हज के संस्कारों में से एक संस्कार 9 ज़िलहिज्जा को अरफ़ात के मैदान में सुर्योदय से सूर्यास्त तक ठहरना होता है।

काबे का तवाफ़ करने के बाद, हाजी अरफ़ात के मैदान का रुख़ करते हैं। अरफ़ात पवित्र नगर मक्का से 25 किलोमीटर दूर जबलुर्रहमा नामक पहाड़ के आंचल में एक मरूस्थलीय क्षेत्र है। ऐसा विशाल मैदान जहां इन्सान सांसारिक व भौतिक चीज़ों को भूल जाता है और दुआ और इबादत में लीन हो जाता है।

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अरफ़ा शब्द की उत्पत्ति मारेफ़त शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है किसी चीज़ की सही पहचान। इस जगह का नाम अरफ़ात इसलिए रखा गया है, क्योंकि पहाड़ों के बीच यह जगह जानी पहचानी है। अरफ़ात के मैदान से हज़रत आदम (अ), हज़रत इब्राहीम ख़लीलुल्लाह, पैग़म्बरे इस्लाम (स) और इमाम हुसैन (अ) जैसे ईश्वर के महान बंदों की यादें जुड़ी हुई हैं। इतिहास में ऐसे महान लोग गुज़रे हैं जिन्होंने अरफ़ात के मैदान में ईश्वर की इबादत की और मानवता के लिए दुआ की है।

हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और हज़रत हव्वा ने पृथ्वी पर उतरने के बाद एक लम्बे अरसे के बाद अरफ़ात के मैदान में एक दूसरे मुलाक़ात की। इसीलिए इस जगह को अरफ़ात कहा गया और इस दिन को अरफ़ा। इस संदर्भ में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैं, अरफ़े के दिन जिबरईल हज़रत आदम (अ) के पास पहुंचे और कहा, अपनी ग़लती को स्वीकार करो और हज के संस्कारों को जान लो, क्योंकि उन्होंने स्वीकार कर लिया इसलिए उस जगह का नाम अरफ़ात रख दिया गया। पैग़म्बरे इस्लाम (स) ने 10वे हिजरी वर्ष में अपने अंतिम हज के दौरान एक ख़ुतबा दिया, जिसे अंतरराष्ट्रीय इस्लामी अधिकारों का घोषणा पत्र कहा जा सकता है और जिसमें समस्त अंधविश्वासों को नकार दिया है। इसके अलावा इमाम हुसैन (अ) ने अरफ़े के दिन दोपहर के बाद मक्के से जब कर्बला जाने का रुख़ किया तो अपने साथियों और परिजनों के साथ अपने तम्बू से निकले और जबलुर्रहमा के आंचल में पहुंचे और अपने ईश्वर से दुआ की। इमाम हुसैन ने इस दुआ में बहुत ही सुन्दर शब्दों में अपने ईश्वर को संबोधित किया, जिनसे बंदगी की ख़ुशबू हमेशा के लिए यहां के वातावरण में रच बस गई।

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अरफ़ा और दुआ शब्द एक दूसरे से इस तरह से जुड़े हुए हैं कि सभी अरफ़ा को दुआ के रूप में पहचानते हैं और अरफ़े के दिन को दुआ के लिए बेहतरीन समय मानते हैं। दुआ का द्वार ऐसा विशाल द्वार है जिससे कल्याण प्राप्त होता है और उसका खुलना समस्त दरवाज़ों की तुलना में आसान है। कल्याण के समस्त द्वारों में दुआ का द्वारा ऐसा है, जिससे समस्त उद्देश्यों को प्राप्त किया जा सकता है। अरफ़ा ऐसा दिन है, जिसमें दुआ क़बूल होती है। इतिहास में है कि अरफ़े के दिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन (अ) ने एक भिखारी की आवाज़ सुनी, जो लोगों से मदद मांग रहा था, इमाम (अ) ने उससे फ़रमाया, आश्चर्य है तुम पर, इस दिन ईश्वर के अलावा किसी और के सामने हाथ फैला रहे हो, जबकि आशा यह की जाती है कि आज के दिन गर्भ में मौजूद शिशु भी ईश्वर की कृपा का पात्र बनता है और उसे कल्याण प्राप्त होता है। इस प्रकार इंसान को चाहिए कि इस दिन अपने अलावा दूसरों के लिए भी दुआ करे।

