ईश्वर का आभार व्यक्त करने की संस्कृति, महत्वपूर्ण इस्लामी शिष्टाचार का भाग है जिसमें ईश्वर की प्रसन्नता भी शामिल होती है।

पैग़म्बरे इस्लाम (स) का कथन है कि जिसने भी लोगों का आभार व्यक्त नहीं किया, तो उसने ईश्वर का भी आभार व्यक्त नहीं किया। आज हम पवित्र रमज़ान के महीने के इस विशेष कार्यक्रम में ईश्वर का आभार व्यक्त करने के विषय पर चर्चा कर रहे हैं, हम ईश्वर का आभार व्यक्त करते हैं कि उसने हमे पवित्र रमज़ान के महीने में अपनी उपासना का अवसर दिया और पापों से दूर रहने का मौक़ा दिया ताकि हम ईश्वर के दरबार में अपने पापों की क्षमा मांग सकें।

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कितने बुरे हैं वह लोग जो पवित्र रमज़ान में भी पाप में ग्रस्त रहते हैं और ईश्वर की क्षमा याचना से वंचित होते है। उस व्यक्ति पर अफ़सोस होता है कि जिसका रोज़ा केवल भूख और प्यास ही हो और वह रोज़े की वास्तविकता को सही ढंग से समझ न सके।

आज हम ईश्वरीय अनुकंपाओं का आभार व्यक्त करने के विषय पर चर्चा करेंगे। पवित्र क़ुरआन की बहुत सी आयतों में मनुष्य द्वारा ईश्वर की अनुकंपाओं का आभार व्यक्त करने पर बल दिया गया है। मनुष्य अपने ईमान द्वारा हमेशा ईश्वरीय अनुकंपाओं को याद करता है और ईश्वर का आभार अपनी ज़बान पर जारी करता है। यह वह लोग हैं जो ईश्वरीय प्रसन्नता प्राप्त करने के मार्ग में उसकी अनुकंपाओं से लाभ उठाते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि अनुकंपाओं का वास्तविक आभार व्यक्त करना उसे कहते हैं जिसमें, वर्जित मार्गों का प्रयोग न किया जाए।

ईश्वर ने पवित्र क़ुरआन में वचन दिया है कि यदि मनुष्य ईश्वर की अनुकंपाओं का आभार व्यक्त करता है तो उसकी अनुकंपाओं में वृद्धि होगी। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का कहना है कि उसका आभार व्यक्त करो जिसने तुम्हें अनुकंपाएं दी हैं और जिसने तुम्हारा आभार व्यक्त किया, उसकी प्रशंसा करो और उसे इनाम दो क्योंकि यदि तुमने अनुकंपाओं का आभार व्यक्त किया तो अनुकंपाएं कम नहीं होंगी और यदि अनुकंपाओं का आभार व्यक्त नहीं किया तो यह अनुकंपाएं जारी नहीं रहेंगी।

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हक़ की पहचान यह है कि जब समस्याएं या परेशानियां दूर हों या जब ईश्वरीय अनुकंपाएं याद की जाएं तो अपने समस्त अस्तित्व से ईश्वर का आभार व्यक्त किया जाए। अलबत्ता ईश्वर को इस बात की आवश्यकता नहीं है कि बंदे उसका आभार व्यक्त करें क्योंकि वह समृद्ध और सृष्टि का मालिक व रचियता है। यही कारण है कि सूरए नम्ल  की आयत संख्या 40 में ईश्वर कहता है कि जिसने भी आभार व्यक्त किया, तो उसने अपने हित में आभार व्यक्त किया और जिसने अनुकंपाओं का इन्कार किया, ईश्वर आवश्यकता मुक्त और दानी हे।

