ताजीक शायरा सफ़िया गुलरुख़सार नौरोज़ और वसंत को मनमोहक और आकर्षक बताते हुए कहती हैं, मुझे बहार बहुत पसंद है, इसलिए कि इससे मुझे प्रकृति के चमत्कार का आभास होता है।

मैंने अपनी पहली कविता 12 वर्ष की आयु में लिखी। वह बहार का ज़माना था। उस समय मैं पहाड़ पर जाया करती थी, बहार की पहली हरियाली का लुत्फ़ उठाती थी और फूलों को चुनती थी। पानी से खेलती थी। पहाड़ पर दौड़ती थी। जो भी फूल खिलता था, मैं उसका नाम जानती थी। मुझे पता था वह कहां और कब खिलता है।

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एक दिन हमें स्कूल से फूलों को चुनने के लिए पहाड़ पर लेकर गए थे। फ़रवरदीन या मार्च का महीना था। कल्पना कीजिए कि इस महीने में ताजिकिस्तान के पहाड़ों का क्या नज़ारा होता है। एक ऐसा अवसर आया कि मुझे लगा मैं कुछ नहीं सुन रही हूं। किसी को नहीं देख रही हूं। मैं अपनी क्लास के साथियों को नहीं देख रही थी और उन्हें नहीं सुन रही थी, मुझे सिर्फ़ रंग बिरंगे फूलों से भरे हुए चमन दिखाई दे रहे थे। जिस दिशा में भी देखती थी, बस देखती रह जाती थी। मेरे साथी मुझे आवाज़ दे रहे थे, लेकिन मुझे सुनाई नहीं दे रहा था। वहां मेरे पास क़लम और काग़ज़ नहीं था। जब मैं वापस लौटी तो सबसे पहले मैंने अपने उस एहसास को शब्दों में बदलकर कापी पर उतारा। उस वक़्त मैं अपने आप में नहीं थी, मैं कहीं खोई हुई थी।

हां, गुलरुख़सार सही कह रही हैं, बहार हम पर जादू कर देती है। बहार होश उड़ाकर, मदहोश कर देती है। कितने भाग्यशाली होते हैं, कलाकार, शायर, चित्रकार और संगीतकार, जो इस अवसर से लाभ उठाते हैं और अद्भुत रचना को जन्म देते हैं। हमारा सामाजिक जीवन और जीवन शैली, हमारी जीवन की व्याख्या से प्रभावित होते हैं। जीवन का उद्देश्य क्या है? जो भी लक्ष्य हम जीवन के लिए निर्धारित करते हैं और उस तक पहुंचने के मार्ग का चयन करते हैं, प्राकृतिक रूप से वह अपने अनुरूप, हमारे लिए एक जीवन शैली को प्रस्तुत करता है। जीवन शैली, हर सभ्यता का मूल भाग है, जिसके दो भाग हैं। एक भाग साधन है, दूसरा साध्य है। साधन वाले भाग से तात्पर्य वे मूल्य हैं, जो किसी एक देश के विकास के लिए ज़रूरी होते हैं। उदाहरण स्वरूप, ज्ञान, आविष्कार, उद्योग, राजनीति, अर्थव्यवस्था, शासन, वैश्विक मान्यता, प्रचार और प्रचार के उपकरण।

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साध्य या असली भाग, वह चीज़ें हैं जिन पर जीवन का आधार होता है, जिसे जीवन शैली भी कहा जा सकता है। यह सभ्यता का मूल भाग है। जैसे कि परिवार, विवाह, आवास, वेशभूषा, भोजन, मनोरंजन, रोज़गार और भाषा। इसी प्रकार, राजनीतिक स्तर पर लोगों का आचरण, खेलकूद, मीडिया और मां-बाप, जीवन साथी और बच्चों के साथ व्यवहार। यहां तक कि इसमें यात्रा, दूसरों के साथ बर्ताव भी शामिल होता है। यह वह चीज़ें हैं, जो मिलकर एक सभ्यता को जन्म देती हैं और किसी सभ्यता के बारे में कोई फ़ैसला इन्हीं चीज़ों के आधार पर किया जा सकता है।

नौरोज़ के रीति रिवाज, इस्लामी और ईरानी जीवन शैली का जलवा हैं। हमने उल्लेख किया था कि नोरोज़ के रीति रिवाजों से पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को मज़बूती मिलती है। ईरानी संस्कृति और इस्लामी शिक्षाओं के अनुसार, समारोहों और मुलाक़ातों में दिखावे और होड़ से बचा जाए। स्पष्ट है कि अगर इस संदेश की उपेक्षा की जाएगी तो नौरोज़ भी एक घिसा-पिटा त्यौहार बनकर रह जाएगा।

दूसरी और हम इस महत्वपूर्ण बिंदु की ओर भी इशारा कर सकते हैं कि नौरोज़ में जीवन में होने वाली क्रांति की गहराई पर विश्वास रखते हैं और ख़ुद को भी इसका एक भाग मानते हैं तो नौरोज़ के रीति रिवाज सांस्कृतिक क्रांति ला सकते हैं। नोरोज़ अपने साथियों, अपने पूर्वजों और आने वाली नस्लों से रिश्ता जोड़े रखने का एक बेहतरीन अवसर है। इसलिए कि नौरोज़ में ईरानियों की जीवन शैली बहुत ही विशेष और अनोखी होती है। यह साल के दूसरे अवसरों और अन्य संस्कृतियों के लिए भी आदर्श बन सकती है।

शहीद मुतहहरी

 