दुआ ईश्वर का ऐसा उपहार है, जो उसने इंसान को प्रदान किया है। इस दिन दूसरों को ख़ुद पर प्राथमिकता देना बहुत महत्वपूर्ण है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) दूसरों के लिए दुआ करने के प्रभाव के संदर्भ में फ़रमाते हैं, जो कोई अपने भाई की अनुपस्थिति में उसके लिए दुआ करता है, दुनिया के आसमान से एक फ़रिश्ता आवाज़ देता है, हे ईश्वर के बंदे, जिस चीज़ की तूने मांग की है, ईश्वर उसका सौ गुना तुझे प्रदान करेगा। दूसरा फ़रिश्ता दूसरे आसमान से आवाज़ देता है, हे ईश्वर के बंदे जो कुछ तूने ईश्वर से मांगा है, ईश्वर उसका दो सौ गुना तुझे प्रदान करेगा। एक और फ़रिश्ता तीसरे आसमान से आवाज़ देता है, जो कुछ तूने मांगा है ईश्वर उसका तीन सौ गुना तुझे प्रदान करेगा। चौथे आसमान से एक दूसरा फ़रिश्ता आवाज़ देता है, हे ईश्वर के बंदे जो कुछ तूने मांगा है, ईश्वर उसका चार सौ गुना तुझे प्रदान करेगा। पांचवे आसमान से एक अन्य फ़रिश्ता आवाज़ देता है, हे ईश्वर के बंदे जो कुछ तूने मांगा है ईश्वर उसका पांच सौ गुना तुझे प्रदान करेगा। छठे आसमान से एक दूसरा फ़रिश्ता आवाज़ा देता है, हे ईश्वर के बंदे जो कुछ तूने मांगा है ईश्वर उसका छः सौ गुना तुझे प्रदान करेगा। सातवें आसमान से एक अन्य फ़रिश्ता आवाज़ देता है, हे ईश्वर के बंदे जो कुछ तूने मांगा है ईश्वर उसका सात सौ गुना तुझे प्रदान करेगा। उस वक़्त ईश्वर आवाज़ देता है, मैं ऐसा समृद्ध हूं जो कदापि ज़रूरतमंद नहीं होता है, हे मेरे बंदे जो कुछ तूने मांगा उसका 1000 गुना तुझे प्रदान किया। यहां ध्यान योग्य बिंदू यह है कि आप जिसके लिए दुआ कर रहे हैं उसके अधिकारों का भी ख़याल रखें।

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अरफ़े के दिन दुआ का महत्व इतना अधिक है कि पैग़म्बरे इस्लाम (स) जो अकसर ज़ोहर और अस्र की नमाज़ों को अलग अलग पढ़ते थे, इस दिन उन्हें एक साथ अदा करते थे, ताकि दुआ के लिए अधिक समय प्राप्त कर सकें। मासूम इमामों के अनुसार, अगर इस दिन रोज़ा रखना शारीरिक कमज़ोरी का कारण हो तो रोज़ा नहीं रखना बेहतर है। जैसा कि इतिहास में है, हन्नान बिन सुदीर अपने पिता के हवाले से कहते हैं कि मैंने इमाम बाक़िर (अ) से अरफ़े के दिन रोज़ा रखने के बारे में सवाल किया कि कुछ लोग सोचते हैं अरफ़े के दिन रोज़ा रखना, एक साल रोज़े रखने के बराबर है, तो इमाम ने फ़रमाया, मेरे पिता इस दिन रोज़ा नहीं रखते थे, मैं भी नहीं रखता हूं, मैंने पूछा क्यों? इमाम ने फ़रमाया, अरफ़े का दिन दुआ और प्रार्थना का दिन है। मुझे इस बात की चिंता है कि रोज़े के कारण होने वाली कमज़ोरी कहीं दुआ में रुकावट उत्पन्न न करे।

