पिछले सोमवार को तेहरान में ईरान के विभिन्न प्रांतों के लोगों ने इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता से भेंट की।

भेंट में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनमें से एक बात ईरान से वार्ता हेतु अमेरिकी प्रस्ताव के बारे में थी।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने ईरान और ईरानी राष्ट्र से मुकाबले केलिए अमेरिकी षडयंत्रों और ईरान से वार्ता हेतु अमेरिकी प्रस्ताव को बयान किया। उन्होंने कहा कि अलबत्ता एक नीति के अंतर्गत उन्होंने इस विषय में पहल की और वे अर्थहीन राजनीतिक प्रयास कर रहे हैं एक व्यक्ति कहता है कि बिना शर्त वार्ता और दूसरा व्यक्ति उसे शर्तों से जोड़ देता है।

ईरान द्वारा अमेरिका से वार्ता न करने के कारणों को बयान करते हुए इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं" वार्ता करने की अमेरिकियों की विशेष शैली है जिसे समझना चाहिये। उसके बाद वरिष्ठ नेता ने इस सवाल का जवाब दिया कि क्या कोई बुद्धिमान व्यक्ति इस तरीके से बात करेगा? वरिष्ठ नेता ने राजनीति के क्षेत्र में वार्ता की वास्तविकता को लेन- देन बताया और कहा कि हर वार्ता में अमेरिकी सैनिक, प्रचारिक और वित्तीय शक्ति से अपने लक्ष्यों को व्यवहारिक बनाये जाने की दिशा में हर रुकावट को खत्म कर देना चाहते हैं।"

वार्ता में अमेरिका पर भरोसा न करने के बहुत सारे उदाहरण हैं और इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता इसके कुछ उदाहरणों की ओर संकेत करते हैं। उन्होंने ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते के संबंध में होने वाली वार्ता की ओर संकेत किया जा सकता है। यह समझौता लंबी वार्ता के बाद हासिल हुआ था परंतु अमेरिका इस अंतरराष्ट्रीय समझौते से एकपक्षीय रूप से निकल गया। रोचक बात है कि सुरक्षा परिषद ने भी एक प्रस्ताव पारित करके इस समझौते की पुष्टि की थी। अमेरिका ने इस समझौते से निकल कर यह सिद्ध कर दिया कि समझौतों के प्रति वचनबद्ध रहने में वह सच्चा नहीं है और हर परिस्थिति में वह केवल अपने हितों को प्राथमिकता देता है और उसी के बारे में सोचता है।

अमेरिका की सुरक्षा और स्ट्रैटेजिक शोध केन्द्र के अध्ययनकर्ता हाली डेग्रेस का मानना है कि ईरानी परस्पर सम्मान की वार्ता में विश्वास रखते हैं परंतु ट्रम्प सरकार ने एकपक्षीय रूप से परमाणु समझौते से निकल कर यह सिद्ध कर दिया कि वह भरोसे के लाएक़ नहीं है।

अभी हाल ही में अमेरिका और उत्तर कोरिया के मध्य सिंगापुर में जो वार्ता हुई है उसमें भी यह बात देखने को मिली कि अमेरिकी केवल अपने हितों के बारे में सोचते हैं। रोचक बिन्दु यह है कि अमेरिकी अपनी शैली के आधार पर सामने वाले पक्ष से चाहते हैं कि वह तुरंत उनकी मांगों पर अमल करे। यह एसा  विषय है जो वार्ता के सही न होने का सूचक है। इसी संबंध में ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने समाज के विभिन्न वर्गों से मुलाकात में कहा कि वार्ता में अमेरिकी केवल विदित में संतोषजनक वादा करते हैं परंतु सामने वाले पक्ष से तुरंत विशिष्टता लेना चाहते हैं और वे अपने वादे को व्यवहारिक नहीं बनाते हैं।

