Feb १८, २०१९ १६:५० Asia/Kolkata

इस बारे में महत्वपूर्ण बिन्दु जिस पर बहुत अधिक बल दिया जाता है वह आर्थिक विकास के लिए आंतरिक व भीतरी क्षमताओं से लाभ उठाने के मुद्दे पर चर्चा है।

प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था, भीतरी व बाहरी ख़तरों व झटकों के मुक़ाबले में अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के अर्थ में काफ़ी पहले से प्रचलित रही है।

अनेक देश, इस प्रकार की अर्थव्यवस्था के प्रयास में रहे हैं और हर देश ने अपनी संस्थाओं और संसाधनों के आधार पर इस संबंध में विशेष रवैया अपनाया है। ईरान में यह शब्द अपने आर्थिक तात्पर्य के साथ ही क्रांतिकारी बोध भी लिए हुए है जो वर्चस्ववादी व्यवस्था के मुक़ाबले में डट जाना और प्रतिरोध करना है। वर्चस्ववादी व्यवस्था, संसार के स्वाधीन देशों की अर्थव्यवस्था में को अपने पर निर्भर करके और उसे बाहरी झटके दे कर हमेशा, इन देशों के व्यवहार को नियंत्रित करने के प्रयास में रही है। प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था इस निर्भरता से मुक्ति के लक्ष्य के साथ संसार में वर्चस्ववादी व्यवस्था से मुक़ाबले और इसी प्रकार न्याय, स्वतंत्रता और अध्यात्म जैसी मान्यताओं को सुदृढ़ बनाने के मार्ग में एक क़दम हो सकती है। वर्चस्ववादी व्यवस्था के व्यवहार से पता चलता है कि देशों से अपनी राजनैतिक इच्छाएं मनवाने के लिए आर्थिक प्रतिबंधों को एक हथकंडे के रूप में प्रयोग किया जाता है। ईरान पर पश्चिम ने पहली बार 1953 में डाक्टर मुसद्दिक़ के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रतिबंध लगाया था। इसका उद्देश्य तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण की उनकी नीति को ख़त्म करना था। उस समय पश्चिम ने प्रतिबंध और आर्थिक दबाव का सहारा लेकर, केवल तेल की आय रखने वाले ईरान की, तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण की नीति को नियंत्रित करने का प्रयास किया। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद पश्चिमी देशों विशेष कर अमरीका ने इस्लामी गणतंत्र ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए।

पिछले कार्यक्रम में हमने इस हवाले से चर्चा की थी और अब ईरान में तेल पर निर्भरता के बिना आर्थिक क्षमताओं से लाभ उठाने के मुद्दे पर चर्चा करेंगे। ईरान में आर्थिक विकास और प्रगति में तेल की हमेशा से मुख्य भूमिका रही है।  यह निर्भरता पिछली शताब्दियों के दौरान राष्ट्रीय हित के लिए हानिकारक सिद्ध हुई है। यही कारण है कि एक आय के स्रोत के रूप में तेल पर निर्भरता को समाप्त करना, प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था में चर्चा का विषय बन गया है।

एक ओर ऊर्जा के महत्व के दृष्टिगत जो अर्थव्यवस्था में निखार और उत्पादन में वृद्धि का कारण बनता है, कच्चे तेल की बिक्री पर अर्थव्यवस्था की सीधी निर्भरता को समाप्त करने के लिए रणनीति बनाने की आवश्यकता का आभास पहले से अधिक होने लगा।

इस आर्थिक आधार के दृष्टिगत, तेल की ब्रिक्री पर निर्भरता को समाप्त करने की रणनीति को व्यवहारिक बनाने और देश के भीतर वैल्यु एडिड वस्तुओं के उत्पादन की दिशा में क़दम बढ़ाने के लिए आवश्यक आधारभूत ढांचे को मज़बूत करने पर प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था में बल दिया गया है।