एक दिन ईश्वर ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर वहि की मेरा आभार व्यक्त करो और वह भी संपूर्ण आभार, इस पर हज़रत मूसा ने कहा कि हे मेरे पालनहार मैं कैसे तेरी नेअमतों का हक़ अदा करूं जबकि तेरी अनुकंपाओं की विभूतियों की क्षमता, स्वयं एक अलग अनुकंपा है और उसका भी आभार व्यक्त किया जाना चाहिए। ईश्वर की ओर से संदेश आया कि हे मूसा, तुमने मेरा आभार व्यक्त किया क्योंकि तुम्हें पता है कि यह सारी कृपा मेरी ही ओर से है।

ईश्वर का आभार व्यक्त करने की एक निशानी, लोगों के साथ भलाई करना और उनका आभार व्यक्त करना है। कभी कुछ लोग ईश्वर की अनुकंपाएं पहुंचने का माध्यम बनते हैं, यहां पर लोगों का आभार व्यक्त करना, एक प्रकार से ईश्वर का आभार व्यक्त करने जैसा हैं। ईश्वर का आभार व्यक्त करने की संस्कृति, महत्वपूर्ण इस्लामी शिष्टाचार का भाग है जिसमें ईश्वर की प्रसन्नता भी शामिल होती है।

सूरए हज की आयत संख्या 40 में ईश्वर कहता है कि यह वह लोग है जो अपने घरों से बिना किसी हक़ के निकाल दिए गये हैं, अलावा इसके कि वह यह कहते हैं कि हमारा ईश्वर अल्लाह है और यदि ईश्वर कुछ लोगों को कुछ लोगों के माध्यम से न रोकता तो समस्त गिरजाघर और यहूदियों के उपसना स्थल और आग की पूजा करने वालों के उपासना स्थल और मस्जिदें, सब धवस्त कर दी जातीं और अल्लाह अपने सहायताकारों की निश्चित सहायता करेगा कि वह निश्चित रूप से शक्तिशाली और प्रतिष्ठा वाला है।

यह आयत उस अत्याचार की ओर संकेत करती है जो अनेकेश्वरवादी मोमनों पर करते हैं, आयत बयान करती है कि अनेकेश्वरवादी बिना किसी कारण के मुसलमानों को उनके घरों, उनके जीवन स्थल से निकाल देते हैं अर्थात मक्के में होने वाले अत्याचारों के अतिरिक्त उन्हें अपने घर व अन्य वस्तुओं की भी अनदेखी करने पर विवश करते हैं। उनकी यातनाओं का कारण केवल यह था कि वह कहते थे कि अल्लाह हमारा ईश्वर है न कि यह मूर्ति।

स्पष्ट है कि एकेश्वरवाद और ईश्वर को एक मानना गर्व की बात है न कि पाप किन्तु अनेकेश्वरवादी इसको सुनने की शक्ति नहीं रखते हैं, इस विषय को बहाना बनाकर उन्होंने मोमिनों को उनके घरों और रहने के स्थानों से निकालना आरंभ कर दिया और उनको पलायन पर विवश कर दिया। उसके बाद आयत कहती है कि यह आयत जेहाद के एक तथ्य को बयान करती है कि यदि ईश्वर मोमिनों की रक्षा न करता और जेहाद का आदेश देकर, कुछ लोगों को कुछ लोगों के माध्यम से न बचाता, तो समस्त उपासना स्थल और मस्जिदें जो ईश्वर की वजह से आबाद हैं, ध्वस्त हो जातीं। अलबत्ता यह आदेश इस वास्तविकता के साथ है कि अपने हितों और जीवन के आधारों की रक्षा करना मनुष्य की स्वभाविक ज़िम्मेदारी है और समस्त मनुष्य अपनी वैचारिक क्षमताओं को जिन्हें ईश्वर ने उसे प्रदान किया है, अपनी रक्षा के साधन के रूप में प्रयोग करे। अलबत्ता युद्ध का सहारा लेना, अपनी रक्षा का अंतिम साधन होना चाहिए। एक मुसलमान केवल उसी समय युद्ध के मैदान में कूदता है जब दूसरे मार्ग परिणामदायक सिद्ध नहीं होते। युद्ध में कुछ लोग अपनी जान क़ुरबान कर देते हैं ताकि दूसरे लोगों को मुक्ति दिला सकें, वह लोग दूसरों के सिर से ख़तरा टालने और उनको सुख प्रदान करने के लिए संघर्ष और युद्ध की कठिनाइयां सहन करते हैं।

