हमने बताया कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने हालांकि ख़ुद को बनी उमय्या और बनी अब्बास के बीच सत्ता के लिए जारी खींचतान से दूर रखा लेकिन उनके अत्याचार के ख़िलाफ़ कभी भी संघर्ष से पीछे नहीं रहे और इस्लामी शासन को हड़पने वालों के बीच साठगांठ से पर्दा उठाते रहे।

बनी अब्बास ने जनमत को धोखा देने और अपनी सत्ता को मज़बूत करने के बाद, क्रान्तिकारियों और शियों के ख़िलाफ़ धमकी, दमन, हत्या और जेल में डालने की नीति अपनायी। इस काम के लिए उन्होंने अपने किराए के टट्टुओं की मदद ली और क्रान्तिकारियों व शियों की गतिविधियों पर नज़र रखने लगे। ये किराए के टट्टु, अब्बासी शासन के दरबार में रिपोर्ट पेश करते थे। ऐसे हालात में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने संघर्ष की शैली बदल दी। उन्होंने अपने वफ़ादार साथियों से बड़ी ख़ामोशी और सावधानी से अपनी गतिविधियां जारी रखने के लिए कहा ताकि दुश्मनों के ख़तरों से सुरक्षित रहें। शियों के धर्मशास्त्र में इस शैली को तक़य्या कहा जाता है जिसका अर्थ है ख़तरों से सुरक्षित रहना।

सिद्धांतों की रक्षा के लिए किसी समयावधि तक हक़ीक़त को छिपाने का आधार पवित्र क़ुरआन की आयत है। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के आले इमरान सूरे की आयत नंबर 28, नहल सूरे की आयत नंबर 106 और ग़ाफ़िर सूरे की आयत नंबर 28 में तक़य्ये की ओर इशारा किया गया है। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इन्हीं आयतों को आधार बना कर संघर्ष की शैली अपनायी और साथियों से अनुशंसा की जिनमें से कुछ का उल्लेख करेंगे। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने एक साथी से फ़रमायाः "ईश्वर उस व्यक्ति व जाति को जो लोगों का चेराग़ की तरह मार्गदर्शन करते हैं, अपनी कृपा का पात्र क़रार देता है। दूसरों को अपने सद्कर्म के ज़रिए हमारी ओर बुलाओ और मार्ग में अपनी पूरी कोशिश करो और उन लोगों की तरह न होना जो हमारे कार्यक्रम व रहस्य को दुश्मन के सामने ज़ाहिर कर देते हैं।" इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने कूफ़ा के रहने वाले मोअल्ला बिन ख़ुनैस को वसीयत करते हुए कहाः "हमारी बात को छिपा कर रखो, कभी सार्वजनिक न करो।"

 

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम गुप्त रूप से संघर्ष के रोल को उस समय जब दुश्मन घात लगाए बैठा हो और सारी गतिविधियों पर नज़र रखे हो, फ़रमाते थे, "जो भी हमारे राज़ को न छिपाए, उन्हें ज़ाहिर कर दे वह उस व्यक्ति की तरह है जिसने हम पर तलवार खींची हो।" उसके बाद इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने आगे फ़रमायाः "ईश्वर उस व्यक्ति पर कृपा करे जो हमारे ज्ञान के रहस्य को जानता है और उसे अपने साथ क़ब्र में ले जाता है।" अलबत्ता राज़ को छिपाना वह भी उस समय जब संघर्ष कठिन हो, आसान काम नहीं है। क्रान्तिकारी व जागरुकता लाने वाले आंदोलनों की नाकामी की एक वजह तक़य्ये के सिद्धांत की अनदेखी और राज़ की बातों की रक्षा न करना है। इस बात में शक नहीं कि इस अहम उसूल का पालन कर सत्य के मोर्चे की कामयाबी में बहुत अहम रोल निभाया जा सकता है और वही लोग इस सिद्धांत का पालन कर पाते हैं जो अनुभवी व होशियार होते हैं। इस क्रान्तिकारी व इस्लामी काम की अहमियत के लिए इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का यह कहना काफ़ी हैः "जो भी हमारे राज़ को ज़ाहिर कर दे, उस व्यक्ति की तरह है जिसने हम पर तलवार खैंची हो बल्कि इससे भी बड़ा पाप है।"                  

