Nov २७, २०१८ १५:१२ Asia/Kolkata

मीनू द्वीप फ़ार्स की खाड़ी में ईरान के द्वीपों में से एक है।

अतीत में इस द्वीप को सलबूख़ कहा जाता था जो अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है रेत। मीनू द्वीप पूरब की ओर से ईरान और पश्चिम की ओर से इराक़ से जुड़ा हुआ है तथा अरवंद रूद नामक नदी की दो शाखाएं इसे घेरे हुए हैं। समुद्र तल से मीनू द्वीप की ऊंचाई दस मीटर और ख़ुर्रमशहर से इसकी दूरी दस किलो मीटर है। द्वीप का अधिकतम व्यास छः किलो मीटर और इसका क्षेत्रफल 17 किलो मीटर है।

मीनू शहर एक छोटा सा शहर है जो इस द्वीप में स्थित है और इसकी आबादी लगभग 13 हज़ार है। इस शहर की आधी जनसंख्या खेती-बाड़ी करती है जबकि कुछ लोग पशुपालन का काम करते हैं। मीनू द्वीप में रहने वालों में से अधिकतर अरब हैं और इसी कारण इस द्वीप की प्रचलित भाषा अरबी है। अरवंद रूद के पानी से गुज़रना और अपने रिश्तेदारों से मिलना इस द्वीप के दोनों ओर के लोगों की अहम चिंताओं में से एक है।

मीनू द्वीप ईरान के एकमात्र ऐसे द्वीप के रूप में जिसके हर ओर मीठा पानी पाया जाता है, छोटी सी तटवर्ती पट्टी के साथ विभिन्न प्रकार के जीवों के जीवन स्थल के साथ ईरान के संवेदनशील क्षेत्रों में से एक समझा जाता है। मीनू द्वीप में पांच नहरें बहती हैं जिनमें से दो नहरें जर्फ़ नदी से और तीन अरवंद रूद नदी से प्रवाहित होती हैं। मीनू द्वीप संसार के उन गिने चुने स्थानों में से एक है जिनमें सिंचाई का सिस्टम प्राकृतिक तरीक़े से और ज्वार भाटे के माध्यम से चलता है और किसी भी प्रकार के मैकेनिकल उपकरणों की ज़रूरत नहीं पड़ती। इस द्वीप में मौजूद खजूर के असंख्य पेड़ प्रवासी पक्षियों के जीवन के लिए उचित स्थान और इसमें पाए जाने वाले नरकुल, कुछ जंगली जानवरों के लिए शरण स्थल हैं। मीनू द्वीप इस समय आबादान के पर्यटन स्थलों में से एक समझा जाता है और अरवंद के मुक्त व्यापार क्षेत्रों में शामिल है।

अगर हम इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध में मीनू द्वीप के इतिहास को खंगालें तो उसके सबसे अहम भाग तक पहुंच जाएंगे। इराक़ द्वारा थोपे गए युद्ध के आरंभिक दिनों में ही मीनू द्वीप के लोगों यहां तक कि महिलाओं और लड़कियों ने संघर्षकर्ताओं की मदद का हर संभव प्रयास किया और एक मज़बूत बांध की तरह उनके पीछे खड़े रहे। इस मार्ग में उन्होंने अपनी जान तक की परवाह नहीं की।

मीनू द्वीप पर क़ब्ज़ा करना दुश्मन के लिए बहुत कठिन नहीं था लेकिन सद्दाम सरकार को अच्छी तरह पता था कि इस द्वीप को अपने क़ब्ज़े में बनाए रखने के लिए उसे भारी क़ीमत चुकानी पड़ेगी क्योंकि स्थानीय बल और आबादान के सुरक्षा बल इस द्वीप से अच्छी तरह परिचित थे और ज़रूरत पड़ने पर खजूर के घने पेड़ों और नहरों से दुश्मन पर वार करने के लिए भली भांति लाभ उठा सकते थे।

इराक़ द्वारा ईरान पर थोपे गए आठ वर्षीय युद्ध में ईरान का कर्बला-4 अभियान मीनू द्वीप से ही चलाया गया था। ईरानी कमांडरों की रणनीति यह थी कि इस अभियान के दौरान उम्मे रसास और अबू ख़सीब द्वीपों पर नियंत्रण कर लिया और दुश्मन के सैनिकों को, जो फ़ाओ द्वीप में फैले हुए थे, घेर लिया जाए। 24 दिसम्बर सन 1986 को ईरान के ग़ोताख़ोर सैनिकों ने अरवंद रूद नदी को पार करके सद्दाम की सेना के ठिकानों पर हमला कर दिया।

