ईश्वरीय मार्गदर्शन के क्षितिज पर एक और सितारा उदित होकर जगमगाने लगा।

पवित्र वंश के नवजात ने अपनी आंखें खोलीं। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का जन्म 15 ज़िलहिज्जा सन 212 हिजरी क़मरी को मदीना नगर में हुआ। उनकी कई उपाधियां हैं जिनमें हादी अर्थात मार्गदर्शक की उपाधि विशेष रूप से ख्याति रखती है। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम मार्गदर्शक के रूप में अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए इस्लामी ज्ञान और सिद्धांतों के प्रचार प्रसार के लिए मदीना नगर को अपना केन्द्र बनाया। उन्होंने 33 साल तक इस्लामी समाज के मार्गदर्शन का दायित्व संभाला। उस समय इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की ख्याति इस्लामी जगत के कोने कोने तक फैल गई थी। अतः दूर और क़रीब के इलाक़ों से ज्ञान में रूचि रखने वाले लोग ज्ञान की प्यास बुझाने के लिए मदीना नगर में एकत्रित होते थे। इस्लाम के प्रख्यात इतिहासकार इब्ने शहर आशोब ने पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के बारे में विस्तार से अध्ययन किया। उन्होंने मनाक़िब नाम की पुस्तक में इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के बारे में लिखा है कि वह बड़े अच्छे दिल के और अत्यंत सच्चे इंसान थे। जब वह ख़ामोश रहते तो उनके चेहरे पर एक अजीब सा रोब रहता था और जब बोलते तो मानो मोती झड़ते और कानों में शहद घुल जाता था। लोग सम्मोहित हो जाते थे।

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इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ईश्वरीय कृपा व दया का दर्पण थे। ईश्वर ने मानव समाज के सामने उन्हें अपने तर्क के रूप में पेश किया है। वह मानवता को परिपूर्णता की मंज़िल पर ले वाले मार्ग के दीपक हैं जो भटके हुए लोगों को सीधी राह दिखाते हैं। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की जीवनशैली सत्यप्रेमियों और संपूर्णता के खोजियों के लिए महान आदर्श है। वह पैग़म्बरे इस्लाम के उन परिजनों में से एक हैं जिनका जीवन मनुष्य के पवित्र जीवन का नमूना और पवित्र ईश्वरीय मूल्यों का आईना है। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों के परिचय में कहते हैं कि इमाम कृपा के सोते, ज्ञान के ख़ज़ानों के मालिक, संयम और सहनशीलता का चरम बिंदु, महानता की बुनियाद, चयनित हस्तियां, अंधेरे के चिराग़ और दुनिया वालों के लिए ईश्वरीय तर्क हैं।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने वर्ष 220 में अपने पिता की शहादत के बाद इमामत का दायित्व संभाला। उस समय उनकी उम्र आठ साल थी। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के ज़माने में अब्बासी शासन का पतन हो रहा था। अब्बासी शासको ने जो अय्याशी की और जनता पर अत्याचार के पहाड़ तोड़े उसके नतीजे में लोग इन शासकों से नफ़रत करने लगे। इन हालात में पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से सब आस लगाए बैठे थे। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का जीवन पैग़म्बरे इसलाम के सभी परिजनों की तरह बहुत पवित्र और पाठदायक था साथ ही इस निष्ठा और परित्याग के साथ उनका प्रेमपूर्ण व्यवहार हर किसी के लिए अत्यंत आकर्षक था। यही कारण है कि उनके इर्द गिर्द सच्चे इस्लाम के श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगता चला गया। उनके जीवन काल में 6 अब्बासी ख़लीफ़ा गुज़रे। यह ख़लीफ़ा एक के बाद एक ख़िलाफ़त की गद्दी पर आते रहे और अत्याचार के नए नए कीर्तिमान स्थापित करते रहे उन्होंने इमाम के साथ भी अत्याचार में कोई कसर नहीं छोड़ी। आख़री ख़लीफ़ा का नाम मोअतज़्ज़ था जिसने इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम को ज़हर देकर शहीद करवा दिया। शोचनीय बिंदु यह है कि यह सभी ख़लीफ़ा बड़े शानो शौकत के साथ गद्दी पर बैठते और अपमानित होकर ख़त्म हो जाते। इतिहास ने उनकी बेरहमी और क्रूरती की कहानियां अपने भीतर सुरक्षित कर ली हैं। अब्बासी ख़लीफ़ाओं के कठोर बर्ताव और इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम पर अत्याचारों के बावजूद इस्लाम का प्रचार इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के माध्यम से होता रहा और इसका दायरा बढ़ता रहा तथा इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम अपने मार्गदर्शन से सबको तृप्त करते रहे।

