रमज़ान के पवित्र महीने का अंतिम दशक आरंभ हो गया है, यह वह दशक है जिसमें शबे क़द्र की संभावना अधिक है।

शबे क़द्र को गुप्त रखने का एक कारण यह भी हो सकता है कि मुसलमान, पवित्र रमज़ान का अंतिम दशक, ईश्वर की उपासना, दुआ मांगने तथा पवित्र क़ुरआन की तिलावत करने में व्यतीत करे। यदि शबे क़द्र का पता चल जाए तो बहुत से लोग उसकी रात में उपासना करना पसंद करेंगे और दूसरी रातों में उपासनाओं और इबादतों की बरकतों से दूर रहेंगे। चूंकि शबे क़द्र गुप्त और ग़ैर निर्धिरित है इसीलिए मोमिनों को उन सभी रातों को जिनमें शबे क़द्र की संभावना हो, ईश्वरीय गुणगान और पापों के प्रायश्चित में व्यतीत करना चाहिए और अधिक से अधिक लाभ उठाना चाहिए। इतिहास में मिलता है कि पैग़म्बरे इस्लाम पवित्र रमज़ान के अंतिम दशक में मस्जिद में एतेकाफ़ करते थे। वह एतेकाफ़ के पुण्य को दो हज और दो उमरह के बराबर बताते हैं। जैसे ही पवित्र रमज़ान के महीने के अंतिम दश्क आरंभ होते थे, पैग़म्बरे इस्लाम अपना बिस्तर हटा देते थे और स्वयं को उपासना के लिए पूरी तरह तैयार करते थे और अपने लिए बनाए गये विशेष साए के भीतर जाकर उपासना करते थे।

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पवित्र क़ुरआन के बयान के आधार पर एतेकाफ़, ईश्वरीय उपासना का भाग है और मुसलमानों को इस पर अमल करने के लिए कहा गया है। एतेकाफ़ की महानता के बारे में यही काफ़ी है कि इसको ईश्वर के घर काबे और रुकू और सजदे के बराबर समझा गया है। हज़रत सुलैमान भी बैतुल मुक़द्दस में एतेकाफ़ किया करने थे उनके लिए खाना पानी आता था और वहां पर वे उपासना करते थे । हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने लोगों के मार्गदर्शन और नेतृत्व की भारी ज़िम्मेदारी के बावजूद उनको कुछ समय के लिए छोड़ दिया था और ईश्वर से एकांत में दुआ करने के लिए तूर की पहाड़ी पर गये। हज़रत ज़करिया वह थे जिनपर बैतुल मुक़द्दस में एतेकाफ़ करने वालों की ज़िम्मेदारी थी और उन्होंने हज़रत मरियम सहित बहुत से एतेकाफ़ करने वालों की अभिभावकता की थी।

 

पैग़म्बरे इस्लाम भी अपने पूर्वजों की भांति हज़रत इब्राहीम के धर्म का अनुसरण करते थे और उस धर्म में प्रचलित एतेकाफ़ सहित समस्त उपासनाएं करते थे। पैग़म्बरे इस्लाम ग़ारे हिरा में एतेकाफ़ करते थे। वे पैग़म्बरी की आधिकारिक घोषणा और मक्के से मदीना नगर पलायन करने के बाद मस्जिदे नबी में एतेकाफ़ किया करते थे और अपने ईश्वर से एकांत में अपने दिल की बातें बयान करते थे।

एतेकाफ़ का अर्थ होता है, किसी स्थान पर रुकना, किसी स्थान पर ठहरना और या किसी वस्तु का प्रतिबद्ध होना किन्तु धर्म में इसका अर्थ, ईश्वर से सामिप्य प्राप्त करने के लिए किसी पवित्र स्थल पर रुककर उपासना करता है। एतेकाफ़ एक ऐसा अवसर है जिसमें सांसारिक मायामोह में डूबा मनुष्य स्वयं का हिसाब किताब करता है। एतेकाफ़ करने वाले का इरादा होता है कि वह आध्यात्मिक मूल्यों से लाभ उठाते हुए कुछ समय के लिए अपना हाथ भौतिक चीज़ों से रोके रहे ताकि ईश्वर की असीम कृपा और दया के समुद्र में डूब कर उसकी क्षमा प्राप्त कर सके।

