चौथे इमाम का नाम अली और उपनाम अबुल हसन था।

अधिक इबादतों और लम्बे लम्बे सजदों की वजह से उन्हें ज़ैनुल आबेदीन और सैय्यदे सज्जाद कहा जाता था, जिसका अर्थ है इबादत करने वालों की ज़ीनत और अधिक सजदा करने वालों के सरदार। हज़रत की शहादत के बाद जब उनके बेटे हज़रत इमाम बाक़िर (अ) अपने पिता के पवित्र शरीर को ग़ुस्ल दे रहे थे, तो वहां मौजूद लोगों ने देखा कि हज़रत के माथे और सज़दे में ज़मीन पर टिकने वाले अन्य अंगो के अलावा उनकी गर्दन और कांधों पर भी घट्टे पड़े हुए हैं। लोगों ने इमाम बाक़िर (अ) से इसका कारण पूछा तो उन्होंने जवाब दिया। रात होते ही मेरे पिता एक गठरी खाना और रोटियां बांधते थे और हज़रत अली (अ) की तरह उसे कमर पर लादकर ग़रीबों तक पहुंचाते थे, इस तरह से कि कोई उन्हें न पहचान सके।

ऐसे समय में कि जब रोटी और अज्ञानता ने लोगों को उलझा रखा था और इस्लाम की शिक्षाओं में बदलाव किया जा रहा था, पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजनों में से एक व्यक्ति उठा और उसने दुआ के सुन्दर शब्दों में इस्लाम की अद्वितीय शिक्षाओं एवं नैतिक सिद्धांतों को दुनिया के सामने पेश किया। ऐसा समय कि जब कर्बला में अमानवीय अपराधों के बाद बनी उमय्या ने समाज के वातावरण को संदेहपूर्ण एवं ज़हरीले प्रचारों से दूषित कर रखा था, इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने उच्च मानवीय व्यवहार एवं अर्थपूर्ण दुआओं द्वारा अपनी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी को अदा किया। ऐसे ज़हरीले वातावरण में अनैतिकता एवं भ्रष्टाचार अपने चरम पर थे, इसीलिए इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने लोगों का नैतिक प्रशिक्षण किया और उन्हें शुद्ध धार्मिक सिद्धांतों की शिक्षा दी।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) कर्बला के संघर्ष में शहीद नहीं हुए। इसलिए कि वे उस समय बीमार थे। कर्बला में बीमारी के कारण वे अत्यधिक कमज़ोर हो चुके थे, यहां तक कि दुश्मनों को लग रहा था कि आपकी प्राकृतिक मौत निकट है और आपको शहीद करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हालांकि इमाम की यह स्थिति ईश्वरीय योजना के अनुसार थी, ताकि धरती ईश्वरीय दूत से ख़ाली न रहे और दुनिया ईश्वरीय दूत के प्रकाश से प्रकाशमय रहे।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) पर उमवी शासन की कड़ी नज़र थी और उनसे मिलने जुलने वालों की कड़ी निगरानी की जाती थी। ऐसे घुटन भरे माहौल में इमाम ज़ैनुल आबेदीन आसानी से लोगों से संपर्क नहीं कर सकते थे और उपदेश नहीं दे सकते थे। इसलिए उन्होंने लोगों तक अपने धार्मिक, राजनीतिक एवं सामाजिक दृष्टिकोणों को पहुंचाने के लिए दुआ का सहारा लिया। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ने दुआ के रूप में महान रहस्यवादी, नैतिक, राजनीतिक और सामाजिक विषयों को बयान किया है।