इस संबंध में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई की ओर से प्रतिरोध अर्थव्यवस्था के लिए जारी होने वाले निर्देश में, तेल की बिक्री की शैलियों में विविधता पैदा करना, तेल और गैस की उत्पादन क्षमताओं में विस्तार तथा रणनैतिक भंडारों और संयुक्त गैस व तेल फ़ील्डों में वृद्धि तथा तेल व गैस उद्योग तथा पेट्रोकेमिकल उत्पादों व तेल से बनने वाली वस्तुओं के वैल्यु चेन तथा वैल्यु एडिड में वृद्धि पर बल दिया गया है।

समीक्षाओं से पता चलता है कि सही ढंग से तथा कम ख़र्च के साथ तेल और गैस का भाग, सकल घरेलू राष्ट्रीय उत्पादों में वृद्धि में बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त तेल उद्योग और इससे जुड़े उद्योग में आधुनिक प्रगति जो गुणवत्ता वाली वस्तुओं के उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है, उत्पादन के अन्य कारकों में गुणवत्ता और मात्रा में परिवर्तन और अर्थव्यवस्था में प्रतिरोध की वृद्धि का कारण बनेगा।

प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था एक अन्य आयाम से ऐसा आदर्श व मानक है जिसे देश की आर्थिक स्वाधीनता को केंद्र में रख कर प्रस्तुत किया गया है। बहुत से देशों के लिए ख़तरा बन चुके आर्थिक संकटों के दृष्टिगत प्रतिरोधक अर्थव्यवस्थाक की यह विशेषता बहुत अहम है जो पूंजी तथा पैदावार के स्रोतों के नष्ट होने को रोक सकती है। प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था अपने अर्थ की दृष्टि से बाहरी झटकों से अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के अर्थ में हैं। उदाहरण स्वरूप 1973 में तेल के झटके और तेल के मूल्य में अत्यधिक वृद्धि के कारण अमरीका व पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्था में ज़बरदस्त मंदी आ गई थी।

अर्थ शास्त्रियों ने इस प्रकार के झटकों के संबंध में विभिन्न प्रकार के विचार पेश किए हैं जिनमें से एक 80 के दशक में अमरीका में रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति काल में सामने आया। यह दृष्टिकोण, रीगनिज़्म की अर्थव्यवस्था के नाम से भी मशहूर हुआ। उन दिनों इस मत के प्रख्यात अर्थशास्त्री आर्थर लाफ़र ने अमरीकी राजनितिज्ञों को नसीहत की थी कि वे तेल के मूल्य में वृद्धि से लगने वाले बाहरी झटके से उत्पन्न हुई आर्थिक मंदी से छुटकारे के लिए करों की दर में कमी कर देंगे ताकि एक ओर उत्पादकों का उत्साह वर्धन करके वस्तुआं के वितरण में वृद्धि करें और दूसरी ओर करों में कमी से लोगों की आय में वृद्धि के माध्यम से उपभोग और वस्तुओं की मांग में वृद्धि करें। इस उपाय से अंततः अमरीका 80 के दशक में मंदी के संकट से बाहर निकल आया।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई बारम्बार विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में ईरान को पिछड़ेपन का शिकार बनाए रखने के दुश्मन के आर्थिक युद्ध के लक्ष्यों की ओर संकेत करते हुए कहते हैं कि आर्थिक सुरक्षा, नुक़सानों के मुक़ाबले में अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने तथा देश की आंतरिक आर्थिक क्षमताओं पर भरोसा करने का नाम है। सौभाग्य से वर्तमान समय में ईरान क्षेत्रीय स्तर पर यद्यपि प्रयोग की कुछ वस्तुओं का आयात करता है किन्तु ऊर्जा, तेल और गैस उद्योग जैसे क्षेत्रों में जो सामान्य रूप से औद्योगिक देशों की आवश्यकताओं और ध्यान का केन्द्र है, उच्च स्थान रखता है।