सामने वाले पक्ष से जिस तरह अमेरिकी वार्ता करते हैं वह इस बात का सूचक है कि वह वार्ता में श्रेष्ठता पर आधारित दृष्टिकोण अपनाते हैं और अपने लक्ष्यों को पूरा बयान करते हैं और वार्ता के दौरान अपने लक्ष्यों से एक कदम भी पीछे हटने के लिए तैयार नहीं होते हैं। वार्ता का अर्थ है यानी लेन-देन। यानी वार्ताकार वार्ता में अपनी कुछ मांगों व लक्ष्यों से पीछे हटता है ताकि वार्ता का कोई परिणाम निकले। परमाणु समझौता इस प्रकार की वार्ता का नमूना था। परमाणु समझौते के संबंध में जो वार्ता हुई थी उसमें अमेरिकियों ने जो वचन दिया था उनमें से किसी एक पर अमल नहीं किया यहां तक कि ट्रम्प की सरकार के सत्ता में आने के बाद कुछ एसी बातें व मांगे पेश की गयीं जिनका परमाणु वार्ता के दौरान कोई उल्लेख ही नहीं था। यह विषय इस बात का सूचक है कि वार्ता के दौरान अमेरिकी अपने समस्त लक्ष्यों को बयान नहीं करते हैं और विभिन्न अवसरों पर अपने दूसरे लक्ष्यों को स्पष्ट करते हैं। वे व्यवहारिक रूप से सिद्ध कर देते हैं कि तार्किक वार्ता के सिद्धांतों के प्रति कटिबद्ध नहीं रहते हैं। परमाणु समझौता केवल ईरान के शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के बारे में था और इस वार्ता में न तो ईरान के मिसाइल के संबंध में और न ही क्षेत्र में ईरान की उपस्थिति के बारे में कोई वार्ता होने वाली थी परंतु अमेरिका में जब ट्रम्प की सरकार सत्ता में आई तो उसने इन चीज़ों की भी मांग की जिस पर ईरान ने कड़ी आपत्ति जताई और अंत में ट्रंप परमाणु समझौते से एक पक्षीय रूप से निकल गये। इस प्रकार यह बात एक बार फिर यह बात सिद्ध हो गयी कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय समझौतों को कोई महत्व नहीं देता है।

धमकी और प्रतिबंध वे हथकंडे हैं जिनका अमेरिका की विदेश नीति में विशेष स्थान हैं। ट्रंप सरकार उत्तर कोरिया और ईरान के खिलाफ इसी हथकंडे का प्रयोग कर रही है। इस प्रकार की नीति का लक्ष्य सामने वाले पक्ष पर दबाव में वृद्धि करना, उसे अपने लक्ष्यों से पीछे हटने और अंत में अमेरिका के दृष्टिगत वार्ता करने पर बाध्य कर देना है। अमेरिका की वार्ता की इस शैली का अनुभव अभी हाल ही में उत्तर कोरिया के साथ होने वाली वार्ता में किया गया। इस वार्ता में दोनों देशों के नेताओं ने सिंगापुर में एक दूसरे से मुलाकात की परंतु परमाणु हथियारों से निरस्त्रीकरण पर आधारित अमेरिकी मांग का उत्तर कोरिया ने विरोध किया। अमेरिका के विदेशमंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि 60 से 70 प्रतिशत परमाणु क्षमता को कम करने पर आधारित अमेरिकी मांग पर उत्तर कोरिया ने सहमति नहीं जताई। अमेरिकी अधिकारियों की यह शैली इस बात की सूचक है कि वार्ता में लक्ष्यों के निर्धारण में किसी प्रकार का संतुलन नहीं है। अमेरिका ने उत्तर कोरिया के खिलाफ लागू प्रतिबंधों को निरस्त करने के बजाये उससे परमाणु निरस्त्रीकरण की मांग की। अमेरिका की यह नीति ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता के शब्दों में अमेरिकी नक्द व कैश विशिष्टता चाहते हैं। इन सबके बावजूद यह बात स्वाभाविक है कि उत्तर कोरिया आरंभिक दिनों में अमेरिका के साथ होने वाली वार्ता के प्रति आशावान था परंतु अब उसे इस परिणाम पर पहुंच जाना चाहिये कि अमेरिकी वार्ता में केवल अपने लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास में होते हैं। इसी संबंध में उत्तर कोरिया के विदेशमंत्रालय ने एक विज्ञप्ति जारी करके वाशिंग्टन पर वार्ता में दूसरे पक्ष के अपमान का आरोप लगाया। इसी प्रकार उत्तर कोरिया के विदेशमंत्रालय ने अमेरिका पर विश्वास बहाली के लिए किये जा रहे प्रयासों को समाप्त करने का आरोप लगाया और कहा है कि इस परिस्थिति में वार्ता से किसी परिणाम की अपेक्षा रखना मूर्खता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सिंगापुर में उत्तर कोरिया के नेता के साथ जो मुलाकात की थी उसे वह अपने लिए राजनीतिक सफलता समझते हैं । इसी बात के दृष्टिगत उन्होंने ईरान से बिना शर्त वार्ता का प्रस्ताव दिया। उनके इस प्रस्ताव के कुछ ही घंटे बाद अमेरिका के विदेशमंत्री ने वार्ता को सशर्त कर दिया। माइक पोम्पियो ने कहा कि क्षेत्र में ईरान के रवइये में बदलाव वार्ता की महत्वपूर्ण शर्त है। अमेरिकी दृष्टिकोणों में अस्थिरता इस बात की सूचक है कि अमेरिकी अधिकारी ईरान के संबंध में बदहवासी का शिकार हैं और सत्ताधारी भली-भांति जानते हैं कि ईरान उत्तर कोरिया नहीं है। अत: वह कभी भी अमेरिकी छलावे में नहीं आयेगा। इसी संबंध में अमेरिका की कोबलोग वेबसाइट ने अभी हाल ही में लिखा था कि अमेरिका द्वारा ईरान को अलग- थलग करने की धमकी के कारण  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाशिंग्टन के अलग- थलग पड़ जाने का ख़तरा है क्योंकि ईरान के रूस और चीन से जो संबंध हैं उसका प्रयोग वह अमेरिका पर दबाव डालने के लिए कर सकता है।

