पहली अप्रैल बराबर 12 फ़रवरदीन ईरानी कैलेंडर में ऐतिहासिक दिन है। इस दिन ईरान में 11 फ़रवरी 1979 को इस्लामी क्रान्ति की सफलता के 49 दिन बाद एक अहम राजनैतिक घटना घटी।

इस दिन इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह के आदेश से जनमत संग्रह आयोजित हुआ ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि जनता देश में किस प्रकार की राजनैतिक व्यवस्था चाहती है। ईरान में इस्लामी क्रान्ति की सफलता से 2500 साल पुरानी राजशाही व्यवस्था का अंत हुआ था। इमाम ख़ुमैनी का जनमत संग्रह कराने का फ़ैसला अद्वितीय था जिसकी किसी भी क्रान्ति में मिसाल नहीं मिलती। गृह मंत्रालय में राजनैतिक व सामाजिक मामलों के सलाहकार व जनमत संग्रह के आयोजन के ज़िम्मेदार अधिकारी डॉक्टर सादिक़ तबातबाई, अपनी किताब में जनमत संग्रह से जुड़ी एक यादगार बात का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि मैने इमाम से कहा, “हुज़ूर अब जबकि दुनिया ने आपको, आपके नेतृत्व को, इस क्रान्ति को आधिकारिक रूप से मान लिया है तो रेफ़्रेन्डम कराने की क्या ज़रूरत है?” मुझे विश्वास है कि अगर आप इस्लामी गणतंत्र को देश की राजनैतिक व्यवस्था के रूप में घोषित करें, तो सारी जनता और दुनिया भी इसे स्वीकार करेगी। इमाम ख़ुमैनी ने डॉक्टर सादिक़ तबातबाई के जवाब में कहा, “आप अभी इसकी अहमियत को नहीं महसूस कर रहे हैं। 50 साल बाद कहा जाएगा कि जनता की भावना का दुरुपयोग करके अपने दृष्टिगत व्यवस्था जनता पर थोप दी। रेफ़्रेन्डम होना चाहिए समर्थकों व विरोधियों की संख्या स्पष्ट हो जाए।” डॉक्टर तबातबाई जो तत्कालीन अंतरिम सरकार के प्रवक्ता भी थे, जनमत संग्रह के आयोजन के बारे में इमाम ख़ुमैनी की ताकीद के बारे में एक अन्य स्थान पर लिखते हैं,“हुज़ूर ने कहा कि आप वर्तमान को मत देखिए जो बात इतिहास में बाक़ी रहेगी वह ऐतिहासिक वास्तविकता है। आप कोशिश करें कि सरकार जल्द से जल्द इस काम को अंजाम दे।”

इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह का यह व्यवहार उनकी दूरदर्शिता व महानता को दर्शाता है कि उनकी आने वाले 50 साल पर नज़र थी। दूसरी ओर जनमत संग्रह के आयोजन पर इमाम ख़ुमैनी का बल देना यह भी दर्शाता है कि उन्हें जनता की धार्मिक आस्था पर विश्वास था। इसी प्रकार वे जानते थे कि जनता को उनके नेतृत्व पर विश्वास है। क्योंकि अगर यह विश्वास और जनता में धार्मिक भावना न होती तो क्रान्ति सफल न होती। ईरानी जनता भी इमाम ख़ुमैनी के विश्वास पर पूरी उतरी जिसे उसने राजनैतिक व्यवस्था के चयन के ज़रिए दर्शा दिया। ईरान में हुए इस जनमत संग्रह में 98.2 फ़ीसद जनता ने इस्लामी गणतंत्र ईरान के पक्ष में मतदान दिया।        