आंकड़ों से पता चलता है कि मध्यपूर्व तेल और गैस से समृद्ध क्षेत्र है और यह ऊर्जा का महत्वपूर्ण ध्रुव है। इस प्रकार से कि फ़ार्स की खाड़ी में तेल के 63 प्रतिशत भंडार जबकि दुनिया के गैस का 30 प्रतिशत भंडार भी यहीं है। जब यह बात स्पष्ट हो गयी तो आपको यह भी बताते चलें कि  मध्यपूर्व और मध्य एशिया में ऊर्जा के स्रोतों में ईरान का एक बड़ा हिस्सा है। इस प्रकार से तेल और गैस की बिक्री की आय से प्राप्त होने वाला सकल घरेलू उत्पादन, तेल से मालामाल क्षेत्रीय देशों की अर्थव्यवस्था में विकास का एक मापदंड समझा जाता है और यदि यह विकास घरेलू उत्पादों के समर्थन के साथ हो तो देश के विकास का कारण बनेगा।

यही कारण है कि तेल उद्योग पर निर्भरता को कम करना उन आवश्यक कार्यवाहियों में है जिसे इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था के मापदंडों को बयान करने में बारंबार बताया। वरिष्ठ नेता इस संबंध में कहते हैं कि यह निर्भरता, हमारी सौ वर्षीय निंदनीय व बुरी धरोहर है, इसी आयाम से प्रतिबंधों पर नज़र रखें कि इसी अवसर से जो आज हमारे पास है, लाभ उठाएं या प्रयास करें ताकि तेल को दूसरी आय वाली आर्थिक गतिविधियों का विकल्प बना सकें।

पिछले कुछ दशकों के दौरान ईरान का एक अति संवेदनशील ढांचा अर्थात तेल उद्योग और तेल निर्यात प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इस उद्योग को अलग थलग करने और सीमित करने के पीछे अमरीका का लक्ष्य, इस उद्योग से प्राप्त होने वाली आय को समाप्त करना या इस क्षेत्र में पूंजी निवेश को रोकता है।

यह विषय हमेशा से ईरान के लिए एक गंभीर मुद्दे के तौर पर पेश किया जाता रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाकर इसका समाधान किया जाए। इस प्रकार से कि इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने देश की अर्थव्यवस्था में तेल की भूमिका बदलने को देश की आर्थिक नीति की प्राथमिकता क़रार दिया और बल दिया कि आर्थिक विकास के क्षितिज को छूने के लिए सूक्ष्म कार्यक्रम और नीतियां बनाई जानी चाहिए। दीर्घावधि में इस रणनीति पर ध्यान देते हुए खनिज और तेल उद्योग से जुड़ी बहुत सी वस्तुओं में देश को आत्म निर्भर बनाते हुए दुश्मनों की धमकियों से मुक़ाबले के लिए तेल को एक हथकंडे के रूप में प्रयोग कर सकते हैं।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई तेल की आय के विकल्प के रूप में नॉलेज बेस्ड कंपनियों को याद करते हैं और कहते हैं कि हम अगर हमारे पास मौजूद अवसरों से लाभ उठा सकें और यह प्रयास करें कि तेल को आय की अन्य आर्थिक गतिविधियों के विकल्प बना दें तो हमने अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में बहुत बड़ी कार्यवाही की है। आज नॉलेज बेस्ड उद्योग उन कामों में से हैं जो इस शून्य को बहुत अधिक सीमा तक भर सकते हैं।

इस विषय के महत्व के दृष्टिकगत, प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था की रणनीति में जिस बिंदु पर बल दिया गया है वह यह है कि नॉलेज बेस्ड अर्थव्यवस्था पर भरोसा किया जाए। शिक्षा की व्यवस्था में सुधार किया जाए और उत्पादन तथा निर्यात में वृद्धि करके क्षेत्र में पहला स्थान प्राप्त किया जाए।

विश्व में होने वाले शोध कार्यों में ईरान की भागीदारी के बारे में जो आंकड़ें प्राप्त हुए हैं, उससे पता चलता है कि विश्व में ईरान की भागीदारी 1.58 प्रतिशत है। इससे स्पष्ट होता है कि ईरान में प्रतिभा की कमी नहीं है, हालांकि अभी भी नॉलेज बेस्ड अर्थव्यवस्था तक पहुंचने के लिए काफ़ी दूरी तय करनी होगी।  (AK)

 

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