Dec २५, २०१८ १३:२८ Asia/Kolkata

हम ने बताया था कि  शेख अबू जाफर मुहम्मद बिन याक़ूब बिन इस्हाक़ कुलैनी राज़ी उर्फ शेख कुलैनी तीसरी हिजरी क़मरी सदी के अंतिम और चौथी हिजरी क़मरी सदरी के आरंभिक काल के प्रसिद्ध शिया बुद्धिजीवी हैं।

बताया जाता है कि शेख कुलैनी सन 258 हिजरी क़मरी में जो वास्तव में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का युग था, ईरान के प्राचीन नगर " रैय" के निकट " कुलैन" नामक क्षेत्र में पैदा हुए। उनका घराना पढ़ा लिखा था और शैख कुलैनी के पिता अपने युग के जाने माने बुद्धिजीवी और धर्मगुरु थे। शेख कुलैनी ने अपनी आरंभिक शिक्षा अपने जन्म स्थल " कुलैन" में पूरी की और फिर अधिक शिक्षा के लिए कुलैन से रैय , क़ुम, कूफा और बगदाद गये और बहुत से ऐसे लोगो से भेंट की जिन्होंने सीधे रूप से इमाम हसन अस्करी अलैहिस्लाम की ज़बान से पवित्र कथन अर्थात हदीस सुनी थी।

शेख कुलैनी ने शिया मुसलमानों के लिए ईश्वरीय दूत और उनके उत्तराधिकारियों के कथनों के संकलन की राह में बहुत अधिक परिश्रम किया और इस काम के लिए उन्होंने विभिन्न नगरों और क्षेत्रों की यात्रा की। इसी प्रकार हमने यह भी बताया था कि वह इस्लामी युग के पहली ऐसी हस्ती हैं जिन्हें  पहली बार " सिक़तुल इस्लाम" अर्थात इस्लाम का भरोसा की उपाधि मिली। कुलैनी सन 329 हिजरी कमरी के शाबान महीने में और एक अन्य कथन के अनुसार सन 328 हिजरी क़मरी में स्वर्ग सिधारे और उन्हें बगदाद के बाबुलकूफा नामक इलाक़े में एक बाज़ार में दफ्न किया गया। 

 

शेख कुलैनी की गिनती उन लोगों में होती है जिन्होंने अपने युग की विशेषताओं और संवेदनशीलता को पहचान कर उसके अनुसार काम किया और इस सिलसिले में उन्होंने इस्लाम और मुसलमानों की बहुत बड़ी सेवा की। इतिहासकारों की नज़र में उनका सब से महत्वपूर्ण संघर्ष, उनकी निंरतर यात्रा और पलायन रहा है। इतनी अधिक यात्रा और पलायन का एक ही मक़सद था और वह पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के कथनों का संकलन रहा है। एक समय था कि जब कुम की विभिन्न मस्जिदों में बुद्धिजीवी, इमामों के कथनों को उन से सुनने के बाद बयान करते थे। यह लोग वह बचे खुचे बुद्धिजीवी थे जिन्होंने स्वंय इमामों की बातें सुनी थीं। इसी लिए इन लोगों को सुनने के लिए दूर दराज़ के क्षेत्रों से लोग क़ुम जाते थे। शेख कुलैनी ने भी यही किया और इन लोगों की बातें और उनकी बयान की हुई हदीसें सुनने के लिए उन्होंने कु़म की यात्रा की। 

 

उस युग में क़ुम में अबुल हसन अली बिन इब्राहीम बिन हाशमि कु़मी का काफी नाम था और हदीस के क्षेत्र में वह बहुत बड़ी हस्ती थे। उनसे कुलैनी की निकटता की यह दशा थी कि कहा जाता है कि अबुल हसन अली बिन इब्राहीम बिन हाशिम कुमी को शेख कुलैनी द्वारा और शेख कुलैनी को बिन हाशिम कुमी द्वारा पहचाना जाना चाहिए। अबुल हसन अली बिन इब्राहीम बिन हाशिम कुमी वह हस्ती हैं जिनका नाम काफी के एक तिहाई भाग में बार बार लिया गया है और कुलैनी की इस प्रसिद्ध किताब की 7140 रवायतों में उनका नाम लिया गया है। इस तरह से यह कहा जा सकता है कि हाशिम कुमी को काफी नामक किताब ने अमर कर दिया। कुलैनी को उनसे अगाध श्रद्धा थी और उन्हों ने हाशिम कुमी को उनकी बीमारी के समय भी एक क्षण के लिए नहीं छोड़ा। 

 

 

