19 रमज़ान को सुबह की नमाज़ की हालत में हज़रत अली अलैहिस्सलाम पर हमला किया गया जिसके तीन दिनों के बाद वे शहीद हो गए।

इस प्रकार एक महान हस्ती हमारे बीच से उठ गई।

पवित्र रमज़ान के अन्तिम दिनों के दौरान हज़रत अली अलैहिस्सलाम की हालत कुछ अजीब सी थी।  18 रमज़ान की रात हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सूरे यासीन पढ़ा।  उसके बाद उन्होंने आसमान की ओर देखा।  आसमान की ओर देखते हुए हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि यह वही रात है जिसमें मुझसे मिलने का वादा किया गया है।  19 रमज़ान की सुबह हज़रत अली, फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने के लिए मस्जिदे कूफ़ा के लिए निकले।  जब वे मस्जिद पहुंचे तो उन्होंने सुबह की अज़ान दी।  अज़ान देने के बाद वे दुआएं पढ़ने में व्यस्त हो गए।

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हज़रत अली अलैहिस्सलाम जब सुबह की नमाज़ के लिए आते थे तो सामान्यतः उन लोगों को उठाते थे जो मस्जिद में सोए होते थे।  उस दिन भी उन्होंने ऐसा ही किया।  उन्होंने सोए हुए लोगों को पुकराते हुए कहा कि नमाज़ के लिए उठो।  मस्जिदे कूफ़ा के एक कोने में इब्ने मुल्जिम नामक एक व्यक्ति लेटा हुआ था जो सोने का दिखावा कर रहा था हालांकि वह जाग रहा था।  इमाम अली ने उसको संबोधित करते हुए कहा कि उठो नमाज़ पढ़ो क्योंकि इस समय जो सोता है ईश्वर उसपर क्रोधित होता है।  इसके बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम मेहराब की तरफ़ गए और उन्होंने नमाज़ पढ़नी शुरू की।  इब्ने मुल्जिम, मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि किसी दूसरे इरादे से आया था।  उसने जब देखा कि हज़रत अली ने नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी है तो वह अपनी जगह से उठा और उनकी तरफ़ आया।  इमाम अली जब सजदे से अपना सिर उठा रहे थे उसी समय अपने काल का अत्यंत दुष्ट व्यक्ति इब्ने मुल्जिम मुरादी, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के निकट आया।  उसने ज़हर में बुझी हुई तलवार से हज़रत अली के सिर पर वार किया।   यह ऐसा वार था जो सिर से माथे तक जा पहुंचा।  यह वह वार था जिसने लोगों को हज़रत अली जैसे महान व्यक्ति से वंचित कर दिया और मानवता को दुख के अथाह सारग में डिबो दिया।  सिर पर तलवार के वार से अली ख़ून मे लथपथ हो गए।  जैसे ही हज़रत अली के सिर पर ज़हर से बुझी तलवार से वार किया गया हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने आकाश की ओर देखते हुए कहा कि है काबे के रब की सौगंध, मैं सफल हो गया।

यह वार इतना तेज़ था कि तलवार हज़रत अली के सिर में घुस गई और उसका ज़हर उनके पूरे शरीर में पहुंच गया।  मस्जिदे कूफ़ा में हंगामा मच गया।  बनी हाशिम के लोगों की मदद से इमाम हसन और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, हज़रत अली अलैहिस्सलाम को घर ले गए।  उनके सिर से ख़ून बह रहा था।  हज़रत अली के चेहरे का रंग पीला पड़ गया था।  इसी बीच लोग इब्ने मुल्जिम को पकड़कर इमाम अली की सेवा में लाए।  ज़ख़्मी हालत में हज़त अली ने इब्ने मुल्जिम को संबोधित करते हुए कहा कि क्या मैं तेरे लिए बुरा इमाम था जो तुमने मेरे साथ ऐसा सुलूक किया? हज़रत अली ने अपने बड़े बेटे इमाम हसन को संबोधित करते हुए कहा कि मुझपर तलवार से हमला करने वाले इब्ने मुल्जिम के साथ विनम्रता का व्यवहार करना।  इसपर इमाम हसन ने कहा कि आप एसे व्यक्ति के साथ विनम्रता का व्यव्हार करने को कह रहे हैं जिसने हमसब के दिलों को दुखी किया है।  क्या एसे के साथ विनम्रतापूर्ण व्यव्हार किया जाना चाहिए? इस पर हज़रत अली ने कहा कि हम पैग़म्बरे इस्लाम (स) के परिजन, क्षमाशील हैं।  इब्ने मुल्जिम को वहीं खिलाना जो तुम ख़ुद खाना।  देखो अगर मैं बच गया तो उसके बारे में स्वयं फैसला लूंगा किंतु यदि मैं नहीं बच सका तो उसके साथ वैसा ही करना जैसा उसने मेरे साथ किया है।

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आइए अब सूर नूर की आयत संख्या 54 का अनुवाद पेश करते हैं।  कहो, अल्लाह का आज्ञापालन करो और उसके रसूल का कहा मानो, परन्तु यदि तुम मुंह मोड़ते हो तो उसपर बस वही ज़िम्मेदारी है जिसका बोझ उसपर डाला गया है और तुम उसके ज़िम्मेदार हो जिसका बोझ तुमपर डाला गया है और यदि तुम आज्ञा का पालन करोगे तो मार्ग पा लोगे और रसूल पर तो बस साफ़-साफ़ संदेश पहुंचा देने ही की ज़िम्मेदारी है।

