वास्तुकला को अलग-अलग ढंग से परिभाषित किया गया है। 

साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि किसी स्थान को मानव के लिए रहने योग्य बनाने की कला को वास्तुकला कहते हैं।  इसी बात को दूसरे अंदाज़ में परिभाषित करते हुए एक फ़्रांसीसी वास्तुकार "ली कारब्यूसर" कहते हैं कि वास्तुकला वास्तव में वैभवशाली नमूनों के साथ खिलवाड़ करना है।  दूसरे शब्दों में वास्तुकला एक सुव्यवस्थित वैचारिक व्यवस्था है।  कहते हैं कि वास्तुकला एक एसी कला है जो अन्य कलाओं की तुलना में मानव से अधिक निकट है।  हालांकि आरंभिक काल के मनुष्य ने मिट्टी, पानी तथा पत्थर के संयोग से इमारतें बनाईं थी जो साधारण सी होती थीं किंतु इनको कोई रूप देना कलाकारों का काम है।  ईरान में इस्लाम के प्रवेश को चौदह शताब्दियों का समय बीत रहा है।  इस्लाम ने विभिन्न आयामों से ईरान को प्रभावित किया है। ईरान में इस्लाम के आगमन के समय मौजूद इमारतों का अध्ययन करके यह पता चलता है कि उस काल की इमारतें अधिकतर वैभवशाली हुआ करती थीं जो अधिकांश महलों और राजदरबारों पर आधारित होती थीं।  आज भी उसके कुछ अवशेष मौजूद हैं।

पहली हिजरी क़मरी के आरंभिक काल में ईरान की वास्तुकला में ख़ुरासानी वास्तुकला अस्तित्व में आई और फिर यह फलने-फूलने लगी।  ख़ुरासानी वास्तुकला लगभग चार शताब्दियों तक जारी रही।  उस काल के बारे में जो बात स्पष्ट है वह यह है कि सांस्कृतिक ढंग के जो परिवर्तन हो रहे थे वह अधिकतर उस समय के ख़ुरासान वाले क्षेत्र में होते थे जो बहुत ही विस्तृत भाग था।  कहते हैं कि ईरान में जो कला तथा वास्तुकला के नए नमूने इस्लाम के बाद सामने ओए वह ईरान के इस विस्तृत भाग में दिखाई दिये।  यह वास्तुकला ख़ुरासान से ही ईरान के दूसरे क्षेत्रों में गई।

उस काल की इमारतों में सोच-विचार करने से यह बात सामने आती है कि उस काल में इमारतों में सादगी थी।  इस्लामी वास्तुकला की एक विशेषता यह थी कि वह लोगों के सामान्य जीवन से बहुत निकट हुआ करती थी।  ख़ुरासानी वास्तुकला में भव्य इमारतों का निर्माण लगभग रुक गया।  इस वास्तुकला में बनी इमारतें बहुत ही साधारण होती थीं।

ईरानी वास्तुकला में जिसे विशेष महत्व प्राप्त है वह मस्जिद है।  ईरान में बनाई गई पहली मस्जिद, इस्लाम की पहली मस्जिद मस्जिदे नबी से प्रभावित थी जो मदीने में बनी थी।  जैसाकि इतिहास में मिलता है कि जिस स्थान पर मस्जिदे नबी बनाई गई थी उस स्थान को पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने ख़रीद लिया था।  उसके बाद आपके आदेश से यह मस्जिद बनाई गई थी।  मस्जिद को बनाने में पत्थरों का प्रयोग किया गया था।  इस मस्जिद की ऊंचाई एक लंबे व्यक्ति की लंबाई के बराबर थी।  बाद में उसकी छत बनाई गई थी जिसमें लकड़ी का प्रयोग किया गया था।  यह एक वर्गाकार मस्जिद थी।

