यद्यपि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम अपने और अपने परिजनों के अंजाम से अवगत थे परंतु वह ईश्वर के धर्म की रक्षा को अपनी जान से ज़्यादा महत्वपूर्ण समझते थे।

अमवी शासकों की सरकार में भ्रष्टाचार इस सीमा तक पहुंच गया था कि अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन न होता तो इस्लाम धर्म उन बिदअतों व भ्रष्टाचारों के मलबे में दबकर समाप्त हो जाता जो पहले के अमवी शासकों के क्रिया- कलापों के कारण अस्तित्व में आये थे और धर्म का कोई चिन्ह बाक़ी न बचता। बिदअत, धर्म में अलग से शामिल की गयी थी जो को कहते हैं जो धर्म का हिस्सा लगने लगें। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को अपनी शहादत की जानकारी थी इसके बावजूद उन्होंने ईश्वरीय धर्म की रक्षा के लिए आंदोलन किया।

मानव इतिहास में बहुत युद्ध हुए हैं। उनमें वे आंदोलन भी कम नहीं हैं जो सत्य और न्याय की रक्षा के लिए हुए हैं। बहुत से लोगों ने न्याय की स्थापना और ईश्वरीय उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपनी और निकटवर्ती लोगों की कुर्बानी पेश कर दी। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जो लोग सत्य के मार्ग में आंदोलन व प्रतिरोध करते हैं उसका पारितोषिक महान ईश्वर देगा परंतु उनमें से कुछ का नाम तक इतिहास में नहीं है जबकि कुछ का केवल नाम ही इतिहास में बाक़ी बचा है। समस्त सत्य व न्याय प्रेमी आंदोलनों के मध्य केवल इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का आंदोलन है जिसकी याद चौदह सौ साल बीत जाने के बावजूद प्रतिवर्ष करोड़ों लोग मनाते हैं। यह वह आंदोलन है जिसके नारे व मूल्य बहुत बड़े परिवर्तनों के स्रोत रहे हैं। महान धार्मिक हस्तियां इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की निष्ठा को इस आंदोलन के बाकी रहने का रहस्य बताती हैं। क्योंकि महान ईश्वर के निकट केवल उसी कार्य का महत्व प्राप्त है जिसे उसकी प्रसन्नता के लिए अंजाम दिया जाये।

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पवित्र कुरआन में समस्त धार्मिक दायित्वों को एक प्रकार से ईश्वरीय निष्ठा से सशर्त किया गया है। जैसाकि महान ईश्वर जेहाद के बारे में फरमाता है जो लोग ईश्वर के मार्ग में मारे गये हैं। इसी प्रकार वह दान के बारे में फरमाता है जो लोग अपने माल को ईश्वर की राह में ख़र्च करते हैं। इसी प्रकार कुरआन पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के बारे में कहता है अपने भोजन को वे असहाय, अनाथ और बंदी को दे देते हैं जबकि उसकी उन्हें ज़रूरत होती है और वे कहते हैं हम तुम्हें केवल ईश्वर के लिए दे रहे हैं और इसका बदला तथा शुक्रिया भी तुमसे नहीं चाहिये।

 

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की एक स्पष्ट विशेषता इस प्रकार थी कि उन्होंने जो कुछ अंजाम दिया वह पूरी निष्ठा के साथ महान ईश्वर के लिए अंजाम दिया।  

पवित्र कुरआन कहता है उन लोगों की तरह न हो जाओ जो लोगों के मुकाबले में घमंड से अपने घरों से निकल गये। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भी अपने आंदोलन के बारे में इस प्रकार कहते हैः बेशक मैं घमंड, आत्म मुग्धता और अत्याचार करने के लिए घर से बाहर नहीं निकला हूं बल्कि मैने केवल अपने नाना की क़ौम की भलाई के लिए आंदोलन किया है।

इस आंदोलन में केवल निष्ठावान साथियों ने ही इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता की परंतु जो लोग महान ईश्वर की प्रसन्नता के अलावा किसी और चीज़ की लालच में थे यहां तक कि उनकी निष्ठा में थोड़ी सी भी कमी थी वे लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के कारवां से नहीं मिले या रास्ते में कारवां से अलग हो गये किन्तु इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथी महान ईश्वर की प्रसन्नता के अतिरिक्त किसी अन्य चीज़ से राज़ी नहीं थे और यह आशूर के सदैव बाक़ी रहने का रहस्य है। लगभग 14 सौ साल का समय बीत जाने के बावजूद आशूर के आंदोलन को न केवल यह कि भुलाया नहीं जा सका बल्कि यह आंदोलन दिन- प्रतिदिन विस्तृत होता जा रहा है और उसका रहस्य केवल निष्ठा है क्योंकि ब्रह्मांड की व्यवस्था में वह चीज़ नहीं भुलाई जाती जिसका आधार निष्ठा हो।

