बहा वलद छठी और सातवीं शताब्दी में ख़ुरासान के आत्मज्ञानियों, प्रवचनकर्ताओं और सूफ़ी धर्मगुरु तथा मशहूर ईरानी शायर व आत्मज्ञानी मौलाना जलालुद्दीन रूमी के पिता थे।

बहा वलद के पिता हुसैन बिन अहमद ख़तीबी, अपने समय के बहुत बड़े विद्वान थे। बहा वलद ने 546 हिजरी क़मरी में बल्ख़ शहर में एक महशूर परिवार में आंख खोली। बल्ख़ ख़ुरासान के अहम शहरों में था। बहा वलद ने भी अपने पूर्वजों की तरह बल्ख़ में प्रवचनकर्ता व मुफ़्ती के रूप में काम करना शुरु किया और अपने दौर के प्रवचनकर्ता ख़ुरासान और ट्रान्सोज़ानिया के शहरों, तथा तुर्किस्तान, वख़्श, सग़द और ख़्वारज़्म का सफ़र करते थे। वह जिस जगह जाते और जिस शहर में जितने समय रहते थे, मस्जिदों में प्रवचन देते थे, स्कूलों में पढ़ाते और सूफ़ियों की ख़ानक़ाहों में जाते थे। उनके प्रवचन में लोगों की भीड़ रहती थी और उनकी क्लासें बहुत दिलचस्प होती थीं। इसी तरह दूसरे धर्मगुरुओं के क्लासों में जो बातें आम तौर पर पढ़ायी जाती थीं उनकी तुलना में बहा वलद की क्लासें बहुत अलग होती थीं। अनेक जीवनियों में आया है कि बहा वलद ने शासक ख़्वारज़्म शाह के अत्याचार के कारण और ईरान में पर मंगोलों के हमले की ख़बर की वजह से बल्ख़ से पलायन करने का फ़ैसला किया। बहा वलद ने अपने परिवार और श्रद्धालुओं के साथ कुछ समय इराक़ और सीरिया में गुज़ारा और फिर एशिया माइनर के पूर्वी छोर की ओर चले गए। इस क्षेत्र में फ़ारसी भाषा आम बोल चाल व लेखन की भाषा थी इसी वजह से उनके प्रवचन की सभाओं में लोगों की भीड़ रहती थी। बहा वलद अपने जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में अपने परिवार के साथ क़ूनिया चले गए। क़ूनिया की जनता, प्रतिष्ठित लोगों और बुद्धिजीवियों ने उनकी बहुत आवभगत की। 628 हिजरी क़मरी में 83 साल की उम्र में वह परलोक सिधार गए।         

बहा वलद की यादगार के तौर पर सिर्फ़ एक किताब बची है जिसका नाम ‘मआरिफ़’ है। यह किताब उनके शास्त्रार्थ व बहस का समूह है जिसे उनके शिष्यों ने संकलित किया है। इस किताब में धार्मिक विषयों से संबंधित सवालों के जवाब, पवित्र क़ुरआन की आयतों की व्याख्या और पैग़म्बरे इस्लाम के कथन हैं। इस किताब को पढ़ने से एक प्रभावशाली और बुद्धिमान वक्ता की छवि सामने आती है जिसकी मुख्य चिंता इस्लामी शरीआ है। इस किताब का मौलाना रोम पर काफ़ी असर नज़र आता है। मौलाना रोम ने ज़्यादातर अपनी बातों में इस किताब को "पिता से हासिल फ़ायदे" के नाम से याद किया है और उनकी किताबों में इस किताब का प्रभाव नज़र आता है। मौलाना रोम ने अपनी ग़ज़लों और मस्नवी में इस किताब को बहुत उद्धरित किया है।

बहा वलद ने अपनी किताब ‘मआरिफ़’ में शायराना अंदाज़ और सुदंर शब्दों में एकेश्वरवाद, ईश्वर के नाम और उसके गुण, पवित्र क़ुरआन की आयतों की व्याख्या और इस्लामी आस्था से संबंधित विषयों को पेश किया है। सबसे पहले हेलमट रिटर ने अपनी एक किताब के साथ साथ ‘मआरिफ़’ को प्रकाशित किया। उनके पंद्रह साल बाद उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र ने 1954 में इस किताब को प्रकाशित किया। जिस समय फ़ुरूज़ान्फ़र ने यह किताब प्रकाशित की उन्हें हेल्मट रिटर के इस काम का पता नहीं था। उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र ने ‘मआरिफ़’ के प्रकाशन के लिए इस्तांबोल के तीन और तेहरान के एक नुस्ख़े की मदद ली थी। ‘मआरिफ़’ के बाक़ी भाग को उन्होंने 1959 में प्रकाशित किया जिसके लिए उन्होंने क़ूनिया के नुस्ख़े की मदद ली थी जिसमें ख़ुद संभवतः बहा वलद के हाथों कुछ संशोधन हुए थे। यह संशोधित नुस्ख़ा उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र की मौत के बाद 1973 में दो जिल्दों में दोबारा प्रकाशित हुआ।             

‘मआरिफ़’ की पहली जिल्द के तीन भाग हैं और फ़ुरूज़ान्फ़र ने दूसरी जिल्द की विषय वस्तु को चौथा भाग कहा है और उनका मानना है कि यह भाग ही वास्तव में सबसे अहम भाग है। हेल्मट रिटर का मानना है कि ‘मआरिफ़’ किताब बहा वलद के प्रवचनों का नोट है लेकिन इसके साथ ही इस किताब में बहा वलद के एकान्त के क्षणों व व्यक्तिगत जीवन से संबंधित बातें भी हैं जो प्रवचन का हिस्सा नहीं लगते। इस किताब में ‘तुम’ सर्वनाम का इस्तेमाल है जिसमें इस बात की संभावना कम लगती है कि बहा वलद के शिष्यों ने यह नोट तय्यार किया हो।