उदाहरण स्वरूप, नौरोज़ में मनाए जाने वाले जश्न और ख़ुशी से सभी की आत्मा निखर जाती है और थकावट दूर हो जाती है। शोधकर्ताओं ने भी लोगों के ख़ुशहाल जीवन को जीवन शैलियों के बीच अंतर का आधार बताया है। अब अगर नौरोज़ की संस्कृति से दूसरों को परिचित करा सकें और ऐसी सभ्यता के बारे में बता सकें कि जिसके साल की शुरूआत जश्न से होती है। ईरानी लोग इस अवसर पर एक दूसरे के साथ इकट्ठे होते हैं, निश्चित रूप से इस सफल जीवन शैली का विस्तार किया जा सकता है।

ईरानी संस्कृति में प्रकृति का अद्भुत प्रभाव, विश्व भर में प्रकृति के चाहने वालों के लिए एक उचित अवसर है कि वह नोरोज़ में ईरानियों की जीवन शैली पर अधिक ध्यान दें। ईरान की संस्कृति के इतिहास में प्राकृतिक विषयों का काफ़ी महत्व है। यह दृष्टिकोण, ईरानी सभ्यता से विशेष है। नए साल की शुरूआत बहार के साथ होती है, जिसमें सर्दियों के बाद पेड़ पौदे हरे भरे होते हैं और कोंपलें खिलती हैं।

ईरानी जीवन शैली में नौरोज़ के विभिन्न रीति रिवाज होते हैं, जो मानवीय सम्मान को प्रकृति की अनुकंपाओं में प्रतिबिंबित करते हैं। धरती पर जीवन को आगे बढ़ाने के लिए पर्यावरण की सुरक्षा, इंसान की बुनियादी ज़रूरतों में से है। इस संबंध में लापरवाही मानव जीवन को ऐसा नुक़सान पहुंचाती है कि जिसकी क्षतिपूर्ति संभंव नहीं होती और यह इंसान और अन्य जीव जंतुओं के जीवन को ख़तरे में डाल देती है। नौरोज़, एक ऐसा अवसर है, जिसमें पर्यावरण और प्राकृतिक अनुकंपाओं के सम्मान की अधिक सिफ़ारिश की गई है। ईरान के कैलेंडर में 15 इसफ़ंद वृक्षारोपण दिवस है, जो नए साल के शुरू होने से दो हफ़्ते पहले मनाया जाता है।

वृक्षारोपण का महत्व इतना अधिक है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) इस संबंध में फ़रमाते हैं, अगर तुम्हारे हाथ में कोई पौधा है और प्रलय आने में केवल इतना समय बाक़ी है कि उसे लगाया जा सकता है, तो उसे लगाओ। नव वर्ष के आगमन पर ईरानियों का व्यवहार, निश्चित रूप से उनकी जीवन शैली की एक सकारात्मक विशेषता है और ईरान में लगभग सभी समुदाय इसे मनाते हैं। साल के परिवर्तन की घड़ी पहुंचती है, ईरानी अनाज को हरे रंग से रंगते हैं और हफ़्त सीन दस्तरख़्वान लगाते हैं जिस पर हरी भरी वनस्पतियां रखी जाती हैं, वास्तव में यह कृर्षि उत्पादों, किसानों और उन समस्त लोगों को सम्मान देने के लिए किया जाता है जो कृर्षि में किसी भी प्रकार का योगदान देते हैं।

यहां ज़रूरी है कि नौरोज़ के असवर पर जो ग़लत प्रथाएं प्रचलित हैं, उनका उल्लेख किया जाए। निःसंदेह अंधविश्वासों और ग़लत प्रथाओं को जिंदा करना जिस प्रकार किसी भी अवसर पर स्वीकार्य नहीं है, नौरोज़ के अवसर पर भी इसे जायज़ नहीं ठहराया जा सकता। स्पष्ट है कि कोई भी प्रथा कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसमें यह संभावना बनी रहती है कि समय बीतने के साथ साथ उसमें अंधविश्वास शामिल हो जाए और वह सही रास्ते से भटक जाए। ईदे नौरोज़ के अवसर पर भी एक दिन को अशुभ मानना और उस दिन घर से बाहर ज़रूर निकलना और कुछ अन्य चीज़ें अंधविश्वास हैं, जिनके लिए कोई तर्क पेश नहीं किया जा सकता।

इस्लामी विद्वान और क़ुरान के व्याख्याकार उस्ताद शहीद मुतहहरी नौरोज़ के अंधविश्वासों के बारे में कहते हैं, क़ुराने मजीद ने विभिन्न आयतों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि ख़ुद इंसान के वजूद से बाहर अशुभ या नहस का कोई वजूद नहीं है। अर्थात संभव है कि इंसान का विचार और विश्वास अशुभ हो, जब उसका विचार और विश्वास ही शत प्रतिशत अशुभ है तो वह अशुभ जिहालत में है। अशुभ होना अनैतिकता के अलावा कहीं नहीं है। अशुभ होना बुरे कार्यों के अलावा कहीं नहीं है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ईरानियों द्वारा नौरोज़ का जश्न मनाना और बहार का आना कोई घिसा-पिटा त्यौहार नहीं है, बल्कि उसकी जड़ों और उसके लाभों के बारे में शोध करके आज के जीवन में अनेक बदलाव और वरिवर्तन किए जा सकते हैं और जीवन में नए रंग भरे जा सकते हैं। इस प्रकार साल की हर ऋतु बहार हो सकती है और हर दिन नौरोज़ । उस वक़्त कलियों और कोंपलों का ख़िलना, केवल बहार की एक निशानी बनकर रह जाएगा। ईरानी कवि सलमान हेराती का भी मानना है कि बहार का आगमन हमेशा संभव है और उसका कैलेंडर से कोई संबंध नहीं है। बहार के आगमन के दर्शन को समझना महत्वपूर्ण है।                         

 

Mar १४, २०१७ १४:५५ Asia/Kolkata
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