एकेवश्वरवाद के हिसाब से उपासना केवल ईश्वर की ही की जानी चाहिए।  ईश्वर के अतिरिक्त किसी का अधिकार नहीं बनता कि उसकी इबादत की जाए। यहां पर यह बात बतानी ज़रूरी है कि ईश्वर के अतिरिक्त केवल उसका अनुसरण किया जा सकता है जिसका आदेश स्वंय ईश्वर ने दिया हो।  इस आयत में ईश्वर ने लोगों को अपने आज्ञापालन के बाद पैग़म्बरे इस्लाम (स) के आज्ञापालन का आदेश दिया है।  उसने पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहा है कि उनसे कह दीजिए कि यदि तुम पैग़म्बर का अनुसरण नहीं करोगे तो इससे पैग़म्बरे इस्लाम को कोई नुक़सान नहीं होगा।  इसका कारण यह है कि पैग़म्बर का दायित्व लोगों तक ईश्वर का संदेश पहुंचाना और तुम्हारा दायित्व पैग़म्बर का अनुसरण करना है।  अब अगर तुमने अपने दायित्व का निर्वाह नहीं किया तो इससे पैग़म्बर और ईश्वर को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं होगी।  लेकिन यह याद रखो कि यदि तुमने उसका अनुसरण किया तो फिर तुम्हारा मार्गदर्शन होगा।  पैग़म्बरे जो कुछ भी बोलते हैं वह सब ईश्वर की ओर से होता है।  इस प्रकार से पता चलता है कि अनुसरण केवल ईश्वर का ही किया जाना चाहिए और एसे व्यक्ति को ही मार्गदर्शन प्राप्त होगा।

ईश्वर के अनुसरण का अर्थ है उसके कथन को मानते हुए उन्हें व्यवहारिक बनाना।  पैग़म्बरे इस्लाम के अनुसरण का अर्थ है उनकी करनी और कथनी दोनों को मानते हुए उसपर चलना।  इस बात को इस प्रकार से समझा जा सकता है कि ईश्वर की ओर से जो संदेश पैग़म्बरे इस्लाम लाए उन्हें सुनकर समझा जाए और उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम के व्यवहार से इन ईश्वरीय आदेशों को व्यवहारिक बनाया जाए।  उदाहरण स्वरूप जैसे पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने लोगों को नमाज़ पढ़ने, रोखा रख़ने, हज करने, ज़कात देने और इसी प्रकार के कई ईश्वरीय आदेश दिये।  हम सुनकर तो इन आदेशों को समझ सकते हैं किंतु इन कामों को कैसे अंजाम दिया जाए यह समझाने वाला कोई होना चाहिए।  पैग़म्बरे इस्लाम, ही वे एकमात्र व्यक्ति हैं जो विस्तार से बता सकते हैं कि इन ईश्वरीय आदेशों को कैसे व्यवहारिक बनाया जाए।  इस बारे में स्वयं पैग़म्बरे इस्लाम का कहना है कि ईश्वर ने नमाज़ को अनिवार्य किया है किंतु यह कैसे पढ़ी जाएगी इसके लिए तुम मुझको देखकर सीखो।

रमज़ान के महीने में लोग विभिन्न प्रकार के खाद्ध पदार्थों का सेवन करते हैं।  डाक्टरों का कहना है कि रोज़े के दौरान शहद का प्रयोग करना लाभदायक होता है।  शहद ऐसी चीज़ है जो घुलनशील होने के साथ ही जल्दी हज़्म हो जाता है।  शहद के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि इसका उल्लेख पवित्र क़ुरआन में किया गया है।  क़ुरआन के अनुसार शहद ऐसी चीज़ है जो लोगों को शिफा देती है।  सूरे नहल की आयत संख्या 68 तथा 69 में ईश्वर कहता हैः और तुम्हारे रब ने मुधमक्खी के मन में यह बात डाल दी कि वह पहाड़ों, वृक्षों और लोगों के बनाए हुए छतों में  अपने घर बना दे, फिर हर प्रकार के फल व फूलों से ख़ुराक ले और मार्गों पर चलती रहे फिर अपने पेट से विभिन्न रंग का एक पेय निकाले जिसमें लोगों के लिए उपचार है।  निश्चय ही सोच-विचार करनेवाले लोगों के लिए इसमें बड़ी निशानी है।  इस प्रकार से कहा जा सकता है कि शहद को सहरी और इफतारी दोनों में प्रयोग किया जा सकता है।  शहद के बारे में वनस्पति विज्ञान के एक विशेषज्ञ ग़ुलाम रज़ा कुर्दअफशारी कहते हैं कि शहद को पानी के साथ मिलाकर खाने से अमाशय या मेदा मज़बूत होता है।  वे कहते हैं कि यह भूख को भी नियंत्रित करता है।  अपने भीतर पाई जाने वाली विशेषताओं के कारण शहद, हृदय के इर्दगिर्द की चर्बी को पिघलाता है।  यही कारण है कि डाक्टर, दिल के बीमारों को शहद प्रयोग करने की सिफ़ारिश करते हैं।  इस प्रकार की विशेषताओं को देखते हुए रोज़े के दौरान हमको शहद का प्रयोग करना चाहिए।

 

 

 

Jun १४, २०१७ १३:५१ Asia/Kolkata
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