युवाओं की एक ऐसी विशेषता जो उनके भविष्य के लिए निर्णायक होती है, उनका आज़ादी से प्रेम है।

आज़ादी एक ऐसा आकर्षक शब्द है, जो युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। युवा रुकावटों, पाबंदियों और नियमों को पसंद नहीं करता। उसका स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह कुछ क्षेत्रों में पूर्ण आज़ादी चाहता है।

 

 

युवा ऊर्जा, आशा और अविष्कार का स्रोत होते हैं। इसीलिए उनके स्वभाव में हमेशा जोश, बेचैनी और ताज़गी रहती है। वे खाने-पीने और हंसने हंसाने में रूची रखते हैं। वे हर उस चीज़ के दुश्मन होते हैं जो उनकी आशाओं, जोश और मनोरंजन के रास्ते में रुकावट बनती है। हालांकि उनका अनुभव बहुत कम होता है और अपने चारो ओर घटने वाले घटनाक्रमों से काफ़ी हद तक अवगत नहीं होते। लेकिन जैसे ही वे अवगत होते हैं, उसके बाद कोई लापरवाही नहीं करते।

 

 

युवा और आज़ादी के बीच के संबंध को स्पष्ट करने की ज़रूरत है। इसलिए कि युवा का उत्साह उस हवा की भांति होता है, जो नाव खेने के लिए लाभदायक होता है। लेकिन नाव के बादबान को उसकी हालत पर नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि वह इंसान को इधर उधर कहीं भी ले जा सकता है। भावनाओं पर आधारित आज़ादी विनाशकारी है और बुद्धि पर आधारित आज़ादी से इंसान सम्मान और उत्कृष्टता प्राप्त करता है।

 

 

आज़ादी की सटीक परिभाषा और उसका अर्थ स्पष्ट करने से युवाओं में जागरुकता आएगी और उनकी इच्छाओं में संतुलन पैदा होगा। उन्हें अपना वजूद साबित करने और अपना व्यक्तित्व उजागर करने की ज़रूरत होती है। परिणाम स्वरूप, उनके परिजनों और बड़ों को उचित अवसर प्रदान करना चाहिए ताकि वे तेज़ी से विकास कर सकें। उदाहरण स्वरूप, परिवार और स्कूल, दोनों ही शिक्षा और परवरिश के केन्द्र के रूप में बच्चों और छात्रों का विश्वास हासिल कर सकते हैं और उन्हें विशेष अवसरों पर पूर्ण आज़ादी देकर बौद्धिक आज़ादी के लिए भूमि प्रशस्त कर सकते हैं।

 

 

वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मूल्यों के अलावा आज़ादी का अपना एक ख़ास महत्व एवं सम्मान है। विभिन्न संस्कृतियों और रीति रिवाजों के बावजूद समस्त राष्ट्र आज़ादी का दम भरते हैं। इसका इतिहास मानव के इतिहास जितना पुराना है। क़ुराने मजीद ईश्वरीय दूतों को भेजे जाने का एक कारण, इंसानों को क़ैद से आज़ाद कराना बताता है। ईश्वरीय दूतों ने भी हमेशा व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में आज़ादी के महत्व पर बल दिया है। वर्तमान समय में भी आज़ादी का विशेष महत्व है। हर कोई ख़ुद को आज़ाद समझता है और आज़ादी का समर्थक कहलाता है और उस पर गर्व करता है।

 

 

भौतिक इच्छाओं से आज़ादी और भौतिक इच्छाओं के लिए आज़ादी के बारे में युवाओं का दृष्टिकोण और इन दोनों विषयों को एक दूसरे से अलग करने से आज़ादी से सही तरीक़े से लाभ उठाया जा सकता है। इसी कारण इंसान की उत्कृष्टता के लिए भूमि प्रशस्त होती है। युवाओं में ऐसी आज़ादी को बढ़ावा देना जिसमें किसी प्रकार की कोई सीमा और नियम न हो और नई पीढ़ी को आज़ादी के नाम पर अश्लीलता और काम वासना में व्यस्त कर देना, शैतानी काम है। यह ऐसी स्थिति में है कि ईश्वरीय दूतों ने हमेशा आरम्भ से आज तक काम वासना और भौतिक इच्छाओं से आज़ादी का संदेश दिया है, ताकि जीवन के विभिन्न आयामों में इंसान गंभीरता और दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ सके।

