हमने बताया कि मस्जिद को आरंभ से ही ईश्वर के घर और सबसे प्रिय मकानों की हैसियत से विशेष महत्व और पवित्रता हासिल रही है।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम मस्जिद में नमाज़ जमाअत को बहुत महत्व देते थे जिसके कारण सभी मुसलमान हर दिन कई कई बार इस उपासना में शामिल होने के लिए मस्जिद में आया करते थे। स्वाभाविक है कि इस प्रकार सभी का, जिनमें छोटे-बड़े, कमज़ोर व शक्तिशाली, दरिद्र व धनवान एक दूसरे के साथ नमाज़ के लिए इकट्ठा होना किस सीमा तक द्वेष, एक दूसरे की बुराई, मतभेद, विवाद और इसी प्रकार की अनुचित बातों को दूर कर देता होगा और इनका स्थान प्रेम, स्नेह, समानता व बंधुत्व को दे देता होगा।

रोज़ाना की नमाज़ों के लिए मस्जिदों में मोमिनों के एकत्रित होने और पैग़म्बर के कुछ सहाबियों अर्थात साथियों द्वारा क़ुरआने मजीद की दिल में उतर जाने वाली तिलावत का उन लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ता था जो मदीने आते थे। सक़ीफ़ क़बीले के लोग, जो पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से शास्त्रार्थ करने के लिए मदीने आए थे, यह दृश्य देख कर अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने का फ़ैसला किया।

मदीने में मस्जिदुन्नबी, प्रचार के एक बड़े विश्वविद्यालय की तरह थी जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपनी शिक्षाओं के माध्यम से दक्ष प्रचारकों का प्रशिक्षण करते थे। ये प्रचारक क़ुरआने मजीद और धर्मज्ञान की शिक्षा के बाद अरब के विभिन्न क्षेत्रों में भेजे जाते थे ताकि वहां के लोगों को अज्ञान व अनेकेश्वरवाद के अंधकार से मुक्ति दिला कर उन्हें इस्लाम का निमंत्रण दें। पैग़म्बरे इस्लाम से शिक्षा प्राप्त करने वाले इन्हीं प्रचारकों की गतिविधियों के चलते थोड़े ही समय में इस्लाम न केवल यह कि पूरे अरब में फैल गया बल्कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के निधन के कुछ ही समय बाद यह आसमानी धर्म उस समय के संसार के एक व्यापक भाग तक पहुंच गया। इसी वैचारिक और सांस्कृतिक विजय के नतीजे में पूरे संसार में मस्जिदें बनने लगीं, धर्मशास्त्र, हदीस, साहित्य, क़ुरआन की व्यवाख्या, शिष्टाचार और इसी प्रकार के अन्य इस्लामी ज्ञानों की क्लासें आयोजित होने लगीं।

वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद

 

विश्लेषकों के अनुसार अमरीका जैसे देश में हर साल बड़ी संख्या में लोग इस्लाम धर्म स्वीकार कर रहे हैं। अमरीका के डेनवर विश्वविद्यालय में धार्मिक अध्ययनों के विशेषज्ञ पेट्रिक बोवेन ने अपने एक लेख में इस्लाम धर्म की ओर अमरीका के लोगों के रुझाने के कारणों का उल्लेख किया है। इस लेख में उन्होंने ऐसे 13 लोगों से अपने इंटरव्यू का उल्लेख किया है जिन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया है। इनमें से 9 लोग नाइन इलेवन की घटना के बाद मुसलमान हुए हैं।

ईसाइयत छोड़ कर इस्लाम धर्म स्वीकार करने वाली एक सत्रह वर्षीय लड़की का कहना है कि जब मैं दोपहर को स्कूल से बाहर आती थी और बस की प्रतीक्षा करती थी तो उस समय वहां की मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आती थी जो मेरे दिल में शांति पैदा कर देती थी। उससे मुझमें एक प्रकार के प्रेम, उत्साह और कृतज्ञता की भावना उत्पन्न होती थी जो उससे पहले कभी नहीं हुई थी। उसी अज़ान ने मुझे ईश्वर के निकट कर दिया। इस्लाम धर्म और इस्लामी शिक्षाओं के बारे में अधिक खोज के बाद मैंने नमाज़ सीखने की कोशिश की। मैं पहली बार शिकागो में अपने घर के निकट स्थित मस्जिद में बड़ी घबराहट और बेचैनी की स्थिति में गई और जब मैंने कहा कि मैं मुसलमान होना चाहती हूं तो एक पर्दे वाली महिला मेरे पास आई और उसने मेरा प्रोत्साहन किया और मुझे मस्जिद के इमाम के पास ले गई। मैंने उन लोगों के सामने ईश्वर के अनन्य और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पैग़म्बर होने की गवाही दी।

वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद

 

उल्लेखनीय है कि विल डुरांट ने अपनी किताब सभ्यता का इतिहास (The Story of Civilization) में लिखा है कि मानव सभ्यता के इतिहास के आरंभ से अब तक उन्हें मुसलमानों की अज़ान की आवाज़ से अधिक संगीतमय, दिल में उतरने वाली और अमर आवाज़ सुनाई नहीं दी है। ये आवाज़ संसार के विभिन्न क्षेत्रों में हर दिन पांच बार सुनाई देती है और इसके माध्यम से मुसलमान ईश्वर के सामने सिर झुकाने के अलावा एक दूसरे से एकता का संकल्प भी करते हैं।