‘मआरिफ़’ के नोट के लिखे जाने की तारीख़ और स्थान स्पष्ट नहीं है। किताब को पढ़ने से लगता है कि इसके ज़्यादातर नोट ख़ुद बहा वलद के वतन अर्थात बल्ख़ में लिखे गए हैं। उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र का मानना है कि इस किताब के कुछ नोट बहा वलद के एशिया माइनर पलायन के बाद संकलित हुए हैं। ये वे नोट हैं जिनके लिखे जाने की तारीख़ का पता नहीं है लेकिन इतना कहा जा सकता है कि ये नोट 597 से 607 हिजरी क़मरी के बीच लिखे गए या संकलित हुए हैं। संगीत

जर्मन शोधकर्ता फ्रिट्ज़ मायर बहा वलद के जीवन और उनके विचारों की व्याख्या पर आधारित एक किताब संकलित की है जो 27 अध्याय पर आधारित है। इस किताब के शीर्षक का अनुवाद है, "बहा वलद, उनका जीवन और अध्यात्म"। मायर चाहते थे कि बहा वलद के बारे में दूसरे शीर्षक व विषय वस्तु पर आधारित किताब लिखें और सिर्फ़ एक अध्याय में बहा वलद के जीवन और उनके अध्यात्म पर चर्चा करें। लेकिन उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र की बहा वलद की किताब ‘मआरिफ़’ पर लिखे गए नोट और जिन स्रोतों का उन्होंने हवाला दिया है उनकी समीक्षा के बाद मायर इस नतीजे पर पहुंचे कि बहा वलद का आध्यात्म दूसरे आत्मज्ञानियों से बहुत भिन्न है इसलिए ज़रूरी है इस बारे में अधिक विस्तार से वर्णन हो।

‘मआरिफ़’ की गद्य को पढ़ने से इस किताब में बल्ख़ की जनता के लहजे को समझा जा सकता है। इस किताब में अध्यात्मिक वास्तविकताओं, धर्म, धार्मिक व आस्था संबंधी नियम, नैतिक मामलों, पवित्र क़ुरआन की आयतों और पैग़म्बरे इस्लाम के कथन बहुत ही सुंदर अंदाज़ में बहस की गयी है। उस्ताद ज़बीहुल्लाह सफ़ा का मानना है कि ‘मआरिफ़’ में वर्णन का अंदाज़ शायराना है और उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र इसे शायराना अंदाज़ में सबसे अच्छी गद्य मानते हैं और बातों को बयान करने की दृष्टि से इसे अत्तार, सनाई और हाफ़िज़ जैसे महान शायरों के अंदाज़ जैसा मानते हैं।

फ़्रिट्ज़ मायर की नज़र में बहा वलद की बातों में आकर्षण उनका बनावट से परे अंदाज़ है। मायर का मानना है कि ‘मआरिफ़’ की अहमियत उसके इस्लामी अध्यात्म का नया अंदाज़ है जिसे बहा वलद ने पेश किया है। बहा वलद के अध्यात्म और दूसरे आत्मज्ञानियों से उनकी शैली में अंतर के बारे में दूसरे शोधकर्ताओं ने भी विचार व्यक्त किए हैं। जैसे उस्ताद फ़ुरूज़ान्फ़र का मानना है कि ‘मआरिफ़’ किताब की अहमियत की वजह यह है कि इस किताब में बहा वलद ने पवित्र क़ुरआन और इस आसमानी ग्रंथ के रहस्य की व्याख्या की है। इसके ज़्यादातर अध्याय में पवित्र क़ुरआन की आयतों की व्याख्या की गयी है और लेखक ने पवित्र क़ुरआन के रहस्य को ऐसी मिसालों के ज़रिए स्पष्ट किया है जिनका संबंध इंद्रीय से जुड़े मामलों से है। बहा वलद ने पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बर इस्लाम के कथन के गूढ़ अर्थ को शायराना अंदाज़ में पेश किया है।         

उस्ताद ज़र्रीन कूब का मानना है कि बहा वलद जिस समय ‘मआरिफ़’ किताब लिख रहे थे उस समय वह भौतिक जगत से परे किसी जगत में थे। मानो क़लम उनके मन के अख़्तियार में है। जो कुछ उनके मन पर जिस तरह बीत रहा उसी तरह उन्होंने उसे बयान कर दिया है।                       

बहा वलद ने ‘मआरिफ़’ किताब में सबसे ज़्यादा ‘अल्लाह’ शब्द का इस्तेमाल किया है। फ़्रिट्ज़ मायर का मानना है कि बहा वलद ने ख़ुदा के स्थान पर ‘अल्लाह’ शब्द को इसलिए इस्तेमाल किया है क्योंकि उनकी नज़र में ईश्वर के रंग में रंगना ही इंसान के आत्मोत्थान का चरम बिन्दु है। उन्होंने इस किताब में दुआ के फ़ायदे के बारे में जो बहस की है उसमें अल्लाह शब्द का स्रोत इलाह बताया है जिसका अर्थ है मख़लूक़ की शरणस्थली। उनका कहना था कि सभी का चाहे वे दार्शनिक और ज्योतिषी हों, यह मानना है कि हर मौजूद के पीछे अल्लाह है और उससे हर चीज़ है।

 

Jul १६, २०१८ १५:३२ Asia/Kolkata
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