आज हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का शुभ जन्म दिवस है।

20 जमादिस्सानी को उनका शुभ जन्म पवित्र नगर मक्का में हुआ था।  आज पूरे नगर में चारों ओर सुगंध फैली हुई थी।  पूरा ही नगर प्रकाशमय था।  मुबारकबाद देने के लिए पैग़म्बरे इस्लाम (स) के घर में फ़रिश्तों का तांता लगा हुआ था।  हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का गौरवपूर्ण जीवन सबके, विशेषकर महिलाओं के लिए आदर्श है।  इस बारे में पैग़म्बरे इस्लाम कहते थे कि मेरी बेटी फ़ातेमा सभी युगों व आने वाली पीढ़ियों की औरतों की सरदार है।  ईश्वर की ओर से हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की पैग़म्बरी की घोषणा के पांचवें साल हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का जन्म हुआ था।  यह वह दिन था जिस दिन पैग़म्बरे इस्लाम (स) का घर ख़ुशियों से भर गया।  हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के दुनिया में आते ही पैग़म्बरे इस्लाम ने ईश्वर का आभार व्यक्त किया।  उन्होंने हज़रत फ़ातेमा को अपनी गोद में लिया और मोहब्बत भरी नज़रों से उन्हें देखा।  दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के रूप में ईश्वर ने पैग़म्बरे इस्लाम के हवाले अथाह ख़ज़ाना कर दिया।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने जन्म लेने वाली अपनी सुपुत्री का नाम फ़ातेमा रखा जिसका अर्थ है ईश्वर ने उन्हें हर प्रकार की बुराइयों से पवित्र और नरक से दूर रखा है।  उनके शुभ जन्म दिवस के अवसर पर हम आप सबकी सेवा में हार्दिक शुभकामनाएं पेश करते हैं।

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पैग़म्बरे इस्लाम की सुपुत्री का नाम फ़ातेमा था जबकि उनके कई उप नाम थे जैसे उम्मे अबीहा, उम्मुल अइम्मा तथा उम्मुल हसन व हुसैन।  आपको ज़हरा, अज़रा, ताहेरा, बतूल और सय्यदे नेसाइल आलमीन के नाम से भी जाना जाता है।  उन्हें कई नामों से जाना जाता है जिनके अपने अलग-अलग अर्थ हैं।  इन नामों में उनका सबसे प्रसिद्ध नाम फ़ातेमा है।  जिस समय हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की आयु मात्र दो वर्ष थी उस समय वे अपने माता-पिता के साथ “शअबे अबीतालिब” गईं जहां अन्य मुसलमानों के साथ उन्होंने तीन वर्षों तक बहुत ही कठिन परिस्थितियों में जीवन व्यतीत किया।  पाचं वर्ष की आयु में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की मां हज़रत ख़दीजा का स्वर्गवास हो गया।  आठ वर्ष की आयु में वे अपने परिवार के साथ मदीना पलायन कर गईं।  पलायन या हिजरत के दूसरे साल हज़रत अली अलैहिस्सलाम के साथ उनका विवाह हुआ।  हज़रत फ़ातेमा के दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं।  इमाम हसन और इमाम हुसैन तथा हज़रत ज़ैनब और हज़रत उम्मे कुलसूम।

 

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा ने ऐसे समाज में आंखें खोली जहां मानवीय मूल्यों का कोई महत्व ही नहीं था।  वह एक ऐसा समाज था जहां पर युद्ध और रक्तपात के अतरिक्त बेटियों को ज़िन्दा क़ब्र में दफ़्न करना एक सामान्य सी बात थी।  इस्लाम के उदय से पूर्व अरब जगत में महिलाओं को कोई महत्व प्राप्त नहीं था।  समाज में पुरूषों का बोलबाला था।  क्योंकि महिलाएं, पुरूषों के अधीन रहा करती थीं इसलिए उनकी योग्यताओं और क्षमताओं को फलने-फूलने का अवसर नहीं मिल पाता था।  उस काल में महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति के रूप में देखा जाता था।  इन्ही अन्यायपूर्ण बातों के कारण महिलाएं स्वयं को एक मनुष्य के रूप में स्वीकार नहीं करती थीं।  इस्लाम के उदय के साथ ही पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने इन बुरी परंपराओं का डट कर मुक़ाबला किया।  इस्लाम के अनुसार महिलाएं भी पुरुषों की ही भांति इन्सान हैं।  इस्लाम का मानना है कि मनुष्य का महत्व उसके बौद्धिक विकास में निहित है।  इस्लामी दृष्टिकोण के अनुसार अपनी ज़िम्मेदारियों के निभाने के हिसाब से महिलाओं और पुरुष में अंतर हो सकता है किंतु मानव होने की दृष्टि से दोनो समान हैं।

