Jan ०८, २०१९ १५:३९ Asia/Kolkata

हमने बताया था कि मस्जिद में उपस्थिति और आध्यात्मिक भाइयों से समपर्क, मन को शांति प्रदान करता है इसी लिए इस्लामी मार्गदर्शकों  ने हमेशा मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ने और मस्जिद में उपस्थित होने पर बल दिया है।

मस्जिद वह जगह हैं जहां पहुंच कर मनुष्य , काफी हद तक भौतिकता से दूर हो जााता है और एक अलग तरह की शांति उसके अस्तित्व में समा जाती है। पैगम्बरे इस्लाम के पौत्र, इमाम जाफरे सादिक़ अलैहिस्सलाम इस संदर्भ में मुसलमानों से कहते हैं कि वह सांसारिक समस्याओं से यदि जूझ रहे हों तो नमाज़ और मस्जिद की शरण में जाएं। 

 

इस्लाम में मस्जिद का उच्च स्थान है और इसी लिए इस्लामी समाज के गठन के बिल्कुल आरंभ में जब पैगम्बरे इस्लाम मदीना पहुंचे तो उन्होंने पहले एक मस्जिद बनायी ताकि मुसलमानों को इस पवित्र स्थल के महत्व का पता चल सके। पैगम्बरे इसलाम ने उस मस्जिद के निर्माण में स्वंय हिस्सा लिया और अपने अनुयाइयों से कहा  कि जितनी जल्दी संभव हो मस्जिद का निर्माण करें । इसके साथ ही पैगम्बरे इस्लाम ने अपने अनुयाइयों से कहा था कि इस बीच वह अपने सारे काम छोड़ दें और अपना सारा समय, मस्जिद निर्माण को दें । यदि आप ध्यान दें कि आज कल अन्य धर्मों के जो उपासना स्थल होते हैं उनका प्रायः सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं होता  और न ही वह उपासना स्थल, समाज पर प्रभाव डालते हैं किंतु मस्जिद ऐसी नहीं है बल्कि मस्जिद आरंभ से ही सामाजिक गतिविधियों का केन्द्र रही है और मुसलमान सदा ही मस्जिद में एकत्रित होकर एक दूसरे से सलाह व मशविरा करते रहे हैं। वैसे भी ईश्वर ने अपने पैगम्बर तक को आदेश दिया है कि अपने मामले में मुसलमानों से सलाह मशविरा करें। 

 

इस्लाम के आरंभिक काल के मुसलमान अपने जीवन की हर घटना और हर परिवर्तन के लिए मस्जिद की शरण में जाते थे। वह लड़ाई झगड़े, अपीलों और समस्याओं के लिए मस्जिद का रुख करते थे। अलबत्ता यह भी बता दें कि इस्लाम के आरंभिक काल में लोगों आध्यात्मिकता, सांसारिक मोह माया से दूरी, एक दूसरे से प्रेम व त्याग व बलिदान की भावना की वजह से विवाद न के बराबर होते थे और इसकी सब से बड़ी वजह , स्वंय पैगम्बरे इसलाम थे जो उनके लिए आदर्श थे। 

 

बादशाही मस्जिद, पाकिस्तान की अत्याधिक प्रसिद्ध मस्जिद है जो लाहौर में स्थित है। इस मस्जिद को 1671 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने बनवाया था इसके निर्माण का काम सन 1673 में खत्म हुआ । यह मस्जिद मुगल काल की सौंदर्य और भव्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण है। पाकिस्तान की इस दूसरी  और दुनिया की  पांचवीं सबसे बड़ी मस्जिद में एक साथ 55000 हजार लोग नमाज अदा कर सकते हैं।  मस्जिद का मुख्य द्वार  लाहौर किले के नजदीक स्थित है जिसे दरवाज़ए आलमगीर कहा जाता है इसे बाद में मस्जिद से जोड़ा गया। 

 

बादशाही मस्जिद को दो मंजिला बनाया गया है और इमारत में नमाज़ पढ़ने वाले का आवास और एक पुस्तकालय भी है। इस मस्जिद का डिज़ाइन चौकोर था और उसका हर कोण 170 मीटर है। चूंकि मस्जिद का उत्तरी भाग रावी नदी के किनारे स्थित है इस लिए इस मस्जिद का उत्तरी दरवाज़ा नहीं है और चूंकि उत्तर में दरवाज़ा बनाना संभव नहीं था इस लिए मस्जिद की सुन्दरता को बनाए रखने के लिए दक्षिण में भी दरवाज़ा नहीं बनाया गया । बादशाही मस्जिद की शिल्पकला, दिल्ली की जामा मस्जिद से बहुत मिलती जुलती है जिसे औरंगज़ेब के पिता शाहजहां के आदेश से बनाया गया था लेकिन दिल्ली की जामा मस्जिद के मीनारों के विपरीत जो अष्टकोणीय हैं, इस मस्जिद के मीनारे चौकोणीय बनाए गये हैं। लाल रंग के यह मीनारे 34 गुणा 5 मीटर ऊंचाई तक तीन मंजिला बनाए गये हैं जो एक अष्टकोणीय चबूतरे पर स्थित हैं। यह चबूतरा भी ज़मीन से 6 मीटर ऊंचा है। मस्जिद की दीवारें छोटी ईंटों से बनायी गयीं हैं जिन पर लाल रंग की रेत का प्लास्टर है और स्तंभों के पायों को रंगा बिरंगे पत्थरों से सजाया गया है। मस्जिद के मुख्य प्रांगण में पकी ईंटें इस्तेमाल की गयी थीं किंतु सन 1939 और 1960 में होने वाली मरम्मत के दौरान वहां भी पत्थर लगा दिये गये।

