मनुष्य की एक सुंदर विशेषता, दूसरों के साथ भलाई है।

क़ुरआने मजीद की संस्कृति में वंचितों व अत्याचारग्रस्तों के साथ भलाई उनकी आर्थिक सहायता और मदद दूसरों की सेवा का स्पष्ट उदाहरण है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी अपने पवित्र परिजनों की तरह, भलाई और दूसरों की मदद का स्पष्ट नमूना थे। जो भी उनसे सहायता चाहता वे उसके सम्मान की रक्षा करते हुए बड़े अच्छे ढंग से उसकी सहायता करते थे। एक दिन एक व्यक्ति इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास आया और उनसे अपनी आवश्यकता बताने लगा। इमाम ने उसे रोकते हुए कहा कि हे भाई! इस प्रकार खुल कर आवश्यकता बताने से अपने सम्मान को सुरक्षित रखो और अपनी बात लिख कर मुझे दे दो। ईश्वर ने चाहा तो मैं ऐसा कुछ करूंगा जिससे तुम प्रसन्न हो जाओगे। उस व्यक्ति ने एक पत्र लिख कर उन्हें दिया। इमाम हुसैन ने, उसके द्वारा मांगी गई रक़म को दुगना करके उसे प्रदान कर दिया।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम दरिद्रों के सम्मान की रक्षा के साथ उनकी मदद का विशेष ध्यान रखते थे। उनका कहना था कि निश्चित रूप से सबसे बड़ा दानी वह है जो उस व्यक्ति की मदद करे जिसे उससे कोई आशा न हो। इतिहास में है कि आशूरा के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के शरीर पर पुराने घाव देखे गए जो किसी हथियार के नहीं थे। उनके पुत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम से उन घावों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यह घाव उन भारों के कारण हैं जो वे रात के समय अपने कंधों पर उठा कर ले जाते थे और अनाथों, ग़रीबों और बेसहारा लोगों के घरों तक पहुंचाते थे।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने काल के सबसे बड़े दानी थे और पैग़म्बर के पवित्र परिजनों के अलावा किसी से उनका मुक़ाबला नहीं नहीं किया जा सकता। इमाम हुसैन का दान-दक्षिणा, पैग़म्बर व अन्य इमामों की तरह अनुदाहरणीय था जो उनके आत्मिक उत्थान का परिचायक है। दान-दक्षिणा और दूसरों को प्रदान करते समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की एक विशेषता, दरिद्रों और बेसहारा लोगों के प्रति उनकी करुणा थी। प्रायः लोग ग़रीबों व मोहताजों की मांग से घबराते हैं और कुछ दे दिला कर उन्हें अपने आप से दूर करना चाहते हैं लेकिन इमाम हुसैन ग़रीबों से मिल कर तड़प जाते थे और उनकी आवश्यकता पूरी करते समय वे स्वयं ही लज्जा का आभास करते थे। इसी लिए अधिकांश वे दरवाज़े के पीछे से और क्षमा चाहते हुए ग़रीब की आर्थिक मदद किया करते थे ताकि उसे अपमान का आभास न हो। अगर कोई समस्या ग्रस्त व्यक्ति अपनी ज़रूरत उन्हें लिख कर देता था तो वे पत्र पढ़ने से पहले ही कहते थे कि तुम्हारी ज़रूरत पूरी हो गई है और अपने आस-पास के लोगों से कहते थे कि मेरे द्वारा पत्र पढ़े जाने के दौरान उसके प्रतीक्षा में खड़े रहने के बारे में ईश्वर मुझसे सवाल करेगा। कौन होगा जो ऐसे करुणामयी व दयावान व्यक्ति के प्रति प्रेम का आभास न करे?

