जो चीज़ क्षेत्र और विश्व के लोगों के मध्य ईरान की इस्लामी क्रांति के मूल्यों के लोकप्रिय होने का कारण बनी है वह इन मूल्यों का इंसान की प्रवृत्ति के अनुरुप और उच्च होना है और इनका स्रोत ईश्वरीय धर्म इस्लाम है।

विश्व शक्तियां और उनसे संबंधित सरकारें चाहें या न चाहें ईरान की इस्लामी क्रांति अत्याचार ग्रस्त राष्ट्रों को जागरुक बनाने का अपना अभियान यथावत जारी रखेगी।

एसी कम घटनायें देखने को मिलती हैं जिनका देश के भीतर और बाहर विश्व स्तर पर प्रभाव होता है। क्रांतियां जिस सीमा तक अपने उद्देश्यों को व्यवहारिक बनाने और परिवर्तन उत्पन्न करने में सफल होती हैं उसी सीमा तक वे देश की आंतरिक स्थिति और क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संबंधों में प्रभावी होती हैं। जैसे वर्ष 1789 में फ्रांस की जनक्रांति और वर्ष 1917 में रूस में आने वाली क्रांतियों को बड़ी क्रांति समझा जाता है। अगर ईरान की इस्लामी क्रांति को बड़ी क्रांति न माने तब भी यह देश के भीतर, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी क्रांतियों में से है। इस क्रांति के प्रभाव को इसके सफल होने के 38 वर्षों बाद देश के भीतर और बाहर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

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ईरान की इस्लामी क्रांति से देश के भीतर बहुत प्रभाव पड़े हैं। उसने शाह की तानाशाही व अत्याचारी सरकार का अंत कर दिया और जनता को आज़ादी प्रदान की। इस आज़ादी को भाषणों, समाचार पत्रों और विभिन्न चुनावों आदि में देखा जा सकता है। अब ईरान के लोग पूरी स्वतंत्रता के साथ वरिष्ठ नेता, वरिष्ठ अधिकारियों, सांसदों और राष्ट्रपति का चयन करके देश के संचालन के मामलों में भाग ले सकते हैं।

ईरान की इस्लामी क्रांति का एक उपहार स्वाधीनता थी। ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी दूसरों के दिशा- निर्देश पर चलने वाली शाह की पिट्ठू सरकार से संघर्ष के आरंभ से बल देकर कहते थे कि इस जनविरोधी सरकार को गिराना केवल लक्ष्य नहीं है बल्कि उसके समर्थकों विशेषकर अमेरिका को भी ईरान से जाना चाहिये। इस प्रकार शाह की अत्याचारी सरकार का अंत हो जाने बाद अमेरिका, ब्रिटेन,जायोनी शासन और समस्त देश, जो ईरानी संपत्ति के स्रोतों की लूट- खसोट में व्यस्त थे, ईरान से जाने पर बाध्य हो गये और इसी कारण वे उस समय से लेकर अब तक ईरान के विरुद्ध षडयंत्र करते रहते हैं।

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ईरान और विश्व के लोगों के लिए इस्लामी क्रांति का एक बहुत बड़ा उपहार धार्मिक शिक्षाओं के आधार पर एक व्यवस्था का गठन था। स्वर्गीय इमाम खुमैनी बल देकर कहते थे कि इस्लाम में केवल उपासना और नैतिक शिक्षाएं नहीं हैं बल्कि इस्लाम की महत्वपूर्ण शिक्षाओं का भाग सामाजिक संबंधों और सरकार के संचालन के संबंध में है। इस संबंध में वे कहते हैं” दुआ और ज़ियारत इस्लाम का एक भाग है परंतु इस्लाम के पास राजनीति है, इस्लाम सरकार का संचालन करता है और इस्लाम आध्यात्मिक धर्म होने से पहले राजनीति का धर्म है।“

इस प्रकार ईरानी लोगों की राय और धर्म एवं अध्यात्म की बुनियाद पर इस्लामी व्यवस्था का आधार रखा गया और वह पश्चिम की उस लिबरल व्यवस्था के मुकाबले में आ गयी जिसका आधार पूंजीवाद है। इसी प्रकार ईरान की इस्लामी व्यवस्था पश्चिम की लिबरल व्यवस्था के लिए गम्भीर चुनौती बन गयी क्योंकि पश्चिम की लिबरल व्यवस्था अपनी डेमोक्रेसी व्यवस्था को सरकार चलाने की बेहतरीन व्यवस्था मानती है।