इस बात का उल्लेख भी ज़रूरी है कि राज़ छिपाने का मतलब ख़ामोशी, उदासीनता और दुश्मन के ख़िलाफ़ संघर्ष के समय हाथ पर हाथ धरे बैठा रहना नहीं है बल्कि यह इस्लामी व क्रान्तिकारी उद्देश्य को पाने के लिए संघर्ष की एक शैली है। इसलिए तक़य्या के सिद्धांत का अर्थ दुश्मन के कमज़ोर बिन्दु को चिन्हित करना, उसके लिए नीति व कार्यक्रम बनाना ताकि उन सत्ताधारियों को गंभीर नुक़सान पहुंचे जो नारों के ज़रिए जनमत को धोखा देकर राष्ट्रों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं। हालांकि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के लिए सामाजिक व राजनैतिक परिस्थिति ऐसी नहीं थी कि वह सीधे तौर पर मैदान पर आएं बल्कि वह आत्ममुग्ध अब्बासी शासकों के मुक़ाबले में एक क्षण हाथ पर हाथ धरे बैठे नहीं रहे। वह अपने संघर्ष की शैली बदलकर लगातार उनके ख़िलाफ़ संघर्ष करते रहे। अगर इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को लगता कि तक़य्या की ज़रूरत नहीं है तो वह अपने दौर के क्रान्तिकारियों के खुले आंदोलन का समर्थन करते। इस संबंध में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम अपने एक वफ़ादार साथी अब्दुल्लाह बिन अबी याफ़ूर से फ़रमायाः "जो लोग अत्याचारी शासकों और उन सत्ताधारियों की ओर रुझान रखते हैं जिन्हें ईश्वर ने नियुक्त नहीं किया है, उनके पास धर्म नहीं है चाहे ऐसे लोग कर्म की दृष्टि से कितने ही अच्छे क्यों न हों।" उसके बाद इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने आगे फ़रमायाः "क्या बक़रा सूरे की यह आयत नहीं सुनी जिसमें ईश्वर कह रहा है कि जिन लोगों ने ईश्वर का इंकार किया और उद्दंडियों के शासन को स्वीकार किया, वे उन्हें ईमान के प्रकाश से निकाल कर अंधकार में ले जाते हैं।" इब्ने अबी याफ़ूर ने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम से पूछा कि क्या इस आयत में वल्लज़ीना कफ़रू से मुराद ईश्वर का इंकार करने वाले नहीं हैं? तो इमाम ने फ़रमायाः "नास्तिकों के पास प्रकाश नहीं है जिसे वे वापस ले सकें। यह वह गुट है जो दिखने में मुसलमान लगता है लेकिन अपनी जान और माल के डर से ईश्वर का इंकार करने वाली शक्तियों से प्रभावित हो गया। जिसके नतीजे में उन्हें इस्लाम के प्रकाश से निकाल कर नास्तिकता के अंधकार की गर खींच ले जाते हैं। इसी आयत के अंतिम भाग में ईश्वर कह रहा है कि ये आग में डाले जाएंगे जिसमें वे हमेशा रहेंगे।"

 

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम, विगत की कटु नाकामियों और अलवियों के आंदोलनों की नाकामी के मद्देनज़र इस बात को महसूस कर रहे थे कि उस सांस्कृतिक आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाएं जो उनके पिता हज़रत इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम के दौर में शुरु हुआ था। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम अपने दौर के राजनैतिक व सामाजिक हालात तथा अपने पिता की इमामत के काल के अनुभव से इस नतीजे पर पहुंच गए थे कि असत्य के ख़िलाफ़ सत्य की जंग का उस समय अच्छा नतीजा निकलता है जब समाज में ख़ास तौर पर असत्य के ख़िलाफ़ संघर्ष करने वालों में धर्म और राजनीति की गहरी समझ हो। इस आधार पर इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने लोगों के प्रशिक्षण के लिए अपना मत तय्यार किया जिससे बड़ी बड़ी हस्तियों का प्रशिक्षण हुआ और उनकी संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती गयी।                          

