ईरान के महान बुद्धिजीवी कार्यक्रम में आज हम खुरासान क्षेत्र की सैर करेंगे और उसके साथ ही तैमूरी काल के हेरात नगर भी जांएगे ताकि नौवीं और दसवी हिजरी क़मरी सदी के विख्यात चित्रकार और हेरात चित्रकला शैली के आविष्कारक, कमालुद्दीन बेहज़ाद सुलतानी से परिचित होंगे ।

वह बहुत प्रसिद्ध चित्रकार थे । उनकी चित्रकला ने, ईरानी चित्रकला में एक नया अध्याय जोड़ दिया।  उन्होंने ईरानी चित्रकला की जो सेवा की और जो उपलब्धियां अर्जित कीं, वह वर्षों तक ईरान, भारत , तुर्की और मध्य एशिया के कलाकारों के लिए एक पाठशाला थी। 

 

कमालुद्दीन बेहज़ाद 1460 ईसवी में, हेरात नगर में पैदा हुए। उस दौर के बहुत से प्रसिद्ध इतिहासकारों ने, इस प्रसिद्ध ईरानी चित्रकार को, सुलतान हुसैन बायक़रा के किताब प्रभारी और हेरात के प्रसिद्ध चित्रकार अमीर रुहुल्लाह  मीरक का शिष्य बताया है। कमालुद्दीन बेहज़ाद  के माता पिता का उनके बचपन में ही निधन हो गया था। संभावित रूप से रुहुल्लाह मीरक उनके रिश्तेदार थे इसी लिए उन्होंने ही कमालुद्दीन बेहज़ाद  का पालन पोषण किया। रुहुल्लाह मीरक अपने काल में चित्रकला और सुलेखन के विख्यात उस्ताद थे और कहा जाता है कि हेरात की अधिकांश इमारतों पर लिखी गयी चीज़ों वास्तव में रुहुल्लाह मीरक के सुलेखन का नमूना है। कमालुद्दीन बेहज़ाद को किशोरावस्था में ही चित्रकला में ख्याति प्राप्त हो गयी थी और सुल्तान, हुसैन बायक़रा तथा उसके बुद्धिमान व कलाप्रेमी मंत्री, अली अलीशीर नवाई ने उन पर ध्यान देना आरंभ कर दिया था यही वजह थी कि उन्हें शाही पुस्तकालय और कलाकेन्द्र का प्रमुख बना दिया गया। ईरानी राजा, शाह इस्माईल सफवी  हेरात पर क़ब्ज़ा करने के बाद, कमालुद्दीन बेहज़ाद को अपने साथ तबरेज़ ले गये और शाही पुस्तकालय उनके  ज़िम्मे कर दिया। कमालुद्दीन बेहज़ाद  का निधन सन 942 हिजरी कमरी  में हो गया। कुछ लोगों के अनुसार उन्हें तबरेज़ में दफन किया गया जबकि कुछ अन्य लोगों का मानना है कि उनकी क़ब्र हेरात नगर में है। 

 

चित्रकला के बहुत से नमूनों को कमालुद्दीन बेहज़ाद से संबंधित बताया जाता है लेकिन अध्ययन कर्ताओं का मानना है कि उनमें से केवल 32 नमूनों को कमालुद्दीन बेहज़ाद की कला का असली नमूना कहा जा सकता है।यह कलाकृतियां उनके जीवन के दस सब से अच्छे वर्षों के दौरान बनायी गयी हैं। सारे विशेषज्ञ, क़ाहेरा के दारुलकुतुब में मौजूद , कलाकृतियों को,कमालुद्दीन बेहज़ाद की महत्वपूर्ण कला कृति मानते हैं हालांकि उनमें से केवल चार पर ही कमालुद्दीन बेहज़ाद के दस्तखत हैं । इसी तरह ब्रिटेन में मौजूद कलाकृतियों में से 18 को कमालुद्दीन बेहज़ाद की कला के नमूने के तौर पर पहचाना जा सकता है। 

 

सदियों तक कमालुद्दीन बेहज़ाद के ख्याति की वजह से इस क्षेत्र में सक्रिय बहुत से कलाकारों ने उनका अनुसरण किया और उनकी कलाकृतियों की नक़्ल करके उस पर उनका नाम भी लिखा है इस लिए कमालुद्दीन बेहज़ाद की असली कलाकृतियों की पहचान काफी कठिन है अलबत्ता इस संदर्भ में अब अध्ययन आरंभ हो गया है। वैसे सन 1931 में लंदन में ईरानी कला की प्रदर्शनी के बाद होने वाले अध्ययन का काफी हद तक नतीजा भी निकला था। उनकी कलाकृतियों के बारे में जो मालूमात हैं उनकी बुनियाद वह चित्र हैं जो उनके अस्ल हस्ताक्षर के साथ, सअदी की विश्व विख्यात किताब बूस्तान में दर्ज हैं और इस समय काहेरा के राष्ट्रीय पुस्तकालय में मौजूद हैं। 

