युवा अवस्था, जीवन का सबसे जटिल काल होता है।

युवाकाल को जीवन का सबसे अच्छा काल कहा जा सकता है। जवानी में युवा के भीतर ऊर्जा भरी होती है। जीवन के इस चरण में वह बहुत से ऐसे काम कर सकता है जिन्हें वह बाद के चरणों में नहीं कर सकता। कहते हैं कि युवाकाल के क्रियाकलापों को देखकर उस व्यक्ति के भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है।

 

 

यदि किसी देश के युवा, अपने युवाकाल में उस देश के विकास के मार्ग पर अग्रसर रहते हैं तो वह देश निश्चित रूप से तरक़्क़ी करेगा। यही कारण है कि इस्लामी संस्कृतिक के शत्रु सामान्यः इस्लामी देशों के युवाओं को सांस्कृतिक हमलों का लक्ष्य बनाते हैं और उन्हें पथभ्रष्ट करना चाहते हैं। जिस देश की जनसंख्या में युवाओं का अनुपात अधिक होता है उस देश को इस प्रकार के आक्रमण का अधिक ख़तरा रहता है।

राष्ट्रों की मुख्य पहचान उसकी संस्कृति होती है। यही संस्कृति उस राष्ट्र को सक्षम और लोकप्रिय बनाती है। यदि किसी देश की संस्कृति विघटन का शिकार होती है और वह देश अपने सांस्कृतिक मूल्यों से हाथ धो बैठता है तो फिर ऐसे में कोई दूसरा देश उसके विकास में कितनी ही सहायता क्यों न करे, वह वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता।

 

 

सत्ता के भूखे लोग और देश अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए हर प्रकार के हथकण्डे अपनाते हैं। इतिहास बताता है कि सत्ता के भूखे अतिक्रमणकारियों ने विश्व के विभिन्न देशों पर आक्रमण किये और उनको टुकड़ों में बांट दिया। वर्तमान समय में तकनीक के विकास ने सैन्य आक्रमण को लगभग प्रभावहीन बना दिया है ऐसे में आक्रमणकारियों ने अपनी रणनीति को परिवर्तित करते हुए साफ्ट वार या सांस्कृतिक आक्रमण का मार्ग चुना है। इसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान समय में साफ़्ट वार के माध्यम से बहुत से ऐसे लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है जिन्हें सैन्य युद्ध से प्राप्त किया ही नही जा सकता।

बड़े खेद की बात है कि सांस्कृतिक आक्रमण का पहला निशाना युवा ही बनते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि युवा ही किसी देश के भविष्य को बनाते या बिगाड़ते हैं। इस हिसाब से यदि किसी समाज के युवा वर्ग को दिगभ्रमित कर दिया जाए तो फिर उस समाज को बड़ी सरलता से पथभ्रष्ट किया जा सकता है।

 

 

सांस्कृतिक आक्रमण को परिभाषित करते हुए इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि सांस्कृतिक आक्रमण का अर्थ यह है कि कोई राजनैतिक या आर्थिक इकाई अपने राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के उद्देश्य से किसी राष्ट्र को आक्रमण का लक्ष्य बनाए। यह इकाई उस राष्ट्र की राष्ट्रीय मान्यताओं के स्थान पर नई-नई बातें प्रस्तुत करती है जो कभी-कभी वहां की प्रचलित परंपराओं से विरोधाभास रखती हैं। वरिष्ठ नेता कहते हैं कि शत्रु, भ्रष्ट संस्कृति को प्रचलित करके यह प्रयास करता है कि युवाओं को उस राष्ट्र से छीन लिया जाए। शत्रु के इस कार्य को सांस्कृतिक विनाश या सांस्कृतिक जनसंहार भी कहा जा सकता है।

 

सांस्कृतिक आक्रमण का लक्ष्य सामान्यतः वे युवा बनते हैं जिनके पास अनुभव की कमी होती है। होता यह है कि अधिकांश युवाओं को जीवन का पर्याप्त अनुभव नहीं होता। यही कारण है कि वे सांस्कृतिक आक्रमण का जल्दी शिकार हो जाते हैं। अनुभव की कमी के कारण ही युवा सच और झूठ को समझने में धोखा खा जाते हैं। युवाओं द्वारा पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होकर पश्चिमी व्यवहार को आदर्श बनाने जैसी बातें इसकी पुष्टि करती हैं। सांस्कृतिक आक्रमण करने वाले, युवाओं की इसी कमज़ोंरी से फाएदा उठाते हैं। यही कारण है कि वे युवाओं को बहुत ही जल्दी अपने जाल में फंसा लेते हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि हे युवाओं, ईश्वरीय भय का साथ न छोड़ो और झूठों का अनुसरण न करो। इमाम का यह कथन बताता है कि सांस्कृतिक आक्रमण करने वाले उनके काल में भी युवाओं को अपना लक्ष्य बनाया करते थे।

 

 

सांस्कृतिक शून्य ही सांस्कृतिक आक्रमण की सफलता की भूमिका प्रशस्त करता है। सांस्कृतिक शून्य का अर्थ यह है कि युवाओं को उचित ढंग से सांस्कृतिक जानकारी न हो और वे सांस्कृतिक समृद्धता की पहचान न रखते हों। ऐसा जवान उसी प्रकार से धराशाई हो जाता है जिस प्रकार से एक कोमल पौधा तेज़ हवाओं के थपेड़ों से गिर जाता है।