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पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के निधन के बाद इस्लामी जगत में दो प्रकार की पथभ्रष्टताएं सामने आईं। पहली पथभ्रष्टता इमामत व ख़िलाफ़त के बारे में थी और दूसरी पथभ्रष्टता जो समय बीतने के साथ साथ सामने आई, इस्लामी मान्यताओं में परिवर्तन से संबंधित थी। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के काल में धार्मिक मान्यताओं से दूरी इस सीमा तक बढ़ चुकी थी कि यज़ीद जैसा व्यक्ति, जो खुल्लम खुल्ला पाप व अपराध करने में कुख्यात था, मुसलमानों का ख़लीफ़ा बन बैठा। मुआविया भी अत्याचारी व पापी था लेकिन वह यह सब खुल कर नहीं किया करता था लेकिन यज़ीद तो दिखावे के लिए भी ऐसा नहीं करता था बल्कि सबकी नज़रों के सामने पाप करने पर आग्रह किया करता था। इन परिस्थितियों में वह चाहता था कि सबसे पहले इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अपनी आज्ञापालन का वचन ले क्योंकि वह इस्लामी जगत में इमाम हुसैन के स्थान से भली भांति अवगत था।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने मदीने में यज़ीद के राज्यपाल की ओर से उसकी बैअत करने या आज्ञापालन का वचन देने के आग्रह के बाद रात के समय मदीना नगर छोड़ दिया क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि अगर वे वहां रुके रहे तो उन्हें यज़ीद की बैअत करनी होगी और अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो बिना कोई प्रभाव छोड़े मार दिए जाएंगे। इसी लिए वे मक्के की ओर रवाना हो गए। मक्के में भी जब उन्हें यह पता चला कि उनकी हत्या की साज़िश तैयार कर ली गई है तो उन्होंने हज के संस्कारों को अधूरा छोड़ा और हज को उमरे में बदल कर कूफ़े की ओर रवाना हो गए क्योंकि वे समझ चुके थे कि मक्के में रुकना मौत के समान है और इस मौत से ईश्वर के घर का अनादर भी होगा और इस्लाम के भविष्य पर भी कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा।

यहीं पर उन लोगों को अधिक ध्यान देना चाहिए जो दावा करते हैं कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने बुद्धि पर प्रेम को प्राथमिकता दी क्योंकि हम देखते हैं कि उन्होंने हर क़दम सुनियोजित ढंग से और बुद्धिमत्ता के आधार पर उठाया। इमाम और इस्लामी समाज के नेता के रूप में इमाम हुसैन ने एक क्षण के लिए भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई और अपने आंदोलन के आरंभ से लेकर कर्बला में आशूरा की घटना तक हर अवसर से लाभ उठा कर उन सभी लोगों को अपने आंदोलन में शामिल होने का निमंत्रण दिया जिनके बारे में उन्हें पता था कि ईमान व आस्था एवं नैतिकता की दृष्टि से वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और इस्लामी विचारों को मज़बूत बना सकते हैं। कभी वे स्वयं लोगों के तम्बुओं में जाते और उन्हें सीधे आमंत्रित करते और कभी ज़ुहैर जैसे लोगों के पास संदेशवाहक भेज कर उन्हें अपने तम्बू में बुलाते और उनसे बातें करते थे।

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इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की तर्कसंगत बातें कर्बला की धरती में भी जारी रहीं। उन्होंने यज़ीदी सेना के कमांडर उमर बिन साद से वार्तालाप किया और यज़ीद की सेना के समक्ष भाषण भी दिया। जब इमाम को यह आभास हो गया कि अब शहादत और युद्ध के अलावा और कोई रास्ता नहीं है उसके बाद भी उन्होंने क्षण भर के लिए भी तर्क व बुद्धि का मार्ग नहीं छोड़ा। हज़ारों की सेना के सामने लगभग सत्तर लोगों का आशूरा के दिन सुबह से लेकर दोपहर बाद तक इमाम के साथ रहना, इमाम हुसैन की युक्ति का सूचक है। सभी जानते थे कि इतने से लोग हज़ारों लोगों के सामने नहीं टिक सकते और वे सुबह ही के समय शहीद हो सकते थे लेकिन इस छोटी सी सेना को भी इमाम हुसैन ने इस प्रकार संगठित कर दिया था कि उसके प्रभाव ने इमाम व उनके साथियों की शहादत के कुछ ही समय बाद उमवी शासन की बुनियादों को अंदर तक से हिला कर धराशायी कर दिया।

 

ज़ुहैर बिन क़ैन, अपने क़बीले में एक प्रतिष्ठित व सम्मानीय व्यक्ति थे। वे एक साहसी व शूरवीर थे जो कूफ़े में अपने क़बीले में रहते थे। जिस समय इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम मक्के में थे, ज़ुहैर भी अपने परिजनों के साथ हज के लिए मक्के गए हुए थे। जब उन्होंने सुना कि इमाम हुसैन ने हज को अधूरा छोड़ दिया है और वे कूफ़े की ओर रवाना हो गए हैं तो उन्हें उनसे सामना होने को लेकर चिंता हो गई क्योंकि मुआविया के विषैले प्रचारों के चलते वे भी ग़लती से यही समझते थे कि तीसरे ख़लीफ़ा उसमान की हत्या में हज़रत अली अलैहिस्सलाम का भी हाथ था और इसी लिए वे हज़रत अली और उनकी संतान से प्रेम नहीं करते थे।