 

कमालुद्दीन बेहज़ाद की कलाकृतियों पर उनके हस्ताक्षर के अलावा एक और हस्ताक्षर है जिससे उनके असली या नकली होने का पता लग सकता है और वह चित्रकला की उनकी विशेष शैली। सजावटी और असली दृश्यों के मध्य असाधारण व अदभुत तालमेल, उनकी कलाकृतियों की असलियत जानने का बहुत अच्छा माध्यम है। विभिन्न पुस्तकालयों में कमालुद्दीन बेहज़ाद से संबंधित चित्रकला के नमूनों के बारे में भी विशेषज्ञों की अलग अलग राय है लेकिन यह भी एक हक़ीक़त है कि इनमें से बहुत सी कलाकृतियां भले ही उनके हाथों से अस्तित्व में न आयी हों लेकिन उन्हें उनकी विशेष शैली में और उनके मत का अनुसरण करते हुए बनाया गया है। सन 890 हिजरी क़मरी में लिखी गयी अमीर अली शीर नवाई की " खम्सा" जो बूदलियान लाइब्रेरी में मौजूद है या सन 891 हिजरी क़मरी में छपी गुलिस्तान , जो पेरिस में है और इसी तह सन 846 हिजरी क़मरी से संबंधित निज़ामी की खम्सा व किताबें हैं जिनकी जिल्द पर छपे चित्रों को कमालुद्दीन बेहज़ाद से संबंधित बताया जाता है। 

 

कमालुद्दीन बेहज़ाद हेरात मत की छत्रछाया में पले बढ़े लेकिन रंगों के चयन और चित्रकारिता की जो उनमें अभूतपूर्व क्षमता थी उसकी वजह से उन्होंने ईरानी चित्रकला में क्रांति ला दी। विशेषज्ञों के अनुसार उन्होंने अत्याधिक दक्षता के साथ लकीरों के कुछ इस प्रकार प्रयोग किया कि उनसे पहले के चित्रकारों के विपरीत, उनकी चित्रकला जीवंत हो उठी। कमालुद्दीन बेहज़ाद ने शिल्प कला और प्रकृति को इन्सानों के कामों में बदल दिया और इस क्षेत्र में उन्होंने हर एक के लिए उचित स्थान का चयन किया। उन्होंने, रंगों के एक दूसरे पर पड़ने वाले प्रभाव से लाभ उठाते हुए, चित्र के विभिन्न हिस्सों के एक दूसरे  से जोड़ दिया। उन्होंने अपनी कला के नमूनों में ज्योमितीय सिद्धान्तों का भी प्रयोग किया और इस तरह से अपने कला के नमूनों को अभूतपूर्ण मज़बूती प्रदान की। वह इस शैली की सहायता से, जनता, चीज़ों और अपनी कलाकृति के वातावरण मे मध्य तार्किक संबंध जोड़ने में सफल रहे जो निश्चित रूप से ईरानी चित्रकारिता में एक नया अध्याय था। 

 

कमालुद्दीन बेहज़ाद ने अपनी कला कृतियों में जो एक अन्य शैली का प्रयोग वह गतिशील चीज़ों के संदर्भ में खाली जगहों का प्रयोग है। उनकी चित्रकला में चीज़ें न केवल यह कि वास्तविक बल्कि जीवंत नज़र आती हैं। कमालुद्दीन बेहज़ाद की चित्रकला, देखने वाले को अपने भीतर छुपी सुन्दरता को खोजने पर प्रेरित करती है। उनकी रचनाएं, व्याख्यान करती हैं  जिन्हें मानवीय दशाओं का आश्चर्यजनक वर्णन कहा जाता है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कमालुद्दीन बेहज़ाद की शैली प्रकृतिवाद लिए हुए है और उन्होंने ही इसे ईरानी चित्रकला में शामिल किया है। कमालुद्दीन बेहज़ाद ने अपनी अधिकांश रचनाओं में गहरे और हल्के रंगों के मध्य टकराव का प्रयोग किया और कहा जाता है कि परस्पर विरोधी रंगों का प्रयोग करने में उन्हें अपने समकालीन कलाकारों की तुलना में बहुत अधिक दक्षता प्राप्त थी। 

