Sep ११, २०१९ १६:०१ Asia/Kolkata

सर्वेक्षण करने वाली संस्थाओं में इस बात को लेकर मतभेद पाया जाता है कि अमरीका में मुसलमानों की सही संख्या कितनी है?

अमरीका में रहने वाले मुसलमानों की संख्या के बारे में विभिन्न मत पाए जाते हैं।  सर्वेक्षण करने वाली रिपोर्टों पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि अमरीका में रहने वाले मुसलमानों की संख्या छह मिलियन से दस मिलयन अर्थात साठ लाख से एक करोड़ के बीच है।  मुसलमान संगठन और मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा करने वाले संगठनों के अनुसार अमरीका में लगभग एक करोड़ मुसलमान रहते हैं।  अमरीका की ओर जिस प्रकार से पलायन किया जा रहा है और जिस अनुपात में अमरीकी मुसलमान हो रहे हैं उसे देखते हुए एक करोड़ की संख्या सही लगती है।

अमरीका में रहने वाले मुसलमानों की संख्या की एक विशेषता यह है कि इस देश की जनसंख्या की तुलना में अमरीका में रहने वाले अधिकतर मुसलमान युवा हैं।  अमरीकी मुसलमानों की कुल संख्या में 60 प्रतिशत ऐसे हैं जिनकी आयु 18 से 39 वर्ष के बीच है।  इनमे से अधिकांश छात्र और शिक्षा से जुड़े हुए लोग हैं।  एक बात यह है कि अमरीका में रहने वाले मुसलमानों में से एक तिहाई एसे हैं जिनका जन्म अमरीका में ही हुआ है।

अमरीकी मुसलमानों में से 30 प्रतिशत श्वेत वर्ण के लोग हैं।  23 प्रतिशत अफ़्रीकी मूल के अमरीकी हैं।  21 प्रतिशत एशियन मूल के मुसलमान हैं।  7 प्रतिशत स्पेन के हैं और 19 प्रतिशत अन्य जातियों से संबन्ध रखने वाले मुसलमान हैं।  अमरीका में अधिकांश मुसलमान या तो वे हैं जो दक्षिणी या पश्चिमी एशिया से पलायन करके यहां आए हैं या फिर उनकी दूसरी पीढी के लोग हैं।  PEW नामक संस्था की 2014 की रिपोर्ट की अनुसार वे मुसलमान जो पलायन करके अमरीका जाते हैं वे शीघ्र की इस देश की मुख्य राष्ट्रीय धारा से जुड़ जाते हैं।  वे यूरोप पलायन करने वाले मुसलमानों से कुछ भिन्न हैं जो अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने की कोशिश करते रहते हैं।

अमरीका की राष्ट्रीय मुख्य धारा से जुड़ने और वहां के समाज के कांधे से कांधा मिलाने के बावजूद अमरीकी समाज में मुसलमानों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता है। यह लोग अमरीकी पुलिस के भेदभाव पूर्ण व्यवहार का शिकार होते हैं।  हस भेदभावपूर्ण व्यवहार में हालिया कुछ वर्षों में तेज़ी से वृद्धि देखी गई है विशेषकर ग्यारह सितंबर की घटना के बाद।  ग्यारह सितंबर 2001 को घटने वाली घटना के बाद अमरीकी कांग्रेस की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार इसमें सऊदी अरब की महत्वपूर्ण भूमिका थी।  ग्यारह सितंबर की घटना के बाद अमरीका मे रहने वाले मुसलमानों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार के साथ ही इस देश में मुसलमानों के बारे में एक प्रकार का द्वेष भी बढ़ा है।  इस द्वेष का सबसे बड़ा ज़िम्मेदार अमरीकी मीडिया है जिसने इस संबन्ध में बहुत ही शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया।  ज़ायोनियों का प्रभाव रखने वाले अमरीकी संचार माध्यम एक सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत संसार में घटने वाली हर प्रकार की आतंकवादी घटना को मुसलमानों से संबन्धित बताने लगते हैं।  इस प्रकार पूरी दुनिया में इस्लामोफ़िया की लहर पैदा हुई है।

