विश्व क़ुद्स दिवस, स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी का एक बुद्धिमत्तापूर्ण क़दम है जो अब भी फ़िलिस्तीन और बैतुल मुक़द्दस की समस्या को पूरे संसार के लोगों के मन में बाक़ी रखे हुए है।

उन्होंने रमज़ान महीने के अंतिम शुक्रवार को विश्व क़ुद्स दिवस नाम देकर पूरे संसार के मुसलमानों से अपील की कि वे इस दिन फ़िलिस्तीनी जनता के क़ानूनी अधिकारों के समर्थन में एकजुटता का प्रदर्शन करें। इस प्रकार उन्होंने फ़िलिस्तीन समस्या को इस्लामी जगत की सबसे बड़ी समस्या में बदल दिया। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने 16 मुर्दाद 1358 हिजरी शमसी बराबर 13 रमज़ान सन 1399 हिजरी क़मरी को लेबनान में अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के अमानवीय अपराधों का नया सिलसिला शुरू होने के बाद एक संदेश जारी करके रमज़ान के पवित्र महीने के अंतिम शुक्रवार को विश्व क़ुद्स दिवस के रूप में निर्धारित किया।

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उनके संदेश के एक भाग में कहा गया थाः मैं संसार के सभी मुसलमानों और इस्लामी सरकारों से अपील करता हूं कि वे अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन और उसके समर्थकों को अत्याचारों से रोकने के लिए एकजुट हो जाएं, मैं संसार के सभी मुसलमानों को निमंत्रण देता हूं कि वे रमज़ान के पवित्र महीने के अंतिम शुक्रवार को, क़द्र के दिनों में से है और फ़िलिस्तीनी जनता के भविष्य के लिए निर्णायक हो सकता है, क़ुद्स दिवस के रूप में चुनें और मुसलमानों के क़ानूनी अधिकारों के समर्थन में संसार के मुसलमानों की एकजुटता दर्शाने के कार्यक्रम में इसकी घोषणा करें।

इमाम ख़ुमैनी ने अनेक बार अपने बयानों में विश्व क़ुद्स दिवस के महत्व का उल्लेख किया है। उदाहरण स्वरूप उन्होंने एक बार कहा था कि क़ुद्स दिवस एक अंतर्राष्ट्रीय दिवस है, यह ऐसा दिन नहीं है जो केवल बैतुल मुक़द्दस से विशेष हो, यह साम्राज्यवादियों से अत्याचारग्रस्त लोगों के मुक़ाबले का दिन है, यह बड़ी शक्तियों से अमरीका इत्यादि के अत्याचारों में पिसने वाले राष्ट्रों के मुक़ाबले का दिन है। क़ुद्स दिवस, इस्लाम का दिन है। यह वह दिन है जिसमें इस्लाम को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए और इस्लामी देशों में इस्लाम के क़ानूनों को लागू किया जाना चाहिए। क़ुद्स दिवस वह दिन है जिसमें हमें सभी बड़ी शक्तियों को चेतावनी देनी चाहिए कि इस्लाम अब तुम्हारे नियंत्रण में नहीं रहेगा, क़ुद्स दिवस, इस्लाम के जीवन का दिन है।

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इमाम ख़ुमैनी के संदेश और विचार यह दर्शाते हैं कि बैतुल मुक़द्दस और फ़िलिस्तीन का मामला, कुछ अरब देशों का नहीं बल्कि पूरे इस्लामी जगत की सबसे बड़ी समस्या है और इस्लामी जगत को इस निर्णायक मामले में एकजुट रहना चाहिए। विश्व क़ुद्स दिवस ने अतिग्रहणकारी और अपराधी ज़ायोनियों के मुक़ाबले में फ़िलिस्तीनी जनता की मज़लूमियत को उजागर किया और आज स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के इसी क़दम के कारण पश्चिमी एशिया से लेकर अमरीका व अफ़्रीक़ा के चप्पे चप्पे से फ़िलिस्तीनी जनता और बैतुल मुक़द्दस के समर्थन में आवाज़ें उठ रही हैं।

