आपको याद होगा कि पिछले कार्यक्रम में हमने इस बात का उल्लेख किया कि कूफ़ा और शाम में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के भाषण का आम लोगों पर क्या असर हुआ।

इसी तरह हमने इस बात का भी उल्लेख किया थी कि शासकों, विद्वानों और धर्मगुरुओं के हाथ में यह होता है कि समाज का सुधार करे, उसे भ्रष्ट बनाएं या उसे पतन की ओर ले जाएं। यज़ीद इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के जागृत करने वाले भाषण से चिंतित था और उसे डर था कि कहीं लोग उसके ख़िलाफ़ विद्रोह न कर दें। उसने अपने जासूसी तंत्र और किराए के पिट्ठुओं को संघर्षकर्ताओं की सभी राजनैतिक व सामाजिक गतिविधियों पर नज़र रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। जैसे ही यज़ीद को यह सूचना मिली कि मदीना की जनता उसके शासन के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुयी है, उसने तुरंत मुस्लिम बिन उक़बा की कमान में एक फ़ौज मदीना रवाना की। मुस्लिम बिन उक़बा ने जिसे लोग अत्यधिक अपराध व लोगों का ख़ून बहाने की वजह से मुसरिफ़ बिन उक़बा कहते थे, अपनी फ़ौज को 3 दिन तक मदीना में नरसंहार करने, महिलाओं की इज़्ज़त लूटने यहां तक पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के वंशज पर हमला करने का आदेश दिया। वह मदीना जिसके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया था, "हे ईश्वर! जो भी मदीना की जनता पर अत्याचार करे और उन्हें आतंकित करे, उस पर अपनी धिक्कार भेज।" अब वही मदीना बनी उमय्या की लूट खसोट का निशाना बना था जो ख़ुद को पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी समझते थे, वे पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजन का धर्म से बाहर निकल जाने का इल्ज़ाम लगाकर ख़ून बहा रहे थे और मदीना की जनता का कि जिसमें इस्लाम की प्रतिष्ठित हस्तियां और पैग़म्बरे इस्लाम के साथी मौजूद थे, नरसंहार कर रहे थे।

मुस्लिम बिन उक़बा ने मदीना में नरसंहार और लूटपाट करने के बाद मक्के का रुख़ किया ताकि वहां अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर का काम तमाम करे, लेकिन वह बीच रास्ते में ही मर गया। यज़ीद के आदेशानुसार, हुसैन बिन नुमैर सेनापति बना। उसके और अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर के बीच मक्के से बाहर जंग हुयी। अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर की फ़ौज के बहुत ज़्यादा लोगों के मारे जाने के बाद, उन्होंने मक्का शहर में पनाह ली। हुसैन बिन नुमैर की फ़ौज ने दो महीने तक मक्का शहर की नाकाबंदी की और इस दौरान इस फ़ौज ने ईश्वरीय घर काबे का अनादर किया और उस पर मिनजनीक़ से गोले फेंके तथा असहाय लोगों का नरसंहार किया। अंततः 64 हिजरी क़मरी के रबीउस्सानी महीने के शुरु में यज़ीद की मौत की ख़बर मिलते ही हुसैन बिन नुमैर और उसके साथियों ने मक्का की नाकाबंदी ख़त्म की।   

 

