Sep ०१, २०१९ १६:४० Asia/Kolkata

हमने बच्चों के प्रशिक्षण और स्वस्थ व पीढ़ी के पालन पोषण में परिवार की भूमिका के महत्व पर बल दिया था।

इमाम कहते हैं कि मोमिन वह है जो हमेशा अपने परिवार को उचित व योग्य संस्कार और ज्ञान से सुसज्जित करे ताकि सभी को स्वर्ग में प्रविष्ट करे।

आज हम में से कुछ लोग यह कल्पना करते हैं कि यदि ज़्यादा काम करें और अधिक आमदनी हो तो यह वैवाहिक जीवन को ख़ुश रखने का अधिक कारण बनती है, जबकि ऐसा नहीं है। यदि एक उचित व सही समय के अनुसार काम करने से सही है कि विदित रूप से आमदनी में वृद्धि होती है किन्तु उसके ख़र्च के लिए भी उसे भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है, आपको पता है क्यों? क्योंकि उक्त व्यक्ति या उक्त महिला ने अपनी संतान या पति अथवा पत्नी की भावनाओं पर हध्यान देने के बजाए काम किया, उन्होंने इस भावनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पैसे ख़र्च किए, हर पिन अधिक से अधिक आमदनी करते थे, हर दिन नया सामान लाते थे ताकि परिवार को ख़ुश रख सकें या यूं कहूं कि उन्हें ख़ामोश कर सकें। इस बात से निश्चेत कि यदि जीवन की अर्थव्यवस्था के लिए प्रयास और गतिविधियां एक सीमा से अधिक बढ़ जाए तो निश्चित रूप से उसका परिणाम उल्टा ही होता है और दंपति की सकारात्मक भावनाओं को बढ़ाने के बजाए दम्पति के बीच मन मुटाव पैदा हो जाता है।

सामाजिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक लेहाज़ से आय में वृद्धि, ख़र्चों को बढ़ा देती है और प्रेम व स्नेह को कम कर देती है। यह ऐसी हालत में है कि कभी कभी इन्सान कम आय के साथ अधिक से अधिक जीना चाहता है और एक दूसरे से प्रेम और स्नेह को समझकर जीवन से राज़ी रहता है। विशेषकर महिलाओं को इस विषय पर अधिक ध्यान देना चाहिए कि अतिरिक्त काम करने की मांग ऐसी न हो कि दंपति के साथ स्नेह के पल गुज़राने के अवसर छीन ले, उन्हें काम और ज़िदगी में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता है। यहां पर इस बिन्दु का उल्लेख आवश्यक है कि इस्लाम धर्म में भी इसी बात पर बल दिया गया है। इस्लामी रिवायतों में उस व्यक्ति को ईश्वर की राह में जेहाद करने वाले का नाम दिया गया है जो जीवन चलाने के के लिए काम और प्रयास करता है। इसी के साथ यह भी सिफ़ारिश की गयी है कि मनुष्य को अपना समय व्यवस्थित करना चाहिए ताकि काम के लिए कुछ समय, विश्राम के लिए कुछ समय, मनोरंजन के लिए कुछ समय और घरेलू काम के लिए कुछ समय निकाल सके। इस स्थिति में दंपति और बच्चों के बीच पूरी तरह से प्रेम और स्नेह रहेगा और उनका घर एक सुखी घर व परिवार की तरह होगा।

 

एक परिवार, वह छोटा समाज है जो विवाह से शुरु होता है और बच्चों के जन्म से बढ़ता और मज़बूत होता है। आरंभ से ही मनुष्य ने पारिवारिक जीवन को बेहतरीन जीवन के रूप में चुनाव और हर समय और हर काल में इसपर प्रतिबद्ध रहा और है। इस प्रकार का जीवन मनुष्य की विशिष्टता समझा जाता है और इसके बहुत से लाभ हैं। इन फ़ायदों में से एक यह है कि महिला और पुरुष परेशानियों और लक्ष्यहीन होने से मुक्ति पा जाते हैं, परिवार से जुड़ जाते हैं और प्रेम व स्नेह की अनुकंपाओं तथा विवाह से आनंद उठाते हैं।

दूसरी ओर महिला और पुरुष, घर के अच्छे माहौल और ख़ूबसूरत माहौल में माता पिता बनते हैं, बच्चों के शिक्षण व प्रशिक्षण का प्रयास करते हैं और संयम का बेहतरीन प्रदर्शन करते हैं। बच्चों का पालन पोषण और उनसे प्रेम व स्नेह, जीवन का बेहतरीन आनंद है।

हमने बच्चों के प्रशिक्षण तथा स्वच्छ व साफ़ सुथरी पीढ़ी के पालन पोषण में परिवार की भूमिका के महत्व के बारे में बताया था। इस मामले में परिवार की सफलता में महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि बच्चों के साथ कैसा बर्ताव किया जाए और बच्चों के साथ किस प्रकार संपर्क रखे। आज इस बारे में बहुत कम ही लोग आपको बताएंगे। हमको ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी परिवार का सदस्य होना, किसी टीम के सदस्य होने की भांति है। हमें एक टीम के सदस्यों की तरह एक दूसरे से बर्ताव करना चाहिए। कई लोगों के कामों में भाग लेना या एक टीम के काम में भागीदारी, बच्चों तथा माता पिता के बीच संबंधों को दर्शाता है। परिवार के सदस्यों के बीच सकारात्मक संपर्क और मेल मोहब्बत से उनमें एक दूसरे के प्रति मोहब्बत और स्नेह का पता चलता है। वह एक दूसरे से प्रेम की भावना जगा कर हम एक दूसरे से मोहब्बत प्रकट करते हैं।

