हज़रत फ़ातेमा ज़हरा, पैग़म्बे इस्लाम (स) की बेटी और हज़रत अली (अ) की पत्नी थीं।

वे ऐसी महान महिला थीं, जिन्होंने अपने छोटे से जीवन में इस्लाम और इंसानियन के लिए महान कार्य अंजाम दिए। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की शहादत की बरसी के अवसर पर हम उनके परिचय के लिए क़ुरान का सहारा लेंगे।

फ़ातेमा एक बेटी थीं, एक ऐसी बेटी जिनकी कोई मिसाल नहीं है। शिष्टाचार के शिखर पर विराजमान, पवित्रता और गुणों से सुसज्जित। वे रचना और इंसानियत की पहेली का रहस्य थीं। उनकी उपाधी उम्मे अबीहा अपने बाप की मॉ की, यह उपाधी पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें प्रदान किया था। यह वही हस्ती थी, जिनके पैग़म्बर ने अनेक बार चूमा था और फ़रमाया था कि फ़ातेमा अपने बाप की जान है, उसका बाप उस पर क़ुर्बान।

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फ़ातेमा एक महिला थीं, एक अद्वितीय महिला जो एक पूर्ण महिला की मिसाल और आदर्श थीं, महिलाओं के लिए महान और स्वाधीन मार्गदर्शक। फ़ातेमा एक मां थीं, एक ऐसी मां जो वसंत की शबनम से अधिक नर्म और कृपालु। बच्चों के लिए एक ऐसी आदर्श मां, जिसकी कल्पना भी असंभव है। फ़ातेमा एक पत्नी थीं, हज़रत अली (अ) के घर में एक ऐसा ध्रुव थीं, जिसकी किरणें सूर्य से अधिक घर को ऊष्मा प्रदान करती हों। उनका बलिदान और क़ुर्बानियां अद्वितीय थे।

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा एक अद्भुत इंसान थीं, जो एक बेटी, सहयोगी, साथी और अपने बाप के लिए सलाहकार थीं, पत्नी के रूप में एक सहयोगी, सलाहकार, दुखों को बांटने वाली, निकटतम साथी और अपने पति की रक्षा करने वाली थीं।

फ़ातेमा ज़हरा हर दौर और हर काल की नस्लों के लिए एक गौरवशाली महिला थीं, वे दुनिया भर की महिलाओं की सरदार थीं। उनके उपनामों मे मोहद्दिसा, सिद्दीक़ा, ताहिरा, मुतह्हेरा, हानिया, मुबारका, मासूमा, ज़किया, राज़िया, मरज़िया, सैय्यदा, सफ़िया, हूरिया हैं। वे हर क्षेत्र और जीवन के हर आयाम के लिए एक पूर्ण आदर्श हैं। इंसानों में वे सबसे अधिक अपने पिता एवं अंतिम ईश्वरीय दूत पैग़म्बरे इस्लाम (स) के समान थीं।

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हज़रत फ़ातेमा एक ऐसे ईश्वरीय दूत की बेटी हैं, जो ईश्वर के अनुसार, सत्य के अलावा कुछ नहीं कहता है और हमेशा न्याय के आधार पर फ़ैसला करता है, जो वास्तविकता से हटकर कार्य नहीं करता है और अपने जीवन में पल भर के लिए भी अतिवाद नहीं करता है। इसलिए स्वर्ग में जाने वाली महिलाओं की सरदार, हज़रत फ़ातेमा के बारे में पैग़म्बरे के किसी कथन या हदीस को एक केवल एक बाप की बात नहीं समझना चाहिए और उसे भावनाओं से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

इस बिंदु पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि ईश्वर ने हर क्षेत्र में पैग़म्बरे इस्लाम के न्याय और सच्चाई की गवाही दी है। क़ुरान में ईश्वर कहता है, वह अपनी इच्छा के अनुसार बात नहीं करता है, वह वह्यी या आकाशवाणी के अलावा कुछ नहीं कहता है।

