उस रात सितारे बड़े दुख से कूफ़ा नगर की ओर देख रहे थे और चांद ने भी इस शहर के लोगों की बेवफ़ाई के कारण अपना चेहरा बादलों की ओट में छिपा लिया था, ज़मीन भी अपने हाल पर आंसू बहा रही थी।

इस्लामी राष्ट्र न सिर्फ़ यह कि अनाथ हो गया था बल्कि इंसान, शैतान के मुक़ाबले में अपनी प्रतिष्ठा और गौरव के दस्तावेज़ को खो बैठा था। कूफ़ के हर घर और गली कूचे से रोने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। हर क्षण लोगों की चिंता में वृद्धि होती जा रही थी। जब वातावरण में “ईमान वालों के सरदार शहीद हो गए” की आवाज़ गूंजी तो फिर लोगों में खड़े रहने की ताक़त नहीं रह गई। वे अविश्वास के साथ इस ख़बर को दोहरा रहे थे।

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ये वही लोग थे जिनकी बेवफ़ाई और वचन तोड़ने के अवगुण की उनके इमाम और सरदार ने अनेक बार शिकायत की थी। ये वही लोग थे जिनके बारे में उनके नेता ने कहा थाः प्रभुवर यह मुझसे थक गए हैं और मैं इनसे, ये मुझसे ऊब चुके हैं और मेरा दिल इनसे टूट चुका है तो मुझे इनसे अच्छे साथी प्रदान कर और इन पर कोई बुरा शासक थोप दे। जी हां वही लोग अब अत्यंत दुखी और बहुत ज़्यादा शोकाकुल हैं क्योंकि वे जानते हैं कि अली के बिना गुज़रने वाले दिन, मानवता की मौत के अंधकारमय दिन होंगे।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के दामाद और उत्तराधिकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम सभी मानवीय व इस्लामी मान्यताओं के स्वामी एक संपूर्ण इंसान थे। वे न्याय करने वाले शासक, रातों को जागने वाले उपासक, गहरी नज़र रखने वाले तत्वदर्शी, उपासना के दौरान रोने वाले, रणक्षेत्र में बढ़-बढ़ कर हमले करने वाले, साहसी व वीर सिपाही, दयालु व नर्म दिल अभिभावक, दक्ष व निपुण कमांडर, सक्षम शिक्षक, बेजोड़ वक्ता, प्रवीण न्यायाधीश और अद्वितीय साहित्यकार थे। उनके अस्तित्व को जिस पहलू से भी देखा जाए, उसमें आश्चर्यचकित करने वाला कोई न कोई मानवीय प्रतिष्ठा ज़रूर दिखाई देती है जो हर धर्म व मत के मानने वाले को सराहना करने पर विवश कर देती है।

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ब्रिटेन के प्रख्यात दार्शनिक कारलायल कहते हैं। हम अली (अलैहिस्सलाम) को चाहने और उनसे प्रेम करने के अलावा कुछ नहीं कर सकते क्योंकि वे एक महान हृदय वाले साहसी पुरुष हैं। उनकी आत्मा के स्रोत से भलाई के अलावा और कुछ नहीं निकलता था, उनके हृदय से साहस व शौर्य की शोले निकलते थे, वे शेर से ज़्यादा बहादुर थे लेकिन उनकी बहादुरी दया, कृपा, स्नेह और नर्मदली से जुड़ी हुई थी। वे कूफ़ा में शहीद हुए, उनका अत्यधिक न्याय ही इस अपराध की वजह बना, उन्होंने अपनी मौत से पहले अपने हत्यारे के बारे में कहा थाः अगर में ज़िंदा रहा तो मैं ख़ुद उसके बारे में फ़ैसला करूंगा लेकिन अगर मैं मर गया तो फिर फ़ैसला तुम्हें करना होगा, अगर तुम उससे बदला लेना चाहोगे तो एक वार के बदले में सिर्फ़ एक ही वार करना और अगर तुम उसे क्षमा कर दोगे तो यह ईश्वरीय भय के अधिक निकट है।

 