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इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) की दुआओं के संग्रह का नाम सहीफ़ए सज्जादिया है, उसमें मकारेमुल अख़लाक़ नामक दुआ है। इस दुआ में इमाम ईश्वर से नैतिक गुणों से सुसज्जित होने और अनैतिकता से दूरी की दुआ करते हैं। अद्वितीय विषय वस्तु की दृष्टि से यह दुआ बहुत सुन्दर है। इमाम इस दुआ में मानवीय सद्गुणों और नैतिकता की सुन्दर सूचि का उल्लेख करते हैं। इस दुआ में महत्वपूर्ण शिक्षाएं हैं और इंसान इसमें बयान किए गए विषयों के बारे में जितना गहराई से सोचता है, उसे उतना ही ज्ञान प्राप्त होता है और जितना उसके सिद्धांतों पर अमल करता है, उतना ही उसे ईश्वरीय कल्याण प्राप्त होता है।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) इस दुआ में ईश्वर को संबोधित करते हुए कहते हैं, हे ईश्वर, मोहम्मद और उनके परिजनों पर सलाम हो, मुझे भले लोगों के आभूषण से सजा दे और मुझे भले लोगों की वेशभूषा प्रदान कर, न्याय को फैलाने में, ग़ुस्से को पीने में, दुश्मनी की आग को बुझाने में, टूटे हुए दिलों को जोड़ने में, लोगों के कामों में मदद करने में, अच्छाई को आम करने में, बुराई को ढांपने में, विनम्रता, अच्छा व्यवहार, सदाचार और समझदारी में, सदगुणों की प्राप्ति में आगे रहने में, भलाई की शैली अपनाने में, दूसरों को भला बुरा न कहने में, जो दान का पात्र नहीं है उसे दान न करने में, सच बात कहने में, हालांकि वह कठिन हो, अपने भले कार्यों को थोड़ा समझने में, यद्यपि वह अधिक हों, अपनी बुरी बातों को अधिक समझने में, यद्यपि वह कम हों। हे मेरे पालनहार, इन गुणों को मुझमें उत्कृष्टता तक पहुंचा, निरंतर पालन द्वारा और मोमिनों के समूह के साथ और बुराई की नींव रखने वालों और मनगढ़त विचारों के अनुसरणकर्ताओं से दूर रखकर।

कर्बला की भयानक त्रासदी के बाद, जिन लोगों ने इमाम हुसैन को अकेला छोड़ दिया था और दुनिया के मोह में आ गए थे, उन्होंने ख़ुद को ईश्वर की रहमत से दूर पाया, उनका विवेक उन्हें कोस रहा था और उसने उन्हें ईश्वर की कृपा से निराश कर दिया था। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ने अपनी एक दुआ में इस बात पर बल दिया कि ईश्वर तौबा को स्वीकार करता है। इस प्रकार से इमाम, ईश्वर की कृपा से निराश होने वालों को शुभ सूचना दे रहे थे और उन्हें ईश्वर की रहमत की ओर आमंत्रित कर रहे थे। इस दुआ में इमाम फ़रमाते हैं, हे ईश्वर, जिस जगह मैं खड़ा हुआ हूं, वह उन लोगों का स्थान है जो गुनाहगार हाथों में खिलौना बन गए हैं और उनके अधिकार की लगाम लरज़ने वाले एवं ग़लत हाथों में चली गई है। शैतान ने उन पर हमला किया है और जीत हासिल कर ली है। इसलिए जिस चीज़ का तूने आदेश दिया है, उसने उसे अंजाम नहीं दिया है और जिस चीज़ से भी तूने उसे रोका है, उसने उसे अंजाम दिया है। हे ईश्वर मोहम्मद और उनके परिजनों पर सलाम भेज। और जिस प्रकार से मैंने तेरे सामने अपने गुनाहों की स्वीकारोक्ति की है, तू भी मेरी तौबा स्वीकार कर ले।

सहीफ़ए सज्जादिया की एक अन्य महत्वपूर्ण दुआ 15वीं दुआ है। इन दुआओं में विशेष प्रेरणा एवं प्रोत्साहन है। इस दुआ की विशेषता यह है कि हर इंसान अपनी मानसिक एवं आत्मिक विशेषताओं और समस्त इंसान अपनी विभिन्न मानसिक एवं आत्मिक परिस्थितियों के बावजूद, अपनी दुआ को इसमें प्राप्त कर सकते हैं और ईश्वर के सामने अपने दिल की बात रख सकते हैं। 15वीं दुआ में, तौबा करने वालों की दुआ, आभार व्यक्त करने वालों की दुआ, भयभीत लोगों की दुआ, वापस होने वालों की दुआ और आकर्षित होने वालों की दुआएं इत्यादि हैं।

