आधी रात गुज़र चुकी थी।

हज़रत इब्राहीम रात की इबादत करने के बाद कुछ आराम करने के लिए विस्तर पर गए।  अभी कुछ ही देर गुज़री थी।  उन्होंने एक अजीब सपना देखा।  इस सपने में उनसे क़ुर्बानी करने को कहा गया था।  उनसे कहा जा रहा था कि क़ुर्बानी के लिए वे अपने सुपुत्र इस्रमाईल को पेश करें।  सपने में हज़रत इब्राहीम से जो मांग की गई थी वह कोई आम मांग नहीं थी।  सपने का संदेश तो बहुत छोटा था किंतु था बहुत महत्वपूर्ण।  हज़रत इब्राहीम उसे एक आम सा ख़वाब समझे लेकिन इस सपने को जब उन्होंने तीन बार लगातार देखा तो उन्होंने उस सपने को साकार करने का निश्चिय किया।  हज़रत इब्राहीम दृढ इच्छा शक्ति के स्वामी थे।  उनके निकट असंभव नामक कोई शब्द था ही नहीं।  वे असंभव को संभव बनाने के पक्षधर थे।

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यहां पर अगर कोई समस्या थी तो वह केवल यह थी कि किस प्रकार से यह बात अपने बेटे इस्माईल से कही जाए।  इस्माईल से यह कैसे कहें कि मैं तुम्हारी क़ुर्बानी करना चाहता हूं।  इस्माईल अब बड़े हो रहे थे।  उनका मासूम चेहरा हज़रत इब्राहीम को बहुत प्रभावित करता था।  लोग उनकी सुन्दरता के कारण उनको निहारते रहते थे।  सपने की बात इस्माईल को बताने के बारे में इब्राहीम बहुत बेचैन थे।  उनके भीतर व्याकुलता थी।  वे यह सोच रहे थे कि इस बात को कैसे कहा जाए? अंततः हज़रत इब्राहीम ने उस ईश्वरीय सपने को अपने बेटे इस्माईल को बता ही दिया।  हज़रत इब्राहीम ने हज़रत इस्माईल से कहा, ऐ मेरे प्रिय बेटे! मैंने स्वप्न देखा है कि मैं तुझे क़ुरबान कर रहा हूँ। तो अब तुम्हारा  क्या विचार है? उन्होंने कहा, ऐ मेरे पिता जो कुछ आपको आदेश दिया जा रहा है उसे कर डालिए। अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे धैर्यवान पाएंगे।  हज़रत इस्माईल का जवाब सुनकर हज़रत इब्राहीम के मन को बड़ी शांति मिली।  ऐसा होनहार संतान होने के कारण उन्होंने कहा कि धन्य है हे ईश्वर जो तूने मुझको एसा पुत्र दिया।  उन्होंने इस्माईल को अपने सीने से लगा लिया।

अब हज़रत इब्राहीम ने अपने सपने को साकार करने का प्रण किया और बेटे को लेकर क़ुर्बानी करने चले।  यहां पर विशेष बात यह थी कि पिता क़ुर्बानी करने और बेटा क़ुर्बानी बनने के लिए तैयार थे जो वास्तव में बहुत ही विचित्र बात है।  हज़रत इब्राहीम ने अपने सुपुत्र इस्माईल को ज़मीन पर लिटा दिया।  अब क़ुर्बानी का वक़्त बहुत निकट था।  उन्होंने जैसे ही छुरी, इस्माईल के गले पर रखी उसी समय आसमान से ईश्वर की ओर से एक भेड़ भेजी गई।  इस बारे में ईश्वर कहता है कि जब दोनों ने अपने आपको अल्लाह के आगे झुका दिया और उसने अर्थात इब्राहीम ने उसे कनपटी के बल लिटा दिया।  और हमने उसे पुकारा हे इब्राहीम! तुमने स्वप्न को सच कर दिखाया।  निःसन्देह, अच्छे लोगों को इसी प्रकार बदला देते है।  निःसन्देह, यह तो एक खुली हुई परीक्षा थी। और हमने उसे एक बड़ी क़ुरबानी के बदले में छुड़ा लिया और हमने बाद में आनेवाली नस्लों में उसका ज़िक्र छोड़ा है।

