आज का दिन ऐसा लग रहा है कि ज़मीन और आसमान ईश्वर का शुक्रिया अदा करने के लिए तय्यार हैं।

फ़रिश्ते बड़े बड़े गुट में हाथों में उपहार लिए ज़मीन पर उतर रहे हैं ताकि ईश्वर के मेहमानों को सम्मानित करें। आज एक महीने के रोज़े की समाप्ति का दिन है, ईश्वर के सामने शुक्रिया अदा करने वालों की सबसे बड़ी संगोष्ठी और अपनी मुरादों की लंबी सूचि ईश्वर के सामने पेश करने का दिन है, एकेश्वरवाद का सबसे सुंदर दृष्य पेश करने का दिन है, एक बड़े इम्तेहान में सफलता पाने और फिर से नए इंसान के रूप में ख़ुद के जन्म लेने का दिन है।

जी हां आज ईद का दिन है। आप सब को बहुत बहुत मुबारक हो।

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सुबह की पौ फूटे हुए कुछ ही समय गुज़रा है। देश में जगह जगह ईद की नमाज़ के आयोजन की तय्यारी चल रही है। उन्हीं जगहों में पवित्र नगर मशहद भी है। सभी लोग इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं और नमाज़ की पंक्ति में शामिल होने के लिए एक दूसरे से जल्दी पहुंचने में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। थोड़ी ही देर में इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम का रौज़ा नमाज़ियों से भर जाता है। लोग ज़कात और फ़ितरा नामक विशेष धार्मिक कर निकालने के बाद सच्चे मन से, समुद्र में मिलने वाली बूंद की तरह ईश्वर की बंदगी की लाइन में खड़े हो रहे हैं। हर ओर सबसे ज़्यादा अल्लाहो अकबर व लकल हम्द की आवाज़ सुनाई दे रही है। ईद की नमाज़ के लिए इकट्ठा हुए श्रद्धालुओं में बूढ़े, जवान, मर्द औरत और बच्चे सभी मौजूद हैं। भीड़ में एक जवान व्हीलचेयर पर अपने बाप को बिठा कर नमाज़ की पंक्ति की ओर ले जाने की कोशिश कर रहा है और कह रहा है, “मेरे बाप की यह इच्छा है कि ईद की नमाज़ इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े में पढ़े।”

इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े के इन्क़ेलाब नामक प्रांगण में क़ालीन बिछा हुआ है ताकि इस प्रांगण में औरते ईद की नमाज़ पढ़ें। हर ओर ईद का माहौल नज़र आ रहा है यहां तक कि रौज़े का सक़्क़ाख़ाना नामक हिस्सा रंग बिरंगे सुंदर फूलों से सजा है। महिला नमाज़ियों की आरंभिक पंक्तियों में एक 30 साल की लड़की बैठी हुयी आसमान की ओर हाथ उठाए हुए है। अपना नाम रज़ा बताते हुए कहती है, “दो साल पहले मुसलमान हुयी हूं। लेकिन आज पहली बार ख़ुद के शिया होने का आभास कर रही हूं। जिस समय रौज़े की ओर आ रही थी मैने देखा कि बड़ी संख्या में लोग हाथ में फूल लिए रौज़े की ओर बढ़ रहे हैं, मुझे लगा कि मैं एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक राष्ट्र हूं।” यह बहुत अच्छी भावना है। यह सभा इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के उस कथन की याद दिलाती है जिसमें आपने फ़रमाया, “ईश्वर ने फ़ित्र के दिन को इसलिए ईद क़रार दिया ताकि मुसलमानों के लिए एक आयोजन हो कि उस दिन ईश्वर के सामने इकट्ठा हों और उसकी नेमतों के लिए उसकी प्रशंसा व सम्मान करें। तो वह दिन ईद, इकट्ठा होने, ज़कात देने और ईश्वर की उपासना का दिन है।”       

