शम्सुल मआली क़ाबूस बिन वूश्मगीर एक अत्यन्त दक्ष लेखक थे कि  जो आले ज़्यार श्रंखला के सब से अधिक प्रसिद्ध राजा के रूप में सत्ता चला रहे थे।

उसके बारे में यह भी कहा जाता है कि वे दक्ष योद्धा भी था लेकिन कभी कभी वह अपने मातहतों पर अत्याचार भी करता था। इसी  वजह से वह अपने ही एक सरदार के हाथों मारा गया। कहते हैं कि इस शासक को गुंबदे क़ाबूस के नीचे दफ्न कर दिया गया और ईरान की यह इमारत इसी लिए गुंबदे क़ाबूस के नाम से प्रसिद्ध हुई। 

 

राज़ी शैली ईरानी शिल्पकला की चौथी शैली है कि जिसमें पहले वाली शैलियों की सभी विशेषताएं अत्यात्धिक उत्तम रूप में पायी जाती हैं। राज़ी शैली की शिल्पकला में, पारसी शैली का सौन्दर्य, पार्ती शैली का वैभव और खुरासानी शैली की सूक्ष्मता एक साथ नज़र आती है। इस शैली का आरंभ भले ही उत्तरी ईरान से हुआ हो लेकिन यह शैली शहरे रैय में परवान चढ़ी और इसी लिए इस शैली को राज़ी शैली कहा जाता है। राज़ी शिल्पकला की शैली आले ज़ियार शासन काल से आरंभ हुई और ख्वारिज़्मशाहियान काल में अपने पतन के निकट पहुंची और ईरान में शिल्प कला के क्षेत्र में लगभग तीन सौ वर्षों तक इस शैली का बोल बाला रहा है।

 

दूसरी तीसरी हिजरी सदी में ईरान की अर्ध स्वाधीन सरकारों के गठन के साथ ही एक एसा आन्दोलन आंरभ हुआ कि जो  इस्लामी काल में ईरान की साहित्यिक व वैज्ञानिक पुनर्जागरण के काल से प्रसिद्ध है। इस आंदोलन के आरंभ होने के यह कारण रहे हैः इस्लामी विचार धारा का चलन हो गया था और अतीत की सामाजिक वर्गीकरण की व्यवस्था का पतन हो चुका था और ईरान के समाज के सभी वर्गों को पढ़ने लिखने का अवसर प्राप्त हो गया। इसके साथ ही चीन में कागज़ का अविष्कार हुआ और वह पहली हिजरी सदी में समरक़न्द पहुंच गया जिसकी वजह से ईरान में किताबें लिखे जाने का सिलसिला तेज़ हो गया। इसके अलावा समाज इस सीमा तक विकसित हो चुका था कि उसमें एक दूसरे से  उनके विचारों के बारे में चर्चा की जाती थी और बहस व शास्त्रार्थ का दौर चलता था जिसके बड़े सकारात्मक परिणाम सामने आए। इस प्रकार से शिल्पकला पर भी इस दौर में सांस्कृतिक व वैज्ञानिक विकास का प्रभाव पड़ा । यही वजह है कि बहुत से लोग राज़ी शैली को ईरानी कला के पुनर्जागरण का युग कहते हैं जो खेद जनक रूप से मंगोलों के आक्रमण और उनकी विनाशलीला के कारण खत्म हो गयी।

 

 

