निःसंदेह हर देश के युवाओं को उस देश का प्रबंधक और राजनीतिक भविष्य समझा जाता है।

 आधिकारिक आंकडों के दृष्टिगत अधिकांश देशों की जनसंख्या का अधिकांश भाग जवानों पर आधारित है और जवान व नौजवान राजनीतिक शिक्षा प्राप्त करके और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय पार्टियों की गतिविधियों से अवगत होकर देश के सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता बन सकते हैं। चुनावों में भाग लेकर, छात्र संघों का गठन करके, राजनीतिक विषयों के संबंध में कांफ्रेन्सों का आयोजन करके, छात्रों की पत्रिका के प्रकाशन की आधारशिला रखकर समय के राजनीतिक मामलों में युवापीढ़ी की भागीदारी को सुनिश्चित बनाया जा सकता है।

 

 

जवान की एक विशेषता यह है कि वह समाज की राजनीतिक स्थिति को जानना चाहता है और सिद्धांतिक रूप से विशेषज्ञ जवानों को राजनीतिक प्राणी कहते हैं। शायद इसका कारण यह है कि जवान, दल व गुटप्रेमी होता है और वह स्वयं किसी गुट से जुड़ना और उसका सदस्य बनना चाहता है। दूसरी ओर उसका व्यवहार राजनीतिक व्यक्तियों की भांति होता है क्योंकि आज़ादी और स्वतंत्रता प्रेमी भावना के साथ वह अपने लिए कानून को आवश्यक समझता है और विभिन्न मामलों में वह अपने दृष्टिकोण को बयान करना चाहता है। इसी प्रकार वह यह चाहता है कि उसे मत देने का अधिकार होना चाहिये और उसे शक्ति की आवश्यकता होती है ताकि उसके माध्यम से वह अपने उद्देश्यों को व्यवहारिक बना सके। वह रणक्षेत्र में शत्रु के विरुद्ध युद्ध करने वाला होता है और साथ ही वह शांति के बारे में भी सोचता है।

जवान राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में बहुत संवेदनशील होते हैं। विचार विमर्श, मार्गदर्शन, आपत्तियों में भाग लेना और व्यवस्था आदि का समर्थन राजनीतिक एवं सामाजिक मामलों में जवानों की भागीदारी के प्रतीक हैं। अलबत्ता यह कार्य सरकार के समर्थन से संभव है।

 

 

वास्तव में जवान अपने समाज से अपेक्षा रखता है कि वह राजनीतिक एवं सामाजिक मामलों में उसकी भागीदारी की भूमि प्रशस्त करे। राजनीतिक एवं सामाजिक मामलों में जवानों की प्रभावी भागीदारी समाज की प्रगति का कारण है। क्योंकि जवान वर्ग देशों की जनसंख्या का महत्वपूर्ण व बड़ा भाग होता है। इस आधार पर राजनीतिक और सामाजिक विभिन्न स्तरों पर उनके मध्य समन्वय और भागीदारी बहुत प्रभावी होती है।

इस्लाम ऐसा धर्म है जो इंसान के केवल व्यक्तिगत मामलों की बात नहीं करता बल्कि वह राजनीतिक बात भी करता है। इस्लाम धर्म के मानने वाले व्यक्ति का दायित्व है कि वह राजनीतिक एवं सरकारी मामलों में अपनी भूमिका निभाये और पवित्र क़ुरआन और रवायतें ऐसी शिक्षाओं व आदेशों से भरी पड़ी हैं जो मुसलमान को व्यक्तिगत खोल से बाहर निकलने और समाज में सामूहिक ढंग से किये जाने वाले प्रयास के लिए प्रोत्साहित करती हैं। इसी कारण जिन देशों ने स्वतंत्रता एवं आज़ादी की पताका लहरा रखी है हम उनमें बहुत से साहसी युवाओं के साक्षी हैं जो प्रतिरोध के केन्द्र हैं।

 

 

वास्तव में अगर जवानों का सही मार्गदर्शन किया जाये और उनकी राजनीतिक सूझ- बूझ सही हो तो वे देश के राजनीतिक ढ़ांचे के बारे में महत्पूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जैसाकि जवानों के समर्थन से ही मदीना में पहली इस्लामी सरकार का गठन हुआ था। पैग़म्बरे इस्लाम ने पैग़म्बरी की घोषणा के आरंभ से ही राजनीतिक मामलों में जवानों की भागीदारी की भूमि प्रशस्त कर दी है। इसी कारण अरब में पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाने वालों में सबसे अधिक व अग्रणी जवान थे। जवानों ने क़ुरैश के सरदारों द्वारा कड़े विरोध के बावजूद इस्लाम धर्म को स्वीकार किया और पैग़म्बरे इस्लाम के कार्यक्रम को तन­-मन से स्वीकार किया। ज़ैद बिन हारिस उन्हीं जवानों से एक थे जो पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान ले आये और इस्लाम को अपने लिए चुना। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि ज़ैद बिन हारिस पैग़म्बरे इस्लाम के मुंह बोले बेटे थे।

