पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैही व आलेही व सल्लम ने फरमाया है कि ईश्वर का ऐसा कोई बन्दा नहीं है कि वह सच्चाई, निष्ठा और ईमान के साथ शबे क़द्र अर्थात क़द्र की रात को जागे और ईश्वर उसके समस्त पापों को माफ़ कर न दे।

“ सलाम हो उस रात पर जिसे महान व सर्वसमर्थ ईश्वर ने एक हज़ार महीनों से बेहतर बताया है। सलाम हो उस रात पर जिसका हर क्षण ईश्वरीय दया व कृपा से ओत-प्रोत है और सलाम हो उस रात पर कि पवित्र कुरआन की वास्तविकता इस रात में पैग़म्बरे इस्लाम के हृदय पर नाज़िल हुई। यह बहुत ही मूल्यवान समय है। रमज़ान के पवित्र महीने की 23 तारीख़ को इस बात की बहुत अधिक संभावना है कि आज ही की रात शबे क़द्र अर्थात क़द्र की रात है जिसे महान ईश्वर ने एक हज़ार रातों से बेहतर बताया है।

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हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम शबे क़द्र के महत्व व स्थान के बारे में फरमाते हैं” शबे क़द्र रमज़ान महीने का दिल है।“ इस आधार पर अगर कोई रमज़ान के पवित्र महीने से अच्छी तरह लाभ उठाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह शबे क़द्र से भरपूर लाभ उठाये। इस रात में महान ईश्वर की उपासना करने, पवित्र कुरआन की तिलावत और प्रार्थना करने पर बहुत बल दिया गया है और ये वे चीज़ें हैं जो ईश्वरीय ज्ञान व प्रेम को स्वीकार करने के लिए दिल का विशुद्धीकरण करती हैं। चिंतन- मनन करने और निर्णय लेने के लिए शबे क़द्रे बहुत ही महत्वपूर्ण व मूल्यवान अवसर है। क्योंकि शबे क़द्र भविष्य निर्धारित करने की रात है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हर इंसान अपने लिए अच्छा से अच्छा भविष्य चाहता है परंतु इसके लिए सोच- विचार और चिंतन- मनन की आवश्यकता है कि क्या चीज़ अच्छा भविष्य हो सकती है? इस रात में क़ुरआन नाज़िल हुआ है, इस रात में गुट -2 में फरिश्ते ज़मीन पर उतरते हैं, वे मोमिनों की सभाओं को देखते हैं, उन्हें सलाम करते हैं और सुबह तक उनकी दुआओं के स्वीकार होने के लिए आमीन कहते हैं। हे पालनहार हम शबे क़द्र में तेरी क्षमा की आशा के साथ तेरी कृपा के आसमान की ओर देखते हैं। आज रात में हम सुबह तक जाग रहे हैं। हमारे दिल में जो तेरे प्रेम का पौधा है उसकी सिंचाई हम प्रायश्चित के आंसूओं से कर रहे हैं और अपनी आत्मा का शुद्धीकरण तेरी याद व कृपा से कर रहे हैं। हे मेरे पालनहार अपनी असीमित कृपा व दया से मेरे पापों को माफ कर दे और मुझे इस रात में जागने का सामर्थ्य प्रदान कर।

                        

आज रात बहुत सी दुआएं पढ़ी जाती हैं उनमें से एक दुआए जौशने कबीर है। इस दुआ में बहुत ही मूल्यवान व उच्च विषयों का उल्लेख है। इस दुआ में हम ईश्वर की महानता का गुणगान करते हैं। इस दुआ को पढ़ने से इंसान की आत्मा महान ईश्वर की याद में डूब जाती है और उसका संपूर्ण अस्तित्व ही आध्यात्मिक वातावरण में डूब व लीन हो जाता है। इस दुआ के एक भाग में हम पढ़ते हैं” हे परेशान लोगों के मार्गदर्शक, हे मदद चाहने वालों की मदद करने वाले, हे पुकारने वालों की पुकार सुनने वाले, हे शरण चाहने वालों की शरण, हे डरने वालों का आश्रय, हे मोमिनों की मदद करने वाले, हे मिसकीनों व बेसहारा लोगों पर दया करने वाले, हे पापियों की शरण, हे पापों को माफ करने वाले, हे परेशान लोगों का जवाब देने वाले तू पाक है हे पालनहार! तेरे अलावा कोई पूज्य नहीं है हे पालनहार हमें नरक की आग से बचा।“