आज लगभग 14 सदियों के बाद भी दुनिया उस व्यक्ति के लिए शोकाकुल है जिसके साथ रहने की लालसा संसार के सभी स्वतंत्रताप्रेमियों के दिल में है। वह व्यक्ति जिसके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा थाः अली वह पहले व्यक्ति हैं। जो प्रलय में मुझसे हाथ मिलाएंगे, वही सिद्दीक़े अकबर अर्थात सबसे बड़े सच्चे और फ़ारूक़ अर्थात असत्य को सत्य से अलग करने वाले हैं।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शहादत, मानव इतिहास की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक है। वे न केवल मुसलमानों के लिए बल्कि सभी सत्य व न्याय प्रेमियों और नैतिक गुणों के खोजियों के लिए एक सम्मानीय आदर्श थे और हैं। यही कारण है कि सभी पवित्र हृदय वाले उनकी शहादत के दिन शोकाकुल हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नमाज़ की स्थिति में मस्जिद में ज़हर से बुझी हुई तलवार से उन लोगों के हाथों शहीद हुए जो अपने आपको मुसलमान कहते थे। उनके बारे में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने कहा थाः हे अली! ईमान आपके अस्तित्व से गूंधा गया और वह आपके मांस और ख़ून में मिश्रित हुआ है जैसा कि वह मेरे मांस और ख़ून में से मिश्रित है। अब भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की कायरतापूर्ण हत्या पर यह सवाल बाक़ी है कि ऐसा क्यों हुआ?

हज़रत अली की शहादत के बारे में विचार करने वाले महान विचारकों और बुद्धिजीवियों में से एक शहीद मुर्तज़ा मुतह्हरी हैं। वे कहते हैं कि हम यह पूछ सकते हैं कि अली को किस व्यक्ति ने मारा? और इसी तरह हम यह भी पूछ सकते हैं कि अली को किस चीज़ ने मारा? अगर यह पूछा जाए कि अली को किसने मारा तो निश्चित रूप से कहा जाएगा अब्दुर्रहमान इब्ने मुल्जिम ने और अगर यह पूछा जाए कि अली को किस चीज़ ने मारा? तो उसके उत्तर में हमें कहना चाहिए कि वैचारिक ठहराव, संकीर्ण मानसिकता और कठमुल्लेपन ने।

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शहीद मुतह्हरी वैचारिक संकीर्णता को इस्लामी समाज के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मानते थे और उनके विचार में ख़वारिज और हज़रत अली के हत्यारे इस बड़े ख़तरे का स्पष्ट नमूना हैं। इस प्रकार के लोग हमेशा से मौजूद रहे हैं और आज भी इस मानसिकता के लोगों की कमी नहीं है। वैचारिक ठहराव और संकीर्ण मानसिकता का मतलब क्या है? उसकी क्या निशानियां हैं? उसके नमूने क्या हैं और वह क्योंकि इतनी ख़तरनाक है कि हमेशा उसकी ओर से चौकन्ना रहना चाहिए?

शहीद मुतह्हरी के विचार में वैचारिक ठहराव, संकीर्ण मानसिकता और कठमुल्लापन ही मस्जिद में हज़रत अली अलैहिस्सलमा की शहादत जैसी त्रासदी का कारण बना और मानव समाज के सामने यह ख़तरा हमेशा लगा रहता है। चिंतन और धर्मावलंबन, कल्याण व परिपूर्णता की ओर उड़ान के लिए किसी भी व्यक्ति या समाज के लिए दो पंखों के समान होते हैं। इनमें से केवल किसी एक पंख के साथ उड़ान संभव नहीं है। सुन्नी मुसलमानों के प्रख्यात धर्मगुरू इब्ने अबिल हदीद कहते हैं। अगर आप यह समझना चाहते हैं कि वैचारिक संकीर्णता और अज्ञानता क्या है तो इस बात पर ध्यान दीजिए कि जब हज़रत अली के हत्यारों ने उन्हें मारने की योजना बनाई तो ख़ास करके इसके लिए 19वीं रमज़ान की रात को चुना। उन्होंने कहा कि हम ईश्वर की उपासना करना चाहते हैं और चूंकि हम एक अच्छा काम करने जा रहे हैं तो बेहतर है कि इसे रमज़ान की इन पवित्र रातों में से एक में करें ताकि हमें प्रलय में अधिक पारितोषिक मिले।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हत्यारे अधर्मी नहीं थे बल्कि वे धर्म की विदित बातों पर सीमा से अधिक ध्यान देने के कारण, पाप करने वाले को भी काफ़िर मानते थे और यही वह चीज़ थी जिसने उनकी भावनाओं को ख़तरनाक बल्कि अत्यंत ख़तरनाक बना दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि आज सदियों बाद भी इस्लामी जगत को इसी समस्या का सामना है और इस समय भी वही विचार मौजूद हैं जो हज़रत अली अलैहिस्सलाम की हत्या का कारण बने थे। शायद कहा जा सकता है कि तकफ़ीरी, जिनका स्रोत भ्रष्ट वहाबी मत है, उन्हीं ख़वारिज का नया रूप हैं जिन्होंने हज़रत अली की हत्या की थी और जो आज निराधार बहानों से दुनिया के अधिकांश शिया व सुन्नी मुसलमानों को काफ़िर कहते हैं और मुसलमानों का ख़ून बहाते हैं।