फ़िलिस्तीन समस्या पर ध्यान देने के कारण आम जनमत और विभिन्न बुद्धिजीवियों ने इमाम ख़ुमैनी की सराहना की है और आज उनके नाम और फ़िलिस्तीन समस्या में चोली दामन का साथ है। जो भी जहां भी फ़िलिस्तीन समस्या का नाम लेगा वह इस मामले को जीवित रखने में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी के प्रयासों का ज़रूर उल्लेख करेगा। इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद फ़िलिस्तीन पर लोगों का ध्यान बढ़ने लगा और पूरे संसार के लोगों का ध्यान इमाम ख़ुमैनी के अमर विचारों के चलते फ़िलिस्तीन की अतिग्रहित धरती में जारी स्थिति की ओर आकृष्ट हुआ और उन्हें पता चला कि फ़िलिस्तीनियों पर किस प्रकार के अत्याचार किए जा रहे हैं।

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इमाम ख़ुमैनी के नेतृत्व में फ़िलिस्तीन समस्या की ऐतिहासिक प्रक्रिया के धारे को मोड़ दिया और लोगों को पता चला कि किन शक्तियों ने किस प्रकार की धूर्ततापूर्ण राजनीति के माध्यम से फ़िलिस्तीन के लोगों की मातृभूमि पर क़ब्ज़ा कर लिया और उन पर अत्याचारों के पहाड़ तोड़ दिए, इसके बाद उन्हें उनकी धरती से बाहर निकाल कर अत्यंत दयनीय स्थिति में पहुंचा दिया। निश्चित रूप से इस्लामी क्रांति और फ़िलिस्तीन समस्या पर इमाम ख़ुमैनी के विशेष ध्यान ने फ़िलिस्तनियों के संघर्ष में एक नई आत्मा फूंक दी और उनके इस विचार को बल प्रदान किया कि अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के मुक़ाबले में एकमात्र विकल्प, प्रतिरोध है और प्रतिरोध के माध्यम से ही उनके छीने गए अधिकारों को वापस लिया जा सकता है।

स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी ने अवैध ज़ायोनी शासन के अस्तित्व के विरोध में और प्रतिरोध का रास्ता बदलने के लिए मध्यपूर्व के भूराजनैतिक मंच को फ़िलिस्तीनियों के हित में परिवर्तित किया जिसके कारण आज फ़िलिस्तीन पर अवैध क़ब्ज़े को सत्तर साल बीत जाने के बावजूद ज़ायोनी शासन के नेता और उसके समर्थक भय व आतंक की छाया में जीवन बिता रहे हैं।

ज़ायोनी शासन के अवैध क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीनी जनता के इंतेफ़ाज़ा आंदोलन जैसे प्रतिरोध ने इस्लामी जगत के केंद्र में साम्राज्यवादी शक्तियों के सभी समीकरणों को बिगाड़ दिया है। मुसलमानों का पहला क़िब्ला मस्जिदुल अक़सा और पवित्र नगर बैतुल मुक़द्दस अब भी फ़िलिस्तीन और इस्लामी जगत के दिल की हैसियत रखता है और इस दिल की धड़कन, फ़िलिस्तीन समस्या के बारे में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी की संवेदनशीलता और उनके द्वारा विश्व क़ुद्स दिवस के निर्धारण के कारण जारी है। आज फ़िलिस्तीन के मामले में फ़िलिस्तीनियों और इस्लामी जगत की संवेदनशीलता के कारण अमरीकी सरकार भी इस्राईल के समर्थन में ठोस क़दम उठाने में अक्षम हो गई है। इसका एक उदाहरण अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प द्वारा तेल अवीव से अमरीकी दूतावास को बैतुल मुक़द्दस स्थानांतरित करने की अपनी चर्चित योजना से पीछे हट जाना है।