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यद्यपि इस्लामी क्रांति का सबसे अधिक फायदा क्रांति लाने वाले ईरानी लोगों के लिए था परंतु उसने दूसरे देशों के लोगों को भी प्रभावित किया। लोगों की जागरुकता हर क्रांति व आंदोलन की भूमिका है। इसी कारण स्वर्गीय इमाम खुमैनी ने अपने साथियों की सहायता से विदेशियों के दिशा- निर्देश पर चलने वाली शाह की दमनकारी सरकार की वास्तविकता और उसके समर्थकों से जनता को पहचनवाने के लिए वर्षों प्रयास किया। इस जागरुकता का बहुत जल्द लोगों विशेषकर इस्लामी जगत पर प्रभाव पड़ा और उसने राष्ट्रों को तानाशाही व भ्रष्ट शासकों और उनके विदेशी समर्थकों से अवगत करा दिया। इसी कारण अत्याचार, अन्याय और साम्राज्य से मुकाबले पर आधारित नारों का जनता ने स्वागत किया। अत्याचार से संघर्ष और आज़ादी के लिए किये जाने वाले प्रयासों से ईरान की इस्लामी क्रांति का दूसरे दावेदारों से अंतर यह था कि इस क्रांति में किये जाने वाले संघर्ष व प्रयासों का स्रोत इस्लाम था और उसका आधार पूरी तरह जनता थी। ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के काल में कुछ लोगों का मानना था कि यह केवल पश्चिम की पूंजीवादी व्यवस्था से मुकाबला है जबकि कुछ अन्य इसे पूर्व सोवियत संघ का विरोध मानते थे किन्तु ईरान की इस्लामी क्रांति ने हर साम्राज्यवादी, वर्चस्ववादी और ज़ोर ज़बरदस्ती करने वाली शक्ति से मुकाबले को अपना लक्ष्य बनाया और इस समय विश्व में इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण अमेरिका है।

विश्व की दूसरी क्रांतियों से ईरान की इस्लामी क्रांति की एक विभिन्नता व विशेषता आध्यात्म की ओर रुझान है। ईरानी जनता का प्रतिरोध व आंदोलन ईश्वर के लिए था और वह इस्लाम की उच्च एवं मानवता का निर्माण करने वाली शिक्षाओं के आधार पर अस्तित्व में आया। इस आंदोलन के नेता स्वर्गीय इमाम खुमैनी सदगुणों से सुसज्जित एक धार्मिक नेता थे और वह ईश्वरीय आदेशों के पालन को क्रांति की सफलता और लोक- परलोक के कल्याण का कारण मानते थे।

ईरान की इस्लामी क्रांति में आध्यात्म की ओर रुझान की बात उस समय की जा रही थी जब चारों ओर भौतिकवाद और धर्म से दूरी का प्रचार किया जाता था और यह विषय राष्ट्रों के लिए रोचक व ध्यानयोग्य था। इसी कारण इस क्रांति के समर्थक केवल मुसलमान नहीं हैं बल्कि बहुत से ग़ैर मुसलमान भी इसके समर्थक हैं। ये वे लोग हैं जो धर्म को समाप्त करने और भौतिकवाद पर ध्यान दिये जाने पर आधारित पश्चिम के प्रयास से अप्रसन्न हैं और वे महान ईश्वर जैसे संतुष्ट व विश्वस्त भरोसे की खोज में हैं ताकि वे उसकी शरण में आध्यात्मिक शांति प्राप्त कर सकें। इस आधार पर ईरान की इस्लामी क्रांति इस दृष्टि से भी मुसलमानों और ग़ैर मुसलमानों के मध्य प्रभावी रही है कि वह धर्म और अध्यात्म का निमंत्रण देने वाली है।

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वर्ष 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के समय से इस क्रांति का प्रभाव दूसरे राष्ट्रों पर आरंभ हुआ जो दिन -प्रतिदिन विस्तृत होता गया। अध्यात्म की ओर रुझान अत्याचार व अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, न्यायप्रेम, आज़ादी और इस्लाम के आधार पर सरकार ईरान की इस्लामी क्रांति की वे आकांक्षाएं हैं जिन पर विश्व के बहुत से लोगों ने ध्यान दिया। इस प्रकार से कि मुक्ति दिलाने वाले बहुत से आंदोलनों ने साम्राज्यवाद से मुकाबले में ईरान की इस्लामी क्रांति के नारों को अपनाया। गत 38 वर्षों के दौरान पश्चिमी सरकारों और संचार माध्यमों ने ईरान पर राजनीतिक और सैन्य शैली के माध्यम से अपनी क्रांति के निर्यात करने का आरोप लगाने का बहुत प्रयास किया जबकि ईरान की इस्लामी क्रांति एक विचारधारा है और विचार को शक्ति के बल पर दूसरों पर नहीं थोपा जा सकता।

इस्लामी जगत विशेषकर पश्चिम एशिया के देशों पर दृष्टि डालने से हम यह समझ जाते हैं कि ईरान की इस्लामी क्रांति के बहुत अधिक प्रभाव पड़े हैं। इस्लामी गणतंत्र ईरान द्वारा फिलिस्तीनी जनता का प्रबल समर्थन और अतिग्रहणकारी जायोनी शासन का घोर विरोध, दमनकारी शासन के मुकाबले में फिलिस्तीनी प्रतिरोध के प्रोत्साहन का कारण बना है। जायोनी शासन और उसके पश्चिमी समर्थक फिलिस्तीन की स्वशासित सरकार से तथाकथित शांतिवार्ता करने से प्रसन्न थे एसी स्थिति में फिलिस्तीन के हमास और जेहादे इस्लामी संगठन ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरणा लेकर अतिग्रहणकारी जायोनी शासन से मुकाबले के लिए उठ खड़े हुए हैं और वे इस अतिक्रमणकारी शासन के लिए डरावने स्वप्न में परिवर्तित हो गये हैं।