जैसाकि हम बता चुके हैं कि ग्यारह सितंबर की घटना के बाद अमरीका में रहने वाले मुसलमानों को इस देश में हर स्तर पर चुनौतियों और इस्लामोफ़ोबिया का सामना करना पड़ रहा है।  इसी बीच दाइश जैसे आतंकवादी गुट की कार्यवाहियों ने इस संबन्ध में जले पर नमक का काम किया है।  इन कार्यवाहियों के परिणाम स्वरूप अमरीका में रहने वाले मुसलमानों को पहले की तुलना में बहुत अधिक दबाव और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।  यह मुसलमान कभी अपने धर्म के कारण तो कभी अपनी जाति के कारण अमरीकी समाज में हिंसा का शिकार होते हैं।

सन 1964 में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से इस देश में नागरिक क़ानून पारित होने के बाद हर प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार पर पाबंदी लगा दी गई।  अर्थात धर्म, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव को अवैध घोषित किया गया।  इसके बावजूद अमरीकी समाज में अल्पसांख्यकों और विभिन्न जाति के लोगों के विरुद्ध की जाने वाली हिंसक कार्यवाहियां बताती है कि 1964 में पारित किये गए नागरिक क़ानून को वह सम्मान नहीं दिया जा रहा है जो उसे मिलना चाहिए था।  हालांकि अमरीकी अधिकारी यही दर्शाने के प्रयास करते हैं कि इस क़ानून को व्यवहारिक बनाया जा रहा है।  इस क़ानून के पारित होने के 50 वर्षों के बाद 2014 में अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने लिन्ड्रन बी जानसन पुस्तकालय में इस संबन्ध में एक भाषण दिया था।  इन बातों के बावजूद सबलोग यह जानते हैं कि अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के संबन्ध में इस क़ानून पर अमल नहीं किया जाता।

कुछ सर्वेक्षण यह बताते हैं कि अमरीका की आधी जनसंख्या इस क़ानून को इतिहास की एक सकारात्मक घटना के रूप में देखती है।  उसका मानना है कि समय बीतने के साथ संयुक्त राज्य अमरीका में इस क़ानून की स्थिति बेहतर हुई है।  सन 2016 में सीबीएस समाचार चैनेल द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार अमरीका के 52 प्रतिशत लोग इस बात को लेकर आशावादी हैं कि उनके देश में भेदभावपूर्ण व्यवहार नहीं है।  लेकिन उनके मुक़ाबले में 48 प्रतिशत अमरीकियों का मानना है कि अमरीकी समाज में भेदभाव सदैव जारी रहेगा यह समाप्त होने वाला नहीं है।

हालांकि अमरीका का संविधान, इस देश के नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हर प्रकार के धरने प्रदर्शन का अधिकार देता है किंतु व्यवहारिक रूप से इस देश में इसकी अवहेलना देखने को मिलती है।  एक अमरीकी संस्था "काउंसिल आफ अमेरिकन इस्लामिक रिलेशन" की रिपोर्ट के अनुसार ग्याहर सितंबर की घटना के बाद अमरीकी राज्यों में मुसलमानों के अधिकारों का अधिक हनन हुआ है।  सन 2003 की तुलना में इसमें 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।  सन 2003 में पुलिस की ओर से मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाहियों की संख्या 1019 बताई गई।  यह क्रम बाद के वर्षों में अधिक देखा गया।  सन 2012 में एफबीआई ने अपनी एक रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि अमरीकी मुसलमानों के विरुद्ध इस देश में हिंसक घटनाओं की संख्या सन 2009 में 107 से बढ़कर 2010 में 160 हो गई थीं।  यदि स्वतंत्र सूत्रों की रिपोर्टों को आधार बनाया जाए तो मुसलमानों के विरुद्ध हिंसक घटनाओं की यह संख्या उससे कही अधिक है जितनी आधिकारिक बयानों में बताई जाती है।