फ़िलिस्तीन की वर्तमान स्थिति इस बात की सूचक है कि फ़िलिस्तीनी काफ़ी मज़बूत हो चुके हैं और वे अधिक एकजुटता के साथ और प्रतिरोध के मार्ग पर चल कर इस्लाम के दुश्मनों की साज़िशों को नाकाम बना सकते हैं। फ़िलिस्तीन समस्या के समाधान के लिए विभिन्न योजनाएं पेश की जा चुकी हैं लेकिन उनमें से कोई भी फ़िलिस्तीनियों के संपूर्ण अधिकारों को बहाल नहीं कर सकी है। कथित शांति वार्ता भी एक चाल है ताकि उसे लम्बे समय तक खींच कर फ़िलिस्तीनी जनता को ज़ायोनी शासन के मुक़ाबले में प्रतिरोध से दूर किया जा सके जबकि वास्तविकता यह है कि प्रतिरोध और इंतेफ़ाज़ा से ही फ़िलिस्तीन समस्या का समाधान का जा सकता है। वर्ष 2000 के इंतेफ़ाज़ा आंदोलन और फिर पत्थर के इंतेफ़ाज़ा आंदोलन के सहारे इस समय क़ुद्स के इंतेफ़ाज़ा आंदोन ने फ़िलिस्तीन के समीकरणों को बदल दिया है और अगर इस मार्ग को जारी रखा गया तो फ़िलिस्तीनी अपने सभी अधिकार प्राप्त कर लेंगे।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने गत फ़रवरी में तेहरान में होने वाली फ़िलिस्तीनी इंतेफ़ाज़ा के समर्थन की छठी अंतर्राष्ट्रीय कान्फ़्रेंस में ज़ायोनी शासन के साथ सांठ-गांठ की प्रक्रिया की विफलता की ओर इशारा करते हुए कहा था कि आज फ़िलिस्तीन की जनता अपने तीन दशक के क्रियाकलाप में दो अलग अलग आदर्शों को देख चुकी है, सांठ-गांठ की प्रक्रिया के मुक़ाबले में इंतेफ़ाज़ा का पवित्र, निरंतर और साहसपूर्ण प्रतिरोध है जिसने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र के लिए महान उपलब्धियां अर्जित की हैं।

ज़मीनी संघर्ष के साथ ही फ़िलिस्तीन का राजनैतिक मंच भी बड़ा अहम रहा है और इस बीच विभिन्न पक्षों की ओर से पेश की गई विफल और एकपक्षीय योजनाओं के मुक़ाबले में इस्लामी गणतंत्र ईरान ने फ़िलिस्तीन समस्या के समाधान के लिए व्यवहारिक योजना या रोड मैप पेश किया है जिस पर इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़मा सैयद अली ख़ामेनेई ने बल दिया है। ईरान की योजना हमेशा इस बात पर आधारित रही है कि फ़िलिस्तीन के भविष्य का निर्धारण फ़िलिस्तीनी जनता के हाथों प्रजातांत्रिक मार्ग से होना चाहिए लेकिन खेद की बात है कि प्रजातंत्र का दम भरने वाले पश्चिमी देश, ईरान की इस योजना की निरंतर अनदेखी कर रहे हैं।

इस्लामी क्रांति के वरिष्ठ नेता ने वर्ष 2000 में एक न्यायपूर्ण, क़ानूनी और मानवीय प्रस्ताव के रूप में सभी स्वीकार्य अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांतों विशेष कर संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणापत्र के अनुसार फ़िलिस्तीन के भविष्य निर्धारण के लिए जनमत संग्रह का प्रस्ताव पेश किया था। उन्होंने इस प्रस्ताव के बारे में कई बार कहा है कि फ़िलिस्तीन समस्या के समाधान का एकमात्र रास्ता यह है कि अतिग्रहणकारी पलायनकर्ता नहीं बल्कि फ़िलिस्तीन के वास्तविक नागरिक, चाहे वे फ़िलिस्तीन के अंदर हों या बाहर, अपने देश के भविष्य का निर्धारण करें। अगर किसी राष्ट्र के मतों पर भरोसा करना, दुनिया में प्रजातंत्र के दावेदारों की नज़र में सही बात है तो फिर फ़िलिस्तीनी राष्ट्र भी एक राष्ट्र है और उसे अपने भविष्य के बारे में फ़ैसला करने देना चाहिए। आज फ़िलिस्तीन में जो अतिग्रहणकारी सरकार है उसका इस धरती पर कोई हक़ ही नहीं है, वह एक ग़ैर क़ानूनी, झूठी और अत्याचारी शक्तियों द्वारा बनाई गई सरकार है। अतः किसी को भी फ़िलिस्तीनी जनता से यह नहीं कहना चाहिए कि वह इस सरकार को औपचारिक रूप से स्वीकार कर ले।

 

Jun २४, २०१७ १५:१३ Asia/Kolkata
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