जिस स्थान पर इमाम हुसैन का कारवां रुकता, ज़ुहैर उससे दूर ही अपना तम्बू गाड़ते थे लेकिन एक स्थान पर वे भी उसी स्थान पर रुकने पर विवश हो गए जहां इमाम हुसैन का कारवां ठहरा हुआ था। ज़ुहैर व उनके साथी खाना खा रहे थे कि अचानक इमाम की ओर से एक व्यक्ति उनके पास आया और कहा कि हे ज़ुहैर! इमाम हुसैन ने तुम्हें बुलाने के लिए मुझे तुम्हारे पास भेजा है। सभी लोग चुप हो गए और वहां सन्नाटा छा गया। सभी ने खाना रोक दिया। इसी बीच ज़ुहैर की पत्नी दुलहम ने उनसे कहा! ज़ुहैर! पैग़म्बर के पुत्र तुम्हें बुला रहे हैं और तुम सोच में पड़े हुए हो? क्यों उनके पास जा कर उनकी बात नहीं सुनते?

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ज़ुहैर पत्नी की बात सुन कर हिल गए और उठ कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के तम्बू की ओर रवाना हो गए। थोड़ा ही समय बीता था कि वे बड़ी तेज़ी से और अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में खिले हुए चेहरे के साथ अपने साथियों के पास लौटे। इमाम हुसैन की बातों ने उन पर ऐसा प्रभाव डाला था कि वे अपना सब कुछ त्यागने के लिए तैयार हो गए थे। उन्होंने आदेश दिया कि उनका तम्बू उखाड़ कर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कारवां के तम्बुओं के साथ गाड़ दिया जाए। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी से कहा कि मैं तुम्हें तलाक़ देता हूं ताकि तुम पूरी स्वतंत्रता के साथ जहां चाहो चली जाओ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि तुम मेरे कारण मुसीबत में पड़ो। इसके बाद उन्होंने कहा कि जो चाहे मेरे साथ आए, यह मेरी और तुम्हारी आख़री मुलाक़ात है। यह कह कर वे इमाम हुसैन के पास चले गए।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कूफ़े के मार्ग में यज़ीद के अत्याचारों के बारे में बात कर रहे थे तो ज़ुहैर अपनी जगह से खड़े हुए और ईश्वर के गुणगान के बार इमाम को संबोधित करके कहने लगेः हे पैग़म्बर के पुत्र! हमने आपकी बातें सुनीं, ईश्वर की सौगंध अगर हमारे लिए दुनिया बाक़ी बची होती और हमें उसमें रहना होता और संसार छोड़ने का मतलब आपकी मदद होता तो निश्चित रूप से हम आपके साथ रहने का ही चयन करते। आशूरा से पहले वाली रात भी जब इमाम हुसैन ने अपने साथियों से कहा कि तुम लोग चले जाओ कि ये लोग केवल मुझसे लड़ना चाहते हैं तो ज़ुहैर ने अपने स्थान से खड़े हो कर कहा थाः ईश्वर की सौगंध! मैं चाहता हूं कि मेरी हत्या कर दी जाए, फिर मुझे जीवित किया जाए और ऐसा हज़ार बार किया जाए यहां तक कि आप और आपके परिजनों से ख़तरा दूर हो जाए।

यज़ीद की सेना से युद्ध में भी ज़ुहैर ने अद्वितीय रणकौशल और अदम्य साहस का प्रदर्शन किया। वे शत्रु पर हमला करते जाते थे और कहते जाते थे कि मैं क़ैन का बेटा ज़ुहैर हूं और अपनी तलवार से तुम्हें हुसैन से दूर कर दूंगा। हुसैन, पैग़म्बर के दो नातियों में से एक हैं, उस परिवार से हैं जिसका श्रृंगार भलाई और ईश्वर से भय है। इस समय वे पैग़म्बर के पवित्र वंश से ईश्वर के संदेश वाहक हैं, मैं तुम्हारी हत्या करूंगा और इसमें कोई बुराई नहीं है। इसके बाद ज़ुहैर, इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास वापस आए और कहा कि मैं आप पर क़ुरबान कि आपके कारण मुझे मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। आज मैं आपके नाना से मुलाक़ात करूंगा उसी प्रकार जैसे आपके भाई और पिता ने उनसे मुलाक़ात की। यह कह कर वे रणक्षेत्र को लौट गए और शत्रु की सेना पर बढ़ बढ़ कर हमले करते रहे, यहां तक कि शत्रुओं ने उन्हें घेर लिया और शहीद कर दिया।

 

 

Oct ०९, २०१६ १६:५८ Asia/Kolkata
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