ईश्वर के घर मस्जिद में रुकना, ईश्वर के मेहमान होने के समान है। इस आधार पर एतेकाफ़ का पहला परिणाम यह होता है कि एतेकाफ़ करने वाला ईश्वर की नज़र में सम्मानीय होता है और ईश्वर की अनुकंपाओं, उसकी इबादत और पवित्र क़ुरआन पढ़ने की विभूतियों से लाभान्त्ति होता है। एतेकाफ़ की विभूतियों में से एक तौबा और प्रायश्चित है। तौबा का अर्थ होता है पलटना। पापों से ईश्वर के आज्ञापालन की ओर पलटना, बुराइयों से अच्छाईयों की ओर पलटना, और आत्ममुग्धता से ईश्वर की उपासना की ओर पलटना, इस आधार पर तौबा केवल एक शब्द नहीं है बल्कि पाप छोड़ने के लिए एक कार्य और एक मज़बूत फ़ैसला है। श्रोताओ आशा है कि रमज़ान महीने की इन रातों में कि जिनमें संभावना है कि शबे क़द्र भी हो, हमें क्षमा याचना और तौबा का सामय्य प्रदान करेगा।

 

सूरए नम्ल की आयत संख्या 14 में ईश्वर कहता है कि उन लोगों ने अत्याचार और घमंड की भावना के आधार पर इन्कार कर दिया था वरना उनके दिल को पूरा विश्वास था फिर देखो कि ऐसे भ्रष्ट लोगों का अंजाम क्या होता है।

यह आयत अत्याचारियों की स्थिति बयान करती है, किस प्रकार वे उस चीज़ का इन्कार करते हैं जिस पर ईमान रखते है, इसीलिए पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करते हुए कहती है कि उन लोगों ने अत्याचार और घमंड की भावना के आधार पर इन्कार कर दिया था वरना उनके दिल को पूरा विश्वास था फिर देखि कि ऐसे भ्रष्ट लोगों का अंजाम क्या होता है।

ईश्वरीय दूतों की ज़िम्मेदारियों में से एक लोगों को डराना है। ईश्वरीय दूत पथभ्रष्ट लोगों से आमना सामना होने के बाद उन्हें उस स्थिति से डराते हैं जिसमें वह जीवन व्यतीत कर रहे होते हैं। उनको सचेत करते हैं कि जिन परिस्थितियों में तुम हो उसका भविष्य अंधकारमयी है। सैद्धांतिक रूप से जो लोग निश्चेतना और पापों में डूबे रहते हैं, अपनी सही स्थिति की पहचान नहीं रखते हैं जबकि यह आयत पैग़म्बरे इस्लाम से जो अपने दायित्वों को लेकर बहुत चिंतित हैं, कहती है कि अनेकेश्वरवादियों को चाहें आप डराए या न डराएं, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है और वह अपना रास्ता छोड़ने वाले नहीं हैं। यह वास्तविकता उसकी भांति है जो स्वयं को सोता हुआ दिखाए और अपने आसपास होने वाले शोर शराबे और चीख़ पुकार पर न उठे और यह दिखाए कि वह सो रहा है। जो व्यक्ति वास्तविकता से अवगत होने के बावजूद, अनेश्वरवाद में ग्रस्त रहे, ईश्वरीय दूतों द्वारा उनको डराया और धमकाया जाना लाभहीन है।

ईमान, मनुष्य के अमल और उसकी कार्यवाहियों का आधार है। ईमान का अर्थ, अपने पूरे अस्तित्व से वास्तविकता को स्वीकार करना या अपना दिल किसी चीज़ के हवाले करना है। मनुष्य जब तक अपने दिल को किसी चीज़ के हवाले नहीं करता, तब तक उसके लिए वह प्रयास और कोशिश नहीं करता। यहां पर ज्ञान और ईमान के बीच अंतर स्पष्ट हो जाता है। मनुष्य कभी वास्तविकता से अवगत होता है किन्तु उस पर दिल नहीं लगाता अर्थात ईमान में, केवल ज्ञान और ज्ञानी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस ज्ञान में वृद्धि आवश्यक है।

