बडे़ लक्ष्यों, सुदुर क्षितिज पर नज़रे गाड़े रहना है । वरिष्ठ नेता ने क्षणिक सफलताओं पर घंमड और उसके धोखे में आने को घातक बताया और बल दिया कि  दूर के लक्ष्य पर नज़र जमाएं, चोटी को देखें, देखें क्रांति और व्यवस्था का मुख्य संदेश क्या है और वह ईरान की जनता, इस्लामी राष्ट्र और मानव समाज को किस दिशा में ले जाना चाहता है, वहां नज़र जमाएं ... अगर हम ने संयम रखा तो बड़े लक्ष्य हमारे हैं  अगर आज आप डट गये तो आने वाली पीढ़ियां उस चोटी तक पहुंच जाएंगी।

 

इस के बाद वरिष्ठ नेता ने कुरआने मजीद के सूरए आले इमरान की आयत नंबर 120 में तक़वा व ईश्वरीय भय की समीक्षा की और कहा कि इस आयत में तक़वा और ईश्वरीय भय का उल्लेख उसके व्यापक अर्थ के साथ किया गया है यहां पर ईश्वरीय भय के दोनों अर्थों से लाभ उठाया गया है , अर्थात इस आयत में इस्लामी राह पर डटे रहने और भटकने से बचने के अर्थ में भी है और दुश्मनों से मुकाबले में अपनी रक्षा के अर्थ में भी है। वरिष्ठ नेता ने कहा कि अगर इस प्रकार का संयम और ईश्वरीय भय   पैदा हो गया तो फिर आप को कोई चीज़ नुक़सान नहीं पहुंचा सकती और ईश्वर की सहायता से एेसा ही होने वाला है।

 

 

वरिष्ठ नेता ने इसके बाद ईरान की शक्ति की रचना करने वाले तत्वों को स्पष्ट करना आरंभ किया। उन्होंने भूमिका में ईरान में इस्लामी क्रांति से पहले और बाद के हालात का उल्लेख किया और क्रांति से पहले तानाशाही के दौर के बारे में कहा कि पहलवी शासन में ब्रिटेन और फिर अमरीका ने सही अर्थों में इस देश पर राज किया तो इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि शासक का निर्धारण उन्होंने किया और उसे हटाया भी उन्होंने, फिर एक और राजा को ले जाए सरकारें उनकी इच्छा के अनुसार बनी और देश की महत्वपूर्ण नीतियां, ब्रिटेन और अमरीका की इच्छा के अनुसार बनायी जाती थीं 57 वर्षों तक देश को इस प्रकार से चलाया गया वरिष्ठ नेता ने इसके बाद देश में क्रांति की सफलता और ईरानी राष्ट्र को प्राप्त होने वाली स्वाधीनता व स्वतंत्रता का उल्लेख करते हुए कहा कि जनता में आत्मविश्वास, ईश्वर पर आस्था से सुसज्जित था, हमारे हाथ , क्रांति लाने वाले अन्य देशों की तरह, ईश्वर पर आस्था, उस पर भरोसे और आध्यात्मिकता  से खाली नहीं थे कि जो आधे रास्ते में ही अटक जाते, ईमान ने हमें रोके रखा, उसने हमारी रक्षा की, हमे आगे बढ़ाया, हमारा मार्गदर्शन किया। यह ईमान मूल्यवान रत्न था और इस आन्दोलन की आत्मा समान था जिसने हमारे भीतर ईमान व आशा का प्रकाश बिखेरा और हमारे भीतर बलिदान व आस्था की ज्योति जगायी। इसके बाद वरिष्ठ नेता ने ईरान में वैज्ञानिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सैनिक क्षेत्रों में प्राप्त की जाने वाली उपलब्धियों को गिनवाते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय शक्ति के तत्व हैं, राष्ट्रीय शक्ति यानि यह चीज़ें।

 

फार्स की खाड़ी के दक्षिणी तट के कुछ देशों की तरह बहुत सी सरकारें, शक्ति के तत्वों को, पश्चिमी देशों से भारी मात्रा में हथियार खरीदने और अपनी जनता के मुकाबले में उनसे अपनी सहायता पर निर्भर मानती हैं