                         

जो व्यक्ति भी रणक्षेत्र में जाता है और दुश्मन का मुकाबला करता है उसकी इच्छा अपनी जीत और दुश्मन की पराजय होती है। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को भी इस चीज़ से अपवाद नहीं किया जा सकता परंतु जो परिस्थिति थी उसके दृष्टिगत क्या कहा जा सकता है कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम युद्ध में विजयी हो सकते थे? अगर नहीं हो सकते थे तो क्यों रणक्षेत्र में गये? इन प्रश्नों के उत्तर में इस प्रकार कहा जा सकता है कि इस्लाम में जीत का अर्थ ईश्वरीय दायित्वों व ज़िम्मेदारियों का निर्वाह है। कभी -कभी परिस्थिति इस प्रकार की होती है कि इंसान अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए हर कार्य करने के लिए मजबूर होता है चाहे उसे यह पता भी हो कि इस कार्य में उसकी मृत्यु हो जायेगी। इस्लामी रणबांकुर भी इस्लाम के आरंभ में ईश्वरीय आदेशों पर अमल करने और इस्लाम की रक्षा के लिए बद्र, ख़ैबर और खन्दक जैसे युद्धों में जाते और एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते और जानते थे कि रणक्षेत्र में वे शहीद  हो जायेंगे किन्तु चूंकि वह जानते थे कि धर्म की रक्षा के लिए इसके अतिरिक्त उनके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है इसलिए वह रणक्षेत्र में जाते थे।

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 बहुत सी रवायतों में आया है कि अगर किसी की जान ख़तरे में पड़ जाये तो उसे चाहिये कि अपने माल को ढ़ाल बनाये और अपनी जान की सुरक्षा करे परंतु अगर इस्लाम ख़तरे में हो तो उसे चाहिये कि अपनी जान को ढ़ाल बनाकर इस्लाम की रक्षा करे। अतः धर्म की रक्षा के लिए हर प्रकार की कुर्बानी व त्याग वैध है और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने भी यही किया।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम भली -भांति जानते थे कि कर्बला जाने से उनका, उनके परिजनों और उनके वफादार साथियों का क्या होगा परंतु धर्म की रक्षा को महत्वपूर्ण समझते थे। मोआविया और उसके बाद उसके बेटे यज़ीद की विदित इस्लामी सरकार में भ्रष्टाचार और बुराई इस सीमा तक पहुंच गयी थी कि अगर इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों का आंदोलन न होता तो इस्लाम और कुरआन और हर वह चीज़ जिसे पूरे इतिहास में दूसरे पैग़म्बर लाये थे सब भ्रष्टाचार और गुमराही के मलबे में दब जाता और धर्म का कोई चिन्ह ही बाक़ी न बचता। जैसाकि पहले के धर्म इसी प्रकार की बुराई व भ्रष्टाचार के मलबे के नीचे दफ्न हो गये और उनकी विशुद्ध शिक्षाएं बाक़ी न रहीं। अतः इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने ईश्वरीय धर्म की रक्षा के लिए अपनी, अपने परिजनों और अपने वफादार साथियों की जानों को कुर्बान कर दिया और इस प्रकार यह आंदोलन इतिहास में अमर हो गया और समस्त सत्य व न्याय प्रेमियों के लिए आदर्श बन गया।

                          

जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला पहुंचे तो उन्होंने अपने नाना और पिता के एक निकट वर्ती साथी हबीब बिन मज़ाहिर को पत्र लिखा। उस पत्र में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने स्पष्ट किया था कि हे हबीब! तुम पैग़म्बरे इस्लाम से मेरी निकटता को दूसरों से बेहतर और अधिक जानते हो, तुम मुझे पहचानते हो। दूसरी ओर तुम मामले को समझते हो और तुम स्वाभिमानी हो। तो तुम मेरी सहायता करने में संकोच न करो। मेरे नाना पैग़म्बरे इस्लाम प्रलय के दिन तुम्हारा सम्मान करेंगे।

जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का पत्र हबीब बिन मज़ाहिर के पास पहुंचा तो उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद के सुरक्षाकर्मियों के भय से उन्होंने बीमार का भेस बना लिया और अपने क़बीला के लोगों के मध्य इस प्रकार दिखाया कि अब वह बूढ़े हो गये हैं। हबीब इस प्रकार की बात करते थे ताकि उनके अंदर का निर्णय स्पष्ट न हो सके और वह उबैदुल्लाह के ख़तरे से सुरक्षित रहें। अंततः हबीब बिन मज़ाहिर रात को कूफे से निकले और अपने दास के साथ कर्बला गये।  

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हबीब बिन मज़ाहिर ने कर्बला पहुंच कर अपने व्यवहार से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्रति अपनी वफादारी की घोषणा की। जैसे ही हबीब बिन मज़ाहिर ने देखा कि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के साथी बहुत कम हैं और दुश्मनों की संख्या बहुत अधिक है तो उन्होंने इमाम से कहा, यहीं पास में बनी असद कबीले के लोग रहते हैं। अगर आप अनुमति दें तो मैं उनके पास जाऊं और उनसे आपकी सहायता के लिए कहूं। शायद ईश्वर उनका मार्गदर्शन कर दे। जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अनुमति दे दी तो हबीब बिन मज़ाहिर जल्दी से बनी असद कबीले के पास पहुंचे और उन्हें नसीहत की और कहा मैं तुम्हारे लिए अच्छा उपहार लाया हूं बेहतरीन चीज़ जो एक क़ौम का मार्गदर्शक उसके लिए लाता है। अमीरूल मोमिनीन और फातेमा के बेटे हुसैन हैं जो तुम्हारे पास ही हैं और उनके साथ कुछ मोमेनीन हैं जबकि उनके दुश्मनों ने उन्हें घेर लिया है ताकि उन्हें क़त्ल कर दें। मैं आया हूं ताकि उनकी और पैगम्बरे इस्लाम की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए तुम्हें आमंत्रित करूं। ईश्वर की सौगन्ध! अगर उनकी मदद करोगे तो ईश्वर लोक -परलोक की प्रतिष्ठा तुम्हें देगा। उनमें से अब्दुल्लाह बिन बशीर नाम का एक व्यक्ति खड़ा हुआ और कहा हे हबीब, ईश्वर तुम्हारे प्रयास का फल दे हमारे लिए गौरव की बात है कि हर इंसान अपने एक निकट प्रियजन को दे। मैं तुम्हारे निमंत्रण को स्वीकार करने वाला पहला व्यक्ति हूं। इस प्रकार दूसरे भी खड़े हुए और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता के लिए अपनी तत्परता की घोषणा की। जिन लोगों ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता के लिए अपनी तत्परता की घोषणा की उनकी संख्या 70 या 90 तक पहुंच गयी। उन लोगों ने कर्बला जाने का फैसला किया परंतु उमरे साद का एक संबंधी उन्हीं के मध्य जासूस था और उसने सारी रिपोर्ट उसे दे दी। उमरे साद ने अज़रक़ जैसे निष्ठुर व निर्दयी व्यक्ति को 500 घुड़ सवारों के साथ उनकी ओर भेजा। ये सवार उसी रात बनी असद कबीले के पास पहुंच गये और उन सब को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के पास जाने से रोक दिया। यद्यपि उस समय बनी असद के लोग इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की सहायता के लिए न जा सके परंतु आशूर की घटना  समाप्त हो जाने और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के परिजनों के बंदी बनाये जाने के बाद कर्बला गये और शहीदों के पावन शरीरों को दफ़्न किया।

जब हबीब बिन मज़ाहिर दुश्मन के मुकाबले में आये तो उन्होंने बड़े ही साहस के साथ अपना परिचय कराया और उसके बाद दुश्मन से युद्ध किया। हबीब बिन मज़ाहिर और यज़ीद की राक्षसी सेना के मध्य कड़ा युद्ध हुआ। अचानक बनी तमीम कबीले के एक व्यक्ति ने उन पर हमला किया और उनके सिर पर तलवार मारी। उसी समय दूसरे व्यक्ति ने उन पर भाला मारा और उन्हें ज़मीन पर गिरा दिया। हबीब ने उठना चाहा कि हसीन बिन तमीम नामक दुष्ट व्यक्ति ने उनके सिर को उनके शरीर से अलग कर दिया और वह शहीद हो गये। हबीब बिन मज़ाहिर की शहादत से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम बहुत दुःखी हुए। जैसाकि इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम जब बिना सिर के हबीब बिन मज़ाहिर के शव के पास पहुंचे तो कहा मुझे ईश्वर से अपने और अपने वफादार साथियों के पारितोषिक की आशा है।

                         

 

Oct १०, २०१६ १३:१३ Asia/Kolkata
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