ईरान की इस्लामी क्रांति भी दुनिया की अन्य क्रांतियों की भांति अपने नारे, लक्ष्य और उमंग रखती है।

चूंकि ईरान की क्रांति देश की धर्मपरायण जनता और उसके नेता की मांगों से निकली है, इसके लक्ष्य, इसकी उमंगें और नारे भी इस्लाम की मूल्यवान शिक्षाओं से ही निकले हैं। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामनेई की नज़र में इस्लामी क्रांति की मुख्य उमंग, पवित्र जीवन तक पहुंचना है। पवित्र जीवन अर्थात ऐसा जीवन जो मनुष्य की आत्मिक, शारीरिक, अध्यात्मिक, वैज्ञानिक और व्यवहारिक आवश्यकताओं का जवाब दे। पवित्र जीवन तक पहुंचना आवश्यक है और इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण काम, ईश्वर की सत्ता, पवित्र क़ुरआन और पैग़म्बरे इस्लाम(स) पर ईमान रखना है। पवित्र जीवन तक पहुंचने के लिए ईमान रखना और भलाई करना भी है।  हम जितना भी अपने ईमान और भलाई करने के स्तर को बढ़ाएंगे, उसका प्रभाव पवित्र जीवन भी उतना ही अधिक होगा। पवित्र जीवन को प्राप्त करने का तीसरा रास्ता, मानवीय बुद्धि और सूझबूझ बढ़ाना है।  इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद पवित्र जीवन के नाम से उसकी मुख्य उमंग सामने आई जिसमें लक्ष्य प्राप्त करने के लिए एक पवित्र जीवन के अतिरिक्त अल्लाह की सत्ता स्वीकार करने, भलाई करने, समझ बूझ के काम करने, सृष्टि और उसके रहस्यों को जानने के साथ साथ बौद्धिक विकास की भी आवश्यकता होती है। सृष्टि और सृष्टि के बारे में चिंतन मनन का इतना अधिक महत्व है जिसके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम का कहना है कि एक घंटे का चिंतन मनन, सत्तर साल की उपासना से बेहतर है। यह जानना बहुत आवश्यक है कि पवित्र क़ुरआन काफ़िरों को चिंतन मनन न करने के कारण मुर्दा और बेजान क़रार देता है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई का मानना है कि इस्लामी क्रांति का लक्ष्य, इस्लामी समाज का गठन है। ऐसा समाज जिसमें इस्लामी उमंगें, इस्लामी लक्ष्य और वह महाकामनाएं व्यवहारिक हों जो इस्लाम ने मनुष्य के लिए रेखांकित की हैं, अर्थात न्याय और स्वतंत्रता से संपन्न समाज, ऐसा समाज है जिसमें लोग देश के संचालन, अपने भविष्य और अपने विकास में भूमिका निभात हैं। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता की नज़र में इस्लामी समाज की एक अन्य विशेषता, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और समृद्धि से संपन्न तथा निर्धनता और ग़रीबी से दूर समाज हो। उनका मानना है कि ऐसे समाज का गठन हो जो इस्लाम चाहता है जिसमें बहुआयामी विकास हो, अर्थात वैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रगति हो, अध्यात्मिक व धार्मिक प्रगति हो, आर्थिक व सामाजिक, नैतिक व समाजिक प्रगति की बात हो, बिना रोक टोक के, हमेशा प्रगति की ओर अग्रसर रहे। आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई बल देते हैं कि यह वह समाज है जिसके प्रयास में हम हैं, अलबत्ता यह समाज अभी व्यवहारिक नहीं हुआ किन्तु हम इस प्रयास में है कि यह समाज व्यवहारिक हो।

 