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शहदी मुतह्हरी हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बारे में लिखी गई अपनी एक किताब में ख़वारिज के विचारों की निशानियों को बयान करते हुए कहते हैं। वे बलिदान देने और लड़ने की भावना रखते थे और अपनी आस्थाओं के मार्ग में जी तोड़ कोशिश करते थे। वे उपासना करने वाले लोगो थे जो रात भर उपासना करते थे और सांसारिक मायामोह से दूर रहते थे लेकिन वे अज्ञानी थे और अज्ञान के कारण सच्चाई को नहीं समझ पाते थे और उसकी ग़लत व्याख्या करते थे। इसी तरह वे संकीर्ण दृष्टि वाले लोग थे। उन्होंने इस्लाम को अपने विचारों की चार दीवारी में सीमित कर रखा था और उनका दावा था कि सभी लोग या तो ग़लत समझते हैं या फिर बिल्कुल नहीं समझते और सभी का ठिकाना नरक है। इस प्रकार के विचार, धर्म को समझने में बुद्धि व तर्क से दूरी का परिणाम हैं जो समाज के लिए अत्यंत हानिकारक हैं।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ख़वारिज को संबोधित करते हुए कहा थाः निश्चित रूप से तुम लोग सबसे बुरे हो, तुम शैतान के हाथों में तीर की तरह हो और वह तुम्हारे घृणित अस्तितव को अपने लक्ष्य साधने के लिए इस्तेमाल करता है और तुम्हारे माध्यम से लोगों को शक और पथभ्रष्टता में धकेल देता है। वास्तविकता यह है कि ख़वारिज, सत्ताधारियों के हथकंडे में बदल गए थे या दूसरे शब्दों में इस प्रकार के लोगों की अज्ञानता का ख़तरा इस दृष्टि से है कि वे चतुर लोगों की कठपुतली बन जाते हैं और उच्च इस्लामी हितों की राह में रुकावटें खड़ी कर देते हैं। हमेशा ही अधर्मी मिथ्याचारी, अपने आपको धर्म का ठेकेदार समझने वाले मूर्खों को इस्लामी हितों के ख़िलाफ़ उकसाते हैं। आज सीरिया, इराक़ व यमन की स्थिति पर नज़र डाल कर इस बात को आसानी से समझा जा सकता है।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसार ख़वारिज के कारण सामने आने वाली दूसरी ख़तरनाक बात, लोगों के बीच पथभ्रष्टता फैलना है। ख़वारिज धार्मिक नारों का सहारा लेकर और धर्म की विदित बातों पर अमल करके लोगों को धोखा देते थे। हज़रत अली इस भावना को एक ख़तरनाक संक्रामक रोग की संज्ञा देते हैं और कहते हैं कि ख़वारिज के धोखा देने वाले विदित रूप के कारण मेरे अलावा किसी में भी इस फ़ितने की आंख फोड़ने का साहस नहीं था। वे कहते हैं कि सिर्फ़ मैं ही था जो इस्लाम के लिए इन कठमुल्लाओं के बड़े ख़तरे को समझ गया था। इनके माथों पर सज्दे के निशान, इनकी मामूली कपड़े, उनकी ज़बान से ईश्वर का गुणगान और इनकी ठोस आस्थाएं भी मेरी दूरदर्शिता को धोखा न दे सकीं। मैं समझ गया था कि अगर ये मज़बूत हो गए तो सभी को अपनी पीड़ा में ग्रस्त कर देंगे और इस्लामी जगत को ऐसे वैचारिक ठहराव व मानसिकता संकीर्णता में उलझा देंगे जिससे इस्लाम की कमर झुक जाएगी। क्या पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने नहीं कहा था कि दो गुटों ने मेरी कमर तोड़ी है, एक कर्म न करने वाला ज्ञानी और दूसरे अपने आपको धर्म का ठेकेदार समझने वाला अज्ञानी।

जी हां वह सिर्फ़ अली अलैहिस्सलाम थे जिन्होंने मानव इतिहास में अपने बेजोड़ गुणों के साथ हमेशा के लिए मिथ्या और संकीर्ण मानसिकता को अपमानित कर दिया था इस प्रकार से कि आज 14 सदियां बीत जाने के बाद भी मुसलमानों के पास सत्य और असत्य को समझने की ठोस कसौटी मौजूद है। सलाम हो अली पर जिस दिन वे काबे में पैदा हुए, सलाम हो अली पर जिस दिन उन्हें मस्जिद में अत्याचार के साथ शहीद किया गया और सलाम हो अली पर जिस दिन वे पूरे गौरव के साथ प्रलय में उपस्थित होंगे।

 

Jun १७, २०१७ १४:३३ Asia/Kolkata
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