पूरब को ईरान की विदेश नीतियों में विशेष स्थान प्राप्त है यही वजह है कि आसेआन का हालिया सम्मेलन ईरान के लिए महत्वपूर्ण रहा है।

इस्लामी गणतंत्र ईरान ने आसेआन के साथ मैत्री समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं। ईरान के विदेशमंत्री जवाद ज़रीफ ने गुरुवार को सिंगापुर में इस समझौते पर हस्ताक्षर किये।

आसेआन का मैत्री समझौता सन 1976 में इस संगठन के संस्थापक देशों अर्थात, सिंगापुर, इंडोनेशिया, मलेशिया , थाईलैंड और फिलीपीन की पहल से अस्तित्व में आया है। इस समझौते का आधार, शांति, सहिष्णुता, अन्य देशों की प्रभुसत्ता के सम्मान और वर्चस्व के खिलाफ सहयोग पर आधारित है। आसेआन के इस समय दस सदस्य हैं जबकि उसके मैत्री समझौते के 36 सदस्य हैं जो आसेआन के साथ एक प्रभवशाली ब्लाक में बदल चुके हैं।  टीएसी कहे जाने वाले इस समझौते के सदस्य देशों की कुल जनसंख्या 63 करोड़ से अधिक है और उनका सकल घरेलू उत्पाद 2 ट्रिलियन 4 सौ अरब डॅालर से अधिक है इस लिए वह दुनिया का पांचवा आर्थिक ध्रुव बन चुका है। 

इस समझौते में ईरान की सदस्यता, राजनीतिक  और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है। राजनीतिक दृष्टि से यह समझौता बेहद अहम है और इससे पूर्वी एशिया का बड़ा बाज़ार ईरान के लिए खुल गया और इससे विदेशी पुंजीनिवेश को आकृष्ट करने का अवसर भी, ईरान के लिए बढ़ गया है। 

ईरान यह प्रयास कर रहा है कि वह एशिया के महत्वपूर्ण देशों के साथ सामान के बदले में तेल जैसे सीधे साधे व्यापार के बजाए आर्थिक सहयोग के जटिल मार्ग पर आगे बढ़े। पिछले वर्ष, ईरान के राष्ट्रपति डॅाक्टर हसन रूहानी की इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों की यात्र में वार्ता का मुख्य विषय, आर्थिक सहयोग रहा है और इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि ईरान, नयी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को समझते हुए इन देशों के साथ अपने संबंधों को बढ़ाने की इच्छा रखता है। 

 

ट्रम्प ने सोमवार की दोपहर को ईरान के खिलाफ गैर क़ानूनी प्रतिबंधों को फिर से लागू कर दिया । उन्होंने एक बयान में घोषणा की कि मंगलवार 7 अगस्त से, कार उद्योग, सोना और ईरानी रियाल पर प्रतिबंध लागू हो जाएगा और तेल व बैंक पर प्रतिबंध 5 नवम्बर 2018 से लागू होंगे। अमरीकी राष्ट्रपति ने अपने इस बयान में एक बार फिर जेसीपीओए को ख़तरनाक समझौता बताया और कहा कि जो देश, ईरान के साथ अपने आर्थिक संबंध नहीं खत्म करेंगे उन्हें भयानक परिणाम भुगतना होगा। ट्रम्प ने अपने इस बयान में यूरोपीय कंपनियों को ईरान छोड़ने पर तैयार करने की भी कोशिश की जबकि युरोपीय संघ ने सोमवार को ही अपने एक बयान में ईरान के खिलाफ प्रतिबंधों की वापसी पर खेद प्रकट करते हुए, अमरीकी प्रतिबंधों को प्रभावहीन करने वाले कानून को लागू करने की सूचना दी और बल  दिया कि युरोपीय संघ, ईरान के साथ आर्थिक संबंध और ईरान के तेल व गैस के निर्यात को जारी रखने की कोशिश कर रहा है। 

 

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ, डेन ग्लेज़रब्रूक  ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि ईरान के तेल के लिए ट्रम्प का उपाय दसियों साल देर से आया है । उन्होंने अपनी रिपोर्ट का आरंभ इस प्रकार के व्यंग्यात्मक वाक्यों से किया है! ट्रम्प के पास जो कुछ है उन सब को इस्तेमाल करके वह ईरान के खिलाफ व्यापारिक युद्ध का आरंभ कर रहे हैं लेकिन उनकी समस्या यह है कि उनके पास जो कुछ है, , इस काम के लिए ज़रूरी चीज़ों से बहुत कम है क्योंकि  वह समय जब एक प्रभावशाली शक्ति अमरीका के पास थी , बहुत दिनों पहले, बीत चुका है। 

 

ईरान के खिलाफ अमरीकी प्रतिबंधों को दोबारा एेसी दशा में लागू किया गया है कि जब अमरीका को अतीत के विपरीत इस बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक विरोध का सामना है और दूसरी तरफ ईरान ने अमरीका की ओर से संभावित प्रतिबंधों की आशंका की वजह से पहले से ही इस प्रकार के प्रतिबंधों से मुकाबले करने की रणनीति तैयार कर रखी थी। ईरान के रिज़र्व बैंक के प्रमुख अब्दुन्नासिर हिम्मती ने खुल कर कहा है कि ईरानी सरकार पूरी शक्ति के साथ प्रतिबंधों का मुक़ाबला करने के लिए तैयार है। मंगलवार से विदेशी मुद्रा के संदर्भ में ईरान की नयी नीतियों को लागू कर दिया गया है और अब ईरान की अर्थ व्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार, अमरीका के गैर कानूनी कदमों के बावजूद निंयत्रण में है और देश के लिए ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति के मार्ग में कोई रुकावट नहीं है। 