लेकिन वरिष्ठ नेता इन कामों को अपमान जनक समझते हैं और शक्ति की परिभाषा इस प्रकार करते हैं। शक्ति यह है कि राष्ट्र में भीतर से उबाल आए, ज्ञान विज्ञान, सैन्य क्षमता, देश निर्माण, विकास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान के लिए खुद आगे बढ़े। यह  ईरान की शक्ति के तत्व हैं। वरिष्ठ नेता इस्लामी गणतंत्र ईरान की शक्ति का सब से बड़ा प्रमाण, अमरीका जैसे दुष्ट व शक्तिशाली देश के सामने चालीस वर्षों से जारी प्रतिरोध को बोलते हैं कि जिसकी वजह से ईरानी राष्ट्र अधिक शक्तिशाली हुआ है।

 

ईरान की शक्ति के एक अन्य प्रमाण के रूप में वरिष्ठ नेता ने ईरान के खिलाफ क्षेत्र में अमरीका के गठजोड़ को बताया। वरिष्ठ नेता ने कहा कि यदि अमरीका ईरान के बारे में अपनी इच्छा अनुसार जो चाहता वह कर पाता तो उसे इलाक़े के कुख्यात व रूढ़िवादी देशों के साथ गठजोड़ की ज़रूरत ही नहीं पड़ती और न ही वह उनसे मदद मांगता इस लिए ईरान में हंगामों के लिए इस प्रकार के देशों से मदद मांगना , ईरान की शक्ति का प्रमाण है। वैसे अमरीका और उसके घटक ईरान के खिलाफ षडयंत्र जारी रखे हैं जिसका एक हालिया उदाहरण, आर्थिक दबाव डालकर ईरानी जनता और सरकार के मध्य दूरी पैदा करने की कोशिश है लेकिन वरिष्ठ नेता बल देते हैं कि यह उनकी मूर्खता है उन्हें नहीं पता कि इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था, ईरानी राष्ट्र ही है और इन दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता । इस्लमी व्यवस्था ऐसी व्यवस्था है जिसे स्वंय जनता ने बनाया है और जो जनता की भावनाओं व आस्थाओं से जुड़ी है, इस्लामी व्यवस्था ऐसी है। वरिष्ठ नेता ने दुश्मनों के उद्देश्यों के बारे में बात करते हुए कहा कि देश की उत्साही व महत्वकांक्षाी युवा पीढ़ी को जानना चाहिए कि दुश्मन, उनकी स्वाधीनता का विरोधी है, उनके सम्मान का विरोधी है, उनके विकास का विरोधी है, ज्ञान विज्ञान व राजनीति में उनकी उपस्थितिके खिलाफ है, ईरानी राष्ट्र से दुश्मनी का अर्थ इस देश की स्वाधीनता व विकास व महानता से दुश्मनी है।

 

वरिष्ठ नेता ने  इमाम हुसैन कैडिट कॅालेज में अपने भाषण में ईरान के शत्रुओं से सांठ गांठ को अपमानजनक और खर्चीला काम बताया और कहा कि निश्चित रूप से प्रतिरोध का भी मूल्य चुकाना पड़ता है लेकिन उपलब्धियां भी बड़ी होती हैं यह ईश्वर का अटल नियम है जैसा कि उसने कहा कि सुस्त न पड़ो, दुश्मन से सांठ गांठ की बात न करो तुम्हीं उच्च हो ईश्वर तुम्हारे साथ है तुम्हारे कर्मों को कम नहीं करेगा। ईश्वर तुम्हरे संघर्ष का तुम्हें फल देगा और पूरा फल देगा। वरिष्ठ नेता ने अंत में , राष्ट्रीय शक्ति के जारी और बढ़ते रहने और दुश्मनों की साज़िशों के नाकाम होने के लिए शर्त के रूप में , मैदान में डटे रहने , संयम ईश्वरीय भय , राष्ट्रीय एकता और चेतना का उल्लेख किया।

Jul ११, २०१८ १४:३८ Asia/Kolkata
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