 

 

हज़रत अली (अ) ने अपने बेटे इमाम हसन (अ) को संबोधित करते हुए फ़रमाया, किसी और चीज़ के ग़ुलाम मत बनो, क्योंकि ईश्वर ने तुम्हें आज़ाद पैदा किया है। हज़रत उत्कृष्टता और विकास में आने वाली रुकावटों का उल्लेख करते हुए फ़रमाते हैं, काम वासना का ग़ुलाम ऐसा ग़ुलाम होता है कि जो कभी आज़ाद नहीं हो सकता।

 

हज़रत अपने जवान बेटे को वैचारिक एवं आध्यात्मिक आज़ादी और दुनिया परस्ती की क़ैद से आज़ादी की ओर मार्गदर्शित करते हैं। वे अपने बेटे का ध्यान इस बिंदु की ओर दिलाते हैं कि इंसान का सम्मान उसके आज़ाद व्यक्तित्व और आत्मसम्मान में है। हज़रत की नज़र में इंसान को अपना महत्व समझना चाहिए और विचारों एवं दूसरी हस्तियों का क़ैदी नहीं बनना चाहिए, इसी तरह काम वासना का ग़ुलाम नहीं बनना चाहिए और संतुलन बनाए रखना चाहिए। हज़रत इमाम अली (अ) फ़रमाते हैं, इन विद्रोही इच्छाओं को नियंत्रित करो और उन्हें ग़लत इच्छाओं से दूरी बनाकर रखो, इसलिए कि यह विद्रोही और असीमित होती हैं। अगर इन इच्छाओं का पालन करोगे और अवैध इच्छाओं को पूरा करना चाहोगे तो वे तुम्हें बहुत गहरे गढ़े में धकेल देंगी।

 

 

यहां इस बिंदु पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि जीवन के हर चरण में आज़ादी में संतुलन बनाए रखने की ज़रूरत होती है, ताकि इंसान को इससे नुक़सान न पहुंचे। इसलिए कि अगर इंसान को खुली आज़ादी प्राप्त हो जाती है तो उसकी इच्छाओं में विद्रोह उत्पन्न होत है और उसमें विरोधाभासी आचरण पनपता है। परिणाम स्वरूप, वह नैतिकता का पालन नहीं करता और सामाजिक नियमों की अवहेलना करता है। दूसरी ओर, आज़ादी को कुचलना और हद से ज़्यादा उसे सीमित करना आज़ादी के छिन जाने और आत्मविश्वास के अभाव का कारण बनता है, इसी प्रकार इंसान की व्यक्तिगत योग्यताओं के नष्ट होने कारण बनता है। इसलिए क़ुराने मजीद के आदेशानुसार, कामों में संतुलन बनाए रखना चाहिए और कट्टरता से बचना चाहिए।

 

ब्रितानी दार्शनिक जान लाक का मानना है कि आज़ादी कदापि पूर्ण रूप में नहीं हो सकती, निगरानी और देखभाल का अभाव आज़ादी नहीं है, बल्कि आज़ादी का दुरुपयोग है। इसलिए आज़ादी को परिभाषित करने से आज़ादी को बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता है।

 

हालांकि युवाओं को इस वास्तविकता से अवगत करने के लिए कि आज़ादी और उससे लाभ उठाना दो भिन्न लेकिन एक दूसरे से संबंधित विषय हैं, उन्हें प्रोत्साहन मिलता है कि आज़ादी प्राप्त होते ही यह न समझें कि बस काम ख़त्म हो गया, बल्कि उसे काम का आरम्भ समझें। आज़ादी को जारी रखना उससे सही लाभ उठाने पर निर्भर है और इस संबंध में कुछ नियमों का पालन किए जाने की ज़रूरत है।