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अज्ञानता के एसे काल में ईश्वर ने तत्कालीन समाज को हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के रूप में एक महिला को उपहार स्वरूप प्रदान किया।  उनका पवित्र जीवन विश्व के समस्त लोगों विशेषकर महिलाओं के लिए आदर्श जीवन है।  पैग़म्बरे इस्लाम (स) जिस प्रकार से हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के साथ स्नेह व सम्मान से पेश आते थे वह व्यवहार, एक पिता का अपनी बेटी के प्रति स्नेह व सम्मान से हटकर था।  वे हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के उच्च स्थान के कारण ही उनका सम्मान किया करते थे। पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत फ़ातेमा ज़हरा से बहुत अधिक स्नेह करते थे।  पैग़म्बरे इस्लाम यह कहा करते थे कि फ़ातेमा मेरे अस्तित्व का भाग है। जो उसे प्रसन्न करता है वह मुझे प्रसन्न करता है और जो उसके साथ दुर्व्यवहार करता है वह मुझे दुखी करता है।  वे कहते थे कि फ़ातेमा मेरे लिए सर्वाधिक प्रिय है।  पैग़म्बरे इस्लाम के महान व्यक्तित्व की छत्रछाया में हज़रत फ़ातेमा का पूरा अस्तित्व, आध्यात्म से रच बस गया था।  हज़रत फ़ातेमा ज़हरा ने अपने पिता पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स) की छत्रछाया में जीवन के उच्च अर्थों को बड़ी गहराई से समझा था।

 

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा ने पारिवारिक व सामाजिक जीवन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।  उन्होंने एक पत्नी तथा मां की भूमिका इस तरह निभाई कि महिला के संबंध में इस्लाम के दृष्टिगत आदर्श बन गईं। हज़रत फ़ातेमा ने इस सच्चाई को समझते हुए कि पुरुष और महिला, सृष्टि की व्यवस्था में एक-दूसरे के पूरक हैं, पारिवारिक वातावरण को प्रेम व स्नेह से भर दिया।  हज़रत फ़ातेमा ज़हरा का मानना था परिवार, सामाजिक व्यवस्था का मुख्य आधार होता है। उन्होंने घर व परिवार के वातावरण को प्रशिक्षण का माध्यम बनाया। उनके छोटे से घर में एसी महान हस्तियों ने प्रशिक्षण पाया जिनका नाम इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो चुका है।  जिस बात ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा को पूरे संसार के लिए आदर्श बनाया है वह यह है कि मानवता के सभी भले आयामों में वे परिपूर्ण थीं।

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निःसन्देह, हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के बारे में सबसे महत्वपूर्ण कथन ईश्वर का कथन है।  पवित्र क़ुरआन के बहुत से व्याख्याकारों का मानना है कि क़ुरआन की बहुत सी आयतें हज़रत फ़ातेमा ज़हरा से संबन्धित हैं जो किसी परिपूर्ण और आदर्श व्यक्तित्व की ओर संकेत करती हैं।  इन आयतों में आयते ततहीर, आयते मुबाहला, सूरए इन्ना अनज़लना और सूरए कौसर का उल्लेख किया जा सकता है जिनके माध्यम से हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के व्यक्तित्व को दर्शाया गया है।  उन्हें समस्त भलाई का स्रोत बताया गया है।  पवित्र क़ुरआन के कौसर नामक सूरे के अनुसार हज़रत फ़ातेमा ज़हरा अपार भलाई का केन्द्र थीं। कौसर का अर्थ बहुत विस्तृत है जिसे सीमित नहीं किया जा सकता।  अधिकतर व्याख्याकारों का यह कहना है कि सूरे कौसर हज़रत फ़ातेमा ज़हरा की शान में उतरा है।  इस सूरे में ईश्वर, पैग़म्बरे इस्लाम से कहता है कि “हमने आपको अपार बरकत व भलाई प्रदान की तो अपने पालनहार के लिए नमाज़ पढ़िए और बलि चढ़ाइये और जान लीजिए कि आपका दुश्मन निरवंश है।  यह आयतें पैग़म्बरे इस्लाम (स) को ढारस देती थीं क्योंकि उन्हें दुश्मनों के तानों का सामना था जो कहा करते थे कि पैग़म्बरे इस्लाम निरवंश रहेंगे।

 

हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के बारे में इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनेई कहते हैं कि उनकी विशेषताओं को देखकर कहा जा सकता है कि निश्चित रूप में हज़रत फ़ातेमा ज़हरा एक महान महिला थीं जो वास्वत में आदर्श महिला हैं।  आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनई कहते हैं कि हज़रत फातेमा का जीवन यद्यपि छोटा रहा जो बीस वर्ष से अधिक जारी नहीं रह सका किंतु उनका पूरा जीवन संघर्ष, क्रांतिकारी कामों संयम, ज्ञात, ईश्वरीय दूत से सहयोग, नेतृत्व व इस्लामी व्यवस्था की दृष्टि से प्रयास व परिश्रम का एक अथाह सागर है।  कठिन संघर्ष से भरा हज़रत फ़ातेमा सलामुल्लाह अलैहा का जीवन, अत्याधिक असाधारण और अभूतपूर्व है।

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ईरान की इस्लामी क्रांति के संस्थापक स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने हज़रत फ़ातेमा ज़हरा के शुभ जन्म दिवस को महिला दिवस के रूप में मनाए जाने की बात कही थी।  इस दिन को ईरान में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है।  यह इसलिए है क्योंकि हज़रत फ़ातेमा ज़हरा एक आदर्श मां और पत्नी होने के कारण हर काल की महिलाओं के लिए महान आदर्श हैं और रहेंगी।

 

 

 

 

 

Mar १४, २०१७ १३:३२ Asia/Kolkata
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