 

 

अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ईरान के लिए सभी रास्ते बंद करने की कोशिश कर रहे हैं और इसी मक़सद को पूरा करने के लिए ईरान पर प्रतिबंध लगाए गये हैं लकेिन अमरीका के सामने सब से बड़ी चुनौती, इस पर पूरी दुनिया को सहमत करने की है। युरोप ने तुलनात्मक रूप से अमरीकियों के सामने खड़े होकर उनका मुकाबला किया है लेकिन यह आशा रखना कि युरोप अमरीका के मुकाबले में अपनी पूरी शक्ति से खड़ा होगा, आशावाद है। इस्लामी गणतंत्र ईरान के राष्ट्रपति के शब्दों में युरोपीय संघ ने कानून बना कर और रुख अपना कर अमरीकी फैसले को स्पष्ट रूप  से अस्वीकार बताया लेकिन कथनों के साथ करनी भी ज़रूरी है और हर हाल में युरोपीयों को यह योजना बनानी चाहिए कि वह इस प्रकार से क्षतिपूर्ति कर सकते हैं। 

 

फ्रांस, जर्मनी और इटली सहित युरोपीय देश और विशेषकर फ्रासं को ईरान के साथ व्यापारिक संबंधों से काफी लाभ हुआ है। यूरो स्टेट की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार सन 2017 में युरोपीय संघ के सदस्य 28 देशों के साथ ईरान के व्यापारिक लेन देन में 53 प्रतिशत की वृद्धि हुई और यह संबंध 21 अरब यूरो तक पहुंच गये। युरोपीय संघ में विदेश नीतियों की प्रभारी फेडरीका मोगरेनी ने सिंगापुर मे अपने हालिया बयान में बल दिया है कि युरोपीय संघ, अपने अंतरराष्ट्रीय घटकों की मदद से, परमाणु समझौते को बचाए रखने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने सिंगापुर की तानयांग युनिवर्सिटी में अपने भाषण में कहा कि हम पूरी दुनिया में अपने घटकों के साथ सहयोग जारी रखेंगे और ईरान के साथ भी कानूनी व्यापार जारी रखेंगे हम यही करेंगे क्योंकि जेसीपीओए  हम सब के लिए और युरोपीय संघ के लिए लाभदायक है। उन्होंने बल दिया कि अंतरराष्ट्रीय समझौतों  का, हस्ताक्षर के बाद सम्मान किया जाना चाहिए। 

 

 

मोग्रीनी ने  न्यूज़ीलैण्ड के विदेशमंत्री विन्सटन पीटर्स के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि परमाणु समझौते या जेसीपीओए को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के साथ वैश्विक व्यापार बहुत ज़रूरी है।  उनका कहना था कि ईरान, परमाणु समझौते के प्रति पूरी तरह से कटिबद्ध रहा है इसीलिए इन बातों के दृष्टिगत हम ईरान के विरुद्ध अमरीकी अधिकारियों की बातों को स्वीकार नहीं करते।  मोग्रीनी का कहना था कि यूरोपीय संघ, ईरान के साथ हर प्रकार का सहयोग जारी रखेगा। उन्होंने विश्व की सरकारों और अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों से मांग की है कि जेसीपीओए की सुरक्षा के उद्देश्य से वे ईरान के साथ व्यापारिक संबन्धों को बढ़ाएं।

 

जर्मनी के विदेशमंत्री ने भी  कहा है कि जो कंपनियां ईरान में सक्रिय हैं उनका समर्थन जर्मनी और यूरोपीय संघ सब ही करते हैं।हाइकोमास ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि वे कंपनियां जो ईरान में सक्रिय हैं उनका हम पूरी तरह से समर्थन करते हैं।इसी बीच जर्मनी के वित्तमंत्री ने बयान जारी करके एलान किया है कि जर्मनी की सरकार अब भी ईरान में सक्रिय जर्मनी कंपनियों की ओर से पूंजी निवेश और निर्यात की गारेंटी लेती है।  इस बयान में कहा गया है कि इन कंपनियों का समर्थन लगातार जारी है।

 

टीकाकार कहते हैं कि रूस और चीन ने कहा है कि वह अमरीका के प्रतिबंधों के बावजूद ईरान के साथ अपने आर्थिक सहयोग को जारी रखेंगे। यह घोषणा ट्रम्प और उनके घटकों के मुंह पर तमांचे से कम नहीं है। अमरीका के अरब घटकों और इस्राईल पर यह तमांचा बहुत ज़ोर से पड़ा है। टीकाकारों के अनुसार  जब दो बड़ी शक्तियां अर्थात रूस और चीन कह रही हैं कि वह प्रतिबंधों के मामले में ईरान के साथ खाड़ी हैं और भारत, तुर्की तथा यूरोपीय संघ ने भी ईरान का साथ देने की बात कही है तो इसका मतलब यही है कि ईरान इस लड़ाई में अकेला नहीं है और ट्रम्प के मंसूबे का विफल होना तय है। बल्कि कुछ टीकाकार तो यहां तक कह रहे हैं कि ट्रम्प इन हरकतों से अपना राष्ट्रपति पद दांव पर लगा रहे हैं। (Q.A)

 

 

Aug १२, २०१८ १५:०६ Asia/Kolkata
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