आज हम महा ख़ुरासान की यात्रा करते हैं।

इस यात्रा में हम वहां पर हेरात में तैमूरी शासन काल में नवीं और दसवी हिजरी क़मरी के प्रसिद्ध चित्रकार और ईरानी चित्रकारिता में हेरात मत के संस्थापक प्रसिद्ध ईरानी चित्रकार कमालुद्दीन बेहज़ाद से परिचित होंगे। कमालुद्दीन बेहज़ाद सुलतानी ईरान के प्रसिद्ध चित्रकार, चित्रकारिता का नवीनीकरण करने वाले बहुत ही विख्यात चित्रकार थे। चित्रकारिता में उनकी शैली ने ईरानी चित्रकारिता में नया मंच बढ़ा दिया। ईरानी चित्रकारिता में उनकी उपलब्धियां, ईरान, भारत, तुर्की और मध्य एशिया के कलाकारों का स्रोत रही है।

श्री कमालुद्दीन बेहज़ाद का जन्म 855 से 865 हिजरी क़मरी के बीच हेरात शहर में हुआ था। उस काल के प्रसिद्ध बहुत से इतिहासकारों ने ईरान के इस प्रसिद्ध चित्रकार को मीरक नाम से प्रसिद्ध हेरवी चित्रकार और सुलतान हुसैन बायक़ुरा के पुस्तकालय के प्रमुख अमीर रूहुल्लाह का शिष्य बताया है। कमालुद्दीन बेहज़ाद के बचपन में उनके माता पिता का स्वर्गवास हो गया था। रूहुल्लाह मीरक ने जो संभवता उनके रिश्तेदार थे, उनकी ज़िम्मेदारी संभाल ली। ख़्वाजा मीरक, चित्रकारिता, सोने की क़लई करने और सुलेखन में अपने समय में दक्ष थे। कहा जाता है कि हेरात की अधिकतर इमारतों पर लगे शिलालेख मीरक के हाथों लिखे हुए हैं। कमालुद्दीन बेहज़ाद ने अपनी जवानी के काल में ही चित्रकारिता के क्षेत्र में ज़बरदस्त ख्याति प्राप्त कर ली थी और अमीर अलीशेर नवाई के ज्ञानी और कलाप्रेमी मंत्री सुलतान हुसैन बायक़ुरा के ध्यान का केन्द्र बन गये जिन्होंने उन्हें चित्रकारिता और पुस्तकालय का प्रमुख बना दिया।  शाह इस्माईल सफ़वी हेरात पर नियंत्रण करने के बाद उस्ताद  बेहज़ाद और हेरात के कुछ कलाकारों को अपने साथ तबरेज़ ले गये और और उनके हवाले शाही पुस्तकालय का नेतृत्व कर दिया गया।  कमालुद्दीन बेहज़ाद का वर्ष 942 हिजरी क़मरी में निधन हो गया। कुछ लोगों ने उनकी क़ब्र तबरेज़ में बतायी है जबकि कुछ लोगों ने उनकी क़ब्र के पत्थर के दृष्टिगत जो मुख़्तार पहाड़ी के किनारे स्थित है, उनकी मज़ार को हेरात में बताया है। हमने इसी प्रकार बताया था कि कमालुद्दीन बेहज़ाद हेरात मत के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। हेरात मत के चित्रकारों को दो पीढ़ियों में विभाजित किया जा सकता है, पहली पीढ़ी, शाहरूख़ तैमूरी के समकालीन थी और इस पीढ़ी का सबसे बेहतरीन और यादगार काम बायसनक़री का शाहनामा था जो इस पीढ़ी की चित्रकारिता की विशेषता की गाथा सुनाता है। दूसरी पीढ़ी के प्रतिष्ठित व्यक्ति बेहज़ाद थे जिन्होंने सुलतान हुसैन बायक़ुरा के काल  में जीवन व्यतीत किया।

 