वरिष्ठ नेता बल देते हैं कि यह समाज, मनुष्य को सर्वोच्च लक्ष्यों तक पहुंचाता है और वह अल्लाह की उपासना है। वह उपासना जो मनुष्यों द्वारा ईश्वर की अधिक से अधिक पहचान से हासिल होती है। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि वह समाज जो अल्लाह की उपासना तक पहुंच गया है, अर्थात उसे ईश्वर की पूर्ण पहचान हासिल हो गयी हो, ईश्वर के शिष्टाचार से स्वयं को सुसज्जित कर लिया हो, यही मानवता की परिपूर्णता है। इस आधार पर यह अंतिम लक्ष्य है, और इससे पहले का लक्ष्य, इस्लामी समाज की स्थापना है जिसका बहुत बड़ा और महान लक्ष्य है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस्लामी क्रांति को चाहिए कि वह ईरानी राष्ट्र के लिए पवित्र जीवन उपलब्ध कराए और अंत में अपनी उमंग तक अर्थाता ईश्वर की उपासना तक पहुंचे। इस्लामी समाज तक पहुंच पवित्र जीवन के प्राप्ति के लिए बहुत आवश्यक है। इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का कहना है कि न्याय की स्थापना, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से संपन्न होना, किसी पर निर्भर न होना, लोकतंत्र, समस्त क्षेत्रों में राष्ट्र के अधिकारियों की रक्षा, दुनिया के मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा, दुनिया के हर क्षेत्र में हर अत्याचारग्रस्त की रक्षा, इस्लामी क्रांति के लक्ष्यों और उसकी उमंगों में है जो पवित्र जीवन तक पहुंचने की भूमिका है।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि क्रांति के आरंभ में जो काम अंजाम देना चाहिए वह लक्ष्यों का रेखांकन है। लक्ष्यों का रेखांकन होता है, अलबत्ता सर्वोच्च लक्ष्य अटल रहते हैं, दिन प्रतिदिन के हालात परिवर्तन योग्य हैं किन्तु वह सिद्धांत जो हमारे मूल लक्ष्य हैं, अटल हैं, अर्थात मनुष्य की रचना के आरंभ से आज तक, न्याय एक उमंग है, कभी भी न्याय, उमंग की श्रेणी से हट नहीं सकता। मनुष्य की स्वतंत्रता एक उमंग है। क्रांति, उमंगों को रेखांकिन करती है और उसके बाद वह इन लक्ष्यों की ओर बढ़ती है।

वरिष्ठ नेता इस्लामी धार्मिक सरकार को इस्लामी क्रांति का मुख्य लक्ष्य बताते हुए कहत हैं कि इस्लामी क्रांति के लक्ष्य निम्नलिखित हैः ईश्वरीय धर्म की सत्ता, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, सार्वजनिक कल्याण, अज्ञानता और निर्धनता उन्मूलन, नैतिक भष्टाचारों की लहरों के सामने कड़ा प्रतिरोध जो पश्चिम से पूरी दुनिया में फैल गया है।

 

उमंगों की राह पर चलना और इस्लामी समाज तक पहुंचना, जनता और अधिकारियों के प्रयासों से हालिस हो सकता है। जनता और अधिकारी, उमंगों की राह पर आगे बढ़कर और दुश्मनों द्वारा पैदा किए जा रहे कठिनाइ भरे जीवन के मार्ग में प्रतिरोध करके इस्लामी क्रांति को अपने असल लक्ष्य और अपनी मुख्य उमंगों को प्राप्ति तक पहुंचा सकते हैं। ईरानी जनता ने पिछले 39 साल से कठिन और जटिल रास्तों से गुज़रकर यह सिद्ध कर दिया है कि वह अपने नेताओं का अनुसरण करके इस्लाम धर्म और क्रांति की अस्ल उमंगों के मार्ग पर डटकर महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त कर सकते हैं। पश्चिम और यूरोप के अत्याचारी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान की जनता ने बिना डांवाडोल हुए और पीछे हटे, कठिनाइयों को सहन किया और साम्राज्यवादियों के सामने नत्मस्तक नहीं हुई।  इस्लामी क्रांति ने अपमान और अत्याचार को सहन न करके मैदानों में बाज़ियां मारीं और नारों पर भरोसा करते हुए देश के विकास और उन्नति के लिए महत्वपूर्ण क़दम उठाए। देश के वैज्ञानिक क्षमताओं पर भरोसा करते हुए परमाणु ऊर्जा प्राप्त करना, ईरानी विशेषज्ञों द्वारा रेडियो मेडिसन का निर्माण, महत्वपूर्ण और प्रतिबंधित दवाओं का निर्माण, सैन्य क्षमताओं और मीज़ाइल शक्ति को बढ़ाना, समुद्री और हवाई क्षमताओ में वृद्धि जैसी बातें ईरानी विशेषज्ञों की देन है। यह वह नारा है  जिसे हमने क्रांति के बाद के वर्षों में हसिल किया है।