अमरीका के 20 राज्यों में अपराध विशेषज्ञों द्वारा किये गए अध्ययन के आधार पर 11 सितंबर की घटना के बाद मुसलमानों के विरुद्ध बढ़ती घृणा के कारण उनके ख़िलाफ़ हिंसा में 89 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।  इस बारे में रिपोर्ट नवंबर 2016 में हफ़िंग्टन पोस्ट में प्रकाशित की गई थी।  इस रिपोर्ट में मुसलमानों के विरुद्ध अपराधों में वृद्धि और इस्लामोफोबिया का कारण ग्यारह सितंबर की घटना, अफ़ग़ानिस्तान तथा इराक़ पर अमरीका का हमला, 2016 में यूरोप तथा अमरीका में आतंकी घटनाएं और इराक़ एवं सीरिया में दाइश की आतंकवादी कार्यवाहियों को बताया गया है।  इस रिपोर्ट के एक भाग में कहा गया है कि इस्लाम के बारे में जानकारी का न होना, इस्लाम विरोधी दुष्प्रचार के बावजूद मुसलमानों के साथ समन्वय न करना और आतंकवादियों की हिंसक कार्यवाहियों जैसी बातों को मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसक कार्यवाहियों की मुख्य वजह बताया गया है।  इसी संदर्भ में अमरीकी मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था, "काउंसिल आफ अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशन" ने नवंबर 2016 को एक बयान जारी करके बताया था कि सन 2015 में मुसलमानों के विरुद्ध जो हिंसक कार्यवाहियां की गई वे उस काल की है जब ट्रम्प के चुनाव प्रचार का अभियान अपने चरम पर था।

"अमेरिकन मुस्लिम सिविल राइट" ग्रुप की ओर से सन 2016 में जारी रिपोर्ट के अनुसार 2001 से 2016 के बीच अर्थात ग्यारह सितंबर की घटना से लेकर इस रिपोर्ट के प्रकाशित किये जाने तक अमरीकी पुलिस की ओर से मुसलमानों के विरुद्ध की जाने वाली हिंसक कार्यवाहियों में 12 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।  एमनेस्टी इंटरनैश्नल के अनुसार इस काल अवधि में हर 9 अमरीकी मुसलमानों में से एक विरुद्ध केस बनाया गया।  अमरीका की सरकारी संस्थाओं ने आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के नाम पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक कार्यवाहियां कीं।  काउंसिल आफ अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशन का कहना है कि अमरीका के कुछ राज्यों में मुसलमानों के खिलाफ़ 80 प्रतिशत से अधिक हिंसक कार्यवाहियां, प्रशासन की ओर से सुनियोजित कार्यक्रम के अन्तर्गत की गई जिनका उद्देश्य, इस्लाम के विरुद्ध माहौल बनाना था।  काउंसिल आफ अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशन के अनुसार अमरीका के जिन राज्यों में इस प्रकार की कार्यवाहिंया की गईं उनके नाम इस प्रकार हैं- केलिफ़ोर्निया, न्यूयार्क, एरीज़ोना, वर्जीनिया, टेक्सास, फ़्लोरिडा, ओहायो, मेरीलैण्ड, न्यूजर्सी तथा इलीनाएस।  इस परिषद ने अगस्त 2018 को बताया था कि अमरीकी हवाई अड्डों पर मुसलमानों के विरुद्ध पुलिस तथा सुरक्षाबलों की ग़ैर क़ानूनी कार्यवाहियों के ख़िलाफ उसने शिकायत दर्ज करवाई है।

इस्लाम विरोधी गुटों की ओर से इस्लाम के विरुद्ध व्यापक स्तर पर दुष्प्रचारों के साथ ही मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसक व्यवहार वास्तव में अमरीका के अति दक्षिणवादी एवं जातिवादी गुटों द्वारा अमरीकी मुसलमानों के विरुद्ध आतंकी कार्यवाहियों का कारण बना है।  इस संबन्ध में जब पुलिस से किसी ही प्रकार की शिकायत की जाती है तो उसका कोई भी परिणाम सामने नहीं आता।  इसका मुख्य कारण यह है कि इन शिकायतों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता।

मुसलमानों के विरुद्ध अमरीकी पुलिस की हिंसा और मुसलमानों के नागरिक एवं सामाजिक अधिकारों के हनन का प्रमुख कारण पुलिस को दिये जाने वाले वे विशेषाधिकार हैं जो उन्हें 11 सितंबर की घटना के बाद से प्रदान किये गए हैं।  दूसरी ओर दिन-प्रतिदिन बढ़ता इस्लामोफोबिया तथा मुसलमानों के खिलाफ घृणा को बढ़ाना भी वे कारक हैं जो हिंसा को लगातार बढ़ावा दे रहे हैं।  यह स्थिति अब इतनी ख़तरनाक हो चुकी है कि ह्यूमन राइट्स वाच" ने इसपर चिंता व्यक्त करते हुए अमरीकी समाज में मुसलमानों के विरुद्ध अधिक हिंसक कार्यवाहियों के प्रति चेतावनी जारी की है।

 

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