हाजी क्षेत्रीय अंतर, अलग अलग रंग व रूप और वर्ग भेद के बावजूद अपना मन एक ओर केन्द्रित किए हुए हैं।

उन्होंने अपने परिवार, वतन, धन संपत्ति, पद सहित सभी सांसारिक मोहमाया से संबंध तोड़ लिया है, स्थानीय आदतों व रीति रवाजों से दूरी अख़्तियार कर रखी है और एक तरह के लेबास में इकट्ठा हुए हैं। इस बीच आध्यात्म में डूबा उनका मन ऐसे राष्ट्र को जन्म दे सकता है जिससे मानवता की शान बढ़ जाए।

हज कई तरह के संस्कारों पर आधारित उपासना है। हज के संस्कार नियत से शुरु होते हैं। हर कर्म की नियत उस कर्म के मूल्य का मानदंड बनती है। नियत ही इंसान के कर्म की कसौटी होती है। प्रलय के दिन उसी कर्म का बदला मिलेगा जो शुद्ध नियत से इस संसार में अंजाम दिया गया होगा। हाजी इच्छाओं पर नियंत्रण की कोशिश करते हैं ताकि यह समझ सकें कि वे इससे कहीं बुलंद है कि इच्छाओं के ग़ुलाम हों।

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हज ईश्वर से निकट होने के लिए इंसान के आध्यात्मिक सफ़र की संपूर्ण उपमा है। इसलिए हज काबे की परिक्रमा से शुरु होता है और काबे की परिक्रमा से अंत होता है। इस बीच इंसान अपने पूरे वजूद से ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने की कोशिश करता है। हाजी एहराम नामक एक रंग के पाक लेबास में काबे के सामने होता है। उस केन्द्र के सामने जो एकेश्वरवाद का प्रतीक है। पूरी दुनिया में मुसलमान 24 घंटे में 5 बार काबे की ओर रुख़ करते हैं। अपनी आंख, मन व वजूद को अनन्य ईश्वर के ध्यान में लगाते हैं। वह ईश्वर जो पूरे संसार के मामलों का संचालक है। हाजी पवित्र क़ुरआन के इनआम सूरे की आयत नंबर 162 को दोहराते हैं जिसमें ईश्वर कह रहा है, “कहो मेरी नमाज़ और अन्य उपासनाएं और मेरा जीना मरना सब कुछ ईश्वर के लिए है जो पूरी सृष्टि का पालनहार है।”

हज के एहराम नामक विशेष लेबास को पहनने के पीछे जो गूढ़ अर्थ छिपा है वह यह कि इंसान अपनी आत्मा को ऐसा शांतिपूर्ण बनाए कि वह सृष्टि की सभी चीज़ों के साथ शांतिपूर्ण व्यवहार कर सके। पवित्र क़ुरआन की कई आयतों में हाजी पर बल दिया गया है कि वह अपने मन से दुश्मनी, द्वेष, जलन और अन्य नैतिक बुराइयों को निकाल दे यहां तक कि निरर्थक बातों से अपनी ज़बान को बचाए, दूसरों की मर्यादा का अतिक्रमण करने से मन को पाक करे और अपने भीतर ऐसी शांति प्रेमी आत्मा विकसित करे कि सृष्टि की सभी चीज़ों के साथ शांति के साथ रह सके, यहां तक कि किसी जानवर को न सताए, पेड़ पौधों को भी नुक़सान न पहुंचाए और अपने मन में सृष्टि की सभी चीज़ों से प्रेम की भावना पैदा करे। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के माएदा नामक सूरे की आयत नंबर 95 में ईश्वर कह रहा है, “हे ईश्वर पर आस्था रखने वालो! एहराम की हालत में शिकार को न मारो!”

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एहराम के बाद हाजी काबे की परिक्रमा करते हैं। माशूक़ के इर्द गिर्द उस तरह चक्कर लगाते हैं जिस तरह परवाना मोमबत्ती के चारों ओर परिक्रमा करता है। परिक्रमा करते वक़्त हाजी के मन में ईश्वर का सम्मान, उसका डर और उससे उम्मीद की भावना जागृत होती है। तवाफ़ या परिक्रमा इस सच्चाई की उपमा है कि पूरी सृष्टि अनन्य ईश्वर के वजूद के ध्रुव पर घूम रही है और हाजी के रूप में काबे की परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु पवित्र क़ुरआन की इस आयत की व्याख्या हैं जिसमें ईश्वर कह रहा है कि इस ज़मीन और आसमान में हर चीज़ उसका गुणगान व परिक्रमा कर रही है। अपने ध्रुव से एक बड़े ध्रुव की ओर घूमने से उपमा का यह अर्थ है कि इंसान अपनी पहचान के ध्रुव से ईश्वर की पहचान के ध्रुव तक पहुंचे। जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा है, “जिसने अपने आपको पहचान लिया उसने अपने पालनहार को पहचान लिया।”

स्वर्गीय धर्मगुरु फ़ैज़ काशानी कहते हैं, “हाजी को यह बात पता होनी चाहिए कि काबे की परिक्रमा के वक़्त वह भी उन्हीं फ़रिश्तों की तरह है जो अर्श की परिक्रमा करते हैं। हाजी यह कल्पना न करे कि इस परिक्रमा का अर्थ अपने शरीर को काबे की परिक्रमा कराना है बल्कि इसका अर्थ यह है कि हाजी का मन ईश्वर की याद में इस तरह डूबा रहे कि उसके स्मरण से किसी काम का आरंभ और उसके स्मरण से किसी काम का अंत हो। जैसा कि काबे की परिक्रमा हजरे अस्वद से शुरु करके वहीं पर ख़त्म करते हैं।”                  

