पवित्र रमज़ान ख़त्म हो गया और अब रोज़ेदार इच्छाओं व भावनाओं पर विजय हासिल करने का जश्न मना रहे हैं।

इतनी महानताओं व बरकतों वाले महीने के बाद ईदुल फ़ित्र जैसी ख़ुशी का दिन आना स्वाभाविक है। ईद के दिन मुसलमान ईश्वर का इस बात के लिए शुक्रिया अदा करता है कि पवित्र रमज़ान में अभ्यास का एक सत्र सफलतापूर्वक गुज़ारा और उससे बहुत फ़ायदा हासिल किया है।

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ईद के दिनों में मुसलमानों में अजीब तरह का उत्साह दिखने में आता है जो शब्दों में बयान नहीं हो सकता। कई दिन पहले सड़कें सजना शुरु हो जाती हैं और घर में साफ़-सफ़ाई होने लगती है। घरों और सार्वजनिक स्थलों पर लोगों का मीठाई से स्वागत होता है। बच्चे नए नए कपड़े पहनते और बड़ों से ईदी लेते हैं। बड़े भी ईश्वर की उपासना का सम्मान करते हुए एक दूसरे से मिलने जाते हैं। इस तरह ईद के दिन बहुत ही शानदार होते हैं और वे ऐसी यादों से भरे होते हैं जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। मुसलमन ईद को अपने बीच सौहार्द व आत्मीयता को मज़बूत करने का अवसर मानते हैं और एक दूसरे को बधाई व मुबारकबाद पेश करते हैं।

लेकिन इन सभी ख़ुशियों के बीच इस्लामी जगत को बहुत गहरी पीड़ाओं का भी सामना है। इन ख़ुशियों के दिनों में भी मुसलमान दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में अपने मुसलमान भाइयों की ओर से चांचित है और उनकी पीड़ा के संबंध में ज़िम्मेदारी का आभास करते हैं इसलिए ईद की नमाज़ में दुआ के लिए उठे हाथ पीड़ित मुसलमानों की रिहाई की दुआ कर रहे हैं।

ईद की नमाज़ मुसलमानों के शानदार धार्मिक संस्कारों में है। ईद की नमाज़ आध्यात्मिक दृष्टि से उस स्तर पर है कि मुसलमानों के दिल को एक दूसरे के निकट कर सकती है। ईरान, पाकिस्तान और भारत से लेकर इंडोनेशिया, मलेशिया, उत्तरी अफ़्रीक़ा, पश्चिम एशिया से लेकर यूरोप और अमरीका में मूसल्मानों ईद की नमाज़ का आयोजन करते हैं और मुसलमानों के बीच एकता लाने वाली सुदंर उपासना के रूप में अपने सौहार्द का प्रदर्शन करते हैं।

ईद की नमाज़ दो रकअत या यूनिट होती है। पहली रकअत में पांच क़ुनूत और दूसरी रकअत में 4 क़ुनूत पढ़ते हैं। क़ुनूत हाथ उठा कर विशेष तरह से दुआ मांगने को कहते हैं। क़ुनूत में पढ़ी जाने वाली दुआ का अर्थ बहुत ही सुंदर गूढ़ है। नमाज़ी ईद की नमाज़ में क़ुनूत पढ़ते वक़्त कहता है, “हे पालनहार महानता व बड़प्पन सिर्फ़ तुझे शोभा देता है। तूही दानशीलता के योग्य है। माफ़ व कृपा करना भी तूझे ही शोभा देता है। तू ही वह है जिससे डरना चाहिए। इस दिन के अधिकार के हवाले से जिसे तूने मुसलमानों के लिए ईद का दिन और पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों के लिए सम्मान व उच्च स्थान का दिन क़रार दिया, तुझसे विनती करते हैं कि पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद भेज और मुझे उस भलाई का पात्र बना जिसके पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजन पात्र बने और मुझे हर उस बुराई से दूर कर जिससे तूने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों को दूर रखा। हे मेरे पालनहार! मैं तुझसे बेहतरीन चीज़ की विनती करता हूं जिसकी अच्छे बंदों ने तुझसे कामना की और उस चीज़ से बच कर तेरी पनाह में आना चाहता हूं जिससे तेरे निष्ठावान बंदे बच कर तेरी पनाह में आना चाहते हैं।”             

ईद की नमाज़ की एक विशेषता यह है कि उच्च अर्थों वाली यह नमाज़ मोमिन बंदों के मन पर असर करती है इस तरह से कि मोमिन के मन में उम्मीद व ख़ुशी की लहर दौड़ती है। जैसा कि पैग़म्बरे इस्लाम ने कहा, ईश्वर मोमिन बंदों को कृपा भरी नज़र से देखता है और इस तरह ईश्वर की उपासना का असर चेहरों पर दिखाई देता है।