इस विश्वास के साथ अब फ़ातेमा ज़हरा को पैग़म्बरे इस्लाम (स) के कथनों के दर्पण में देखना चाहिए। वे फ़रमाते थे, जो कोई इस महिला को पहचानता है, तो वह पहचानता है और जो कोई नहीं पहचानता है वह पहचान ले कि वह मेरे जिगर का टुकड़ा है। इसलिए जो कोई उसे दुखी करेगा तो मानो उसने मुझे दुखी किया।

क़ुराने करीम ने संसार की सर्वश्रेष्ठ महिला और उनके पति हज़रत अली और उनके दो बेटों की तस्वीर इस तरह से खींची है, कह दो कि मुझे तुम्हारे मार्गदर्शन के बदले में कोई इनाम नहीं चाहिए, केवल यह कि तुम मेरे अहले बैत अर्थात परिजनों से मोहब्बत करो, और जो कोई पुण्य करेगा हम उसके पुण्य में वृद्धि करेंगे, इसलिए कि ईश्वर दयालु और कृतज्ञ है। इस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से तात्पर्य हज़रत फ़ातेमा ज़हरा, हज़रत अली, इमाम हसन और इमाम हुसैन हैं।

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जब यह आयत नाज़िल हुई और पैग़म्बरे इस्लाम ने उसे पढ़कर सुनाया तो लोगों ने पूछा, हे ईश्वरीय दूत, यह आपके परिजन जिनसे मोहब्बत करना और उनका अनुसरण करना हमारे लिए अनिवार्य किया गया है, कौन लोग हैं? हज़रत ने जवाब दिया, अली, फ़ातेमा और फ़ातेमा के दो बेटे हसन और हुसैन।

इस हदीस को अहले सुन्नत के एक वरिष्ठ विद्वान ने अपनी किताब शवाहिदुत्तनज़ील में इस प्रकार से बयान किया है, एक व्यक्ति पैग़म्बरे इस्लाम के पास गया और कहा, हे ईश्वरीय दूत, मेरे लिए इस्लाम का वैसा ही उल्लेख करो, जैसा तुम तक पहुंचा है, हज़रत ने फ़रमाया, गवाही दो कि अल्लाह के अलावा और कोई ईश्वर नहीं है, और मोहम्मद उसका बंदा और दूत है। उस व्यक्ति ने पूछा, क्या मेरा मार्गदर्शन करने के लिए आपको मुझसे कुछ इनाम चाहिए? पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, नहीं, केवल इतना करो कि मेरे परिजनों से मोहब्बत करो। उसने पूछा अपने परिजनों को या आपके? पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, मेरे परिजन। उसने कहा, आप अपना हाथ बढ़ाइए ताकि मैं आपकी बैयत करूं और आपके अनुसरण का संकल्प करूं और कहा, जो कोई आपके परिजनों से मोहब्बत न करे, उसके ऊपर ईश्वर की लानत हो। पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा, आमीन।

फ़ातेमा ज़हरा पूर्ण ईमान और मानवता प्रेम का आदर्श हैं। इस्लामी विद्वानों और क़ुरान के व्याख्याकारों ने क़ुरान के सूरए इंसान के नाज़िल होने के कारणों का इस प्रकार उल्लेख किया है। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के दो बेटे इमाम हसन और इमाम हुसैन बीमार पड़ गए। पैग़म्बरे इस्लाम अपने कुछ साथियों के साथ उनके स्वास्थ्य का हाल पूछने के लिए उनके पास गए। इस अवसर पर पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली से कहा, अच्छा होगा अपने बेटों के स्वास्थ्य के लिए ईश्वर से नज़्र या कोई मन्नत मान लो। उसके तुरंत बाद हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा ने तीन दिन तक रोज़े रखने की मन्नत मांगी। मन्नत के बाद, ईश्वर की कृपा से उनके दोनों बेटे स्वस्थ हो गए। हज़रत अली और हज़रत फ़ातेमा ने अपनी मन्नत को पूरा करने का इरादा किया तो उनके बेटों ने भी उनके साथ रोज़े रखे।

