रमज़ान का पवित्र महीना चल रहा है।

इस महीने ज़मीन पर महान व सर्वसमर्थ ईश्वर की कृपा हर समय से अधिक होती है और इस दया के चिन्हों को विशेषकर इस्लामी समाजों में बहुत देखा जा सकता है। अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार मुसलमानों में एक अच्छी व सुन्दर परम्परा रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ेदार मुसलमानों को इफ्तारी देना है। यह पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों की सुन्दर परम्पराओं में से एक है।

मग़रिब अर्थात शाम की अज़ान होने में कुछ मिनट शेष थे। दुआ की सुन्दर व मनमोहक आवाज़ कानों में रस घोल रही थी। इफ्तारी के दस्तरखान ने घर को एक विशेष सुन्दरता प्रदान कर रखी थी।

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मां इफ्तारी कर रही थी। घर की छोटी लड़की सारा हर चीज़ को बड़ी उत्सुकता और जिज्ञासा की नज़र से देख रही थी। बाप के हाथ में रोटी थी वह मुस्कराते हुए घर में प्रविष्ट हुए। दादा दादी फूफी, मामू और मौसी सब उनके घर में मेहमान थे ताकि प्रेम से ओत- प्रोत वातावरण में अपना रोज़ा खोलें। अज़ान की मधुर ध्वनि आने लगी। दिल की एक विशेष आध्यात्मिक स्थिति हो गयी। जब दादा अपनी जगह से उठे तो सभी उनके सम्मान में खड़े हो गये। उन्होंने सब को प्रेम भरी नज़रों से देखा। शायद उस समय के आध्यात्मिक वातावरण में वह दुआ कर रहे थे कि हे पालनहार इस प्रेम को उस समय भी बाकी रख जब हम इनके बीच न रहें। दादा के कहने पर सब लोग प्रेम के साथ दस्तरखान के चारों ओर बैठ गये। दादा ने अपना हाथ आसमान की ओर उठाया, दुआ पढ़ी और सबने आमीन कही। इस मेहमानी की सुन्दर यादें सारा के ज़ेहन में हमेशा के लिए रह गयीं। जब वह बड़ी हो जायेगी तो निश्चिय ही इस सुन्दर परम्परा पर अमल करेगी और इफ्तारी के प्रेमपूर्ण दस्तरखान से लोगों के दिलों को एक दूसरे से निकट करेगी। रोज़ेदारों की इफ्तारी का बहुत पुण्य है। इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं” अपने आपको नरक की आग से बचाओ चाहे रोज़ेदारों को आधी खजूर या एक घूंट पानी ही देकर।“

इफ्तारी देना एक अच्छी व सुन्दर परम्परा है। इससे सामाजिक और मुसलमानों के मध्य संबंधों को मजबूत करने में सहायता मिलती है। इस्लाम प्रेम का धर्म है और वह बल देकर कहता है इंसानों के एक दूसरे से संबंधों का आधार प्रेम, सम्मान और शिष्टाचार होना चाहिये। दूसरों के साथ सामाजिक संबंधों में पैग़म्बरे इस्लाम दूसरों से अधिक प्रेम और उनका सम्मान करते थे। रवायत में है कि जो भी पैग़म्बरे इस्लाम से मुलाक़ात करता था वह उनके अद्वितीय व्यक्तित्व का प्रेमी हो जाता था। जब भी पैग़म्बरे इस्लाम दूसरों से मुलाकात करते थे तो बहुत ही अच्छे व नर्म भाव के साथ मिलते थे और उनके चेहरे पर मुस्कान होती थी। एक स्थान पर पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैं”

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कुछ लोग भलाई और बुराई के स्रोत व कुंजी हैं। भाग्यशाली वे लोग हैं जिन्हें ईश्वर ने अच्छाई व भलाई की कुंजी दे दी है।“

