हमने बताया कि कमालुद्दीन बहज़ाद का जन्म वर्ष 855 से 865 हिजरी के बीच या लगभग 1460 ईसवी में हेरात में हुआ।

उस काल के अनेक मशहूर इतिहासकारों ने इस महान ईरानी चित्रकार को अमीर रूहुल्ला उर्फ़ मीरक का शिष्य बताया है जो हेरात के एक मशहूर चित्रकार और सुलतान हुसैन बायक़ुरा के पुस्तकालय के प्रमुख थे। कमालुद्दीन बहज़ाद के माता-पिता का निधन उनके बचपन में ही हो गया था और मीरक ने, जो संभावित रूप से उनके परिजनों में से थे, उनकी अभिभावकता की।

ख़ाजा मीरक चित्रकारिता, सुलेखन और क़ुरआने मजीद की प्रतियों के किनारे गुल बूटे बनाने की कला में अपने समय के सबसे महान कलाकारों में से एक थे। कमालुद्दीन बहज़ाद जवानी में ही चित्रकारी में मशहूर हो गए और सुलतान हुसैन बायक़ुरा और उनके बुद्धिमान मंत्री अमीर अली शीरनवाई के ध्यान को पात्र बन गए जिसके बाद वे सरकारी चित्रकारिता के केंद्र और शाही पुस्तकालय के प्रमुख नियुक्त किए गए। शाह इस्माईल सफ़वी, हेरात पर क़ब्ज़े के बाद उस्ताद बहज़ाद और हेरात के कुछ अन्य कलाकारों को अपने साथ तबरेज़ ले गए और उन्होंने शाही पुस्तकालय का काम कमालुद्दीन बहज़ाद के हवाले कर दिया। उस्ताद बहज़ाद का निधन वर्ष 942 हिजरी में हुआ और कुछ लोगों का कहना है कि उनका मज़ार तबरेज़ में है जबकि कुछ अन्य हेरात में उनका मज़ार बताते हैं।

 

ईरानी कला की कुछ बेजोड़ विशेषताएं हैं जो उसे बहुत रोचक बनाती हैं। मानव शरीर ईरानी चित्रकला में अहम स्थान रखता है और उसके चित्रण की शैली ईरानी सौंदर्यबोध से प्रभावित और निर्धारित मानकों के अधीन होती है। कमालुद्दीन बहज़ाद के चित्रों में मनुष्य की उपस्थिति को विशेष महत्व प्राप्त है। उन्होंने जीवन के वास्तविक माहौल में इंसान को पेश करने पर ध्यान दिया और एक प्रकार से अपने चित्रों में इंसान का सही चित्रण किया है।

ईरानी चित्रकला में मानव शरीर के महत्व के दृष्टिगत इतिहास के विभिन्न कालों में और चित्रकारिता के विभिन्न मतों में उसके चित्रण की शैली पर हमेशा ध्यान दिया गया है। पश्चिमी चित्रकला में मानव शरीर का चित्रण वहां की भौतिक मानसिकता पर आधारित है और शरीर और उसके अंगों को जस का तस पेश करने पर अधिक ध्यान दिया जाता है। सुदूर पूर्व में भी मनुष्य का स्थान प्रकृति के प्रतीकों की सीमा तक गिर गया है और प्रायः इंसान को प्रकृति के एक छोटे से भाग के रूप में चित्रित किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान में मानव शरीर का चित्रण, पूरब और पश्चिम के विचारों के बीच की चीज़ है।

ईरानी चित्रकला धार्मिक आस्थाओं से प्रभावित है। ईरानी चित्रकारी में मनुष्य की प्रवृत्ति, उसके शारीरिक अस्तित्व से हट कर उसके काल्पनिक चित्रण या शरीर के आदर्श चित्रण की ओर उन्मुख हुई है। निश्चित रूप से ईरानी चित्रकला में मनुष्य के चित्रण के संबंध में इस सोच का मुख्य स्रोत फ़ारसी साहित्य रहा है क्योंकि ईरानी चित्रकारी के अधिकतर विषय फ़ारसी शेरों से लिए गए हैं जिनमें आत्मज्ञान और रहस्यवाद की मुख्य भूमिका होती है।