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ईद की नमाज़ पढ़ने के बाद लोग इमाम के भाषण को सुनते हैं। नमाज़ के भाषण में इमाम पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा के अनुसार सभी मुसलमानों से ईश्वर से डरने व सदाचारिता अपनाने की अनुशंसा करते हैं। उसके बाद इस्लामी जगत की स्थिति की समीक्षा करते हैं, मुसलमानों की मुश्किलों पर चर्चा करते हैं और एक मुसलमान की दूसरे मुसलमान के प्रति ज़िम्मेदारी की याद दिलाते हैं और उनसे अनुशंसा करते हैं कि जातीय, भाषाई, सांस्कृतिक व धार्मिक अंतर को नज़रअंदाज़ करें और अपने संयुक्त सामाजिक व राजनैतिक हितों के बारे में सोचें, संयुक्त दुश्मनों को न भूलें और इस्लामी एकता को मज़बूत करें। क्या मौजूदा हालात में जब मुसलमान जंग व साज़िश में फंसे हुए हैं, इस्लामी जगत में एकता से बेहतर क्या कोई और विषय हो सकता है। इन दिनों यमन, सीरिया, फ़िलिस्तीन, अफ़ग़ानिस्तान, बहरैन यहां तक कि पूर्वी सऊदी अरब में मुसलमान भय व अशांति के माहौल में जी रहे हैं और उनके दिन-रात जंग की आग में बीत रहे हैं। ईदुल फ़ित्र इन पीड़ितों के साथ सौहार्द दिखाने का बेहतरीन अवसर है और ईद की नमाज़ के भाषण से ज़्यादा बेहतर क्या कोई और मंच हो सकता है जिससे इमाम इस्लामी देशों को इस बारे में जागरुक बनाए? 

ईद के दिनों में जो मुसलमानों को इकट्ठा होने का अवसर प्रदान करते हैं, पीड़ितों से हमदर्दी और उनकी भौतिक व आत्मिक मदद करके इस्लाम व इस्लामी की महानता का भव्य दृष्य पेश कर सकते हैं। क्या पैग़म्बरे इस्लाम ने यह नहीं फ़रमाया, जो कोई सुबह इस हालत में करे कि मुसलमानों के मामलों के संबंध में उदासीन रहे तो वह मुसलमान नहीं है और जो कोई मदद मांगने वाले की मदद न करे तो वह भी मुसलमान नहीं है।

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ईदुल फ़ित्र में मुसलमान पाक मन के साथ अपना सिर ईश्वर की बंदगी में झुकाता है और साथ ही हर प्रकार के वर्चस्व व उद्दंडता को नकारता है। ईदुल फ़ित्र की तकबीर उपासना की भावना का प्रतिबिंबन और ईश्वर के अलावा दूसरी शक्तियों का इंकार है। ऐसे हालात में कि साम्राज्यवादी शक्तियां इस्लाम की छवि ख़राब करने और मुसलमानों को आपस में लड़ाने की साज़िश कर रही हैं, ईदुल फ़ित्र के संस्कार मुसलमानों के बीच एकता व सौहार्द का संदेश देते हैं और उनके जीवन में जोश पैदा कर सकता है।                  

ईदुल फ़ित्र में सौहार्द की एक और निशानी फ़ितरा अदा करना है। ईद के दिन लोग पैसों के ज़रिए दान-दक्षिणा ज़्यादा करते हैं। ईद के दिन फ़ित्रा निकाल कर एक मुसलमान दूसरे मुसलमान के प्रति एक तरह से ज़िम्मेदारी का आभास करता है। हर मुसलमान पर अनिवार्य है कि वह ईद के दिन चावल या गेहूं या इसके बदले में पैसा निर्धनों को दे। वास्तव में फ़ित्रा रोज़ेदार की ओर से ईश्वर की बंदगी का आभार जताने के लिए निर्धनों को एक प्रकार का उपहार है और इससे धनवान व निर्धनों के बीच संबंध मज़बूत होते हैं।

फ़ित्रा ईश्वर की उपासना और उसका सामिप्य हासिल करने की नियत से निकाला जाता है। यह एक प्रकार से आध्यात्म तक पहुंचने के लिए भौतिक साधन से लाभ उठाना है। फ़ित्रा भौतिक व सांसारिक इच्छाओं से संबंध तोड़ने के लिए एक तरह का अभ्यास है। इस समय कुछ देशों में मुसलमान निर्धनता व सख़्ती में जीवन बिता रहे हैं क्या उनकी मदद से बेहतर कोई और काम हो सकता है। क्या इस ख़बर से ज़्यादा कोई और दर्दनाक ख़बर हो सकती है कि इस्लामी जगत के एक भाग में बच्चे, औरतें और मर्द भूख व कुपोषण के कारण मौत से लड़ रहे हैं। इन दिनों यमन में सैकड़ों लोग जंग के नतीजे में उपजे कुपोषण व भूख के कारण मौत से संघर्ष कर रहे हैं। उनकी नज़र मुसलमान भाई-बहनों की ओर से मदद पर लगी हुयी है। फ़ित्रा इन पीड़ित लोगों की मदद के लिए पैसों का एक अच्छा स्रोत हो सकता है। फ़ित्रे को वंचितों की ज़रूरत पूरी करने के अलावा मस्जिद, स्कूल, पुल, रास्ता, स्कूल और जनसेवा के अन्य साधनों के निर्माण में ख़र्च कर सकते हैं। इस तरह ईद के दिन हर व्यक्ति अपनी हैसियत भर ज़रूरतमंद के दुख को कम करता है और समाज में सहयोग की भावना को मज़बूत करने में मदद करता है।

इसलिए मुसलमान ईदुल फ़ित्र के समारोह में इकट्ठा होकर, एक दूसरे की  मुश्किलों और दृष्टिकोण से अवगत होते हैं। इस समारोह में द्वेष दोस्ती में बदल जाता है और मोमिन एक ही लाइन में खड़े होकर एक दूसरे से  अधिक एकता व निकटता महसूस करते हैं।

 

Jun २५, २०१७ १६:२१ Asia/Kolkata
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