आयत के अंत में यह भी कहा गया है कि मैं सौगंध खाता हूं कि  ईश्वर हर उस व्यक्ति की जिसकी वह दुश्मनों से जेहाद के माध्यम से सहायता करता है, सहायता करता हे क्योंकि ईश्वर शक्तिशाली है और कोई भी शक्ति उसे कमज़ोर नहीं कर सकती, प्रतिष्ठा और सम्मान वाला है कि कोई भी उसकी प्रतिष्ठा की सीमा में अतिक्रमण नहीं कर सकता और निश्चित रूप से ईश्वर अपने वादों पर अमल करने वाला है। वह ईश्वर है जिसने युद्ध के दौरान दुश्मनों के मुक़ाबले में मुसलमानों की मदद की और उनको विजयी बनाया, अलबत्ता यह सफलता उस समय तक उनके साथ रहेगी जब तक उनके लिए ईश्वरीय धर्म सर्वोपरि और उसको प्राथमिकता प्राप्त रहेगी।

सहर वह समय है जब मनुष्य लंबे रोज़े के लिए स्वयं को तैयार करता है और उसे सहर के समय शक्तिवर्धक खाने और पेय लेने चाहिए ताकि दिन भर उसे भूख प्यास न लगे। पानी, रोज़े के दौरान बेहतरीन पेय है। पानी पवित्र व स्वच्छ पेय है। इस पेय का इतना अधिक महत्व है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम इसको लोक परलोक का सबसे बेहतरीन पेय क़रार देते हैं। पैग़म्बरे इस्लाम (स) के हवाले से बयान किया गया है कि जब आप पानी पीते थे तो दुआ करते थे कि उस ईश्वर का आभार व्यक्त करता हूं जिसने अपनी कृपा से इस पानी को मेरे लिए शीतल किया और इसको हमारे पापों की वजट से खारा और गदला नहीं बनाया।

खाद्य विशेषज्ञों का कहना है कि सहरी के समय रोज़ेदार को पानी अधिक पीना चाहिए। अलबत्ता यह बात ध्यान में रहे कि ऐसा पानी न पीए जो अधिक ठंडा या गर्म हो। पानी कमरे के तापमान के बराबर हो जो प्यास बुझाने के लिए काफ़ी है।

दिन भर प्यास न लगे इसलिए आप अपने पानी में कुछ बूंद नींबू की मिलाकर पिएं। यह घोल गर्मी में प्यास बुझाने और अधिक प्यास न लगने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

डाकटर मज़हरी कहते हैं कि सबसे बेहतरीन पेय पानी है, केवल हमको यह ध्यान रखना चाहिए कि पानी सीमा से अधिक ठंडा न हो, ध्यान रखना चाहिए कि ठंडा पदार्थ या पेय, अमाशय को हिला देता है और इसी प्रकार प्यास समाप्त नहीं करती।

वह कहते हैं कि यदि कोई रोज़ेदार मुझसे सहरी के समय कोई शरबत की सलाह मांगता है तो मैं उसे नींबू का शरबत पीने की सलाह दूंगा। इस शरबत को ताज़े नींबू, शकर या शहद से तैयार किया जा सकता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सहरी के समय अधिक मात्रा में पानी नहीं पीना चाहिए क्योंकि इससे प्रतिदिन की प्यास बुझाने में कोई सहायता नहीं मिलती।

रोज़ेदार को पानी पीने के समय बिसमिल्लाह कहना चहिए और पानी पीने के बाद अलहमदूलिल्लाह कहना चहिए। इमा जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम का कहना है कि जब तक पानी उसके पेट में रहता है वह ईश्वर का गुणगान करता रहता है और उसका पारितोषिक उसे मिलता रहता है।

 

Jun १३, २०१७ ११:२१ Asia/Kolkata
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