एक अहम व विचार योग्य बिन्दु यह है कि उमवी परिवार और उनके पिट्ठुओं में यह साहस कब पैदा हुआ कि इस्लाम का दिखावा करके इस्लाम की आस्थाओं का अनादर करें, आशूरा जैसी त्रासदी को जन्म दें, मदीना शहर में नरसंहार करें, ईश्वर के घर पर पत्थर बरसाएं और उसे आग लगाएं? इस मूल सवाल का स्पष्ट जवाब यह है कि यह सभी पथभ्रष्टता उस समय शुरु हुयी जब सत्ता लोभियों ने इस्लाम को हथकंडे के तौर पर इस्तेमाल करते हुए हज़रत अली अलैहिस्सलाम की गदीरे ख़ुम नामक स्थान पर ईश्वर के आदेश से पैग़म्बरे इस्लाम के हाथों ख़िलाफ़त पर नियुक्ति का इंकार किया, सत्ता हथिया ली और 50 साल में शुद्ध इस्लाम को जीवन से निकाल कर उसकी जगह पर उमवी इस्लाम का चलन आम किया। इस कड़वी सच्चाई को साबित करने के लिए सिर्फ़ इतना ही काफ़ी है कि जिस समय यज़ीद मरा और उसके बेटे मोआविया बिन यज़ीद को सत्ता मिली तो उसने एक दिन एक भाषण में उमवियों के क्रियाकलापों की कड़ी आलोचना की, कर्बला की घटना, मक्का और मदीने पर हमले की भर्त्सना की और ख़िलाफ़त को पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों का हक़ बताया। इस बात में शक नहीं कि अगर पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद ख़िलाफ़त हज़रत अली अलैहिस्सलाम को मिलती तो इस्लामी जगत में मोआविया और यज़ीद जैसे लोग सत्ता में नहीं पहुंचते और उक्त त्रासदीपूर्ण घटनाएं नहीं घटतीं। मुमकिन है कोई यह सवाल करे कि आख़िर इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम क्यों संघर्ष के लिए उठ खड़े नहीं हुए और मदीना तथा मक्के पर अतिक्रमण को नहीं रुकवाया?

इस सवाल का जवाब यह है कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने अपने दादा हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सिफ़्फ़ीन में मोआविया के साथ जंग और अपने चाचा इमाम हसन अलैहिस्सलाम के विद्रोहियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही के समय उनके साथियों द्वारा उनका साथ छोड़ने और फिर इन्हीं लोगों के आशूरा की घटना को जन्म देने में क्रूर रोल को देखा था, इसलिए वह सशस्त्र विद्रोह को इस्लामी जगत के हित में नहीं देखते थे क्योंकि इसके नतीजे में हज़ारों बेगुनाहों का ख़ून बहता। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने अपने चाचा इमाम हसन अलैहिस्सलाम और पिता इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की मोआविया के शासन काल में सॉफ़्ट वॉर की शैली अपनायी और अपने भाषणों से कि जिनके बारे में पिछले कार्यक्रम मे उल्लेख किया, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों और अपने आपको पहचनवाया, उमवी परिवार की नीचता का पर्दाफ़ाश किया, लोगों की सोयी हुयी चेतना को झिंझोड़ा और लोगों के उमवी परिवार के ख़िलाफ़ विद्रोह का मार्ग समतल किया। कुछ सतही सोच रखने वाले यह सोचते थे कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम जंग और ईश्वर के लिए जेहाद से डरते थे और इसी वजह से वे लोग पवित्र क़ुरआन के तौबा नामक सूरे की 111वीं आयत का ग़लत अर्थ निकालते थे जिसमें ईश्वर कह रहा है, जान लो कि ईश्वर ने मोमिनों से उनकी जान और माल को स्वर्ग के बदले में ख़रीद लिया है। वे ईश्वर के मार्ग में लड़ते हैं, क़त्ल होते और क़त्ल करते हैं। लेकिन ऐसे लोगों के जवाब में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम फ़रमाते थे, "अगर आप लोगों को इसके बाद वाली आयतों में जिन विशेषताओं का वर्णन हुआ है, उन विशेषताओं से सुसज्जित लोग दिखें तो मैं उमवियों के भ्रष्ट शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए तय्यार हूं।" जैसा कि ईश्वर उनकी विशेषताओं का इन शब्दों में वर्णन करता है, "प्रायश्चित करने वाले, उपासना करने वाले, ईश्वर की प्रशंसा करने वाले, रोज़ा रखने वाले, रुकू करने वाले, सजदा करने वाले, लोगों को भलाई का हुक्म देने और बुराई से रोकने वाले, ईश्वर की सीमाओं की रक्षा करने वाले हैं और ईश्वर मोमिनों को शुभसूचना देने का आदेश देता है।" 

