सन 855 से 865 हिजरी के बीच किसी एक वर्ष में अर्थात सन 1460 ईसवी के आस-पास हेरात शहर में एक ढंके हुए बाज़ार के पास एक बच्चे ने जन्म लिया जो आगे चल कर ईरान की चित्रकारिता की कला में नई शैलियां उत्पन्न करने वाला था।

उसका नाम कमालुद्दीन रखा गया और जब उसने प्रचलित ज्ञान अर्जित कर लिए और शिक्षाएं पूरी कर लीं तो अपने लिए बेहज़ाद नाम का चयन किया और इसे नाम से ख्याति मिली। उस काल के बहुत से चर्चित इतिहासकारों जैसे तारीख़े रशीदी लिखने वाले मीरज़ा मुहम्मद हैदर दोग़लात और ख़ुलासतुत्तवारीख के लेखक क़ाज़ी अहमद मुनशी क़ुम्मी ने ईरान के इस विश्व विख्यात चित्रकार को अमीर रूहुल्लाह उर्फ़ मीरक का शागिर्द बताया है। मीरक हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार और सुलतान हुसैन बायक़ुरा के पुस्तकालय के निरीक्षक थे।

कमालुद्दीन बेहज़ाद के माता-पिता का निधन उनके बचपन में ही होगया था। बताया जाता है कि रूहुल्लाह मीरक ने, जो संभावित रूप से उनके रिश्तेदार थे, उनकी अभिभावकता की ज़िम्मेदारी संभाल ली। हबीबुस्सियर नामक किताब के लेखक ख़ुंद मीर के अनुसार उस काल में चित्रकारिता और किताब के किनारे डिज़ाइन बनाने और इसी तरह इमारतों के शिलालेख लिखने में ख़ाजा मीरक जैसा कोई नहीं था। ख़ुंद मीर का कहना है कि हेरात की अधिकांश इमारतों के शिलालेख, मीरक के हाथों के लिखे हुए थे। इतिहास की किताबों में रूहुल्लाह मीरक और पीर सैयद अहमद तबरीज़ी को, कमालुद्दीन बेहज़ाद के उस्तादों के रूप में परिचित कराया गया है।

बेहज़ाद अभी लड़कपन में ही थे कि चित्रकला में उनके जौहर खुलने लगे और बड़े कम समय में चारों ओर उनकी ख्याति फैल गई। उन्हें गुरुओं के अलावा अपने पहले अहम समर्थक अमीर अली शीरनवाई की कृपा से कला में अपने जौहर दिखाने के बड़े बड़े अवसर मिलने लगे। अभी व युवा ही थे कि सुलतान हुसैन बायक़ुरा के आदेश से दरबार से जुड़ गए और इस कला प्रेमी शासक और उसके बुद्धिमान मंत्री अमीर अली शीरवाई की देख-रेख में उनकी कला तेज़ी से परवान चढ़ने लगी।

इन्हीं दिनों बेहज़ाद को हेरात के चित्रकला विद्यालय में गुरू के रूप में चुना गया और उन्होंने वहां अपने शिष्यों को मिनियेचर की शिक्षा दी। उस्ताद कमालुद्दीन बेहज़ाद की अहम कलाकृतियां इस काल में अस्तित्व में आई हैं। अमीर अली शीरनवाई, चित्रकला विद्यालय की आवश्यकता का हर सामान, साधन और रंग उपलब्ध कराते थे। उस्ताद बहज़ाद ने अपनी कलाकृतियों के अलावा हेरात के चित्रकला विद्यालय के एक हॉल की दीवारों और छत को अपने कुछ शिष्यों के साथ मिनियेचर पेंटिंग्स से सुसज्जित किया था। इसके बाद उस हॉल को निगारख़ाने या पेंटिंग हॉल कहा जाता था। हेरात में सुलतान हुसैन बायक़ुरा का दरबार, ज्ञान, साहित्य व कला की बेजोड़ हस्तियों के एकत्रित होने का केंद्र था जिसमें उनके बुद्धिमान मंत्री अमीर अली शीरनवाई, प्रख्यात कवि जामी और विख्यात इतिहासकारी ख़ुंदमीर विशेष रूप से उल्लेखनीय थे।