 

 

पैग़म्बरे इस्लाम के जीवन काल में बहुत से कार्यक्रम थे जिनके राजनीतिक और धार्मिक आयाम थे। सामूहिक रूप से पढ़ी जाने वाली नमाज़े जमाअत उनमें से एक थी। इस्लाम से पहले अज्ञानता के काल में इसका कोई अतीत नहीं था और पैग़म्बरे इस्लाम जब अपने कुछ अनुयाइयों के साथ नमाज़ के लिए खड़े होते थे तो उनका यह कार्य असाधारण प्रतीत होता था और सबसे अधिक जवान पैग़म्बरे इस्लाम के साथ थे। जो यात्री दूर से मक्का आते थे वे मुसलमानों द्वारा सामूहिक रूप से पढ़ी जानी वाली नमाज़ को बड़े आश्चर्य से देखते और बहुत प्रभावित होते थे।

पैग़म्बरे इस्लाम राजनीतिक, सामाजिक, उपासना और सैन्य मामलों तथा दूसरे मामलों में जवानों की भागीदारी के लिए भूमि प्रशस्त करते थे और मक्का एवं मदीना में धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए उनका आह्वान करते थे। इसी प्रकार पैग़म्बरे इस्लाम शिक्षा- प्रशिक्षा और सांस्कृतिक मामलों में जवानों को इस बात का अवसर देते थे कि वे आत्म विश्वास के साथ भाग लें। हबशा अर्थात वर्तमान इथोपिया के एक जवान बेलाल हबशी थे जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के समर्थन से अपनी पहचान व व्यक्तित्व प्राप्त किया और वे सदैव पैग़म्बरे इस्लाम के लिए आज़ान देते थे।

 

 

वर्तमान समय की भी मांग यह है कि विभिन्न इस्लामी और सामाजिक कार्यक्रमों में जवानों की सक्रिय भागीदारी के लिए भूमि प्रशस्त की जाये और जवानों की अपेक्षा यह है कि वे समाज के विभिन्न मामलों में भाग लें। ईरान की इस्लामी व्यवस्था के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी राजनीतिक एवं सामाजिक मामलों में जवानों की भागीदारी के बारे में कहते हैं” आप इस्लाम के जवानों के लिए जो मुसलमानों की आशा के स्रोत हैं, आवश्यक है कि राष्ट्रों को जागरुक बनायें और साम्राज्यवादियों के विनाशकारी षडयंत्रों का पर्दाफाश करें। इस्लाम को पहचनवाने में अधिक गम्भीरता व प्रयास से काम लें। पवित्र कुरआन की शिक्षाओं को सीखें और उस पर अमल करें। पूरी निष्ठा, प्रचार-प्रसार और दूसरे राष्ट्रों को इस्लाम को पहचनवाने और इस्लाम की बड़ी आकांक्षाओं को आगे ले जाने के लिए अधिक प्रयास करें। इस्लामी सरकार के कार्यक्रमों को व्यवहारिक बनाने और उसके मामलों की समीक्षा के लिए अधिक ध्यान दें। शालीन बनें और स्वयं को संवारें। एकजुट हो जायें। अपनी पंक्तियों को मज़बूत बनायें। अधिक से अधिक विचारों को समान बनायें, त्याग व बलिदान देने वाले इंसानों का निर्माण करें। इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध साम्राज्यवादियों के षडयंत्रों का रहस्योदघाटन करने में लापरवाही से काम न लें। पीड़ित भाइयों और मुसलमानों की आवाज़ को दुनिया तक पहुंचायें और उनके साथ सहानुभूति रखें।“

 

 

ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामनेई द्वारा जवानों पर ध्यान और आर्थिक गतिविधियों के साथ राजनीतिक कार्यों में उनकी भागीदारी पर बल देना इस बात का सूचक है कि लोगों विशेषकर जवानों की राजनीतिक भागीदारी और देश की प्रगति में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। चूंकि जवान निकट भविष्य में देश के संचालन की ज़िम्मेदारी संभालेंगे इसलिए राजनीतिक क्षेत्र में जवानों का प्रशिक्षण अधिक महत्वपूर्ण है। यह मामला विश्व के दूसरे देशों में भी काफी महत्वपूर्ण है और विश्व की विभिन्न व्यवस्थाओं व देशों में लोगों के राजनीतिक प्रशिक्षण के विभिन्न कार्यक्रम बनाये गये हैं। उदाहरण स्वरूप ब्रिटेन में लगभग 50 वर्ष पहले शिक्षा- प्रशिक्षा के ज़िम्मेदारों ने पब्लिक स्कूल की बुनियाद रखी और यद्यपि इसका अर्थ सार्वजनिक स्कूल है पंरतु इस प्रकार के अधिकांश स्कूल सामाजिक और राजनीतिक हैं। इन स्कूलों में छात्र सुबह से लेकर दोपहर तक सामान्य स्कूलों की भांति पढ़ते हैं और दोपहर के बाद छात्रों को दो घंटे का समय दिया जाता है ताकि वे इस समय में समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और चयनित बुलेटिनों का अध्ययन करें।