इंसान अपने परिस्थितियों के मद्दनेज़र इन दुआओं में से किसी का चयन करके अपने ईश्वर से अपने दिल का हाल बयान कर सकता है। उदाहरण स्वरूप, जब किसी व्यक्ति में अपने पालनहार का आभार व्यक्त करने की इच्छा उत्पन्न होती है तो वह आभार व्यक्त करने वालों की दुआ का चयन कर सकता है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) इस दुआ में फ़रमाते हैं, हे ईश्वर तेरी निरंतर कृपा ने मुझे तेरा आभार व्यक्त करना ही भुला दिया और तेरी असीम रहमत ने मुझे तेरी अच्छाइयां गिनने में असमर्थ कर दिया, लगातार तेरी नेमतों ने तेरा गुणगान करने और उनका प्रसार करने से रोक दिया। यह स्थान उस व्यक्ति का है जो हमेशा तेरी नेमतों और कृपा की स्वीकारोक्ति करता है और दूसरी ओर अपनी कमियों को स्वीकार करता है और अपनी ज़बान से तेरी बंदगी में लापरवाही करने और तेरी नेमतों को बर्बाद करने की गवाही देता है, जबकि तू दिलों का सहारा और कृपा करने वाला है।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) के सहीफ़ए सज्जादिया के बाग़ में क़दम रखने, दुआओं की मनमोहक ख़ुशबू का आनंद लेने और शुद्ध पानी के सोतों और विनम्रतापूर्ण शब्दों से दिलों को शुद्ध करने से इंसान की निगाहों के सामने से अँधेरे छट जाते हैं और उसके सामने उत्कृष्टता के द्वार खुल जाते हैं।

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आज के आधुनिक काल में कि जिसे तेज़ी व प्रगति का ज़माना कहते हैं, इंसान को ईश्वर से बात करने और अपने दिल की बात कहने का समय नहीं है। आज का इंसान टैक्नॉलोजी में घिरकर बहुत अकेला हो गया है। अब उसके पास दूसरे लोगों के साथ समय बिताने का समय नहीं है। लोगों में सच्ची मोहब्बत कम होने और पारिवारिक एवं दोस्ताना रिश्तों के फीका पड़ने से मानसिक समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। अब न केवल धर्म में आस्था रखने वालों का बल्कि नए ज़माने के मनोवैज्ञानिकों का भी मानना है कि ईश्वर से संपर्क स्थापित करने और उससे अपने दिल की बात कहने से अनेक मानसिक रोगों का उपचार हो जाता है और इंसान में उत्साह भरता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आज के इंसान की खो जाने वाली चीज़ अल्लाह अर्थात वही एक पालनहार है, उसकी ओर लौटने से और उसके सामने अपने दिल का हाल बयान करने से दिलों को शांति प्राप्त होती है।

ईरान के प्रसिद्ध विद्वान हुज्जतुल इस्लाम क़राअती इस संदर्भ में कहते हैं, जब प्रोफ़ेसर हेनरी कोरबिन फ़्रांस से ईरान आते थे, अल्लामा तबातबाई से बातचीत और वाद-विवाद करते थे। एक दिन अल्लामा ने उनसे कहा, हम शिया मुसलमानों के पास दुआए हैं। जब हमें कोई कठिनाई पेश आती है और हमारे ऊपर उसका दबाव होता है तो ईश्वर से कुछ कह सुन लेते हैं, रोते हैं और शांति प्राप्त कर लेते हैं। आप तो प्रोफ़ेसर हैं, जब ऐसी कोई समस्या पेश आती है तो फ़्रांस में क्या करते हैं? कोरबिन ने जवाब दिया, मैं भी रोता हूं। मेरे पास भी सहीफ़ए सज्जादिया है, जब भी मैं परेशान होता हूं अनुवाद के साथ उसे पढ़ता हूं, मैं भी रोता हूं। दुआ से शांति प्राप्त होती है।            

                             

 

Oct १५, २०१६ १६:१५ Asia/Kolkata
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