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पवित्र कुरआन के सूरये यासिन की 11वीं आयत में महान ईश्वर कहता है (हे पैग़म्बर) आप केवल उसे सावधान करने वाले हैं जो कुरआन का अनुसरण करता है और अकेले में ईश्वर से डरता है तो इस प्रकार के व्यक्ति को क्षमा और मूल्यवान प्रतिदान की खुशखबरी दे दीजिये।“

पवित्र कुरआन की यह आयत इस बात की सूचक है कि इंसान किस सीमा तक नसीहत और अच्छाई को स्वीकार करता है। जो लोग अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ की उपेक्षा करते हैं, अपनी बुद्धि व विवेक से काम नहीं लेते हैं और दूसरों की तर्कसंगत बातों की भी परवाह नहीं करते हैं निश्चित रूप से वे स्वयं को ईश्वरीय मार्गदर्शन से वंचित करते हैं परंतु जो लोग बातों को सुनते हैं और चिंतन- मनन करते हैं तो ऐसे लोगों के लिए मार्गदर्शन का द्वार हमेशा खुला है।

महान ईश्वर पैग़म्बरे इस्लाम से फरमाता है आप केवल उन लोगों पर प्रभाव डालेंगे यानी आपकी बातें उन लोगों पर असर करेंगी जो कुरआन की आयतों को सुनेंगे।

लोग पैग़म्बरे इस्लाम की सत्य बात को न सुन लें इसके लिए कुरैश ने कुछ लोगों को उकसा रखा था कि जब भी पैग़म्बरे इस्लाम काबे में या उसके समीप कुरआन पढ़ें तो शोर- शराबा मचा दें ताकि कोई कुरआन की आयतों को न सुन सके। अतः पवित्र कुरआन की इस आयत में महान ईश्वर कहता है कि वे लोग मार्गदर्शन के योग्य हैं जो कुरआन को सुनें और उसका अनुसरण करें और इसी तरह वे अकेले में ईश्वर से डरें। इस आयत में जो यह कहा गया है कि अकेले में ईश्वर से डरें तो इसी बिन्दु की ओर संकेत है कि मित्याचारियों की भांति न हों जो लोगों की उपस्थिति में ईश्वर से डरने और सदाचारिता का दिखावा करते हैं परंतु जब वे अकेले में होते हैं तो लेशमात्र भी ईश्वर से नहीं डरते।  

जब इंसान का सामना किसी बड़ी हस्ती से होता है तो उसके रोब से इंसान के अंदर जो हालत पैदा होती है उसे खशियत कहते हैं। इसमें और उस भय में अंतर होता है जो प्रकोप के भय से अस्तित्व में आता है। इस आयत में खशियत का उल्लेख ईश्वर की दयालुता के साथ हुआ है ताकि इस बिन्दु की ओर संकेत किया जाये कि मोमिन की खशियत वह भय है जो आशा के साथ होती है। यह वह हालत है जिसके कारण बंदा महान ईश्वर की उपासना में व्यस्त व लीन हो जाता है। इस हालत में बंदा न तो अपने कर्मों से प्रसन्न होता है और न ही स्वयं को ईश्वरीय प्रकोप से सुरक्षित समझता है पर साथ ही वह महान ईश्वर की कृपा व दया से निराश भी नहीं होता है।

जो लोग मार्गदर्शन पाते हैं, पवित्र कुरआन को सुनते हैं और अकेले में महान ईश्वर से डरते हैं उनके लिए दो प्रतिदान हैं पहला यह कि महान ईश्वर उनके पापों को क्षमा कर देगा और दूसरे यह कि उन्हें प्रतिदान में बड़ी चीज़ दी जायेगी। जिस तरह से अगर कोई बागबान किसी ज़मीन में कोई पौधा लगाना चाहता है तो सबसे पहले वह उस जगह से घास- फूस साफ करता है और मिट्टी को सही करता है उसके बाद उसमें पौधा लगाता है ठीक उसी तरह महान ईश्वर सबसे पहले बंदों के पापों को माफ कर देगा ताकि वे बड़े प्रतिदान को स्वीकार करने के योग्य हो जायें और यह बड़ा प्रतिदान स्वर्ग में अमर जीवन के अतिरिक्त कुछ और नहीं होगा। वहां पर इंसान हर प्रकार की सुख- सुविधा से सम्पन्न होगा, आराम ही आराम होगा और इंसान को कभी भी मौत नहीं आयेगी।          

यह बात आपने अवश्य सुनी होगी कि स्वस्थ आत्मा स्वस्थ शरीर में होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि खाने- पीने का प्रभाव शरीर के अलावा आत्मा पर भी पड़ता है। इस संबंध में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” जान लो आत्मा की शक्ति व क्षमता शरीर के मिज़ाज के अनुरूप होती है।“