खूरनक़ महल का निर्माण, कमालुद्दीन बेहज़ाद

 

खूरनक़ महल का निर्माण, कमालुद्दीन बेहज़ाद की उत्कृष्ट कला कृति है जिसे जीवन के वास्तविक दृश्यों पर ध्यान देते हुए चित्रकारिता की उनकी विशेष शैली का एक अच्छा नमूना कहा जाता है। उन्होंने लोगों की जीवन शैली और छोटे मोटे कामों को रेखांकित करने में अत्याधिक सूक्ष्मता से काम लिया है उदाहरण स्वरूप उन मज़दूरों को बड़ी दक्षता के साथ दिखाया गया है जो काम बांट कर एक महल बना रहे हैं और उनके बीच एक गारा मिट्टी ढोने वाला एक काला दास भी नज़र आ रहा है। इसी तरह शाही जश्न की तैयारी करने वाले सेवकों को देखा जा सकता है या फिर उस दास को जो तौलिया लेकर खड़ा  है ताकि अपने स्वामी के पैर सुखाए। 

 

वास्तविकता को कमालुद्दीन बेहज़ाद की चित्रकला की वह विशेषता कहा जा सकता है जो उन्हें अन्य कलाकारों के अलग करती है। यह वास्तविकता विशेषकर उन चित्रों में अधिक नजर आती है जो पूरी तरह से दरबार के लिए नहीं बनाये गये थे बल्कि उनमें आम जीवन दिखाया गया जैसे, खेतों में अपने बच्चों को दूध पिलाते जानवर या, किसी को सज़ा देने का दृश्य, खाने पीने की चीज़ें लाते हुए नौकर और खेतों में ग्रामीण आदि। कमालुद्दीन बेहज़ाद की चित्रकला की एक अन्य विशेषता जो वास्तव में उनके वास्तविकता वाद की ही देन है, इन्सानों के रूप हैं। कमालुद्दीन बेहज़ाद की चित्र कला में इन्सानों को गुड़िया गुड्डों की भांति एक जैसा नहीं दिखाया जाता बल्कि हर इन्सान का चेहरा, उसके व्यक्तित्व की पहचान होता है। कमालुद्दीन बेहज़ाद के चित्रों में आराम करते हुए लोगों के चेहरे भी अत्याधिक स्वाभाविक नज़र आते हैं। लेकिन कमालुद्दीन बेहज़ाद की चित्रकला का सब से महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि उन्होंने कभी भी,  अपनी इतनी सूक्ष्मता के बावजूद, कथानक को आम जीवन शैली के चित्रण की बलि नहीं चढ़ायी। दूसरी तरफ उन्होंने स्वाभाविक व वास्तविक दुनिया के चित्रण के लिए, ईरानी चित्रकला के सौन्दर्य बोध की शैली को अपनाया था और इसी लिए उनका स्वाभिकतावाद व वास्तविकता की शैली, युरोप के वास्तविकता वाद से बहुत अलग है। 

कथानक की शैली विचार व आभास को अत्याधिक कलात्मक रूप में सूक्ष्मता के साथ संतुलित किया गया है। उन्होंने विशेष शैली और रंगों के प्रयोग से मनुष्य को जिस तरह से देखा और दिखाया है उसकी मिसाल नहीं मिलती और इससे उनकी कला का महत्व भी स्पष्ट होता है। चित्रों में संतुलन और रंगों के चयन ने, ईरानी चित्रकला शैली में बुनियादी बदलाव पैदा कर दिया। 

सुल्तान हुसैन बायक़रा,कमालुद्दीन बहज़ाद

कमालुद्दीन बहज़ाद की चित्रकला में रंगों की महत्वपूर्ण भूमिका है। तरह तरह के रंगों के प्रयोग  से यह पता चलता है कि वह रंगों के चयन में कितने अधिक संवेदनशील थे। उनके बनाए चित्रों से पता चलता है कि वह अधिकतर, " ठंडे" रंगों में रूचि रखते थे अर्थात वह रंग जो हरे और नीले जैसे दिखते हों लेकिन इसके साथ ही " गर्म " रंगों विशेषकर तेज़ नारंगी रंगों को उनके साथ रख कर संतुलन बना देते हैं। चित्र के हर भाग का दूसरे से ताल मेल और उनमें संतुलन आश्चर्यजनक है। कलियों से भरी डालियां, खूबसूरत टाइल और सजे हुए फर्श, उनके चित्रों में उनकी रचनात्मकता को दर्शाते हैं। 

 

Aug १३, २०१८ १३:१३ Asia/Kolkata
कमेंट्स