कुम के बाद भी शेख कुलैनी की ज्ञान की प्यास बुझी नहीं जिसकी वजह से उन्होंने अधिक हदीसों की चाह में कुम भी छोड़ दिया और कूफा चले गये जिसे इस्लामी जगत का केन्द्र समझा जाता था और उस काल में सभी धर्मों और मतों के लोग कूफा नगर में स्वतंत्रता के साथ अपने विचारों का प्रचार करते थे। यही वजह थी कि इस नगर में इ्सलामी धर्म के सभी मतों के धर्मगुरु अपनी अपनी पाठशालाएं खोले बैठे थे और उनमें अपने विचारों की शिक्षा देते थे। इब्ने अक़दा भी इसी नगर में रहते थे। उनकी की स्मरण शक्ति ऐसी थी कि जो भी उनसे मिलता आश्चर्य चकित रह जाता और उनकी स्मरण शक्ति को ईश्वर का चिन्ह कहता।  इब्ने अक़दा, धर्म की दृष्टि से " ज़ैदी जारूदी" थे लेकिन इतने अधिक पवित्र व सत्यवादी थे कि सभी धर्मों के लोग, उनसे सुनी हुई हदीसों को सही व विश्वस्त मानते थे। शेख कुलैनी ने भी इस महापुरुष से लाभ प्राप्त किया और उनसे बहुत कुछ सीखा। 

 

शेख कुलैनी  विभिन्न नगरों और गांवों में शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने के बाद अंततः बगदाद पहुंचे और देखते ही देखते इस महानगर में उनका चर्चा होने लगा और लोग उन्हें एक बड़ा बुद्धिजीवी समझने लगे इसी लिए शिया और सुन्नी दोनों समुदायों के लोग अपनी  धार्मिक समस्याओं के निवारण के लिए उनके पास जाते थे। शेख कुलैनी ने बगदाद में सब से बड़ा जो काम किया वह अलकाफी का संकलन था। 

 

शेख कुलैनी ने  " अर्रेजाल," " अर्रद्दो अललक़रामेता" " रसायलुल अइम्मा" तथा ताबीरुर्रूया जैसी कई महत्वपूर्ण रचनाएं लिखी। इसके साथ ही उन्होंने पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों की तारीफ में कही जाने वाली कविताओं पर आधारित भी एक किताब लिखी है जो खेद के साथ इस समय मौजूद नहीं है लेकिन शेख कुलैनी की सब से महत्वपूर्ण किताब अलकाफी है जिसे लिखने में उन्होंने अपनी आयु के बीस वर्ष लगा दिये। यह किताब शिया समुदाय के लिए स्रोत समझी जाने वाली चार किताबों में से पहली किताब है जिसे कुलैनी की सब से बड़ी किताब ही नहीं कहा जाता बल्कि इसे इस्लामी समाज की भी एक बड़ी किताब कहा जाता है जिसमें पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के कथनों का वर्णन है। यही वजह है कि लगभग ग्यारह सदियों से यह किताब शिया मुसलमानों के लिए पैगम्बरे इस्लाम के परिजनों के कथनों का मुख्य स्रोत है। 

 

शेख कुलैनी ने अपनी किताब अलकाफी की भूमिका में इस किताब को लिखने के पीछे अपनी भावना का उल्लेख इस प्रकार करते हैंः एक भाई ने अपने संदेश में यह कहा कि हमारे काल के लोगों ने ज्ञान विज्ञान को छोड़ दिया है और अब वह अज्ञानता में डुबकी लगा रहे हैं, खुद को मुसलमान कहते हैं लेकिन इस्लाम की शिक्षाओं से अनभिज्ञ हैं, अपने पूर्वजों का अंधा अनुसरण करते हैं और वही सब काम करते हैं और हर काम अपनी बुद्धि के सहारे ही करते हैं। क्या यह सही है? उसके बाद शेख कुलैनी कहते हैं कि उस भाई ने यह लिखने के बाद यह मांग की कि एक ऐसी किताब लिखी जाए जिसमें पूरी तरह से धर्म ज्ञान हो और जो हर धार्मिक व्यक्ति के लिए काफी हो ताकि जो लोग इस्लाम और इस्लामी मार्गदर्शकों के बारे में जानना चाहें उन्हें सारी जानकारी आसानी से प्राप्त हो जाए। शेख कुलैनी ने उस व्यक्ति की मांग पूरी की और अलकाफी नाम की किताब लिखी । काफी नामक इस किताब में पैगम्बरे इस्लााम और उनके परिजनों के 16000 कथन मौजूद हैं। इस किताब में तीन अध्याय हैं । एक उसूल दूसरा फूरु और तीसरा रौज़ा है। यह तीनों अध्याय के नाम हैं। उसूल नामक अध्याय में धर्म के मूल सिद्धान्तों और नैतिकता का विषय है जिसे आठ भागों में बांटा गया है। 

 

 

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