हज़रत अली (अ) ने नए स्थापित इस्लामी समाज की परिस्थितियों और घर में खाद्य पदार्थ न होने के कारण, थोड़े से जौ की व्यवस्था की। हज़रत फ़ातेमा ने जौ का आटा पीसा और उससे रोज़ा इफ़्तार करने के लिए रोटियां बनाईं। इफ़्तार का टाइम होने वाला ही था कि दरवाज़े पर एक फ़क़ीर ने अहले बैत पर सलवात भेजते हुए कहा कि मैं भूखा हूं। हज़रत फ़ातेमा ज़हरा और उनके परिवार ने ईश्वर के लिए उस भूखे को खाना खिलाने के लिए अपनी अपनी रोटियां उस फ़क़ीर को दान कर दीं।

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जब दूसरा दिन हुआ और हज़रत फ़ातेमा ने बचे हुए जौ के आटे से इफ़्तार के लिए कुछ रोटियां बनाईं तो फिर एक अनाथ ने दरवाज़े पर आवाज़ लगाई और भोजन की मांग की। दूसरे दिन भी उन्होंने अपनी रोटियां उस यतीम को दे दीं, यह घटना तीसरे दिन भी घटी और उन्होंने तीसरे दिन भी ईश्वर के मार्ग में दान कर दिया।

चौथे दिन पैग़म्बरे इस्लाम ने हज़रत अली और उनके दो बेटों को देखा कि भूख से उनके चेहरे मुरझाए हुए हैं। पैग़म्बरे इस्लाम उनके साथ उनके घर पहुंचे और हज़रत फ़ातेमा को देखा कि अधिक भूख से उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ है और ईश्वर की इबादत में व्यस्त हैं। उसी समय ईश्वर की ओर से फ़रिश्ता सूरए इंसान की कुछ आयतें लेकर नाज़िल हुआ, निःसंदेह नेक कार्य करने वाले ऐसे जाम पियेंगे, जिनमें बेहतरीन ख़ुशबू शामिल होगी। ईश्वर के विशेष बंदे जिन सोतों से पीते हैं और जिधर चाहते हैं उन्हें दिशा प्रदान कर देते हैं, इसलिए कि वे अपने जीवन में हमेशा अपना वादा या अपनी मन्न्न पूरी करती हैं और उस दिन से डरते हैं, जब हर ओर प्रकोप होगा। वे अपने भोजन को ऐसी स्थिति में कि जब वह भूखे हैं और उसे खाना चाहता हैं, ग़रीबों, यतीमों और निर्धनों को दान कर देते हैं और कहते हैं, हम केवल ईश्वर की प्रसन्नता के लिए तुम्हें भोजन करा रहे हैं और हमें तुमसे न कोई इनाम चाहिए और न ही आभार।

इस प्रकार इन आयतों में हज़रत फ़ातेमा और उनके परिवार की प्रशंसा की गई है और उन्हें ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ एवं विशेष बंदा बताया गया है, जो पूर्ण मानव समाज के लिए आदर्श बनने योग्य हैं।

हम हज़रत फ़ातेमा ज़हरा (स) की शहादत के अवसर पर संवेदना प्रकट करते हैं और उन पर सलवात भेजते हैं, इसलिए कि पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया है, मेरी बेटी जो कोई तुझ पर सलवात भेजेगा, ईश्वर उसपर दया करेगा औऱ स्वर्ग में मैं जहां कहीं भी रहूंगा, वह उसे मुझसे मिला देगा।

 

Mar ०४, २०१७ १६:५७ Asia/Kolkata
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