अभी हाल ही ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई ने हालिया महीनों में अमेरिकी राजनेताओं के दुस्साहसी रवैये की ओर संकेत किया और कहा कि वे पहले भी अपनी बातों में राजनीतिक एवं डिप्लोमैटिक शिष्टाचार का ध्यान नहीं रखते थे परंतु इस समय वे दुनिया के साथ अधिक अशिष्ट शैली में बात कर रहे हैं और एसा लगता है कि उनके अंदर से पूरी तरह लज्जा ही समाप्त हो गयी है।

सऊदी अरब ने यमन में स्कूली छात्रों से भरी बस और एक अस्पताल पर जो बमबारी की थी वरिष्ठ नेता ने समाज के विभिन्न वर्गों के साथ अपनी हालिया भेंट में उसकी ओर संकेत किया और कहा कि इन अपराधों से दुनिया को तकलीफ हुई और दिखावे के तौर पर ही सरकारों ने इस पर खेद प्रकट किया परंतु अमेरिकियों ने सऊदी अरब के निर्लज्ज अपराधों की भर्त्सना के बजाये उसके साथ स्ट्रैटेजिक संबंधों की बात की और वरिष्ठ नेता ने यह सवाल पूछा कि क्या वास्तव में अमेरिकी अधिकारी इंसान हैं?

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने इसी प्रकार अमेरिका पलायन करने वाले लगभग दो हज़ार बच्चों को उनके माता- पिता से अलग करके अलग सेल में बंद कर दिये जाने की घटना को अभूतपूर्व अपराध की संज्ञा दी और कहा कि शोचनीय बिन्दु यह है कि शर्म के बिना अमेरिकी पूरी दुनिया के सामने यह कार्य कर रहे हैं।

डोनल्ड ट्रंप के सत्ताकाल में ईरान से अमेरिका की शत्रुता अपने चरम बिन्दु पर पहुंच गयी है और अमेरिकी अधिकारी किसी प्रकार के संकोच के बिना ग़ैर वास्तविक बातें कहते और दावा करते हैं। रोचक बात यह है कि अमेरिकी अधिकारी उस स्थिति में हर जगह ईरान के खिलाफ दावे करते हैं जब वे स्वयं और उनके घटक इस प्रकार की बातों व कार्यों के प्रतीक बन गये हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हर कुछ समय पर ट्वीट करके इस्लामी गणतंत्र ईरान को क्षेत्र में ख़तरनाक सरकार की संज्ञा देते हैं। इसी प्रकार इस समय क्षेत्र में ईरान की रचनात्मक भूमिका को बदलने के लक्ष्य से अमेरिकी अधिकारी अधिक से अधिक दबाव तेहरान पर डाल रहे हैं। क्षेत्र में आतंकवाद का समर्थन, दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप और मानवाधिकारों का हनन वे आरोप हैं जिसे अमेरिकी अधिकारी इस्लामी गणतंत्र पर मढ़ते- रहते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि अमेरिका के क्रिया- कलापों और उसकी नीति ने क्षेत्र की शांति व सुरक्षा को ख़तरे में डाल रखा है। बहरहाल अमेरिकी सरकार का ईरान विरोधी रवइया, इस समय क्षेत्र और विश्व में मौजूद वास्तविकताओं के दृष्टिगत इस बात का सूचक है कि अमेरिकी राजनेताओं का व्यवहार निर्लज्जता के चरम शिखर पर पहुंच गया है।

अमेरिकी विश्व विद्यालय के एक प्रोफ़ेसर अकबर मुन्तसिर ने एक लेख में वेटरेन्ज़ साइट पर लिखा है कि ईरान में जो इस्लामी व्यवस्था है उसका बहुत से अमेरिकी विरोध करते हैं परंतु वे ईरान विरोधी अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो की बातों को पसंद नहीं करते हैं। पाइक पोम्पियो जब ईरान के बारे में बात करते हैं तो वह अमेरिका के घटक आतंकवादियों के सरगना देशों यानी सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात की इच्छाओं को दृष्टि में रखते हैं।

अमेरिकी सरकार के वर्तमान राजनेता एसी स्थिति में ईरान पर आतंकवाद के समर्थन और क्षेत्र में अस्थिरता उत्पन्न करने का आरोप लगाते हैं जब स्वयं अमेरिका और अमेरिका का समर्थन प्राप्त देश एवं शासन दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में अपराध अंजाम दे रहे हैं जो किसी से छिपा नहीं है। इराक और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी क्रिया- कलापों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। इसी तरह इस्राईल फिलिस्तीन में जो कुछ कर रहा है और यमन में सऊदी अरब जो कुछ अपराध अंजाम दे रहा है उसे अमेरिका का पूर्ण समर्थन प्राप्त है। इन दोनों सरकारों के साथ अमेरिका का रवैये इस बात का सूचक है कि अमेरिकी अधिकारियों को मानवाधिकारों के हनन पर किसी प्रकार का लेशमात्र भी संकोच नहीं है और वे दूसरों के साथ ज़ोर- ज़बरदस्ती की भाषा में बात करते हैं।