हाजी काबे की परिक्रमा के बाद सफ़ा और मरवा पहाड़ियों के बीच के फ़ासले को 7 बार इस तरह तय करे कि न तो दौड़े और न ही धीरे धीरे चले। इस संस्कार को सफ़ा मरवा में सई करना कहते हैं। यह संस्कार ईश्वर के घर के निकट शरण पाने के समान है ताकि इस तरह उसकी ओर से पापों की क्षमा मिल सके। सफ़ा और मरवा की पहाड़ियों के बीच सई एक पाठ लेने योग्य ऐतिहासिक घटना की याद दिलाती है। हज़रत इब्राहीम की बीवी हज़रत हाजिरा अपने बेटे हज़रत इस्माईल के लिए पानी की तलाश में सफ़ा और मरवा के बीच आ जा रही थीं यहां तक कि उन्होंने हज़रत इस्माईल के पैरों के नीचे स्वच्छ पानी का चश्मा बहता देखा जिससे अपनी और अपने बेटे की प्यास बुझाई। यही चश्मा इस भूमि के आबाद होने का कारण बना और यह भूमि ईश्वर की कृपा का पात्र बनीं। सई नामक संस्कार हर चिंतन मनन करने वाले को यह समझाती है कि कोशिश का अंजाम वह स्वच्छ सोता है जो उसके पैरों के नीचे से उबलेगा और अगर इंसान अपने उद्देश्य को पाने के लिए ख़ुद को कोशिश के लिए समर्पित कर दे तो सफल होकर रहेगा।    

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अरफ़ात के मैदान में ठहरना भी हज के संस्कार में है। ऐसा मरुस्थल जिसमें पर्याप्त सुविधा नहीं है विभिन्न राष्ट्रों व वर्गों के लोग दोपहर से सूर्यास्त तक वहां ठहर कर ईश्वर से अपने मन की बात करते हैं। एक तरह के नज़र आने वाली सभी हाजी ईश्वर से अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की दुआ करते हैं। अरफ़ात के मरुस्थल को देख कर प्रलय के दिन फिर से जीवित होने का दृष्य मन में उभरता है। सफ़ेद लेबास में हाजी नमाज़, प्रार्थना, सांसारिक मोहमाया से दूर ईश्वर से गिड़गिड़ाते हुए दिखाई देते हैं कि जिन्हें देख कर लगता है कि उनमें बदलाव आ गया है। वे ईश्वर से मुलाक़ात और उसके घर के दर्शन करने योग्य बन गये हैं।

अरफ़ात के दिन सूर्यास्त के समय हाजी मशअर नामक क्षेत्र की ओर कूच करते हैं और वहां रात गुज़ारते हैं। उसके बाद बक़रईद के दिन विशेष संस्कार के लिए मिना जाते हैं। सबसे पहले तीसरे शैतान को कंकरी मारते हैं। उसके बाद जानवर की क़ुर्बान करते हैं। मशअर को इंसान के विवेक को विकसित करने वाला स्थान कहा जाता है। हाजी मशअर में ईश्वरीय कृपा के द्वार पर पहुंचता है जहां उसपर कृपा की वर्षा होती है। उस कृपा के वस्त्र को पहन कर फिर मिना जाता है और वहां तीनों शैतानों पर कंकरियां मारता है।

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रमये जमरात पाप व दुर्भागी बनाने वाले तत्वों से नफ़रत प्रकट करने का प्रतीक है। हाजी शैतान के प्रतीक खंबों पर कंकरियां मार कर शैतान की गुमराह करने वाली चालों और नुक़सान पहुंचाने वाले कर्मों से संघर्ष का दृढ़ संकल्प लेता है। हाजी ऐसी स्थिति में अपने धार्मिक बंधुओं की सामूहिक उपस्थिति का उपयोग करते हुए एकता व समन्वय के ज़रिए विशालकाय शैतान को कंकरियों से ढेर करता है। हालांकि उनका हथियार विशालकाय शैतान के मुक़ाबले में बहुत छोटा है लेकिन चूंकि उनके इस प्रतीकात्मक संघर्ष में समन्वय मौजूद है, इसलिए दुश्मन कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो उसे हरा देते हैं। यह अपने आप में बहुत बड़ा पाठ है कि मुसलमान एकता के ज़रिए बड़ी शक्तियों को झुका सकते हैं चाहे उनके पास कमज़ोर हथियार क्यों न हो।         

9 ज़िल्हिज्जा को हाजी मिना जाते हैं और मवेशियों का बलिदान देकर ईश्वर का आभार प्रकट करते और उसकी बंदगी के योग्य बनने का जश्न मनाते हैं। जो लोग पहली बार हज पर जाते हैं वे अपना सिर मुंडवाते या थोड़ा सा बाल या नाख़ुन कटवाते हैं।

 

इस तरह हाजी हज के प्रतीकात्मक संस्कारों को उसकी आत्मिक सच्चाई के मद्देनज़र अंजाम देते हैं। वास्तव में हाजी अपनी शख़्सियत के पुनर्निर्माण में सफल हो गया है। वह विगत के पापों व बुराइयों के बंधन से मुक्त होकर फिर से ईश्वर से वादा करता है कि वह शैतान व आतंरिक इच्छाओं के सामने नहीं झुकेगा। इस हालत में हाजियों का चेहरा उनके पवित्र मन व आस्था की झलक पेश करता है मानो वह फिर से पैदा हुए हैं। ऐसे में पैग़म्बरे इस्लाम का यह कथन उन पर चरितार्थ होता है कि जो कोई हज करे और पाप न करे तो मक्के से इस तरह बाहर निकलता है जिस तरह वह मां के पेट से जन्म लेता है।

 

Aug ३०, २०१७ १३:२३ Asia/Kolkata
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