कभी मनुष्य वास्तविकता से अवगत हो जाता है किन्तु उसके हवाले अपना दिल नही करना और उसके मुक़ाबले में डट जाए। कभी कभी इससे भी बढ़ जाता हे और और वास्तविकता की अनदेखी करते हुए अनेकेश्वरवाद में ग्रस्त हो जाता है। जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपने निमंत्रण पेश किया, तो फ़िरऔन व उसके समर्थक उसे वास्तविक समझे, हज़रत मूसा ने कुछ आयतों और चमत्कारों से उनको मनाने का प्रयास किया, दरबार में हज़रत मूसा का चमत्कार देखने वाले जादूगरों को उनकी वास्तविकता का पता चल गया और वह उन पर ईमान भी ले आए और अंतिम सांस तक अपने ईमान पर डटे रहे, फ़िरऔन के लोगों ने भी यह समझते हुए कि मूसा सच पर हैं, समस्त अत्याचारों और परेशानियों को सहन किया किन्तु कभी भी उन्होंने घुटने नहीं टेके।

आज मेरा मोहल्ले की मस्जिद में जाना हुआ, रमज़ान के महीने में मस्जिद नमाज़ियों से भरी हुई थीं और लोग नमाज़ और दुआओं में व्यस्त थे, पूरा वातावरण दुआओं की आवाज़ से गूंज रहा था, तथी अज़ान हुई और लोग लाइन में खड़े होने लगे नमाज़ पढ़ने के लिए।  मग़रिब की नमाज़ अदा करने के बाद, लोगों के सामने दस्तख़ान बिछाया गया, ताज़ा रोटी और अनेक प्रकार के पकवान की सुगंध चारों ओर फैल गयी, सब के आगे सूप और खजूर रखी थी और सब रोज़ा खोलने की दुआ पढ़कर रोज़ा खोल रहे थे।

ईरानियों के इफ़्तार के दस्तरख़ान में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ जो होती है वह रोटी है। रोटी बहुत अहम होती है और भूख मिटाने में इसकी भूमिका से कोई इन्कार नहीं कर सकता। रोटी खाने से मनुष्य ऊर्जा पाता और वह अंदर से मज़बूत होता है। पैग़म्बरे इस्लाम और इमामों के कथनों में भी रोटी के प्रयोग पर बहुत अधिक बल दिया गया है। पैग़म्बरे इस्लाम का कहना था कि हे ईश्वर, रोटियों से हमें बरकत दे और हमारे व उसके बीच में दूरी पैदा न कर।

पैग़म्बरे इस्लाम का एक अन्य स्थान पर कथन है कि रोटी को महान समझो और उसका सम्मान करो कि ईश्वर ने उसके माध्यम से आसमान से विभूतियां उतारी हैं और धरती की अनुकंपाएं बाहर की हैं, रोटी का सम्मान इस प्रकार से भी किया जाता है कि रोटी को न काटें और उसको पैर के नीचे न आने दें। महारुषों का कहना है कि बेहतरीन सदक़ा, आवश्यकता वाले लोगों को रोटी देना है। यही कारण है कि ईरान में ऐसे अवसरों पर मुफ़्त में रोटियां बांटी जाती हैं, जो कोई मन्नत मानता है और उसके पूरा होने के बाद लोगों में रोटियां बंटवाता है। उनसे कहता है कि एक सलवात पढ़ें और रोटी ले जाएं, उसे कहा जाता है  सलवाती रोटी।

ईरान के प्रसिद्ध आहार विशेषज्ञ बहदादीपूर कहते हैं कि चोकर वाली रोटी ही प्रयोग की जाए। चोकर में फ़ाइबर बड़ी मात्रा में पाया जाता है जिससे शूगर या वसा को गलाने में मदद मिलती है या यह शूगर और वसा का घुलना रोक देती है। जिन लोगों के ख़ून में चर्बी की मात्रा अधिक है उनको सामान्य रोटी के बजाए चोकर वाली रोटी खाना चाहिए, इससे ख़ून की चर्बी नियंत्रित रहती है।

 

 

Jun १४, २०१७ १६:३५ Asia/Kolkata
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