जिस तरह से पिंजड़े में पक्षी बंद होता है उसी तरह से इंसान की आत्मा उसके शरीर में बंदी होती है। जितना उसका शरीर स्वस्थ होगा उतना ही उसकी आत्मा भी स्वस्थ होगी। आज यह बात स्पष्ट हो गयी है कि खाने की कुछ चीज़ों का प्रभाव इंसान के व्यवहार पर पड़ता है। जैसे अंगूर दुःख व अवसाद को प्रसन्नता में परिवर्तित करता है। सेब खाने से स्नायुतंत्र मजबूत होता है और चेहरे का रंग साफ होता है।

इसी तरह से हलीम नाम का एक विशेष खाना है जिसके खाने से उपासना करने में स्फूर्ति अधिक होती है। हलीम उन खानों में से एक है जिसे रमज़ान महीने में खासतौर पर बनाया जाता है और ईरानी उसे बहुत पसंद करते हैं और रमज़ान के महीने में उसे जगह- जगह पर बनाया जाता है। शाम को मग़रिब की अज़ान से पहले जगह- जगह आप हलीम खरीदने वालों को लंबी- लंबी लाइनों में देख सकते हैं। हलीम कैलोरीयुक्त खाना है। आम तौर पर 100 ग्राम हलीम में 190 कैलोरी होती है, 6 ग्राम प्रोटीन, 10 ग्राम वसा, 20 ग्राम कार्बोहाइड्रेड, एक मिलीग्राम आयरन और नौ मिलीग्राम कैल्शियम होता है। हलीम ईरान के प्राचीन खानों में से एक है। शाम को लोग रोज़ा खोलने के बाद उसे खाना खाने से पहले खाते हैं जबकि कुछ लोग उसे सहरी में भी खाते हैं। हलीम ऐसा खाना है जिसे सब यहां तक कि बच्चे भी बड़े चाव से खाते हैं। हलीम को बनाने के लिए गेहूं, प्याज़, बछड़े का मांस या मुर्गे अथवा टर्की और थोड़े से तेल का प्रयोग करते हैं। चूंकि हलीम में गेहूं होता है इसलिए उसके खाने से पेट अच्छी तरह पेट भर जाता है। साथ ही वह मैंग्नेशियम और आयरन का भी अच्छा स्रोत होती है। अलबत्ता अगर हलीम तैयार करने में चोकरयुक्त गेहूं का प्रयोग किया जाये तो पाचनतंत्र, आंत और सीने का कैंसर जैसी कुछ बीमारियों के उपचार में भी लाभदायक है। क्योंकि चोकरयुक्त गेहूं में फाइबर बहुत अधिक मात्रा में होता है और उसमें जो फाइबर होता है वह खून में मौजूद कोलेस्ट्राल को कम करने, रक्त चाप को कम करने, खून में मौजूद शर्करा को नियंत्रित करने, दिल के स्वास्थ्य के बेहतर होने और दिल से संबंधित दूसरी बीमारियों को कम होने का कारण बनता है। इसी प्रकार बड़ी आंत के कैंसर जैसी दूसरी बीमारियों के उपचार में भी प्रभावी है। चोकरयुक्त गेहूं में पेट के कीड़े मारने विशेषता होती है और उससे स्नायुतंत्र से जुड़ी बीमारियों के उपचार में सहायता मिलती है। एक आहार विशेषज्ञ कहते हैं” हलीम बहुत ही पौष्टिक भोजन है परंतु अगर आप खून में चर्बी या शर्करा के अधिक होने की समस्या से पीडित हैं तो इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हलीम खाने में आप शकर या तेल का प्रयोग न करें या करें तो बहुत कम। वह कहते हैं अगर हलीम को घर में और चोकरयुक्त या अंकुरित गेहूं से तैयार किया जाये तो बहुत अच्छा है। बचे हुए हलीम का सेवन नहीं करना चाहियें क्योंकि हलीम अगर कुछ घंटे या कई दिनों तक रखा रहता है तो उसके खाने से वह देर में पचता है और वह पाचनतंत्र की समस्या का कारण बनता है। हलीम प्रोटीन से मालामाल खाना है और वह देर में पचता है इसी कारण जब रोज़ेदार उसे सहरी में खाता है तो काफी समय तक वह भूख का एहसास नहीं करता है।

                       

 

Jun १७, २०१७ १५:२३ Asia/Kolkata
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