29 इस्फ़ंद या 19 मार्च ईरान में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण की वर्षगांठ का दिन है।

यह दिन साम्राज्यवादी शक्तियों से ईरानी राष्ट्र के संघर्ष के इतिहास का एक अहम पन्ना है। यह दिन, उस संघर्ष में ईरानी राष्ट्र की विजय का दिन है जिसमें दूसरा पक्ष आंतरिक तानाशाही और विदेशी साम्राज्य था। इस्लामी क्रांति की सफलता से पहले तक, तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बावजूद इस महत्वपूर्ण उद्योग का भविष्य किसी और ही दिशा में जा रहा था और इसके कुपरिणाम बरसों तक ईरान की अर्थ व्यवस्था पर दिखाई देते रहे। तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण, ईरानी राष्ट्र के लिए विजय व स्वाधीनता का चिन्ह था लेकिन ब्रिटेन की सरकार के लिए, जिसके पास ईरान के तेल की खोज, उसे बाहर निकालने, प्रयोग के लायक़ बनाने और बेचने का लाइसेंस था, मध्यपूर्व में अपने व्यापक हितों को खोने के अर्थ में था। ईरान में तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण एक लम्बे और तनावपूर्ण राजनैतिक काल का परिणाम था जिसने देश के तेल उद्योग का रास्ता पूरी तरह से बदल दिया। यह परिवर्तन, ईरान के तेल उद्योग के भविष्य के लिए, जो बरसों तक साम्राज्य के लोभ का पात्र बनता रहा था, एक निर्णायक मोड़ समझा जाता है।

इस्लामी क्रांति से पहले के बरसों में ईरान का तेल उद्योग, साम्राज्यवादी शक्तियों की लूट-खसोट का केंद्र बना हुआ था। ब्रिटेन जैसे देश हमेशा अन्य देशों के स्रोतों को लूटने के चक्कर में रहते थे ताकि अपने विस्तारवादी लक्ष्यों को पूरा कर सकें। ईरान व मध्यपूर्व के संबंध में उनका दृष्टिकोण कभी भी क्षेत्रीय राष्ट्रों के हितों पर आधारित नहीं रहा। इस आधार पर उनके समझौते भी केवल दिखावे के लिए होते थे और उनका फल ईरानी राष्ट्र के अनादर, उसके अधिकारों के हनन और देश के स्रोतों व संपत्ति की लूट-मार के अलावा कुछ नहीं होता था। वे ईरान के तत्कालीन शासक की कमज़ोरी से फ़ायदा उठा कर अपनी इच्छाएं ईरान पर थोप देते थे और तथाकथित समझौतों के बहाने उससे विभिन्न प्रकार की विशिष्टताएं लिया करते थे।

इन्हीं में से एक समझौता वह था जो बेरन जूलियस रोएटर नामक अंग्रेज़ ने ईरान के दरबार के साथ किया था। इस समझौते के आधार पर सभी जंगलों, नहरों, पत्थर के कोएले, लोहे, तांबे व सीसे की खदानों और तेल से लाभ उठाने का पूरा अधिकार सत्तर साल तक उसे दे दिया गया था और शुद्ध मुनाफ़े में ईरान का भाग केवल 15 प्रतिशत था। यह समझौता इस हद तक विचित्र था कि ब्रिटेन के मशहूर राजनितिज्ञ और इस देश की साम्राज्यवादी नीतियों के जनकों में से कए लॉर्ड कर्ज़न ने इसके बारे में लिखा था कि किसी देश के सभी औद्योगिक स्रोतों को विदेशियों के हाथ में दे देना वास्तव में बहुत विचित्र लगता है और तेहरान में ब्रिटेन से मित्रता का जोश इतिहास में कभी भी इतना गहरा नहीं था।

 

वर्ष 1902 में भी ईरान की तत्कालीन सरकार ने एक समझौता किया जिसके अनुसार पूरे ईरान में तेल की खोज, उसे बाहर निकालने, प्रयोग के लिए तैयार करने और बेचने का पूरा अधिकार साठ साल तक के लिए विलियम डारसी नामक एक अन्य अंग्रेज़ को दे दिया गया था। ईरान के पांच उत्तरी भागों को इस समझौते से अलग रखा गया था। इस समझौते में, ईरान का भाग शुद्ध लाभ में से केवल 16 प्रतिशत था। यह मामूली सा भाग भी केवल स्वामित्व के अधिकार के नाम पर ईरान की सरकार को दिया जाना था लेकिन अंग्रेज़ कभी भी इस मामूली सी रक़म को भी अदा करने के लिए तैयार नहीं हुए। ब्रिटेन के साम्राज्य और वर्चस्ववाद का ये खेल 1933 में एक अन्य समझौते के साथ जारी रहा, जो गस-गुलशाइयान समझौते के नाम से प्रख्यात हुआ।

इस समझौते का भी ईरानी समाज के जानकार लोगों विशेषकर क्रांतिकारी धर्मगुरू आयतुल्लाह काशानी ने संसद में खुल कर विरोध किया। आयतुल्लाह काशानी ने ब्रिटेन की तेल कंपनी के विरुद्ध एक कड़ा बयान जारी किया और उनके साथ कई अन्य सांसदों ने इस समझौते को निरस्त करने का प्रस्ताव संसद में पेश किया। इन्हीं आपत्तियों के कारण ईरान की तानाशाही सरकार ने अंग्रेज़ सरकार का आज्ञापालन करते हुए विरोधियों की आवाज़ दबाने की कोशिश की और आयतुल्लाह काशानी को रात के समय उनके घर से गिरफ़्तार करके कुछ समय के लिए लेबनान निर्वासित कर दिया। लेकिन विरोध और आपत्तियों की आग दबी नहीं और 16वीं संसद की एक आरंभिक बैठक में आयतुल्लाह काशानी का संदेश पढ़ कर सुनाया गया जिसमें उनके निर्वासन के ग़ैर क़ानूनी होने और उसके कारणों, सेनेट के प्रस्तावों और इसी तरह तेल के संबंध में थोपे गए प्रस्ताव के ग़ैर क़ानूनी होने की बात कही गई थी। उनका यह संदेश डाक्टर मुसद्दिक़ ने पढ़ कर सुनाया।