मस्जिद बनाने की यह साधारण वास्तुकला जब ईरान पहुंची तो इसका प्रयोग केवल मस्जिदों को बनाने में किया जाने लगा।  ईरान में बनाई जाने वाली पहली मस्जिद, मदीने में बनने वाली प्रथम मस्जिद, "मस्जिदे नबी" की शैली पर आधारित थी।  उस काल में मस्जिदें बहुत ही साधारण शैली में ही बनाई जाती थीं।  "ख़ुरासानी" वास्तुकला में ईरान में जो पहली मस्जिद बनाई गई उसका निर्माण, यज़द नगर के निकट "फ़रहज" क्षेत्र में करा गया था।  फ़रहज में बनाई जाने वाली मस्जिद को ईरान की सबसे पुरानी मस्जिद माना जाता है।  इस्लामी वास्तुकला के एक जानेमाने वास्तुकार दिवंगत मुहम्मद करीम परीनिया ने इस मस्जिद के बारे में एक पुस्तक लिखी है।  वे कहते हैं कि लगभग 50 वर्ष पहले पहली बार मैंने इस मस्जिद को देखा था।  इस बारे में वे लिखते हैं कि दशकों पहले जब मैं "बाफ़्क" से वापस आ रहा था तो मैंने विशाल मरूस्थल में एक मस्जिद की मीनारों को देखा।  जब मैंने यह देखा तो मस्जिद के निकट से देखने के लिए मैंने अपना रास्ता बदल दिया।  लंबी यात्रा तै करने के बाद मैं एक छोटी बस्ती मे पहुंचा।  जब उस बस्ती में मैं मस्जिद के निकट पहुंचा तो देखा कि मस्जिद की मीनार के नीचे गांव के कुछ लोग खड़े हुए हैं।  जब गांववालों को यह पता चला कि मैं वास्तुकला का जानकार हूं तो उन्होंने मुझसे कहा कि आप इस पुरानी मस्जिद के इतिहास के बारे में हमें बताइए।  मस्जिद को निकट से देखकर मुझको इस बात का अनुमान हुआ कि यह वास्तव में बहुत ही पुरानी मस्जिद है।  मस्जिद की वास्तुकला और उसकी ईंटों को देखकर यह पता चला कि यह सासानी शासनकाल से संबन्धित हो सकती है अतः इसे ईरान में इस्लाम के आने के आंरभिक काल में बनाया गया होगा।

"फ़हरज जामा मस्जिद" का नक्शा बहुत ही साधारण है।  इसके प्रांगण में तीन प्रवेश द्वार हैं।  इन प्रवेश द्वारों में बीच वाला प्रवेश द्वार तुल्नात्मक रूप में बड़ा है।  इस मस्जिद की एक वह विशेषता जो लोगों को आकर्षित करती है इसके दरवाज़ों पर की गई नक़्क़ाशी है।  माना जाता है कि इस मस्जिद को बनाने वाले वास्तुकार ने यह सोचकर मस्जिद का निर्माण किया था कि वह अपने पीछे सासानी वास्तुकला का एक उदाहरण अपने पीछे छोड़ जाए।

दामग़ान मस्जिद भी प्राचीन ख़ुरासान वास्तुकला का एक अदभुत नमूना है।  यह मस्जिद, ईरान की राजधानी तेहरान से 340 किलोमीटर पूर्व में स्थित है।  यह एक वर्गाकार मस्जिद है।  इसकी छत फ़हरज की मस्जिद से कुछ छोटी है।  लेकिन जानकारों का कहना है कि फ़हरज मस्जिद की तुलना में इस मस्जिद को अधिक सुन्दर बनाया गया है।  इसकी छत को सुसज्जित किया गया है।  इसकी दीवारें कहीं-कहीं पर भीतर की ओर हैं जिससे सुन्दर डिज़ाइन बन गए हैं।  इतिहास की कुछ किताबों में मिलता है कि इस मस्जिद के नींचे भूमि के के भीतर एक ख़ज़ाना-घर बनाया गया था जिसमें लोग अपनी मूल्यवान वस्तुएं लाकर रखा करते थे।  लेकिन वर्तमान समय में उसका कोई निशान बाक़ी नहीं बचा है।

इन प्रमाणों ये यह सिद्ध होता है कि कुछ इतिहासकारों तथा पूर्वी मामलों के विशेषज्ञों की ओर से ईरान में अरब व उमवी व अब्बासी वास्तुकला की परिभाषा का प्रयोग सही नहीं है बल्कि वास्तविकता यह है कि उस काल में ईरान की वास्तुकला, इस्लामी वास्तुकला पर आधारित थी।  इसके अतिरिक्त कहीं-कहीं पर यह सासानी वास्तुकला से प्रभावित दिखाई देती है।  इस प्रकार से कहा जा सकता है कि ईरान के पड़ोसी देश या पड़ोसी राष्ट्र, ईरान की वास्तुकला पर कोई प्रभाव नहीं डाल सके क्योंकि ईरान के पास हज़ारों साल पुरानी सभ्यता रही है।

बताया जाता है कि ईरान में ख़ुरासानी वास्तुकला शैली के प्रभाव सन 999 ईसवी तक देश के विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद थे।  ख़ुरासान वास्तुकला शैली की धरोहरों में अधिकतर मस्जिदें ही हैं जिनकी साज-सज्जा करके बाद में अधिक सुन्दर बनाया गया।  इनके नमूनों के रूप में इस्फ़हान की जामा मस्जिद, मस्जिदे अरदिस्तान, मस्जिदे जामे नाईन, तबरीज़ की जामा मस्जिद तथा कुछ अन्य इमारतें हैं।

 

Jul १४, २०१८ १३:३८ Asia/Kolkata
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