दूसरों की सहायता करना या उन्हें प्रसन्न करना विभिन्न रूपों में हो सकता है। कभी एक दोस्त से सहानुभूति जताने से उसके दिल से दुःख दूर हो जाता है और कभी थोड़ी सी सहानुभूति जताने से एक इंसान के जीवन की एक बड़ी समस्या का समाधान हो जाता है और यह सहानुभूति उसके दिल में प्रेम का बीज बो देती है। पैग़म्बरे इस्लाम एक अन्य कथन में लोगों को खुश करने के तीन नमूनों को बयान करते और फरमाते हैं” बेहतरीन कार्य मोमिन को प्रसन्न करना है, या उसके कर्ज़ को अदा कर देना, या उसकी किसी ज़रूरत को पूरा कर देना या दुःख व कठिनाइ को उससे दूर कर देना।  

                          

महान व सर्वसमर्थ ईश्वर पवित्र कुरआन के सूरये ताहा की 74-75वीं आयत में कहता है” जो अपने पालनहार के पास अपराधी की हालत में आयेगा उसका ठिकाना नरक है उसमें न तो उसे मौत आयेगी और न ही ज़िन्दा रहेगा और जो उसकी बारगाह में इस हालत में जाये कि वह मोमिन हो और अच्छा कार्य किये हो तो उसके लिए ऊंचे दर्जे हैं।“

पवित्र कुरआन की इन आयतों में फिरऔन के जादूगरों द्वारा हज़रत मूसा पर ईमान लाने के बाद का वर्णन है। फिरऔन ने जादूगरों से कहा था कि विजयी होने की स्थिति में वह उन्हें अपने दरबार में विशेष स्थान देगा परंतु जब वे हज़रत मूसा पर ईमान ले आये तो उसने उन लोगों को हाथ- पैर काट देने और सूली पर चढ़ा देने की धमकी दी।

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इन आयतों में जो चीज़ महत्वपूर्ण दिखाई देती है वह दिल की गहराइयों से जादूगरों का परिवर्तित हो जाना और हज़रत मूसा पर ईमान का लाना है। इन जादूगरों का हज़रत मूसा से सामना उस समय हुआ था जब वे हज़रत मूसा के मुखर दुश्मन थे परंतु हज़रत मूसा का एक ही चमत्कार देखने के बाद वह जागरुक हो गये और उन्होंने तुरंत अपना रास्ता बदल दिया जिसे देखकर सब हतप्रभ रह गये। उन्होंने कुफ्र व गुमराही का  रास्ता छोड़कर ईमान का रास्ता पकड़ा जिसे देखकर सभी हतप्रभ रह गये और शायद फिरऔन को भी विश्वास नहीं आ रहा था। इस आधार पर उसने इस कार्य को पहले से सोचा- समझा षडयंत्र बताने की चेष्टा की जबकि वह स्वयं जानता था कि यह झूठ है।

जो चीज़ जादूगरों के शीघ्र परिवर्तित होने का कारण बनी वह उनका ज्ञान था। वह इस चीज़ को अच्छी तरह समझ गये थे कि हज़रत मूसा का कार्य कोई जादू नहीं है बल्कि चमत्कार है इसलिए वे हज़रत मूसा पर ईमान लाये और उन्होंने हाथ -पैर काट देने और सूली पर चढ़ा देने की फिरऔन की धमकी की कोई परवाह नहीं की। इस आधार पर इन आयतों से अच्छी तरह समझा जा सकता है कि लोगों या समाजों को परिवर्तित होने के लिए हर चीज़ से पहले उन्हें अवगत करना चाहिये।

इन आयतों में दूसरा ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि जो लोग भी हैं या वे पापी व अपराधी हैं और इसी हालत में ईश्वर की बारगाह में हाज़िर होंगे या अच्छे व मोमिन हैं और इसी हालत में ईश्वर के दरबार में पहुंचेंगे। अगर पापी व अपराधी होंगे तो उनका ठिकाना नरक की आग होगी और अगर मोमिन होंगे तो स्वर्ग में ऊंचे दर्जे होंगे और वहां हर प्रकार की नेअमत से उनका आतिथ्य सत्कार किया जायेगा।