दुश्मन को अमरीका के उपग्रहों की सहायता से मिलने वाली सूचनाओं के सहारे इस अभियान की सूचना मिल गई थी अतः उसने ईरान के ग़ोताख़ोर सैनिकों और नौकाओं को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इराक़ी सेना ने इसी तरह मीनू द्वीप में ईरान बलों के ठिकाने पर भारी गोलाबारी की। इसके बावजूद ईरानी जियाले उम्मे रसास, उम्मे बाबी, बलजानिया, सुहैल और क़त्आ जैसे द्वीपों तक पहुंच गए। इस तरह इस युद्ध के छठे साल में पहली बार दुश्मन की ओर से डाली गईं मज़बूत रुकावटें टूट गईं। युद्ध की समाप्ति के बाद मीनू द्वीप में दुश्मन द्वारा लगाई गई बारूदी सुरंगों को निष्क्रिय बनाया गया और आज यहां के स्थानीय लोग बिना किसी कठिनाई के रह रहे हैं और यह द्वीप आबादान व ख़ुर्रमशहर के पर्यटन स्थलों में से एक है।

 

स्थानीय लोगों की क्षमताओं पर आधारित पर्यटन, पर्यटन की सबसे विकसित व टिकाऊ शैलियों में से एक है जिसकी ओर मीनू द्वीप के लोगों ने क़दम बढ़ाना शुरू कर दिया है। मीनू द्वीप के पर्यटन कॉम्पलैक्स में पंद्रह प्रकार की वनस्पतियां मौजूद हैं। यह कॉम्पलैक्स डेढ़ वर्ग किलो मीटर पर बना हुआ है और इसमें इस समय दो "मुज़ीफ़" और नरकुल से बनी एक कॉफ़ी शॉप है। इस कॉम्पलैक्स के मेहमानों का झींगा पुलाव, मछली के कबाब, झींगे के सालन, मछली के सालन, मसूर की दाल जैसे स्थानीय व्यंजनों और भैंस के दूध की पारंपरिक आइस क्रीम इत्यादि से सत्कार किया जाता है।

यह कॉम्पलैक्स, जो हाजी अब्दुल्लाह नूरानी के व्यक्तिगत पूंजी निवेश से बनाया गया है और उन्हीं के द्वारा इसका संचालन होता है, सादात नहर में अर्थात सीमा रेखा से चार सौ मीटर की दूरी पर अरवंद रूद नदी के किनारे स्थित है। यहां से नौका की सवारी की जैटी तक पहुंचा जा सकता है और गोल्फ़ व घुड़सवारी का क्लब भी इस कॉम्पलैक्स की विशेषताओं में से एक है।

मुज़ीफ़ वास्तव में प्राचीन काल में अरबों के मेहमानख़ाने को कहा जाता था। अरबी शब्दकोष के अनुसार मुज़ीफ़ का अर्थ सत्कार का स्थान है। अरबों के यहां रिवाज था कि वे अपने घर के साथ ही मेहमानों के लिए भी अलग से एक कमरा बनाते थे ताकि अतिथि वहां पर आराम से रह सकें। मुज़ीफ़ को अरब लोग पवित्र स्थलों की तरह ही सम्मान की नज़र से देखते हैं और इसके विशेष संस्कार हैं। यह स्थान, ऐसी इमारत है जो नरकुल से बनाई जाती है, यहां तक कि मुज़ीफ़ के स्तंभों को भी किसी दूसरी चीज़ से नहीं बांधा जा सकता क्योंकि कुछ समय बाद वह खुल जाएगी अर्थात मुज़ीफ़ में इस्तेमाल होने वाली रस्सियां भी नरकुल की ही होनी चाहिए।

मुज़ीफ़ का प्रवेश द्वार क़िब्ले की दिशा में बनाया जाता है और इसकी ऊंचाई एक साधारण इंसान के क़द से कम होती है। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति मुज़ीफ़ में प्रवेश करना चाहता है उसे पहले से अंदर मौजूद लोगों के सम्मान में अपना सिर झुका कर अंदर जाना चाहिए। परंपरा यह है कि प्रवेश करने वाला व्यक्ति दरवाज़े के पास बैठे हुए पहले व्यक्ति को सलाम करे और उससे गले मिले और फिर अपने बैठने के लिए जगह का निर्धारण करे। उस जगह बैठने के बाद वहां मौजूद सभी लोग उसका हाल चाल पूछते हैं और उसे स्वागतम कहते हैं। इसके बाद एक व्यक्ति जिसे मुज़ीफ़ का साक़ी कहा जाता है, नए आने वाले व्यक्ति को चाय या क़हवा देता है। अरबों के बीच क़हवा पीने के भी विशेष संस्कार हैं।

 

हाजी अब्दुल्लाह नूरानी मुज़ीफ़ की छः हज़ार साल पुरानी संस्कृति की तरफ़ इशारा करते हुए कहते हैं कि इस प्रकार की इमारत ईसा पूर्व सूमरियों व ईलामियों के काल में मेसोपोटामिया के लोगों के बीच ईरान, इराक़ व सीरिया के लोगों में प्रचलित थी। जो लोग पानी और तालाबों के किनारे जीवन बिताते थे वे नरकुल से अपने घर बनाया करते थे। इस बात के दृष्टिगत कि मीनू द्वीप का मुज़ीफ़ अरवंद नदी के निकट स्थित है, खजूर के पेड़ों और पत्तों से वहां हट्स भी बनाए गए हैं। इन हट्स में से अरवंद नदी और उसमें चलती नौकाओं का दृश्य बड़ा मनमोहक होता है। (HN)

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