850 हिजरी क़मरी में शाहरूख़ की मौत के बाद राजनैतिक और आर्थिक स्थिरता फैल गयी और तैमूरियों के शासन क्षेत्र में बहुत विद्रोह और दंगे फैल गये। इस बीच पिता अपनी विद्रोही संतानों के हाथों मारे गये। इस बीच चित्रकारों को बहुत अधिक नुक़सान पहुंचा और जैसा कि बताया  जाता है कि राजाओं की संपत्ति, जिनके पास सत्ता होती थी उन्हीं के बीच इधर उधर होती थी। यह दंगे, अशांतियां और अस्थिरता की झलक ईरानी चित्रकारों और लेखकों की किताबों में देखा जा सकता है। सुलतान हुसैन बायक़ुरा की जीत और हेरात पर उनके नियंत्रण से जो 12 वर्षीय गृहयुद्ध और दंगों के बाद 875 हिजरी क़मरी में हुआ, तैमूरियों के क्षेत्र पर राजनैतिक स्थिरता विराजमान हुई।

सुलतान हुसैन बायक़ुरा ने ज्ञान प्रेमियों और कलाप्रेमियों की सेवा करके समाज में बहुत बड़ा परिवर्तन पैदा किया। उनके काल में उनसे पहले वाले काल की तुलना में कलाप्रेमियों की लंबी सूची थी। बताया जाता है कि सुल्तान बायक़ुरा के काल में सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय लोग इतने अधिक थे कि दरबार से जुड़े इतिहासकारों ने उनकी संख्या 150 से 200 तक बताई है।

 

हुसैन बायक़ुरा की सत्ता की जड़ उनकी सार्थक कार्यवाहियों में निहित थी। उनके काल में कृषि को रौनक़ मिली और मंगोलो के काल में ख़राब हो चुकी भूमिगत नहरों को फिर से शुरु किया गया। साथ ही सांस्कृतिक गतिविधियों में संलग्न लोगों के कर माफ़ कर दिए गये। शाही पुस्तकाल  ने भी इस काल में अपनी गतिविधियां जारी रखी। मीरक के नाम से प्रसिद्ध अमीर रूहुल्लाह हेरवी, सुलतान हसैन बायक़ुरा के दरबार के एक प्रतिष्ठित कलाकार थे। उन्होंने हेरात चित्रकारिता मत के गठन में प्रभावी भूमिका निभाई है। मीरक ने आरंभ में क़ुरआन की तिलावत और लिपि सीखना शुरु किया और पिता के स्वर्गवास के बाद उन्होंने वस्तुओं पर सोने का पानी चढ़ाने और सोने के पानी से लिखाई की ओर रुझान पैदा किया और इन क्षेत्रों में आगे बढ़ते चले गये। उनके काम को इतनी अधिक ख्याति मिली कि सुलतान हुसैन बायक़ुरा के दरबार में उनको पुस्तकालय का मुखिया बना दिया गया। मीरक हेरवी इस काम में प्रचलित परंपरा को तोड़ने वाले के रूप में पहचाने गये। उन्होंने दूसरे कलाकारों के विपरीत स्वयं को एक कमरे में ही बंद नहीं रखा बल्कि उन्होंने खुले वातावरण में अपनी कई रचनाओं को दुनिया के सामने पेश किया। उनकी रचनाओं में ख़ुर्रम घाटी में तैमूर से संघर्ष, जूलूसे तैमूर, शीरीं को ख़ुसरू की तस्वीर दिखाना, शीरीं से फ़रहाद की मुलाक़ात और बूढ़ी औरत तथा सन्जर बादशाह की ओर संकेत किया जा सकता है यह सब मीरक ने हेरात चित्रकारिता मत के आधार पर रची हैं।

 