खाजा अब्दुल्लाह लिखते हैं” यह दोनों आयतें दो गुटों की ओर संकेत करती हैं एक गुट जो ईश्वरीय प्रकोप का पात्र बनता है उसे मौत नहीं आयेगी कि आराम मिल जाये और न ही ज़िन्दगी होगी कि आनंद उठाये। दूसरा गुट उन लोगों का होगा जो ईश्वरीय दया व कृ पा के पात्र होंगे और हर वक्त उन्हें पवित्र जाम पिलाया जायेगा। अतः बंदे को चाहिये कि अपने सामने से निश्चेतना का पर्दा हटाये और अपने कार्यों को धर्म व ईश्वरीय इच्छा के मुताबिक अंजाम दे।

रमज़ान महीने के अंतिम दिन चल रहे हैं। आजकल दिन भी लंबे हो रहे हैं और गर्मी भी काफी पड़ रही है जिसकी वजह से रोज़ेदारों को भूख- प्यास के कारण होने वाली तकलीफ दो बराबर हो जाती है और शरीर में पानी की कमी हो जाती है। जो लोग गर्मी के इन दिनों में रोज़ा रखते हैं और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए खाने- पीने से परहेज़ करते हैं उन सबसे हम सिफारिश करते हैं कि रमज़ान के महीने में प्यास कम लगे इसके लिए वे आलबालू PRUNUS cerasus खाना न  भूलें। आलबालू प्यास को कम करता है, खून साफ करता है और स्कीन को कोमल व अच्छा बनाता है। रोज़ा रखने से पहले आड़ू और उसे जैसे फलों को खाना चाहिये क्योंकि ये फल असाधारण रुप से पीड़ा को कम करने और अमाशय में बनने वाली एसिड कम करने का कारण बनते हैं और जो खनिज पदार्थ शरीर से कम हो गये हैं किसी सीमा तक उनकी भरपाई कर देते हैं। जूस पीकर, रसीले फलों को खाकर और सज़्ज़ी का सेवन करके शरीर से समाप्त हो गये पौष्टिक पदार्थों की कमी को पूरा किया जा सकता है। रसदार और स्ट्राबेरी जैसे फल पानी की आपूर्ति के अलावा कैल्शियम, फाइबर, लोहा, पोटैशियम, विटामिन ए, बी और सी जैसे ज़रूरी पदार्थों की भी आपूर्ति कर देते हैं। इसी प्रकार तरबूज और खरबूज भी शरीर में पानी की ज़रुरत जैसे आवश्यक पदार्थों को पूरा करते हैं। इफ्तारी और सहरी के बीच में इन चीज़ों को खाना चाहिये। नीबू के सेवन से भी प्यास को कम करने में सहायता मिलती है। प्यास को रोकने के लिए सूखाये गये पुदीने की पत्ती को उबालना चाहिये और उसे शहद के साथ मिलाकर पीना चाहिये। यह प्यास को रोकने में चमत्कारिक गुण रखता है। इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि कुछ लोग प्यास रोकने के लिए सुबह सहरी के बाद चाय पीते हैं जो गलत है विशेषकर डार्क चाय।

प्राचीन चिकित्सा में कहा गया है कि कुलफे का शाक खाने से प्यास रोकने में बहुत मदद मिलती है। इसके पत्ते मोटे और गूदेदार होते हैं और उसके बीज काले और छोटे होते हैं। कुलफा मेंथी की तरह होता है। प्रसिद्ध ईरानी विद्वान व चिकित्सक अबू अली सीना लिखते हैं कुलफा गर्मी, प्यास और पित्त को दूर करता है। गर्मी में रमज़ान के महीने में कुलफे का सेवन प्यास रोकने में बहुत प्रभावी है। इफ्तारी और सहरी में कुलफे का शाक खाना चाहिये और शर्बत में उसके बीज का सेवन करना चाहिये।

प्राचीन चिकित्सा के अनुसार कुलफा का असर बहुत ठंडा होता है और उसके खाने से कब्ज़ होती है। बहुत से अरब देशों में कुलफा खाने वाली सब्जी के रूप में रूप में बेचा जाता है। निचोड़ या कूट कर कुलफे का जो रस निकाला जाता है उसका प्रयोग दर्द को खत्म करने, जले हुए घाव को ठीक करने, सूजन कम करने और दाने व फोड़े को सही करने के लिए किया जाता है।

 

 

Jun १९, २०१७ १३:५८ Asia/Kolkata
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