अरफ़े के दिन जिस सुन्दर दुआ की काफ़ी सिफ़ारिश की गई है, वह इमाम हुसैन (अ) द्वारा की गई दुआ है। इमाम (अ) इस दुआ में एकेश्वरवाद के उच्च अर्थ का मनमोहक शब्दों में उल्लेख करते हैं। इस दुआ में ईश्वर को संबोधित करने और उसे पहचानने की शैली पाई जाती है। इमाम हुसैन (अ) इस दुआ में ईश्वर की उन असीम अनुकंपाओं का उल्लेख करते हैं, जिनसे इंसान अपने पूरे जीवन में लाभ उठाता है। उदाहरण स्वरूप, मां की ममता को वे ईश्वर की कृपा बताते हैं। उसके बाद ईश्वर की अनुकंपाओं का अभिनंदन करने की ओर संकेत करते हैं और स्वयं को एक आभार व्यक्त करने में भी असमर्थ पाते हैं।

इस दुआ के व्यापक अर्थ से पता चलता है कि इमाम हुसैन (अ) ईश्वर से अपने पूर्ण अस्तित्व के साथ मोहब्बत और प्रेम करते हैं और हर जगह उसका जलवा देखते हैं। इस दुआ के एक भाग में इमाम इस तरह से दुआ करते हैं, हे मेरे स्वामी, तू ही है जिसने नेअमत प्रदान की, तू ही है जिसने कृपा की है, तू ही है जिसने दया की है, तू ही है जिसने करम किया है, तू ही है जिसने विशिष्टता प्रदान की, तू ही है जिसने अपनी कृपा को अंतिम चरण तक पहुंचाया, तू ही है जिसने शरण दी, तू ही है कि जिसने व्यापक आजीविका प्रदान की, तू ही है जिसने ऊर्जा प्रदान की, तू ही है जिसने पूंजी प्रदान की, तू ही है जिसने मार्गदर्शन किया, तू ही है जिसने गुनाहों से रोका, तू ही है जिसने गुनाहों पर पर्दा डाला, तू ही है जिसने गुनाहों को माफ़ कर दिया, तू ही है कि जिसने तौबा स्वीकार की, तू ही है कि जिसने गौरव प्रदान किया, तू ही है कि जिसने सम्मान दिया, तू ही है कि जिसने सहारा दिया, तूने ही मेरी पुष्टि की, तूने ही मेरी मदद की, तूने ही मुझे शिफ़ा प्रदान की, तूने ही मुझे आशीर्वाद दिया, तूने मेरा सम्मान किया, हे मेरे ईश्वर तेरा स्थान बहुत ऊंचा है, समस्त प्रशंसाएं तेरे लिए हैं और तेरा हमेशा आभार व्यक्त किया जाना चाहिए।

हे मेरे ईश्वर, मैं अपने गुनाहों को स्वीकार करता हूं, मुझे माफ़ कर दे, मैं हूं कि जिसने गुनाह किया है, मैं हूं कि जिसने ग़लती की है, मैं हूं कि जिसने नादानी की है, मैं हूं कि जो गुनाह की ओर लपक कर गया हूं, मैं हूं कि जिसने ग़लती की है, मैं हूं कि जिसने तेरे अलावा दूसरों पर भरोसा किया, मैं हूं कि जिसने जानते हुए भी गुनाह किया, मैं हूं कि जिसने वादा किया, मैं ही हूं कि जिसने वादा पूरा नहीं किया, मैंने वादे को तोड़ा, मैं अपने अपराध को स्वीकार कर रहा हूं, हे ईश्वर, मैं उन अनुकंपाओं पर आश्वस्त हूं जो तूने प्रदान कीं, मैं अपने गुनाहों को स्वीका कर रहा हूं और उन्हें तर्क कर रहा हूं, तू भी मुझे माफ़ कर दे।  

 

Aug ३०, २०१७ १४:५२ Asia/Kolkata
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