 

साम्राज्यवादियों के सामने प्रतिरोध का परिणाम, सफलता के रूप में सामने आता है।  ईश्वरीय दूतों और पवित्र क़ुरआन की शिक्षाएं, प्रतिष्ठा और अत्याचार सहन न करने पर बल देती हैं।  इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता का मानना है कि साम्राज्यवादी और वर्चस्ववादियों के मुक़ाबले में प्रतिरोध, इस्लामी क्रांति के महत्वपूर्ण लक्ष्यों में है। साम्राज्यवादियों की प्रवृत्ति, वर्चस्ववाद के प्रयास में रहती है, वह अपना वर्चस्व फैलाने के प्रयास में होते हैं, हर राष्ट्र और हर सैनिक जो प्रतिरोध न करे, फंस जाता है और उनकी जाल में फंस जाता है।

साम्राज्यवादियों के मुक़ाबले में ईरानी व्यवस्था के अधिकारियों और राष्ट्र के आश्चर्यजनक प्रतिरोध के कारण अब अत्याचार ग्रस्त राष्ट्र इस्लामी क्रांति का अनुसरण करते हुए और उसके गौरवपूर्ण लक्ष्यों को अपनाकर प्रतिरोध के मार्ग को अपनाए हुए हैं और अत्याचारियों पर विजय की आशा लगाए हुए हैं। जैसा कि फ़िलिस्तीन की अत्याचारग्रस्त जनता, वर्षों से अतिग्रहणकारियों के मुक़ाबले में बहुत कम क्षमताओं के साथ डटी हुई है और हर एक फ़िलिस्तीनी के दिल में जीत की चिंगारी सुलग चुकी है।

इस्लामी व्यवस्था के अधिकारियों और जनता के साहस और ईमान के अतिरिक्त वर्तमान समय में ईरानी राष्ट्र और सरकार की सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण वरिष्ठ नेता की सूझबूझ और उनकी युक्ति है। वह ऐसे नेता हैं जो जनता के विभिन्न वर्गों और उनकी आवश्यकताओं से अवगत है और समय समय पर जनता के विभिन्न वर्गों से मुलाक़ात करते हैं और उनके बीच भाषण देते हैं।  वे छात्रों के विभिन्न वर्गों, श्रमिकों, बुद्धिजीवियों, प्रोफ़ेसरों और कलाकारों विशेषकर शायरों के विभिन्न वर्गों से मुलाक़ात करते हैं। इन मुलाक़ातों में वे विश्व की बड़ी शक्तियों और बुरा चाहने वालों के लक्ष्यों को उजागर करने और उनको क्षेत्रीय, वैश्विक और आंतरिक मामलों से अवगत कराते हैं। इस प्रकार वे  उनको ज़बरदस्त सलाह देते हैं।

ज़ेबीगीनो ब्रेज़ेन्सकी अमरीका के मशहूर राजनेता और रणनीतिकार हैं अभी हाल में उनका निधन हुआ, वे कहते हैं कि उन्होंने अपने सफल जीवन में केवल ईरान की क्रांति के मामले की समीक्षा में हार का सामना किया। (AK)

 

Sep ०५, २०१८ १३:३९ Asia/Kolkata
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