मीरक हेरवी वही व्यक्ति थे जिन्होंने बेहज़ाद के माता पिता के निधन के बाद उनकी अभिभावकता की ज़िम्मेदारी संभाली। यही कारण है कि उन्होंने बेहज़ाद का भविष्य संवारने का बीड़ा उठाया। बेहज़ाद बचपने से ही मीरक के शिष्य रहे। वर्ष 872 हिजरी क़मरी में तैमूरी ज़फरनामा नामक किताब की रचना बेहज़ाद से संबन्धित बताया गया जो उस समय केवल 16 से 17 साल की उम्र के थे। कुछ शोधकर्ताओं का यह मानना है कि इस पुस्तक की दक्षतापूर्ण रचना और साथ में हाथ से रंगों को निखारने से, यह शंका पैदा होती है कि शायद मीरक ने इसकी डिज़ाइनिंग की हो और बेहज़ाद ने उसमें रंग भरा हो इस बात के दृष्टिगत कि तैमूरी ज़फ़रनामा, सुलतान हुसैन के काल के किसी महापुरुष की सिफ़ारिश का परिणाम है, सरकारी और शाही आयाम से परे है। यह भी संभव है कि मीरक ने बहज़ाद को सिखाने और उनको अभ्यास कराने के लिए इससे लाभ उठाया हो।  दीवाने अमीर ख़ुसरू देहलवी की रचना बेहज़ाद ने 886 हिजरी क़मरी में अर्थात 32 वर्ष की आयु में की थी और गुलिस्ताने सादी के फ़ुटनोट वर्ष 891 हिजरी क़मरी में अर्थात 37 वर्ष की आयु में लिखे थे। बेहज़ाद अभी 38 वर्ष की आयु के ही थे कि अत्तार की मनतेक़ुत्तैर नामक पुस्तक का फ़ुटनोट वर्ष 892 हिजरी क़मरी में लिखा था। उन्होंने 52 वर्ष की आयु में दीवाने अमीर अलीशेर नवाई पर फ़ुट नोट लिखा।

 

सुलतान हुसैन बायक़ुरा की मृत्य के साथ ही दोबारा आंतरिक उपद्रव शुरु हो गया और मुहम्मद ख़ान शैबानी या शैबक ख़ान ने जो मेसोपोटामिया के उत्तरी भाग का रहने वाला उज़्बक था, हेरात पर नियंत्रण कर लिया किन्तु इस प्रक्रिया ने ईरानी चित्रकारिता की बढ़ती प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई क्योंकि शैबक ख़ान को चित्रकारिता में रुचि थी और बेहज़ाद ने भी उनकी तस्वीरें बनाई थीं। शाह इस्माईल सफ़वी द्वारा हेरात पर नियंत्रण और कमालुद्दीन बेहज़ाद जैसे प्रसिद्ध कलाकारों को तबरेज़ पहुंचाए जाने के कारण हेरात मत अपने पतन से निकट होता गया।  बेहज़ाद ने तबरेज़ पहुंचकर चित्रकार सलमान मुहम्मद तबरेज़ी के साथ मिलकर शाह इस्माईल के बेटे तहमास्ब की शिक्षा की ज़िम्मेदारी संभाली। तहमास्ब पर इन दो प्रसिद्ध उस्तादों की शिक्षा का यह प्रभाव पड़ा कि उसने न केवल कुछ किताबों की रचना की बल्कि वह वर्ष 944 हिजरी क़मरी में तहमास्बी शाहनामे की रचना में ख़ुद भूमिका बने। यह पुस्तक वर्तमान समय में हेरात मत की प्रसिद्ध पुस्तकों में शुमार होती है। तहमास्बी के शासन काल में तबरेज़ और हेरात जैसे दो मतों के साथ रहने के कारण इसमें काफ़ी निखार पैदा हुआ और यह साथ रहना हेरात मत के पतन और इस्फ़हान मत के अस्तित्व में आने की भूमिका बना जिसका नमूना रज़ा अब्बासी की रचनाओं में देखा जा सकता है। (AK)   

 

Aug २५, २०१८ १५:४० Asia/Kolkata
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