परमाणु समझौते से अमेरिका के निकल जाने के दृष्टिगत इस समय इस प्रकार की परिस्थिति नहीं है जैसा ट्रंप सरकार सोच रही है। प्रतिबंध से ईरान को अलग- थलग नहीं किया जा सकता। क्योंकि आज यूरोपीय संघ भी अमेरिका की एकपक्षीय कार्यवाही का विरोध कर रहा है और वह अमेरिका की हां में हां नहीं मिला रहा है। इसी संबंध में अमेरिकी सिनेटर जैक रीड ने कहा कि अब ईरान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता नही रही है। साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि अमेरिका एसी स्थिति में परमाणु समझौते से निकल गया जब उसके साथ ईरान विरोधी घटक भी वाशिंग्टन के साथ नहीं हैं और यूरोपीय संघ ने भी अमेरिका का साथ छोड़ दिया है।

इस बात को सभी जानते हैं कि वार्ता का आधार परस्पर सम्मान और सच्चाई होनी चाहिये और साथ ही वचनों के प्रति कटिबद्ध होना चाहिये परंतु अमेरिकी अधिकारियों ने परमाणु समझौते से निकल कर दर्शा दिया कि वे वार्ता के इन सिद्धांतों से दूर हैं और ईरान के राष्ट्रपति डाक्टर हसन रूहानी के कथनानुसार अत्याचारपूर्ण और ग़ैर कानूनी प्रतिबंधों के साथ वार्ता का प्रस्ताव नहीं दिया जा सकता। ईरान के खिलाफ यूरोपीय संघ ने भी जब अमेरिका का साथ छोड़ दिया तो अमेरिकी अधिकारी वार्ता के माध्यम से अपने दृष्टिगत लक्ष्यों को साधने की चेष्टा में हैं। इस वार्ता का कोई परिणाम नहीं निकलेगा। ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने कहा है कि वार्ता में अमेरिकियों की शैली के दृष्टिगत दुनिया में जो भी सरकार उनसे वार्ता करेगी उसे कठिनाइ का सामना होगा किन्तु यह कि वाशिंग्टन और उसका दृष्टिकोण एक हो। अलबत्ता इस समय की अमेरिकी सरकार यूरोपीय संघ से भी ज़ोरज़बरदस्ती से बात कर रही है।

अमेरिका की वर्तमान सरकार इस देश की सबसे पाखंडी सरकार है। जब से ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति बने हैं तब से यह सरकार एक के बाद दूसरे अंतरराष्ट्रीय समझौतों से निकल रही है यहां तक कि उसने व्यापारिक युद्ध छेड़ दिया है और विश्व व्यापार संगठन WTO की जिम्मेदारी भी ख़तरे में पड़ गयी है। इस स्थिति से इस बात में लेशमात्र भी संदेह नहीं रह गया है कि उस सरकार से वार्ता करना तार्किक नहीं है जो अपने वचनों के प्रति कटिबद्ध नहीं रहती और जिसने केवल ज़ोर-ज़बरदस्ती को वार्ता का आधार बना रखा है। इसी संबंध में स्कोवक्राफ्ट केन्द्र के सहायक मैथिव क्रोनिग ने अभी हाल ही में कहा था कि ट्रंप ने ईरान के राष्ट्रपति से वार्ता का जो प्रस्ताव दिया है वह दबाव का एक हथकंडा है जिसका प्रयोग अमेरिका वर्षों से कर रहा है।

बहरहाल अमेरिकी राष्ट्रपति एक ओर ईरान से बिना शर्त वार्ता का प्रस्ताव देते हैं और दूसरी ओर वह तेहरान के विरुद्ध अत्याचारपूर्ण प्रतिबंध भी लगाते हैं। इस प्रकार की परिस्थिति में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ अमेरिकी राष्ट्रपति के विरोधाभासी रवइये की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि ट्रंप सरकार ने किसी प्रकार की सदभावना नहीं दिखाई है जिसे आधार बनाकर वह ईरान के साथ वार्ता का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। इन्हीं वास्तविकताओं के दृष्टिगत ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ भेंट में अमेरिका के साथ वार्ता न करने की घोषणा की है और कहा है कि थोड़ी देर के लिए मान लीजिये कि अगर हम वार्ता करेंगे तो अमेरिका की वर्तमान सरकार से कदापि वार्ता नहीं करेंगे।

 

टैग्स

Aug २०, २०१८ १२:५६ Asia/Kolkata
कमेंट्स