 

 

इन स्कूलों के छात्रों को दो गुटों में विभाजित किया जाता है। एक गुट को लेबर पार्टी के रूप में जबकि दूसरे को नियोकन्ज़रवेटिव पार्टी के रूप में पहचाना जाता है। एक प्रशिक्षक भी उनके मध्य होने वाली बहस पर निगरानी करने के लिए मौजूद होता है और विदित में वह निष्पक्ष होता है और वह कार्यक्रमों के मार्गदर्शन के साथ बैठक में शांति बनाये रखने का प्रयास करता है। इस कार्य से ब्रिटेन में शिक्षा -प्रशिक्षा के ज़िम्मेदारों का प्रयास यह होता है कि वे पहले से ही इस देश की संसद में जाने वाले ऐसे व्यक्ति को तैयार कर दें जिसके अंदर एक सांसद की समस्त विशेषताएं मौजूद हों।

साथ ही विश्व के विभिन्न देशों में बहुत से लोग राजनीतिक गतिविधियों में भाग नहीं लेते हैं यानी वे राजनीतिक भागीदारी पर ध्यान ही नहीं देते हैं और वे राजनीति को देश के अधिकारियों व शासकों पर छोड़ देते हैं या राजनीति को निषेध क्षेत्र समझते हैं और उसमें भाग लेने को हराम समझते हैं या भय के कारण चुपचाप अपने शासकों की नीतियों का अनुसरण करते हैं और यह वह कार्य है जिससे तानाशाहों और विदेशियों के वर्चस्व की भूमि प्रशस्त होती है।

           

 

नौजवानों में राजनीतिक सूझ-बूझ को बेहतर बनाने के लिए उनके अंदर आत्म विश्वास की भावना उत्पन्न करना और उनके विचारों का सम्मान बहुत ज़रूरी है। इसी प्रकार सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं के सही विश्लेषण के लिए उनके अंदर एक प्रकार की समझ व जानकारी उत्पन्न करना चाहिये। अगर हम राजनीतिक प्रशिक्षण का अर्थ, समाज की सार्वजनिक शक्ति को बेहतर बनाना और रचनात्मक भागीदारी के लिए तत्परता उत्पन्न करना मानें तो हमें सही प्रशिक्षण के लिए उनकी राजनीतिक जानकारी में वृद्धि करना चाहिये और इसके लिए आवश्यक है कि एक ओर लोगों की राजनीतिक जानकारी के स्तर को ऊपर ले जाया जाये और दूसरी ओर जानकारियों का उचित विश्लेषण एवं जानकारियों का सही होना ज़रुरी है। परिणाम स्वरूप जिन जवानों का देश की शिक्षा- प्रशिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत राजनीतिक प्रशिक्षण हो रहा है उन जवानों को अपने देश की इतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक घटनाओं से अवगत होना चाहिये और साथ ही उन्हें अपने देश में घरेलू और विदेशी वर्चस्व के कारकों और अपने देश और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की जानकारी भी होनी चाहिये। इसी प्रकार जिन जवानों का राजनीतिक प्रशिक्षण किया जा रहा है उन्हें विश्व में वर्चस्व जमाने और वर्चस्व स्वीकार करने की प्रक्रिया की भी पर्याप्त जानकारी होनी चाहिये और इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि जानकारियों व सूचनाओं की सही व्याख्या व विश्लेषण किया जाये।

 

क्योंकि जानकारियां वास्तव में कच्ची सामग्री हैं जिन्हें जवानों को दिया जाता है और अगर ये जानकारियां ही सही नहीं होंगी और उनसे विश्व की विभिन्न घटनाओं के मध्य उचित व तार्किक संबंध स्थापित नहीं होगा तो विश्लेषण सही नहीं होगा और विदेशी संचार माध्यम जवानों के मस्तिष्क को ख़राब कर देंगे और यह उनके अनुचित राजनीतिक व्यवहार का कारण बनेगा। अलबत्ता इस बात को ध्यान में रखना चाहिये कि जवानों द्वारा राजनीतिक घटनाओं का सही विश्लेषण व समीक्षा कोई सरल कार्य नहीं है।

Apr ११, २०१६ १३:५५ Asia/Kolkata
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