दूसरी ओर जायोनी सेना ने वर्ष 1982 में दक्षिणी लेबनान पर कब्ज़ा कर लिया और उसे हिज्बुल्लाह नामक आंदोलन का सामना हुआ। हिज़्बुल्लाह के जवानों ने ईरानी क्रांतिकारियों की भांति इस्लाम को आधार बनाया और ईश्वर के मार्ग में जेहाद के लिए निकल पड़े और वे शहादत को गर्व का कारण समझते हैं यहां तक कि वे ईरान की इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता को अपना नेता मानते हैं।

लेबनान के हिज़्बुल्लाह आंदोलन को ग़ैर ईरानी सबसे मज़बूत आंदोलन माना जा सकता है जो ईरान की इस्लामी आकांक्षाओं के प्रति कटिबद्ध है और उसने अतिक्रमणकारी जायोनी शासन के सैनिकों को बारमबार पराजित किया है और इस समय वह इस शासन को अपना कट्टर दुश्मन समझता है।

दिसंबर वर्ष 2010 में जबसे अरब देशों में आंदोलन आरंभ हुआ बहुत से लोगों का मानना था कि इन देशों के लोगों ने ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरणा ली है। तानाशाही व साम्राज्यवादी सरकार का विरोध, आज़ादी और न्यायप्रेम इन देशों के आंदोलनों के संयुक्त नारे थे जिन पर ईरान की इस्लामी क्रांति के दौरान बहुत बल दिया जाता था। यद्यपि अरब देशों में जो आंदोलन आये थे उनमें से कुछ को कठिनाइयों का सामना हुआ और वे अपने रास्ते से हट गये परंतु कुछ दूसरे देशों में वे परिणाम पर पहुंचे। बहरैन में लोग अब भी तानाशाही और आले ख़लीफ़ा की राजशाही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। इस देश में लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दमन किये जाने और अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाली सरकारों की ओर से किसी प्रकार की कार्यवाही न किये जाने के बावजूद डेमोक्रेसी और मानवीय अधिकारों की पूर्ति हेतु बहरैनी जनता का आंदोलन वर्ष 2011 से जारी रही है। पश्चिमी संचार माध्यम बहरैनी जनता के आंदोलन की ख़बरों को नहीं देते हैं इसके बावजूद बहरैनी लोग आले खलीफा से अपनी संघर्ष को जारी रखे हुए हैं।

यमन एक दूसरा अरब देश है जहां के लोगों ने ईरानी जनता से प्रेरणा लेकर आज़ादी, डेमोक्रेसी और स्वतंत्रता व स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए आंदोलन किया है परंतु पश्चिम का समर्थन प्राप्त सऊदी अरब की तानाशाही सरकार उनके शांतिपूर्ण आंदोलन का दमन कर रही है। यमन के लोगों द्वारा ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरणा लेना और अमेरिका तथा जायोनी शासन के वर्चस्व से उनका विरोध इस बात का कारण बना है कि पश्चिमी सरकारों ने उनकी हत्या और उन पर किये जा रहे अपराधों पर अपनी आंखें मूंद ली है। यही नहीं ये सरकारें यमनी जनता के दमन में सऊदी सेना की सहायता भी कर रही हैं।

इराक में भी इस देश के संघर्षकर्ता और क्रांतिकारी मुसलमानों ने ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रेरणा लेकर सद्दाम की तानाशाही सरकार के विरुद्ध आंदोलन किया। वर्ष 2003 में अमेरिका द्वारा इराक के अतिग्रहण के बाद इस वर्चस्ववादी सरकार से विरोध आरंभ हुआ यहां तक कि अमेरिकी सैनिक इराक से निकल गये। इस समय भी इराकी ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रभावित होने के कारण तकफीरी और आतंकवादी गुटों से मुकाबला कर रहे हैं।

अलबत्ता ईरान की इस्लामी क्रांति के प्रभाव इन्हीं कुछ यहां तक कि इस्लामी देशों तक सीमित नहीं हैं। ग़ैर इस्लामी देशों के लोग भी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से ईरान की इस्लामी क्रांति से प्रभावित हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और फार्स खाड़ी के दक्षिण में स्थित सऊदी अरब जैसे इस्लामी देशों की ओर संकेत किया जा सकता है। ग़ैर इस्लामी देशों में वे लोग भी ईरान की इस्लामी क्रांति की आकांक्षाओं की सराहना करते हैं जो मुसलमान नहीं हैं। प्रत्येक दशा में ईरान की इस्लामी क्रांति का स्रोत इस्लाम है। इस आधार पर विश्व के राष्ट्रों के मध्य अधिक से अधिक उसका विस्तृत होना एक प्राकृतिक, स्वाभाविक व अपेक्षित बात है।

                       

 

Feb १८, २०१७ १३:३३ Asia/Kolkata
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