राज़ी शैली की शिल्पकला का आंरभ रैय शहर में  हुआ जो इस समय के तेहरान के दक्षिण में स्थित है। यही वजह है कि इस शैली के उत्कृष्ट नमूनों का निर्माण इसी नगर में हुआ। रैय या राज़ नामक यह क्षेत्र जहां राज़ी शैली का जनम हुआ, तथ्यों के अनुसार बेहद समृद्ध क्षेत्र था । जैसा कि " हफ्त एक़लीम" नामक किताब में लिखा गया है कि इस इलाक़े में छे हज़ार पाठशालाएं और सूफी केन्द्र , चार सौ हम्माम, एक हज़ार सात सौ मीनारें और पंद्रह हज़ार कुंए थे। कुछ लेखकों ने रैय नगर की आबादी, उसकी समृद्धता के दौर में, लगभग पंद्रह लाख बतायी है। यह समृद्ध नगर सन 617 हिजरी क़मरी में चंगेज़ खान के हाथों तबाह हो गया और उसकी सभ्यता व समृद्धता के चिन्ह काफी हद तक खत्म हो गये। कभी विश्व की दुल्हन कहे जाने वाले इस नगर पर चंगेज़ खान की चढ़ायी से  उसे इतना नुकसान पहुंचा कि फिर वह कभी भी अपनी पुरानी समृद्धता को दोहरा नहीं पाया।

 

राज़ी शैली में विभिन्न उद्देश्यों के लिए इमारतें विशेष गुणों के साथ बनायी जाती हैं जैसे मस्जिद, मीनारें या बुर्जियों वाले मक़बरे। बुर्जी वाले मक़बरे, ऊंची और पतली इमारत होती थी जिसे खंबे की तरह बनाया जाता था। इस तरह की बहुत सी इमारतों में साधरण ईंटों का प्रयोग किया गया है जबकि कुछ इमारतों की बाहरी दीवारों पर सजावट भी  नज़र आती है।

 

इस प्रकार की इमारतों में सब से अधिक प्रसिद्ध इमारत, गुंबदे क़ाबूस है जिसे सन 1006 ईसवी में उत्तरी ईरान के गुरगान नगर में बनाया गया था। यह विश्व में ईंट से बनने वाली ऊंची इमारतों में से एक है जो वास्तव में नगर पहुंचने का चिन्ह भी था। इस की ऊंचाई लगभग पांच दशमलव पांच मीटर है जिसे पंद्रह मीटर ऊंचे टीले पर बनाया गया है । गुंबदे क़ाबूस शंकुवाकार है और उस पर निर्माण करने वाले के नाम और निर्माण के समय के अतिरिक्ति कोई भीलेख नज़र नहीं आता। इस की गुंबद का भीतरी व्यास, दस मीटर है और गुंबद को दो परतों में बनाया गया है।

 

राज़ी निर्माण शैली में कुछ मस्जिदों में खंभों वाली दालान को चार दालानों वाली बना दिया गया। इस शैली में मेहराब के निकट  के और बीच में खडे खंभों को हटा दिया गया और उसे एक चार दालानों वाले एक बड़े स्थल में बदल दिया गया कि जिसके ऊपर एक गुंबद बनाया गया हो। कुछ इतिहासकार ज़वारेह" मस्जिद को ऐसी पहली मस्जिद बताते है जिसे चार दालानों के साथ बनाया गया हो। यह मस्जिद सन 530 हिजरी क़मरी अर्थात 1135 ईसवी में प्रसिद्ध शिल्पकार उस्ताद महमूद इस्फहानी द्वारा बनायी गयी थी। पुरानी मस्जिद, वर्तमान मस्जिद के उत्तरी भाग के तहखाने में मौजूद है। हाल की छत बहुत ऊंची है और उस पर गुंबद बनाया गया है। इस मस्जिद को चूने के काम से बेहद अच्छी तरह से सजाया गया है।

 