बादशाह मस्जिद का हाल लंबा है और उसे ताकों से सजाया गया है। इसे सात हिस्सों में बांटा जा सकता है हाल के बीच का दरवाज़ा सफेद पत्थर से बनाया गया है और वहीं मेंबर और मेहराब है । इसे मस्जिद का मुख्य और केन्द्रीय भाग कहा जाता है इसी लिए इस जगह पर पत्थर  पर रंगारंग डिज़ाइन नज़र आते हैं। 

 

हाल के ऊपर तीन अर्धगोलाकार गुंबद हैं जिनमें से बीच का गुंबद बड़ा है । दोनों तरफ के गुंबद एक ही साइज़ के हैं। यह मोतियों की तरह चमकते हैं। बीच वाले गुंबद की लंबाई लगभग दस मीटर है और दोनों तरफ के गुंबदों की लंबाई साढ़े छे मीटर है। इन गुंबदों पर कमल का उल्टा फुल, सफेद पत्थर से बनाया गया है। 

 

बादशाही मस्जिद में सिर्फ दो शिलालेख हैं एक प्रवेश द्वार पर और दूसरा मुख्य हाल में। प्रवेश द्वार के ऊपर फार्सी भाषा में और सुल्स व नस्तलीक़ लिपि शैली में लिखा है कि इस मस्जिद को सन 1084 हिजरी क़मरी अर्थात 1673 ईसवी को औरंगजेब के मुंहबोले भाई  मुज़फ्फर हुसैन उर्फ फदाई खान कूके द्वाा बनाया गया है। 

 

बादशाही मस्जिद ने  एक उपासना स्थल के रूप में  सिखों के दौर में अपना महत्व खो दिया। सन 1799 में जब सिखों ने लाहौर पर क़ब्ज़ा किया और पंजाब की सत्ता हासिल की तो इस मस्जिद को सैनिक छावनी और सैन्य भंडार तथा अस्तबल के रूप में प्रयोग किया। बाद में जब सिखों में सत्ता के लिए आपसी युद्ध हुआ तो महाराजा रंजीत सिंह ने मस्जिद के मीनारों पर हल्की तोप लगा दी ताकि लाहौर क़िले में घिरे अपने विरोधियों पर गोलाबारी कर सकें। तोप के गोलों से मस्जिद को भी भारी नुकसान पहुंचा। 

 

सन 1865 में मस्जिद के पुनर्निमाण की दिशा में काम आरंभ हुआ। और सन 1875 से लेकर 1920 के दौरान लाहौर के मुसलमानों के चंदे और पंजाब सरकार की ओर से मिलने वाली आर्थिक मदद से मस्जिद की मरम्त का पहला चरण संपन्न हो गया। मस्जिद की मरम्मत का दूसरा चरण सन 1939 में भारतीय मुसलमानों की ओर से आरंभ हुआ और सन 1947 में पाकिस्तान बनने के बाद इस मस्जिद के पुनर्निमाण का काम पाकिस्तानी मुसलमानों के हाथ में आया  और 21 वर्षों के दौरान पूरी मस्जिद की मरम्मत हो गयी जिससे मस्जिद का पुराना रूप वापस आ गया। सन 2000 में मस्जिद के मुख्य भाग को संगे मरमर से सजाया गया जिससे उसकी खूबसूरती बढ़ गयी। 

 

बादशाही मस्जिद कई एतिहासिक घटनाओं की गवाह रही है। सन 1913 में जब लीबिया पर इटली ने हमला किया तो अल्लामा इक़बाल ने इस मस्जिद में अपनी  प्रसिद्ध कविता पढ़ी थी और उसमें लीबिया के शहीदों के श्रद्धांजलि अर्पित की थी। उन्होंने मुसलमानों के लिए एक अलग देश का विचार सब से पहले पेश किया और उनके इस विचार के परिणाम में पाकिस्तान अस्तित्व में आया । अल्लामा इक़बाल का अंतिम संस्कार भी इसी मस्जिद में हुआ और उन्हें मस्जिद के दक्षिणी भाग में मस्जिद के प्रांग से दूर दफन किया गया। 

 

पाकिस्तान की बादशाही मस्जिद उपासना स्थल होने के साथ ही साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र है। मस्जिद के दूसरे मंज़िले पर कई कमरों को संग्रहालय का रूप दे दिया गया है जिनमें पवित्र चीज़ें रखी गयी हैं। इन में बहुत सी चीज़े, पैगम्बरे इस्लाम, इमाम अली हज़रत फातेमा और इमाम हुसेन तथा उवैस क़रनी व शेख अब्दुलक़ादिर जीलानी से संबंधित बतायी जाती हैं। कहा जाता है कि अमीर तैमूर गूरकानी को शाम व तुर्की पर विजय प्राप्त करने के बाद यह चीज़ें मिली थीं जिन्हें वह अपनी राजधानी समरकंद ले गया और उसके बाद ज़हीरुद्दीन बाबर  द्वारा वह चीज़ें भारत पहुंच गयीं यहां तक कि सैयद नूरुद्दीन मुनव्वर ने उन्हें खरीद कर बादशाही मस्जिद में रखवा दिया। 

 

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