आर्किटेक्ट के आख़िरी साल का छात्र कहता है, “कई साल पहले मैंने यह प्रण लिया कि ईद की नमाज़ इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े में पढ़ूंगा। यहां ऐसा लगता है इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के पीछे ईद की नमाज़ पढ़ रहा हूं। ऐसा लगता है कि इमाम रज़ा सिर पर सफ़ेद पगड़ी बांधे और उसके एक सिरे को सीने पर और दूसरे सिरे को गर्दन के नीचे से कांधे पर डाल रखा है। नंगे पैर, क़मीस और दूसरे वस्त्र को कमर में बांधे, छड़ी के सहारे ग़ुलामों और अनुयाइयों के साथ अपने घर से रौज़े की बढ़ रहे हैं। हमने इतिहास की किताब में पढ़ा है कि इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम हर क़दम उठाने पर तकबीर अर्थात अल्लाहु अकबर कहते थे। यह तकबीर आध्यात्म में डूबे हुये लहजे में कहते थे मानो आसमान, घर के दरो दीवार उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलाकर तकबीर कह रहे हों। शासक मामून के सैनिकों ने इमाम रज़ा को जब इस हालत में देखा तो अपनी सवारी से उतर गए, जूते उतार दिए और इमाम के पीछे चल पड़े। इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम पैदल जा रहे थे और हर दस क़दम पर रुक कर तीन बार अल्लाहु अकबर कहते थे। मामून के वज़ीन फ़ज़्ल इब्ने सहल ने जब इस स्थिति को देखा तो कहा कि अगर इमाम रज़ा इसी हालत में ईदगाह पहुंच गए तो लोग उनपर मोहित हो जाएंगे और तेरी हुकूमत की बिसात उलट जाएगी। बेहतर है कि उनसे कहो कि पलट आएं। मामून ने फ़ौरत एक व्यक्ति के ज़रिए इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम को कहलवा भेजा कि आधे रास्ते से पलट आएं। आज हम वही शासन इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े में देख रहे हैं।” जी हां हर साल ईद की नमाज़ इमाम रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े में बहुत ही शान से आयोजित होती है।

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शब्दकोश में ईद शब्द औद शब्द से निकला है जिसका अर्थ है पलटना। इसलिए वह दिन ईद है जिस दिन किसी समूह व क़ौम की मुश्किल हल हो। इस्लामी ईदों में पवित्र रमज़ान में एक महीने की उपासना के बाद शव्वाल महीने के पहले दिन को या हज को ईद इसलिए कहा गया है क्योंकि इन उपासनाओं के ज़रिए इंसान अपनी पवित्र प्रवृत्ति की ओर पलटता है और वे बुराइयां दूर हो जाती हैं जो उसकी प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ हैं।

ईदुल फ़ित्र साल के सबसे अहम दिनों में से एक है। इस्लामी रवायतों के अनुसार, इस दिन ईश्वर की कृपा के द्वार खुले हुए हैं और जिस व्यक्ति ने पवित्र रमज़ान के महीने की आध्यात्मिक ऊर्जा से जितना लाभ उठाया होता है उतना ही वह ईद और उसके बाद के दिनों में पाप से दूर रहता है।

पवित्र क़ुरआन के आला सूरे की आयत नंबर 14 और 15 में ईश्वर कह रहा है, “बेशक वह व्यक्ति मुक्ति पा गया जिसने अपनी आत्मा को पाक कर लिया और जिसने अपने पालनहार के नाम को याद किया और नमाज़ पढ़ी।”

ये आयतें ईमान वालों की मुक्ति और मुक्ति दिलाने वाले तत्वों की ओर इशारा करती है और मुक्ति व कल्याण के तीन तत्व गिनवाए हैं, आत्म शुद्धि, ईश्वर के नाम को याद करना और नमाज़ पढ़ना। तज़किये के बारे में कुछ विद्वानों का कहना है कि तज़किया आत्मा की शुद्धि को कहते हैं, इसी प्रकार मन से हर प्रकार की नैतिक बुराइयों को दूर व सद्कर्म करना है और साथ ही ईश्वर से डरते रहना भी है।    