 

 

देखने में यह आता है कि युवा सामान्यतः पहचान के चक्कर में फंसे रहते हैं। युवाओं की इस मानसिकता के दृष्टिगत सांस्कृतिक आक्रमण करने वाले, युवाओं के सामने ग़लत आदर्श पेश करते हैं। इन सभी बातों के दृष्टिगत युवाओं को समझाना चाहिए कि इस्लामी संस्कृति कितनी समृद्ध है? युवाओं को यह बताना चाहिए कि इस्लामी संस्कृति के पास कितने गौरवशाली विद्वान, वैज्ञानिक, दर्शनशास्त्री तथा अन्य क्षेत्रों के आदर्श व्यक्तित्व पाए जाते हैं। दूसरी ओर इस्लामी संस्कृति पैग़म्बरे इस्लाम (स) और उनके पवित्र परिजनों की उच्च शिक्षाओं से भरी पड़ी है जिससे पूरी मानवता का मार्गदर्शन किया जा सकता है। इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के एक परिजन का यह कथन है कि यदि हमारी शिक्षाओं को लोगों को बताया जाए तो फिर वे उसी की ओर एकत्रित होने लगेंगे।

 

 

पूरी दुनिया के मुसलमनों को एक जुट करने का सर्वोत्तम मार्ग, पवित्र क़ुरआन है। ऐसी स्थिति में कि जब मुसलमानों को सांस्कृतिक आक्रमण का सामना है, उन्हें इन आक्रमणों से बचने और एकजुट होने के लिए पवित्र क़ुरआन का दामन थामना चाहिए। इस ईश्वरीय पुस्तक की शिक्षाओं से युवाओं को लाभ उठाते हुए स्वयं को सांस्कृतिक आक्रमणों से सुरक्षित करनी चाहिए। पवित्र क़ुरआन युवा को आत्म निर्भर, न्यायप्रेमी और लक्ष्यपूर्ण बनाता है। इस प्रकार वह जवानों का उचित प्रशिक्षण करते हुए उन्हें हर प्रकार की बुराइयों से सुरक्षित रखता है। इस बारे में सूरए माएदा की आयत संख्या 15 और 16 में ईश्वर कहता है कि हे आसमानी किताब वालो! निसंन्देह, हमारा पैग़म्बर तुम्हारी ओर आया ताकि आसमानी किताब की उन अनेक वास्तविकताओं का तुम्हारे लिए उल्लेख करे जिन्हें तुम छिपाते थे और वह अनेक बातों को क्षमा भी कर देता है। निःसन्देह ईश्वर की ओर से तुम्हारे लिए नूर अर्थात प्रकाश और स्पष्ट करने वाली किताब आ चुकी है। ईश्वर इस (प्रकाश और स्पष्ट करने वाली किताब) के माध्यम से, उसकी प्रसन्नता प्राप्त करने का प्रयास करने वालों को शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित मार्गों की ओर ले जाता है और अपनी कृपा से उन्हें अंधकार से प्रकाश में लाता है और सीधे रास्ते की ओर उनका मार्गदर्शन करता है।

 

 

वास्तव में पवित्र क़ुरआन की शिक्षाओं को जानने से किशोरों और युवाओं में आत्मविश्वास उत्पन्न होता है और उनकी नैतिकता में विस्तार होता जाता है। सांस्कृतिक आक्रमण के संदर्भ में अधिकारियों को सुझाव देते हुए इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि इस समय सांस्कृतिक आक्रमण और आधुनिक तकनीक के बीच गहरा संबन्ध पाया जाता है। सांस्कृतिक आक्रमण के लिए टेलिविज़न, कम्प्यूटर, इंटरनेट और इसी प्रकार के संचार माध्यमों को प्रयोग किया जा रहा है। संचार माध्यमों द्वारा भ्रष्ट विचार और शंकाओं को पेश किया जा रहा है। इस प्रकार की कार्यवाहियों का मुक़ाबला किया जाना चाहिए। इस समय हम अपनी पुरानी शैली को प्रयोग करके सफल नहीं हो सकते। हमको युवाओं को, उनकी सोच को और साथ ही आक्रमणकारियों को भलि भांति पहचानना होगा। जब तक बीमारी के कारणों की पहचान न कर ली जाए उस समय तक बीमारी का उचित उपचार नहीं किया जा सकता।

 

जैसाकि आप जानते हैं कि युवा वर्ग, बहुत जल्दी प्रभावित होने वालों में से होता है किंतु यही वर्ग हर देश की पूंजी भी होती है। जब किसी राष्ट्र पर सैन्य आक्रमण किया जाता है तो उसके लोग उस आक्रमण का मुक़ाबला करते हैं जिससे उनमें प्रतिरोध उत्पन्न होता है किंतु इसके विपरीत नर्म युद्ध या साफ्ट वार, लोगों को सुस्त कर देता है। सैन्य युद्ध एक खुला हुआ युद्ध होता है जबकि साफ्ट वार, छिपा हुआ आक्रमण होता है। साफ्ट युद्ध में संस्कृति, नैतिकता और धर्म को क्षति पहुंचाई जाती है। इन बातों के दृष्टिगत युवाओं को नर्म युद्ध का मुक़ाबला करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

Apr ११, २०१६ १३:५१ Asia/Kolkata
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