 

अमरीका की सबसे प्रख्यात मस्जिदों में से एक वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद है। वर्ष 1945 में वॉशिंग्टन में तुर्की के राजदूत के निधन के बाद इस शहर के मुसलमानों को एक मस्जिद के निर्माण की ज़रूरत पहले से अधिक महसूस होने लगी क्योंकि अमरीका की राजधानी में नमाज़े जनाज़ा पढ़ने और मृत व्यक्ति के अंतिम संस्कार के लिए कोई जगह नहीं थी। उन लोगों ने मासाचुसेट सड़क पर तीस हज़ार वर्ग मीटर की एक ज़मीन ख़रीदी ताकि वहां वॉशिंग्टन के रहने वाले मुसलमानों के लिए एक जामा मस्द और इस्लामी केंद्र बनाया जा सके। इस मस्जिद के निर्माण में क़रीब सात साल का समय लगा और वर्ष 1957 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति ड्वाइट आयज़नहोवर की उपस्थिति में इसका उद्घाटन हुआ।

वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद इस शहर में इस्लामी देशों के प्रतिनिधि कार्यालयों के सहयोग से बनाई गई। इनमें से हर एक इस्लामी देश ने न केवल इस मस्जिद के निर्माण बल्कि उसकी सजावट में भी मदद की। उदाहरण स्वरूप इस मस्जिद की टाइलें तुर्की ने, क़ालीन ईरान ने और झाड़-फ़ानूस मिस्र ने प्रदान किए। वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद का मिम्बर क़ाहेरा की मुहम्मद अली पाशा जामा मस्जिद के मिम्बर की तरह बनाया गया है। इस मिम्बर की तैयारी में आबनूस या इबोनी की लकड़ी के बारह हज़ार टुकड़ों का प्रयोग किया गया है और इसे मिस्र में बनाया गया। इसी तरह इस मस्जिद में इस्तेमाल होने वाले पत्थर, अमरीका के एक दक्षिणी राज्य अलाबामा के सफ़ेद पत्थरों के पहाड़ों से लाए गए।

वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद

यह मस्जिद, अमरीका की मूल वास्तुकला को दृष्टि में रख कर एक इस्लामी शैली पर बनाई गई है। वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद की मीनार, मिस्री शैली में मस्जिद के प्रवेश द्वार पर बनाई गई है जो काफ़ी चौड़ी है। उसका निचला हिस्सा चौकोर है और उसके हर छोर पर ऊंची खिड़कियां हैं जिन्हें इस्लामी शैली में उभरी हुई डिज़ाइनों से सजाया गया है। निचले चौकोर हिस्से के बाद मीनार का ऊपर का बाक़ी हिस्सा गोलाकार है। मस्जिद में प्रवेश करने के बाद का हिस्सा काफ़ी लम्बा चौड़ा है और उसमें दाख़िल होने वाले संगे मरमर की सीढ़ियां चढ़ कर वहां पहुंचते हैं। वॉशिंग्टन की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने का एक बड़ा हॉल है जिसमें एक साथ तेरह हज़ार लोग नमाज़ पढ़ सकते हैं। इस हॉल की छत संगे मरमर के मोटे मोटे स्तंभों पर टिकी हुई है।

वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद

जिन लोगों ने इस मस्जिद की डिज़ाइनिंग और निर्माण का दायित्व संभाला था उन्होंने इसके साथ ही एक इस्लामी केंद्र का भी निर्माण किया। इस इस्लामी केंद्र के एक भाग में एक संस्कृति विभाग भी है जिसमें इस्लामी सम्मेलन आयोजित होते हैं और दूसरी ओर एक पुस्तकालय है जिसमें विभिन्न इस्लामी देशों की ओर से भेंट दी गई हज़ारों किताबें हैं। इन किताबों के माध्यम से यह पुस्तकालय इस्लामी संस्कृति का प्रचार-प्रसार करता है।

वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद

 

वॉशिंग्टन की जामा मस्जिद में हर दिन हज़ारों मुसलमानों का स्वागत किया जाता है जो नमाज़ पढ़ने और अपना इस्लामी ज्ञान बढ़ाने के लिए यहां आते हैं। यह मस्जिद भी अन्य मस्जिदों की तरह विभिन्न जातियों, राष्ट्रों और देशों के मुसलमानों की विविधता का प्रदर्शन करती है। यह जानना भी रोचक होगा कि रविवार का दिन अमरीकी समाज में जुदाई का सबसे बड़ा दिन होता है जबकि शुक्रवार का दिन मुसलमानों की एकता के प्रदर्शन का सबसे बड़ा दिन है क्योंकि इस दिन हर वर्ग के मुसलमान नमाज़े जुमा अदा करने के लिए अपने घर या कार्यस्थल से सबसे निकट मस्जिद में आते हैं जबकि ईसाई केवल अपने विशेष चर्चों में जाते हैं। (HN)

 

Sep ०५, २०१८ १६:०० Asia/Kolkata
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