कमालुद्दीन बेहज़ाद का जीवन दो अलग-अलग कालखंडों में और दो विभिन्न शासन शैलियों में गुज़रा। उनके जीवन का पहला भाग अर्थात नवीं शताब्दी हिजरी का उत्तरार्ध सुलतान हुसैन बायक़ुरा और तैमूरी शासन शैली के अधीन गुज़रा। उनकी ज़िंदगी का दूसरा भाग अर्थात दसवीं शताब्दी हिजरी का पूर्वार्ध सफ़वी शासकों के काल में गुज़रा। वस्तुतः कमालुद्दीन बेहज़ाद ने दो अलग-अलग सरकारों में जीवन बिताने का अनुभव किया। उन्होंने इसी तरह इन दो शासन श्रंखलाओं के बीच प्रख्यात उज़बक सरदार शैबक ख़ान के नाम से प्रख्यात मुहम्मद ख़ान शैबानी से भी मुलाक़ात की लेकिन इससे उनके जीवन की प्रक्रिया पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।

एक समकालीन इतिहासकार याक़ूब आज़ंद का कहना है कि बेहज़ाद के जीवन के लगभग 50 साल हेरात में सुलतान हुसैन बायक़ुरा के काल में गुज़रे और इसी में उन्होंने कला की चोटियां सर कीं। इस काल में हेरात, आबादी और विदित वैभव की दृष्टि से भी बड़ा अहम शहर माना जाता था। वैभवशाली इमारतें, बाग़, मैदान, चौराहे और भीड़-भाड़ वाले बाज़ार इस काल में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा तैमूरी काल में हेरात के विद्यालयों का भी बड़ा चर्चा था। इन विद्यालयों के अनेक पुस्तकालय, इस काल के धर्मगुरुओं, कवियों, सुलेखकों और कलाकारों के कार्यस्थल रहे हैं।

 

हेरात के विभिन्न पुस्तकालयों के बीच सुलतान हुसैन बायक़ुरा और अमीर हुसैन शीरनवाई के पुस्तकालय, साहित्यिक दृष्टि से बड़े अहम थे। सुलेखक, चित्रकार, जिल्दसाज़ और पृष्ठों पर डिज़ाइन बनाने वाले सुंदर और बेजोड़ किताबें तैयार करने में एक दूसरे से सहयोग और प्रतिस्पर्धा करते थे। सुलतान बायक़ुरा के दरबार में कमालुद्दीन बहज़ाद का बड़ा उच्च स्थान था। सुलतान ने उन्हें मानी द्वितीय की उपाधि दी थी और इसी वजह से बेहज़ाद ने थोड़े ही समय में इतनी प्रगति कर ली थी कि सभी उन्हें उस्ताद मानने लगे थे।

सुलतान हुसैन बायक़ुरा ने वर्ष 898 हिजरी में बेहज़ाद को शाही पुस्तकालय का प्रमुख नियुक्त किया और इस नियुक्ति के साथ ही दरबार के कलाकारों की अध्यक्षता भी उन्हीं के हवाले हो गई। पुस्तकालय में बेहज़ाद ने चित्रकारी और किताबों की सजावट का काम शुरू किया और किताबों की डिज़ाइनिंग और सजावट में उच्च चरण तक पहुंच गए। ऐसा प्रतीत होता है कि सुलतान हुसैन बायक़ुरा के निधन के साल तक कमालुद्दीन बेहज़ाद शाही पुस्तकालय के प्रमुख रहे। इन बीस बरसों में उन्होंने दरबार की अनेक योजनाओं पर काम करने के अलावा क़ासिम अली चेहरेगुशा, मौलाना यूसुफ़, आग़ा मीरक इस्फ़हानी और शैख़ ज़ादे ख़ुरासानी जैसे प्रख्यात शिष्यों का प्रशिक्षण किया। उन्होंने ईरानी चित्रकला में अनेक पहलें करके हेरात मत की आधारशिला रखी।