 

कमालुद्दीन बहज़ाद ने, हेरात मत की चित्रकला के अग्रणी कलाकार के रूप में अपने चित्रों में मनुष्य पर विशेष ध्यान दिया है। उन्होंने चित्रों में सांकेतिक रूप से मनुष्य की सच्चाई दर्शाने की कोशिश की है। उन्होंने ईरानी चित्रकारित के दृष्टिकोणों और सिद्धांतों से हटे बिना एक प्रकार से शरीर के वास्तविक चित्रण का प्रचार किया है। आलोचकों के विचार में ईरानी चित्रकारी में मनुष्य के चित्रण के संबंध में बहज़ाद की कलाकृतियां बेजोड़ हैं। इसका मुख्य कारण जीवन के वास्तविक माहौल में मनुष्य के व्यवहार और उसकी क्रिया-प्रतिक्रियाओं पर उनकी विशेष दृष्टि है जो विदित रूप से उनसे पहले ईरानी चित्रकला में दिखाई नहीं देती। काम करते हुए मज़दूरों, ईरानी संस्कारों और साधारण लोगों के जीवन के मामलों को दर्शाने वाले उनके चित्रों में यह बात बड़ी अच्छी तरह देखी जा सकती है।

कमालुद्दीन बहज़ाद की कलाकृतियों में तथ्यवाद, जीवन के बारे में उनकी गहरी भावनाओं को दर्शाता है। कला के विशेषज्ञों का कहना है कि बहज़ाद ने अपने आस-पास के माहौल को दृष्टि में रख कर और अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लेकर अपने चित्रों में मनुष्य के बारे में शायराना सच्चाई पेश की है। इसी के साथ उनके चित्रों में साधारण घटनाओं के चित्रण में आध्यात्मिक विषयों की भी कभी अनदेखी नहीं की गई है। उन्होंने वास्तव में मनुष्य के कर्मों के छिपे अर्थों पर बल देकर इस बात की कोशिश की है कि आंखों की ज़बान से ईरान की चित्रकला में अपनी विशेष तथ्यात्मकता को शामिल कर दें।

बहज़ाद के चित्रों को जो चीज़ उनसे पहले वाले चित्रकारों के कामो से अलग करती है वह मानव शरीर का चित्रण है। अपने से पहले वाले चित्रकारों के विपरीत बहज़ाद की कलाकृतियां केवल इंसान का विदित रूप नहीं दिखाती बल्कि उनमें से हर एक का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है और उनके चेहरे स्पष्ट रूप से एक दूसरे से अलग हैं। मानो उन्होंने उस समय के इंसानों को उनके वास्तविक मानकों पर ध्यान देकर चित्रित किया है। शायद यही वजह है कि उन्हें ईरानी चित्रकला में चेहरे के चित्रण की शैली का आविष्कारक समझा जाता है।

कमालुद्दीन बहज़ाद की कलाकृतियों में एक अहम बिंदु, हर चित्र के सभी भागों के बीच पाया जाने वाला सटीक संतुलन है। उनसे पहले तक इस प्रकार का संतुलन नहीं दिखाई देता और हर व्यक्तित्व को उसके सामाजिक स्थान या पद के अनुसार छोटा या बड़ा बना कर चित्रित किया जाता था। बहज़ाद के चित्रों में दरबार के सेवकों, साधारण लोगों, यहां तक कि दरिद्र लोगों का क़द भी शासक और राजकुमारों के जितना ही है और शासक को उसके पद व स्थान के अनुसार बड़ा नहीं दर्शाया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस विशेषता का कारण बहज़ाद के आत्मज्ञान और उनकी विचारधारा है। यही विचारधारा जामी और अली शीरनवाई की आस्थाओं में भी मौजूद थी।

 

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Sep १०, २०१८ १६:१५ Asia/Kolkata
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