इस शैली में बनाए गये गुंबद प्रायः दो परतों के साथ होते हैं और उसका बाहरी रूप विविधता पूर्ण होता है। गुंबद की सजावट में ईंट के छोटे बड़े टुकड़े प्रयोग किये जाते हैं तथा इमारत में विभिन्न स्थानों पर कूफी लिपि शैली और क़ुरआने मजीद की आयतें नज़र आती हैं। राज़ी शैली में " शिकस्ता" लिपि शैली भी नज़र आती है जो ईंट, टाइल्स के साथ मिल कर किसी भी इमारत को वैभव प्रदान करती है। इस शैली में टाइल्स के टुकड़ों को नगीनों की तरह बडे साधारण तरीक़े से ईंटों के बीच जड़ा जाता है।  इस काल की शिल्प कला में चूने का काम भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है और राज़ी शिल्प कला शैली में " शीर शकरी"  " बर्जस्ता" " ज़बरे व बरहश्ते " जैसे बहुत सी शैलियों से चूने का काम होता है। चूने से सजावट में फूल , पेड़ व पौधे, कई कई घुमाव के साथ बनाए जाते हैं तो दीवारों और गुंबदों को विशेष प्रकार की सुन्दरता प्रदान करते हैं। इसी प्रकार चूने की कटाई की शैली भी इसी काल में आरंभ हुई इस शैली के अंतर्गत चूने को विभिन्न रंगों के साथ मिला लिया जाता और फिर जब वह सूख जाता तो उसे अलग अलग आकार और रूप में काटा जाता और फिर इन टुकड़ों को टाइल्स की तरह एक दूसरे के साथ मिला कर इमारत पर लगाया जाता जिससे बड़ी खूबसूरत डिज़ाइनें बन जाती।

 

इतिहास में मिलता है कि गज़नवी शासक और उनके बाद के शासकों ने शिल्पकला पर बहुत अधिक ध्यान दिया। इस काल में बनायी जाने वाली इमारतें की संख्या ही नहीं उनका आकार भी असाधारण रहा है। कुछ इतिहासकारों ने गज़नी में बनायी जाने वाली एक मस्जिद का उल्लेख किया है कि जिसे उसके वैभव की वजह से, आकाश की दुल्हन का नाम दिया गया था।इसी प्रकार इस काल में, राजा महाराजा , अपने शासन की शान व शौकत को महलों से दिखाने की कोशिश करते थे। इतिहास के अनुसार इस प्रकार के एक महल के निर्माण में चार साल का समय लगा और उसके निर्माण का खर्च सत्तर लाख दिरहम हुआ था।

 

जैसा कि हमने बताया राज़ी शैली की विशेषता कहा जाने वाला टाइल और चूने का काम, सरकारी इमारतों में बहुत ही काम आता था। जैसा कि प्रसिद्ध इतिहासकार अतबी ने इस प्रकार की इमारतों के रंग व रूप को वसन्त ऋतु के बाग से संज्ञा दी है । वह लिखते हैं कि कभी कभी तो ईंट की दीवारों को चूने के प्लास्टर से बने डिज़ाइनों से इस तरह से छुपा देते कि वह रंग बिरंगा कपड़ा नज़र आने लगतीं ।

 

दो परतों वाले गुंबदों का चलन भी इसी राज़ी शैली की देन है। मूनरे डी विलयर सहित युरोपीय अध्ययनकर्ता के अनुसार दो परतों वाले गुंबद मध्य एशिया से प्रचलित हुए लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि मध्य एशिया की शिल्प कला में पत्थर से बनी इमारतों पर ध्यान दिया जाता था जबकि ईरान में अधिकतर ईंटों का प्रयोग होता था।

बहरहाल , राज़ी शैली में दो परतों वाले गुंबद अत्याधिक सूक्ष्मता से बनाए जाते। दो परतों वाले गुंबदों को इस नाम से याद करने की वजह भी यह है कि इस प्रकार के बने गुंबदों के भीतरी और बाहरी आकार में अंतर होता था। भीतरी भाग अर्धगोलाकार होता था जबकि बाहरी भाग अंडाकार और नोकीला होता था। इस प्रकार की शिल्प कला का स्पष्ट व उत्कृष्ट नमूना इस्फहान की जामे मस्जिद का गुंबद है कि जिसे पश्चिमी अध्ययनकर्ता श्रोडर ने प्रेरणा स्रोत व कल्पना की दृष्टि से अत्याधिक शक्तिशाली, गणित के अनुसार अत्याधिक सूक्ष्म व संतुलित और तकनीकी दृष्टि से संम्पूर्ण व त्रुटिहीन बताया है।

 

 

 

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Jul २२, २०१८ १४:२६ Asia/Kolkata
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