सुलतान हुसैन बायक़ुरा

वर्ष 912 हिजरी क़मरी में मुहम्मद ख़ान शैबानी उर्फ़ शैबक ख़ान ने हेरात पर हमला कर दिया और तैमूरी शासन श्रंखला का तख़ता पलट दिया। बहज़ाद इस काल में भी हेरात में ही रहे। वर्ष 916 हिजरी क़मरी में शाह इस्माईल सफ़वी ने हेरात पर क़ब्ज़ा कर लिया। शाह इस्माईल को चित्रकला समेत विभिन्न कलाओं में बहुत रुचि थी। उन्हें कमालुद्दीन बेहज़ाद की ख्याति के बारे में पता था और वे उन्हें अपनी सेवा में लेना चाहते थे। शाह इस्माईल हेरात पर क़ब्ज़े के बाद बेहज़ाद और इस क्षेत्र के अनेक अन्य कलाकारों को अपने साथ तबरेज़ ले गए। बहज़ाद ने अपनी आयु के 26 से अधिक साल सफ़वी दरबार में बिताए।

इतिहासकारों का कहना है कि यह काल, चित्रकला में कमालुद्दीन बहज़ाद की परिपक्वता और दक्षता का काल था और वे बूढ़ हो चले थे लेकिन उनमें अब भी इतनी क्षमता थी कि वे सफ़वी काल के आरंभ में आयोजित होने वाले कला संबंधी कार्यक्रमों में भाग लें और चित्रकला के तबरेज़ी मत के गठन में अपना प्रभाव डाल सकें। वर्ष 928 में शाह इस्माईल सफ़वी ने भी बेहज़ाद को शाही पुस्तकालय का प्रमुख नियुक्त किया। पुस्तकालय के सारे मामले और इसी तरह सुलेखकों, चित्रकारों, जिल्दसाज़ों और किताबों से संबंधित सभी अन्य मामले उनके हाथ में आ गए। यह पद, सुलतान तहमास्ब सफ़वी के काल तक उनके पास रहा।

अब कमालुद्दीन बेहज़ाद का बुढ़ापा आ चुका था और इसी कारण वे अपने काम, उन शिष्यों के हवाले करने लगे थे जो उनके आस-पास मौजूद थे। अब वे ज़्यादातर उनके कामों की नोक-पलक संवारा करते थे। अलबत्ता यह काम उनसे पहले भी प्रचलित था और पूरब में प्राचीन उस्तादों के बीच इसे एक परंपरा का दर्जा हासिल था।

वर्ष 942 में कमालुद्दीन बेहज़ाद का निधन हो गया। कुछ लोगों का मानना है कि वे अपनी आयु के अंत तक तबरेज़ में सफ़वी दरबार से जुड़े रहे और वहीं उनका निधन हुआ। इन लोगों का कहना है कि कमालुद्दीन बेहज़ाद का मज़ार तबरेज़ के कूये सुरख़ाब क्षेत्र में शैख़ कमाल ख़जंदी के मज़ार के पास है। कुछ अन्य लोगों का कहना है कि कमालुद्दीन बेहज़ाद, तहमास्ब सफ़वी के काल में दरबार वालों के हथकंडों और चालबाज़ियों को सहन नहीं कर सके और हेरात लौट गए और वहीं उनका निधन हुआ। हेरात में सैयद अब्दुल्लाह मुख़्तार के मज़ार के निकट एक क़ब्र मौजूद है और उसके पत्थर पर जो बातें लिखी हुई हैं उनके दृष्टिगत इस बात की प्रबल संभावना है कि कमालुद्दीन बेहज़ाद की क़ब्र वहीं हैं। (HN)

 

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Jul ३१, २०१८ १४:०३ Asia/Kolkata
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