इस प्रकार के संघर्ष ने अंततः 29 इस्फ़ंद वर्ष 1329 में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का विधेयक पारित होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। अलबत्ता साम्राज्यवाद की साज़िशें समाप्त नहीं हुईं और वर्ष 1953 में डाक्टर मुसद्दिक़ की क़ानूनी सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह जैसे हथकंडों, ईरान के तेल स्रोतों की लूट-मार और ईरान के मामलों में हस्तक्षेप जैसी चालों के साथ जारी रहीं। ब्रिटिश व अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान की शाही सरकार के समर्थन से फ़ायदा उठा कर अमरीका व यूरोप की 16 तेल कंपनियों पर आधारित एक कंसरशियम की ओर से ईरान पर एक समझौता थोप दिया और एक बार फिर ईरान के तेल को लूटना शुरू कर दिया।

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ईरान का तेल खोजने से लेकर बाहर निकाले जाने तक संवेदनशील चरण से हो कर गुज़रा है लेकिन आज तेल उद्योग नए विचारों के साथ भविष्य की ओर क़दम बढ़ा रहा है। पिछले छः दशकों में तेल व गैस का उद्योग, विभिन्न कारणों से ईरान की अर्थ व्यवस्था के इंजन के रूप में काम करता रहा है और अब भी इसकी यही हैसियत है लेकिन यह उद्योग अतीत के अनुभवों से लाभ उठा कर देश का मज़बूत भविष्य बनाने के लिए प्रयासरत है। इस समय ईरान और संसार के सबसे बड़े ऊर्जा केंद्रों में से एक के रूप में दक्षिणी पार्स फ़ील्ड के सभी चरणों ने काम करना शुरू कर दिया है और इसने मध्यपूर्व की सबसे बड़ी तेल रिफ़ाइनरी के रूप में पैदावार शुरू कर दी है। ईरान में तेल रिफ़ाइन करने की क्षमता प्रतिदिन साढ़े अट्ठारह लाख बैरल तक पहुंच गई है और कई अन्य रिफ़ाइनरियों के क्रमशः काम आरंभ करने से इस क्षमता में निरंतर वृद्धि होती जाएगी।

पिछले दो दशकों में ईरान के तेल उद्योग ने विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों के बावजूद बेजोड़ क्षमताएं प्राप्त की हैं और अब वह पेट्रोकेमिकल और तेल व गैस से बनने वाली विभिन्न वस्तुओं का उत्पादान कर रहा है बल्कि वह अपने अनुभवों के आधार पर इनका व्यवसायीकरण भी कर रहा है। सितारए ख़लीजे फ़ार्स नामक तीन लाख साठ हज़ार बैरल प्रतिदिन की क्षमता वाली रिफ़ाइनरी ईरान के तेल उद्योग की बड़ी परियोजनाओं में से एक है जो हर दिन तीन करोड़ साठ लाख लीटर पेट्रोल और एक करोड़ चालीस लाख लीटर डीज़ल का उत्पादन करने की क्षमता रखती है। इसी के साथ यह हर दिन दो हज़ार टन तरल गैस, तीस लाख लीटर विमान का ईंधन और 130 टन गंधक का भी उत्पादन करने में सक्षम है। वर्तमान सरकार के कार्यकाल के अंत तक दक्षिणी पार्स की संयुक्त गैस फ़ील्ड से प्राकृतिक गैस की पैदावार की क्षमता बढ़ कर 77 करोड़ घन मीटर प्रतिदिन तक पहुंच जाएगी जो पिछले कई बरसों से ईरान का एक बहुप्रतीक्षित लक्ष्य था।

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तेल उद्योग के क्षेत्र में अन्य देशों पर निर्भरता को कम करना उन बातों में से है जिन पर इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने हमेशा बल दिया है। वे कहते हैं कि यह निर्भरता, सौ साल से हमारी शापित विरासत है और प्रतिबंधों को भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। आज जो अवसर मौजूद है उससे लाभ उठा कर कोशिश करनी चाहिए कि अन्य लाभदायक आर्थिक गतिविधियों को तेल का विकल्प बनाया जाए। इस समय ईरान के पड़ोसी और निकटवर्ती देशों में ईरान का तेल उद्योग ऐसी दिशा में बढ़ रहा है जिस पर चल कर वह अर्थव्यवस्थ के मूल ढांचे के रूप में अपनी स्थिति को स्थापित कर सके। निश्चित रूप से तेल एक निर्णायक तत्व के रूप में अर्थव्यवस्था के दूसरे विभागों की पैदावार में वृद्धि में अहम और सीधी भूमिका निभाता है और अगर इसका सही उपयोग किया जाए तो यह श्रम बल, पूंजी और उत्पादन के कच्चे माल जैसे उत्पादन के संपूर्ण चक्र को तेज़ी से आगे बढ़ा सकता है। ईरान के आर्थिक भविष्य के लिए प्रतिरोधक अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में इसी बड़े लक्ष्य को दृष्टिगत रखा गया है।

 

Mar १५, २०१७ १३:२१ Asia/Kolkata
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