ट्रंप सरकार की नीतियों की जड़ व स्रोत साम्राज्यवाद है और उसका यही रवैये विश्व की समस्त कठिनाइयों व समस्याओं की जड़ है। इसी संबंध में हारवर्ड विश्व विद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के प्रोफेसर स्टीफ़ेन वाल्ट ने लिखा है कि दूसरे देशों में अमेरिका की उपस्थिति सदैव अतिवाद और नई तानाशाही के अस्तित्व आने का कारण रही है। वह आगे लिखते हैं कि मध्यपूर्व में अमेरिकी नीति के परिणामों पर दृष्टि इस बात की सूचक है कि मध्यपूर्व में उसका प्रभाव कम हो रहा है और यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि वह जहां भी जाता है वहां हिंसा, अतिवाद और एक नयी प्रकार की तानाशाही भी साथ में होती है।

 

अकबर मुन्तसिर सहित बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सरकार ईरान के खिलाफ जो झूठ बोलती है उसकी वजह इस्राईल है और दुनिया के बहुत से संचार माध्यम जायोनियों के हैं और वे उन्हीं के दिशा निर्देशन में काम करते हैं। इसी प्रकार जायोनी पूंजीपति संचार माध्यमों का प्रयोग अपनी इच्छाओं के अनुसार करते हैं। अमेरिका के नियो कंजरवेटिव इस्राईल की वफादारी का वस्त्र धारण करके लोगों के साथ विश्वासघात करते हैं। वेटेरन्ज़ टूडे साइट ने लिखा है कि अमेरिकी- इस्राईली नियो कंजरवेटिव धड़े ने अमेरिकी डेटा केन्द्र सहित अमेरिकी सरकार के 17 केन्द्रों में पैठ बना ली है। यह बात इस बात की सूचक है कि जायोनी ईरान के मुकाबले में किस सीमा तक अमेरिका की दुस्साहसी व निर्लज्ज नीतियों में सक्रिय व प्रभावी हैं।

ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते से अमेरिका का एक पक्षीय रूप से निकल जाना इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि ट्रंप ने यह कार्य इस्राईल की प्रसन्नता के लिए किया है। अमेरिका और इस्राईल की समरसता इस समय अपने शिखर पर है और यह समरसता इस बात का कारण बनी है कि पश्चिम एशिया में आतंकवादियों के आक़ा और उनके समर्थक बड़ी निर्लज्जता से ईरान विरोधी दृष्टिकोण अमनाएं और ट्रंप जायोनी शासन और कुछ अरब शासकों से मिलकर जिस ईरान विरोधी गठबंधन को बनाने का प्रयास कर रहे हैं उसे इसी दिशा में देखा जाए। इसी संबंध में अमेरिकी विचारक, बुद्धिजीवी, भाषा विशेषज्ञ व इतिहासकार नोअम चामस्की का मानना है कि अमेरिकी सरकार का लक्ष्य है कि वह इस्राईल और अरब देशों के सहयोग से बनने वाले गठबंधन के स्तंभों को मज़बूत करे क्योंकि ईरान, अमेरिका और इस्राईल की नीतियों व कार्यों के दिशा में सबसे बड़ी रुकावट है।“

इतिहास ने इस बात को अच्छी तरह दर्शा दिया है कि अमेरिकी जहां भी जाते हैं वहां समस्यायें व कठिनाइयां अधिक हो जाती हैं और अमेरिकी रवैया अशांति, असुरक्षा और अस्थिरता का कारण बनता है। इराक, सीरिया और यमन युद्ध ने विश्व वासियों के लिए स्पष्ट कर दिया है कि इन युद्धों की जड़ अमेरिका की साम्राज्यवादी नीति है। अब यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अमेरिकी नीतियों के कारण आतंकवादी गुट दाइश अस्तित्व में आया है। यही नहीं स्वयं अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और इस देश की पूर्व विदेशमंत्री हिलैरी क्लिंटन ने कहा है कि दाइश को अमेरिका ने बनाया है किन्तु अमेरिका की वर्तमान सरकार बड़ी निर्लज्जता के साथ ईरान पर आतंकवाद के समर्थन का आरोप लगाती है। हारवर्ड विश्व विद्यालय के प्रोफेसर स्टीफ़ेन वाल्ट ने बहुत अच्छी तरह अमेरिका की विनाशकारी नीति का चित्रण किया है और उनका मानना है कि क्षेत्र में अमेरिका का जो प्रभाव है अब उसका पूर्णरूप से नकारात्मक प्रभाव सामने आ रहा है। आतंकवादी गुट दाइश का अस्तित्व में आना और हज़ारों की हत्या वर्ष 2003 में इराक में अमेरिकी युद्ध का परिणाम है। स्टीफ़ेन वाल्ट ने यमन के वर्तमान संकट को भी इस समय के विश्व के सबसे बड़े मानवीय संकट का नाम दिया है और अमेरिका द्वारा सऊदी गठबंधन के समर्थन को इस संकट के अस्तित्व में आने का कारण बताया है। 

 

टैग्स

Aug २६, २०१८ १६:०६ Asia/Kolkata
कमेंट्स