इमाम ख़ुमैनी ने जनमत संग्रह के परिणाम का एलान करते हुए जनता के नाम संदेश में कहा, “मैं इस पवित्र दिन, राष्ट्र की जीत के दिन व जनता के हाथ में संचालन के दिन इस्लामी गणतंत्र ईरान का एलान करता हूं। मैं पूरी दुनिया को बताना चाहता हूं कि ईरान के इतिहास में ऐसे रेफ़्रेन्डम की मिसाल नहीं मिलती कि पूरा राष्ट्र पूरे जोश से मतदान केन्द्रों की ओर जाए और अपना मत देकर उद्दंड शासन को इतिहास के कूड़ेदान में दफ़्न कर दे।” इमाम ख़ुमैनी ने अपने संदेश में एक अन्य स्थान पर कहा, “मैं इस अद्वितीय एकता की सराहना करता हूं कि सभी ईश्वर की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और आपस में विभाजित न रहो की आवाज़ पर निकल आए और इस्लामी गणतंत्र के पक्ष में मतदान कर अपनी राजनैतिक व सामाजिक परिपक्वता को पूरब व पश्चिम के सामने साबित कर दिया।” चूंकि ईरान हमेशा स्वाधीन देश रहा है, इसलिए इतिहास में ईरान की स्वाधीनता के घोषणापत्र को नहीं ढूंढा जा सकता, अमरीका की स्वाधीनता के घोषणापत्र की तरह। लेकिन 1 अप्रैल 1979 को इमाम ख़ुमैनी का संदेश और इस्लामी गणतंत्र ईरान की स्थापना का आधिकारिक एलान वास्तव में स्वाधीनता का भी और आज़ादी का भी घोषणापत्र है। इमाम ख़ुमैनी ने इस संदेश में जो शब्द इस्तेमाल किए हैं वे अद्वितीय हैं। इमाम ख़ुमैनी ने अपने संदेश में इमामते उम्मत अर्थात जनता के हाथ में संचालन का शब्द इस्तेमाल करके यह बता दिया कि उनका यह मानना है कि सरकार में जनता की भी भूमिका होनी चाहिए। इमाम ख़ुमैनी 12 फ़रवरदीन को वह दिन मानते हैं जो ईरानी समाज को कल्याण की ओर ले जाने वाला है।

इस संदेश में जनता की मुख्य भूमिका पर बल दिए जाने के अलावा एक अन्य संदेश यह है कि इसमें न्याय का उल्लेख किया गया है। सरकार का न्याय करना ही वह चीज़ है जिसे जनता पसंद करती है। इमाम ख़ुमैनी अपने इस संदेश में इस्लामी गणतंत्र में न्याय पर बहुत बल देते हुए कहते हैं, “बधाई हो आपको कि स्वाभिमानी जवानों की शहादत और मां-बाप ने मन पर गहरे दुख व कठिनाइयां सहन करने के बाद समय के फ़िरऔन को उखाड़ फेंका और इस्लामी गणतंत्र के पक्ष में अपने दृढ़ मत से ईश्वरीय न्याय पर आधारित शासन का एलान किया। ऐसी हुकूमत जिसमें राष्ट्र के सभी वर्ग को एक आंख से देखा जाएगा, ईश्वरीय न्याय का प्रकाश सब पर एक तरह से चमकेगा, पवित्र क़ुरआन पैग़म्बरे इस्लाम की सुन्नत की वर्षा सब पर एक समान होगी। बधाई हो आपको ऐसी हुकूमत जिसमें जातीय मतभेद, तुर्क, फ़ार्स, लुर, कुर्द और बलोच तथा श्वेत व अश्वेत शब्द की कोई जगह नहीं है। सभी समान व आपस में भाई भाई हैं। सिर्फ़ ईश्वर से भय की छत्रछाया में ही सम्मान है और अच्छे आचरण व कर्म ही वरीयता का आधार हैं। बधाई हो आपको उस दिन की जिसमें राष्ट्र के सभी वर्ग को उसका अधिकार मिलेगा। न्याय को लागू करने में महिला-पुरुष और धार्मिक अल्पसंख्यकों व दूसरों में कोई अंतर नहीं है।”    