इस बात में शक नहीं कि अगर समाज में ऐसे योग्य लोग होते तो इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम उनके साथ मिल कर संघर्ष करते और उमवी वंशज को सत्ता से उखाड़ फेंकते। एक और बात जिसकी वजह से इमाम ने संघर्ष न किया वह निष्ठावान व वफ़ादार साथियों का न होना था। यज़ीद की मौत के बाद अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर जो जंग से जान बचाने में सफल हो गया था और वर्षों से मन में इस्लामी जगत की सत्ता हथियाने की सोच रहा था, मक्के में उठ खड़ा हुआ और हेजाज़, यमन, इराक़ और ख़ुरासान के लोगों ने उसके आज्ञापालन का वचन दिया। दूसरी ओर यज़ीद के बेटे के सत्ता से इंकार के बाद मरवान बिन हकम शासक बन गया। यह शख़्स पैग़म्बरे इस्लाम का मुखर विरोधी था। उसने मिस्र और सीरिया की सत्ता क़ब्ज़ा कर लिया था। उसके बाद उसके बेटे अब्दुल मलिक बिन मरवान के हाथ में 65 हिजरी क़मरी में सत्ता पहुंची। उसने 73 हिजरी क़मरी में अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर का जो मक्का में हुकूमत कर रहा था, घेराव करके उसकी हत्या कर दी। अब्दुल मलिक ने अब्दुल्लाह बिन ज़ुबैर की हत्या के बाद मदीने में एक भाषण दिया जिसके अंत में उसने कहा, "ईश्वर की सौगंद अब अगर किसी ने मुझसे ईश्वर से डरने की अनुशंसा की, तो उसे क़त्ल कर दूंगा।" अब्दुल मलिक सैद्धान्तिक रूप से एक निर्दयी व अत्याचारी व्यक्ति था। वह अपने विरोधियों की बिला झझक हत्या करता था। उसके आस-पास के लोग भी उसी की तरह के थे जिनमें कुछ के नाम इस प्रकार हैं, इराक़ में उसका राज्यपाल हज्जाज बिन यूसुफ़ सक़फ़ी, ख़ुरासान में मोहल्लब बिन अबी सुफ़रा, मदीना में हेशाम बिन इस्माईल, मिस्र में उसका बेटा अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मलिक, यमन में हज्जाज का भाई मोहम्मद बिन यूसुफ़ सक़फ़ी और जज़ीरा में मोहम्मद बिन मरवान। इनमें से हर एक राज्यपाल इतिहास में हत्या व लूटपाट के लिए मशहूर थे। मिसाल के तौर पर हज्जाज बिन यूसुफ़ सक़फ़ी इतिहास में रक्तपात व अत्याचार करने के लिए कुख्यात है। इतिहासकारों ने हज्जाज के हाथों क़त्ल होने वाले लोगों की संख्या 1 लाख 20000 से 1 लाख 30000 तक बतायी है। हज्जाज ख़ुद कहता था उसे लोगों का ख़ून बहाने और ऐसे काम करने में सबसे ज़्यादा मज़ा आता है जिसे अब तक किसी ने नहीं किया है।

अब्दुल मलिक की मौत के बाद वलीद सत्ता पर पहुंचा। वलीद पहला व्यक्ति था जिसने अपने बाप की मौत पर ख़ुद ही को संवेदना दी और सत्ता पर पहुंच का ख़ुद को बधाई दी और लोगों को अपने आज्ञापालन के लिए बुलाया था। उसके बाद उसने दमिश्क़ की मस्जिद में धमकी भरे भाषण में कहा था, "जिस किसी ने मेरी बात नहीं मानी, उसे रास्ते से हटा दूंगा और जो भी ख़ामोश रहेगा, उसे ख़ामोशी से रास्ते से हटा दूंगा।" इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की इमामत के काल पर नज़र डालने से जो अनेक सामाजिक व राजनैतिक संकट व अस्तव्यस्तता का दौर और सत्ता पर आत्ममुग्ध व अपराधी लोगों का क़ब्ज़ा था, स्पष्ट हो जाता है कि उनके पास ख़ामोश संघर्ष के सिवा कोई और रास्ता न था।

 

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Jul १७, २०१८ १२:५७ Asia/Kolkata
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