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यदि ग़ौर किया जाए तो हज़रत इब्राहीम ने ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए बड़ी कठिन परीक्षा दी।  यह एसी परीक्षा थी जिसके बारे में आम आदमी तो सोच ही नहीं सकता।  उन्होंने अपनी आंतरिक इच्छाओं का दमन करते हुए केवल ईश्वरीय आदेश का अनुसरण किया।  हज़रत इब्राहीम ने स्वेच्छा से इस्माईल की क़ुर्बानी को स्वीकार किया।  क़ुर्बानी के माध्यम से हज़रत इब्राहीम ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि मनुष्य को ईश्वरीय आदेश केवल मौखिक रूप में नहीं बल्कि व्यवहारिक रूप में मानने चाहिए।  उसे ईश्वरीय आदेशों को व्यवहारिक बनाना चाहिए।  वास्तव में किसी व्यक्ति के लिए अपने बेटे की क़ुर्बानी बहुत ही महत्व रखती है।  ऐसे बहुत से लोग मिल जाएंगे जो अपनी जान तक दांव पर लगा सकते हैं किंतु वे किसी भी स्थिति में यह नहीं चाहते कि उनके बेटे को कोई नुक़सान पहुंचे।

इस महान क़ुर्बानी के बाद से हज़रत इब्राहीम का नाम हमेशा के लिए अमर हो गया।  प्रतिवर्ष बक़रीद के दिन मुसलमान, क़ुर्बानी करके हज़रत इब्राहीम की याद ताज़ा करते हैं। बक़रीद, मुसलमानों की दूसरी सबसे बड़ी ईद है।  यही वह दिन है जब मक्के में मुसलमान हज करते हैं।  इस महान ईद को मनाने का मुख्य कारण यह है कि एक ईश्वरीय दूत ने ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए अपना सबकुछ न्योछाव करने का फैसला किया यहां तक कि अपने बेटे की क़ुर्बानी के लिए भी वह तैयार हो गया।  इस ईद से हमें यह पाढ मिलता है कि मनुष्य को ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करने के लिए हर प्रकार के त्याग के लिए तैयार रहना चाहिए।

क़ुर्बानी के बारे में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं कि जैसे ही क़ुर्बानी के जानवर के ख़ून का पहला क़तरा ज़मीन पर गिरता है, क़ुरबानी करने वाले के पाप माफ़ कर दिये जाते हैं।  क़ुर्बानी करने का अर्थ ही यही है कि ईश्वर से निकटता हासिल की जाए ताकि मोक्ष प्राप्त हो सके।  पवित्र क़ुरआन में ईश्वर कहता है कि तुम्हारी क़ुर्बानी में से न तो गोश्त और न ही ख़ून कुछ भी ईश्वर तक नहीं पहुंचता।  हां अगर कुछ पहुंचता है तो वह तुम्हारा तक़वा या ईश्वरीय भय है।  क़ुर्बानी एसा काम है जो एक ओर ईश्वर को प्रसन्न करता है तो दूसरी ओर  इससे मनुष्य का आध्यात्मिक विकास होता है।

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बक़रीद के बारे में स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी कहते हैं कि यह उन लोगों को हज़रत इब्राहीम की क़ुर्बानी की याद दिलाती है जो सोच-विचार करते हैं।  यह क़ुर्बानी आदम की संतान अर्थात मनुष्य को त्याग और संघर्ष का पाठ देती है।  वे कहते हैं कि इब्राहीम ने एकेश्वरवादियों को यह पाठ दिया है कि वे ईश्वर के मार्ग में अपनी सबसे पसंदीदा चीज़ को अर्पित करे ताकि उसकी निकटता प्राप्त कर सकें।  वे कहते हैं कि धर्म को बचाने और उसको फैलाने के लिए स्वयं तथा अपने परिजनों को भी क़ुर्बान करने से न हिचकिचाओ।

आज ईदे क़ुरबान या बक़रीद है।  लोग नमाज़ पढ़कर क़ुर्बानी कराते हैं।  बच्चे, बड़े बूढ़े, जवान सभी मस्जिदों में उपस्थित होकर ईद की नमाज़ अदा करते हैं।  यह प्रेम और समर्पण को साबित करने का दिन है। बक़रीद का दिन वह दिन है जब एक इंसान स्वयं को अपने पालनहार के सामने महत्वहीन होने की बात स्वीकार करता है। वह अपना सब कुछ ईश्वर की उपासना पर नियोछावर कर देता है।  आज इंसान प्रदर्शन करता है उस आज्ञापालन का जो सही पहचान और बोध का परिणाम है।

आज ही के दिन लाखों की संख्या में हाजी पवित्र मक्के में मौजूद हैं।  वे हज कर रहे हैं।  हरएक की इच्छा ईश्वर की निकटता प्राप्त करना है। ईदुल अज़हा वास्तव में ईश्वर के समक्ष अपनी प्रियतम वस्तुओं को क़ुरबान करने का दिन है।  बक़रीद, के दिन जो भी अपनी इच्छा को ईश्वर की इच्छा पर क़ुरबान करने में सफल हो जाता है तथा ईश्वर की ख़ुशी के लिए अपनी इच्छाओं को त्याग देता है वह बंदगी की ऊंचाई पर पहुंच जाता है।  अब देखना यह है कि इस प्रयास में कौन सफल हो पाता है।

 

Sep ०२, २०१७ ११:३१ Asia/Kolkata
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