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मुसलमान पवित्र रमज़ान से मुक्ति का रास्ता समतल करते हुए आध्यात्म से भरे मन से निकलता है। उन्होंने रोज़ा, ईश्वर की प्रार्थना, पवित्र क़ुरआन की तिलावत और दूसरे सद्कर्मों से अपने मन को पवित्र बनाते हुए नए चरण में पहुंचते हैं और ईश्वरीय भय व नए जीवन के ज़रिए परिपूर्णतः की ओर बढ़ते हैं। दूसरे शब्दों में पवित्र रमज़ान में ईश्वरीय मेज़बानी के मेहमानों से पाप से दूर होने का अभ्यास किया है। उसके बाद भी वे ईश्वर से अच्छे मूल्यों से संपन्नता की प्रार्थना करते हैं। वास्तव में पवित्र रमज़ान की क्लास में एक महीने के अभ्यास के बाद इंसान नए जन्म का एहसास करता है। अरबी भाषा में फ़ित्र का अर्थ होता है खिलना। ईदुल फ़ित्र के दिन ईरान अपनी प्रवृत्ति की ओर दुबारा लौटता है और नए जीवन का जश्न मनाता है और चूंकि उसने ख़ुद को फिर से पाक किया है इसलिए ख़ुश होता है।

इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनई कहते हैं ईदुल फ़ित्र का एक अर्थ इस नई हालत का आभार व्यक्त करना है। ईदुल फ़ित्र की नमाज़ में कई बार ईश्वर से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि हमे ईमान, नैतिकता व सदकर्म के स्वर्ग में दाख़िल कर कि जिसमें तूने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों को दाख़िल किया और बुरे कर्म, अनैतिकता व बुरी आस्था के नरक से उसी तरह निकाल जिस तरह तूने इन महान हस्तियों को दूर रखा। हम ईद के दिन अपने लिए इसी बड़े उद्देश्य को तय करते हैं और उसकी प्राप्ति की ईश्वर से दुआ करते हें। हमारी भी यह ज़िम्मेदारी है कि इस सीधे रास्ते पर बाक़ी रहने के लिए कोशिश करे कि इसी को तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय कहते हैं।               

इमाम मूसा सद्र कहते हैं कि पवित्र रमज़ान के महीने के बाद इंसान एक नए रूप में प्रकट होता है और उसके वजूद का यह आयाम रमज़ान से पहले वाले उसके वजूद से अलग होता है। वह एक महीने के अभ्यास से अधिक विकसित चेतना के साथ ज़िन्दगी करता है और रोज़े की वजह से अधिक कोमल भावना से संपन्न हो गया है। ऐसा रोज़ा जिसने उसे पीड़ितों की पीड़ा से परिचित कर दिया है, उसके वजूद में दृढ़ता बढ़ा दी और उसे अधिक धैर्यवान बना दिया है।

यह महान आदमी अपने वजूद में हुए गहरे बदलाव के साथ ईद की सुबह ज़कात देता है, ईश्वर के नाम को याद करता है, नमाज़ पढ़ता है, जश्न मनाता है और ख़ुशी के साथ नए जीवन का आग़ाज़ करता है। ऐसा जीवन जिसमें वह अपनी भावना व गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है।

इसलिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईद के दिन को भले लोगों को उनके सद्कर्म के पारितोषिक मिलने का दिन कहते हैं। इस दिन सबसे कम चीज़ जो रोज़ेदार मर्द और औरतों को पारितोषिक मिलता है वह यह कि रोज़े के अंतिम दिन फ़रिश्ता उनसे कहता है, शुभ सूचना हो! हे ईश्वर के बंदों को तुम्हारे विगत के पाप माफ़ कर दिए गए तो अब भविष्य के बारे में सोचो कि किस तरह बाक़ी दिन गुज़ारोगे।

लोग ईद की नमाज़ के बाद ख़ुशी मनाते हैं। दोस्त व रिश्तेदारों से मुलाक़ात करते हैं। इस प्रकार ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करते हैं। एक बार हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने ईश्वर से पूछा, “रिश्तेदारों व दोस्तों का ख़्याल रखने का बदला है? ईश्वर ने कहा, हम ऐसा करने वाले की उम्र बढ़ा देते हैं, उस पर मौत की सख़्ती को आसान कर देते हैं और स्वर्ग के निगहबान उसे पुकारते हैं कि जल्दी करो! जिस दरवाज़े से चाहो स्वर्ग में दाख़िल हो जाओ।”

 

Jun २५, २०१७ १६:१५ Asia/Kolkata
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