मशहूर धर्मगुरु शैख़ मुफ़ीद अपनी किताब ‘इरशाद’ में उन रावियों की संख्या 4000 बतायी है जिन्होंने विभिन्न कलाओं में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के हवाले से रवायत पेश की है। धर्मगुरु तबरसी ने भी अपनी किताब "आलामुल वरा" में इसी संख्या की पुष्टि की है। इस तरह इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अपने दौर में सबसे बड़ी व प्रभावी यूनिवर्सिटी की बुनियाद रखी और मदीना को शुद्ध इस्लामी शिक्षाओं के प्रचार व प्रसार का केन्द्र बना दिया। इस संबंध में एक अहम बात यह है कि जाबिर बिन हय्यान, हेशाम बिन हकम, ज़ुरारा बिन आयुन और मोमिन अत्ताक़ जैसी शियों की महान हस्तियों ने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के स्कूल में प्रशिक्षण हासिल किया था जिन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं के प्रसार में बहुत अहम योगदान दिया था। इसी तरह हनफ़ी मत के इमाम अबू हनीफ़ा को भी इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का दो साल तक शिष्य बनने सौभाग्य हासिल रहा और अपने पूरे ज्ञान का श्रेय उस समय को देते हैं जो उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की सेवा में बिताए थे। वह कहते हैः "अगर वह दो साल न होते तो नोमान तबाह हो जाता।" मालेकी मत के इमाम मालिक बिन अनस को भी इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का शिष्य बनने का सौभाग्य हासिल हुआ। वह कहते थे "किसी ने जाफ़र बिन मोहम्मद जैसा महान व्यक्ति देखा न सुना होगा"

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की शिक्षाओं के दिन प्रतिदिन प्रसार की वजह से अब्बासी शासन हरकत में आया और इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के सांस्कृतिक व वैज्ञानिक प्रभाव को रोकने की कोशिश करने लगा। इसलिए अब्बासी शासन ने एक सुनियोजित कार्यक्रम के तहत एक नई जंग छेड़ दी जिसे आस्था की जंग कहा जा सकता है। उन्होंने एक ओर यूनानी विचारकों के विचारों के प्रचार का द्वार खोला और उनकी रचनाओं का अनुवाद किया ताकि इस तरह इस्लामी विचारों की शुद्धता को ख़त्म कर दें तो दूसरी ओर इस्लामी जगत में फूट डाल कर नए मतों की स्थापना की। इसके अलावा उन्होंने अध्यात्म के नाम पर ऐसी चीज़ को बढ़ावा दिया जो शुद्ध इस्लामी संस्कृति के ख़िलाफ़ थी। अब्बासी शासकों ने उस समय वैसा माहौल बनाया जैसा माहौल आज दुनिया पर छाया हुआ है ताकि इस तरह इस्लामी समाज के धार्मिक विचारों के आधार मज़बूत न होने पाएं। यही वजह थी कि इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम को बनी अब्बास की शैतानी साज़िश को नाकाम बनाने के लिए ज्ञान और संस्कृति के मंच पर सक्रिय होना पड़ा।               

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए धर्मशास्त्र की सभी शाखाओं के साथ नेचुरल साइंस के क्षेत्र में भी बड़े बड़े शिष्यों का प्रशिक्षण कर उन्हें इस्लामी जगत के विभिन्न क्षेत्रों की ओर रवाना किया ताकि वे सही शिक्षाओं के ज़रिए इस्लाम में बाहर से शामिल की गयी बातों को अलग कर सकें। इसके साथ ही इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का सांस्कृतिक आचरण जाफ़री मत का पालन करने वालों ख़ास तौर पर धर्मगुरुओं के लिए कुछ संदेश रखता है। पहले यह कि वह ख़ुद को ज्ञान के हथियार से लैस करें ताकि दुश्मन के सांस्कृतिक हमले से निपट सकें। दूसरे यह कि इस्लाम के विरोधियों की ओर से फैलायी जाने वाली भ्रान्तियों के संबंध में अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करें। तीसरे यह कि अपने समय की ज़रूरत को पहचानें और उसी के अनुरूप जवाब देने की क्षमता पैदा करें।

 

 

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Sep ०८, २०१८ १३:५३ Asia/Kolkata
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