माता पिता और बच्चों के बीच उचित संपर्क स्थापित करने का एक रास्ता, अपेक्षाओ और इच्छाओं में संतुलन है। सामान्य रूप से बच्चे अपने माता पिता से कुछ इच्छाएं और अपेक्षाएं रखते हैं कि जिन्हें जितनी जल्दी हो सके पूरा कर दिया जाए। बच्चों की अपेक्षाएं वह समस्याएं हैं जो हर परिवार को ख़तरे में डाले रहती है और यदि इस समस्या को पेश कर दिया जाए तो जीवन का सुख चैन छिन जाता है।  

अतार्किक और पूरी न हुई अपेक्षाएं और जमा हुई इच्छाएं कारण बनती हैं कि बच्चे अपनी ज़िम्मेदारियों के मुक़ाबले में प्रतिरोध करम करने लगते हैं और धीरे धीरे उनमें निराशा और उदासी विराजमान हो जाती है किन्तु इन इच्छाओं की अनदेखी की जाने की स्थिति में यह बच्चों से संपर्क में रुकावट की पहली सीढ़ी बन जाती है। कभी कभी वह इस बात का आभास करते हैं कि उनकी इच्छाओं की अनदेखी कर दी गयी। कभी कभी यह देखने में आता है कि कुछ माता पिता अन्य बच्चों की तुलना, अपने बच्चों से करने लगते हैं, उनकी कमज़ोरियां गिनवाने लगते हैं, सैद्धांतिक रूप से बच्चों की तुलना उन लोगों के बच्चों से की जाती है जिन्हें माता पिता चाहते हैं और उनकी पोज़ीशन मज़बूत होती है किन्तु इस प्रकार की तुलना से बच्चों के मनोबल को नुक़सान पहुंचता है और उनकी प्रतिष्ठा कम होती है और उनके प्रयासों में विघ्न उत्पन्न हो जाता है।

 

इस बात के लिए कि बच्चे अपने आप को पहचानें तो इसके लिए ज़रूरी है कि माता पिता उनके साथ संपर्क बनाए रखें ताकि वह अपने माता पिता से दूरी का एहसास न करें। इन्हीं में से एक नज़र रखना है जो एक दूसरे से संपर्क के लिए बेहतरीन तत्व है। यह संपर्क संभव है कि वार्ता के समय लोगों के ध्यान और उनकी रुचि का कारण बने और इस शैली के उचित प्रयोग के अच्छे परिणाम निकल सकते हैं।

इस बारे में नज़र चुराने या नज़रें बचाने की बहुत अहम भूमिका होती है।  माता पिता और बच्चे कभी कभी अवांछित स्थिति के पैदा होने के बाद एक दूसरे से नज़रें बचाते हैं ताकि यह दिखा सकें कि वह दूसरे के बर्ताव से कितना प्रभावित हैं। यहां पर यह बात ध्यान योग्य है कि नज़रें चुराने से यह भी संदेश जाता है कि वे एक दूसरे से कितनी घृणा करते हैं। माता पिता और बच्चों को यह अभ्यास करना चाहिए कि किस प्रकार एक दूसरे की ओर से देखें। यहां पर इस बात का उल्लेख भी आवश्यक है कि आंखें चढ़ाकर या आंखें निकालकर देखना, एक ग़लत संदेश है बल्कि इससे यह संदेश जाता है कि बच्चे को माता पिता की ओर से जो संदेश मिला है वह अवांछित है और इसमें कोई शंका नहीं है।

उचित है कि माता पिता, इस तरह से अपने बच्चों से निकट हों, उनके हाथ पकड़ें, उनको बचाएं और उनके साथ रहें, अपने बच्चों को लाड प्यार करें ताकि उन्हें पता चले कि यद्यि उनकी विफलताएं बहुत हैं किन्तु वे अकेले नहीं हैं, उनके माता पिता को उनको समझना चाहिए, उनके बारे में सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। कभी कभी उन्हें चूमना, ज़बान से बोलने से कम संदेश नहीं है। एक दूसरे से छूने और प्यार करने से सकारात्मक ऊचा पहुंचती है जो कि ज़बान से अधिक प्रभावी होती है।

इसके अतिरिक्त यदि माता पिता जो हमेशा अपने बच्चों को सुनते हैं, उन्हें अपने सुनने की कला मज़बूत करनी चाहिए। इस प्रकार से वह अपने बच्चों की दुनिया से अधिक से अधिक निकट हो सकते हैं और उन पर प्रभाव डाल सकते हैं।

इस प्रकार के पारिवारिक माहौल में जीवन व्यतीत करने की वजह से कभी कभी बच्चे स्वयं को अपरिचित नहीं समझते और अपनी दक्षता से दूर नहीं रहते। मनोचिकित्सकों का कहना है कि अपने बच्चों को अपनी पहचान दिलाना उनकी सराहना है। यह परिवार के सदस्यों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है ताकि उन्हें पता चल सके कि उन्होंने एक सुरक्षित परिवार में क़दम रखा है। आप परिवार के अन्य सदस्यों को एक दूसरे से अच्छे और मज़बूत संबंध रख सकते हैं और एक दूसरे को ख़ुश रख सकते हैं। (AK)

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