इमाम ख़ुमैनी ने धार्मिक प्रजातंत्र पर आधारित व्यवस्था का गठन कर एक धार्मिक शासन दुनिया के सामने पेश किया। इस्लामी क्रान्ति के संस्थापक ने नारों की हद तक नहीं बल्कि व्यवहारिक रूप से यह दर्शा दिया कि उन्हें इस बात पर विश्वास है कि जनता इस्लामी शिक्षाओं के आधार पर एक शासन के गठन व संचालन के पक्ष में मतदान करेगी। वह भी ऐसी स्थिति में जब दुनिया के देश पूरब और पश्चिम जैसे दो ब्लॉक में बटे हुए थे। ऐसे हालात में जब पूर्वी ब्लॉक पर मार्क्सवाद छाया हुआ था जिसका मानना था कि धर्म अफ़ीम समान है और पश्चिमी ब्लॉक पर उदारवाद व सेक्युलरिज़्म छाया हुआ था जो धर्म को व्यक्तिगत जीवन तक सीमित मानता था, इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी शिक्षाओं, पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के आचरण के आधार पर पहले शासन का गठन किया। इमाम ख़ुमैनी के व्यक्तित्व की समीक्षा में इस बात की ओर इशारा कर सकते हैं कि वह एक बुद्धिमान, वीर, विचारक व वैश्विक मामलों में जागरुक थे। उन्होंने नई व अनुपम शैलियों से सबसे बड़ी तत्कालीन क्रान्ति का दिशा निर्देशन किया। इमाम ख़ुमैनी क्रान्ति के चरम पर एक ऐतिहासिक हस्ती के रूप में प्रकट हुए। जैसा कि जर्मनी में पूर्वी मामलों की संस्था यूडो स्टेनबाख़ इमाम ख़ुमैनी के व्यक्तित्व के बारे में कहती है, “इमाम ख़ुमैनी दुनिया के सबसे बड़े राजनेता हैं। उनका व्यक्तित्व करिश्माई व आकर्षक है। इस्लामी गणतंत्र की सभी आकांक्षाओं का आधार उनके विचार हैं।” महान ईरानी विचारक व विद्वान शहीद मुतह्हरी अपनी किताब “क्रान्ति के बारे में” इमाम ख़ुमैनी के संबंध में लिखते हैं, “मैंने इमाम ख़ुमैनी के वजूद में तीन अहम विशेषता पायी। अपने उद्देश्य पर यक़ीन, अर्थात पूरी दुनिया एकजुट होकर उन्हें उनके उद्देश्य से नहीं हटा सकती थी। जनता पर यक़ीन अर्थात जनता की भावना पर यक़ीन और इन सबसे ज़्यादा अहम ईश्वर पर आस्था।” इसी आधार पर इमाम ख़ुमैनी ने सबसे अच्छे तरीक़े से नेतृत्व का रोल अदा किया।                    

इस्लामी क्रान्ति ने इस बात को साबित कर दिखाया कि राजनैतिक व सामाजिक मंच पर धर्म की उपयोगिता क्या है। इसी तरह उन्होंने यह भी साबित किया कि जीवन को न्याय व अध्यात्म के आधार पर जिया जा सकता है। स्पेन के दार्शनिक इस्माईल कीलबस के शब्दों में, “धर्म ज़िन्दा हो गया है। दैनिक जीवन में अध्यात्म को अहमियत दी जा रही है। दुनियावाले मुक्ति और अपने सामाजिक संबंध को अच्छा करने के लिए धर्म और उसके आध्यात्मिक पहलु की ओर झुक रहे हैं। यह सब इमाम ख़ुमैनी की धार्मिक क्रान्ति की देन है जिसका असर विश्व समुदाय की मानसिकता में दिखाई दे रहा है।”

इमाम ख़ुमैनी ने इस्लामी क्रान्ति की सफलता के बाद भी लक्ष्य निर्धारित किए थे। वह सेक्युलरिज़्म के समर्थकों के विपरीत, धर्म को व्यक्तिगत उपासना तक सीमित नहीं मानते थे। उनका मानना था कि इस्लाम के पास समाज के संचालन के लिए उसी प्रकार कार्यक्रम है जिस तरह व्यक्तिगत व्यवहार में छोटे से छोटे आयाम के लिए उसके पास नियम हैं। “विलायते फ़क़ीह” अर्थात वरिष्ठ धार्मिक नेतृत्व का विचार उन्होंने इस्लामी क्रान्ति की सफलता और भ्रष्ट राजशाही व्यवस्था के स्थान पर धार्मिक प्रजातंत्र की स्थापना के लिए रखा था।

पश्चिमी सरकारें और उनके क्षेत्रीय घटक ईरान में धार्मिक प्रजातंत्र पर आधारित शासन को अपने अवैध हितों के लिए ख़तरा समझते हैं। इसका एक कारण यह है कि क्षेत्रीय देशों में अत्याचारी व सांप्रदायिक सरकारें हैं। ये सरकारें इस्लामी क्रान्ति की सफलता के आरंभ से ही ईरान से दुश्मनी पर उतर आयीं और आज भी कि जब इस्लामी गणतंत्र व्यवस्था की स्थापना को 38 साल हो चुके हैं, तकफ़ीरी व चरमपंथी विचारधाराओं का इस्लामी देशों में समर्थन कर इस्लामी छवि को ख़राब कर रही हैं और इस कोशिश में हैं कि इस्लामी देशों पर इस्लामी क्रान्ति के असर को ख़त्म कर दें, जिसने ईरान में शुद्ध इस्लाम को जीवित किया।

 

Apr ०४, २०१७ ११:२३ Asia/Kolkata
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