युवाओं की विशेषता है कि वे मां-बाप और प्रशिक्षक जैसे बड़े लोगों के आदेशों के मुक़ाबले में एक हद तक डटे रहते हैं और वे उन्हें उनकी इच्छा समझते हैं न कि अपनी भलाई। इसलिए उनकी इच्छाओं पर ध्यान देने की भी ज़रूरत है, उनसे सलाह ली जानी चाहिए और उनके दृष्टिकोणों का सम्मान किया जाना चाहिए और इसी प्रकार उनकी सही रूचियों का स्वागत किया जाना चाहिए।

 

 

युवाओं को अपना व्यक्तित्व उजागर करने की ज़रूरत होती है, इसलिए बड़ों को चाहिए कि उनके विकास और प्रगति के लिए उचित अवसर प्रदान करें। सामान्य रूप से युवतियों को शिकायत होती है कि उन्हें लड़कों की तुलना में कम आज़ादी दी जाती है। इसलिए उनके साथ दोस्ताना बातचीत और विनम्रतापूर्ण व्यवहार अपनाकर तथा उनके चयन की अधिकार को शक्ति प्रदान करके उनकी इस चिंता को दूर किया जा सकता है।

युवाओं की आलोचना और उनके साथ बातचीत को बढ़ावा देकर, आज़ादी के बारे में विचार विमर्श को समृद्ध बनाकर, सकारात्मक आलोचना के मार्गों की समीक्षा करके तथा दृष्टिकोणों को पेश करने की सही शैली का पालन करके आज़ादी के नियमों को समझने में युवाओं की सहायता की सकती है।

 

 

आज आज़ादी के बारे में जो बहस की जाती है, उसमें राजनीतिक उद्देश्य निहित होते हैं। इसी कारण इमाम ख़ुमैनी ने इस संबंध में चेतावनी दी है और आज़ादी को उत्कृष्टता प्रदान की है और उसे ईश्वर की महान अनुकंपा एवं अमानत क़रार दिया है। इमाम ख़ुमैनी कहते हैं, आज़ादी ईश्वर की एक बहुत बड़ी अनुकंपा है, आज़ादी ईश्वर की एक अमानत है जो ईश्वर ने हमें प्रदान की है। सभ्य समाज में राष्ट्र की आज़ादी को प्राथमिकता हासिल है। हमने अपने राष्ट्र को आज़ाद करने और स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए कठिनाईयों को सहन किया। इस्लाम ने हमें आज़ादी प्रदान की। इस आज़ादी के महत्व को समझो और इस्लाम के महत्व को समझो।

 

इस्लाम की नज़र में आज़ादी उत्कृष्टता का कारण और समाज के विकास का कारण है। हालांकि इस्लाम उस आज़ादी को सही नहीं समझता है, जो बूराईयों से दूषित होती है। इसलिए कि इस स्थिति में समाज पतन का शिकार हो जाता है और वह भटक जाता है। यही कारण है कि जो इमाम ख़ुमैनी ने युवाओं को पश्चिमी आज़ादी की ओर से सेचत करते हुए ऐसी आज़ादी से रोका है जिसकी कोई सीमा नहीं होती। वे कहते हैं, यह लोग जो आज़ादी चाहते हैं, यह लोग जो चाहते हैं कि हमारे युवा आज़ाद हों, हमारे युवाओं की आज़ादी के लिए लेख लिख रेह हैं और प्रयास कर रहे हैं, लेकिन वे किस प्रकार की आज़ादी चाहते हैं? हम सबको समझ लेना चाहिए कि पश्चिमी शैली की आज़ादी युवाओं, लड़कों और लड़कियों के विनाश का कारण बनती है। इस्लाम और बुद्धि इस आज़ादी की निंदा करते हैं, इसलिए इस्लाम के ख़िलाफ़ और जन सम्मान के विरुद्ध प्रचार प्रसार, लेख लिखना और भाषण देना हराम है और उसे रोकना हम सबके लिए अनिवार्य है तथा विनाशकारी आज़ादी का रास्ता रोका जाना चाहिए।                 

Apr ११, २०१६ १३:२५ Asia/Kolkata
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