यदि इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की मशहूर उपाधि हादी अर्थात मार्गदर्शक के बारे में विचार किया जाए तो बहुत से तथ्य अपने आम सामने में आ जाते हैं। हादी शब्द हिदायत से बना है। हिदायत अरबी शब्द है जिसके दो अर्थ हैं। एक है रास्ता दिखाना और दूसरे मंज़लि व गंतव्य तक पहुंचाना। आम तौर पर इसे सही मार्ग दिखाने के अर्थ में प्रयोग किय जाता है। क़ुरआन और हदीस में हिदायत और हादी का अर्थ बहुत गहरा और व्यापक है यह केवल रास्ता दिखा देने तक सीमित नहीं है। रास्ते का ज्ञान, गंतव्य का ज्ञान, समाज की पहिचान और पथिकों का परिचय, साथ ही रास्ते की कठिनाइयों की जानकारी , लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने का हुनर, राहगीरों में आगे बढ़ने का जज़्बा जगाने की दक्षता, कारवां को सही दिशा में ले जाने की क्षमता, यह सब इस्लामी संस्कृति में हादी की विशेषताएं हैं। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम एक जगमगाता सूर्य थे जो वर्ष 220 हिजरी क़मरी से 254 हिजरी क़मरी ता अपना प्रकाश सारी दुनिया में बिखेरते रहे और इस्लामी समाज को मार्गदर्शन की ऊष्मा प्रदान करते रहे। वह अब्बासी शासन काल की ख़तरनाक लहरों के बीच इस्लाम की कश्ती के खेवनहार बने रहे।

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इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम अपने काल में अपने पूर्वजों की भांति ज्ञान व विवेक की सोता और ख़ज़ाना बने रहे। उस समय अनेक मत और विचारधाराएं इस्लाम के मूल सिद्धांतों के बारे में प्रचलित हो रही थीं। यह ग़लत व भ्रामक विचारधाराएं इस्लाम के बारे में ग़लतफ़हमियां पैदा कर रही थीं। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने अपने ज्ञान की महानता, मार्गदर्शन के प्रकाश और पथप्रदर्शक उपायों से हर प्रकार के भ्रामक प्रयासों को नाकाम बनाया और इस्लाम के विशुद्ध विचारों और सिद्धांतों को बयान किया तथा इस्लाम के सिद्धांतों और मान्यताओं के बारे में जो भ्रांतियां पैदा की जाती थीं उनको दूर किया।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने इस्लामी सिद्धांतों और मूल्यों को पुनरजीवित और प्रचलित करने के साथ ही सामाजिक मैदानों में भी कमियों और शून्यों पर नज़र रखी और उन्हें भरने में अग्रिणी रहे। कोई भी उनके दरवाज़े शे नामुराद वापस नहीं जाता था। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के एक श्रद्धालु का बयान है कि मैं इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की सेवा में पहुंचा और मैंने कहा कि अब्बासी शासक मुतवक्किल ने मुझे नौकरी से निकाल दिया है और मेरी तनख्वाह रोक दी है उसने मुझे यातनाएं भी दीं जबकि मेरा केवल यह दोष है कि मैं आपसे मुहब्बत करता हूं। अगर आप इस बारे में उससे बात कर लें तो शायद वह मान जाए। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने कहा कि सब कुछ ठीक हो जाएगा। रात का समय हुआ। मेरे घर का दरवाज़ा किसी ने खटखटाया। पता चला कि वह मुतवक्किल का कारिंदा था। वह मुझे मुतवक्किल के पास ले गया। मुतवक्किल ने मेरी तरफ़ देखा और कहा कि मैं तो तुम्हें याद कर रहा था और तुम मुझे भी और खुद को भी भूल गए। तुम बताओ तुम्हें क्या चाहिए? मैंने कहा कि मेरी तनख़्वाह मुझे नहीं मिली है। मुतवक्किल ने तत्काल आदेश दिया कि दुगनी तनख्वाह दी जाए। मैंने तनख्वाह ली और सीधे इमाम के पास पहुंचा। मैंने इमाम से कहा कि लोग तो कहते हैं कि आप मुतवक्किल के पास नहीं गए और न ही आपने उससे कोई सिफ़ारिश की तो फिर क्या हुआ कि उसने मेरी तनख़्वाह दे दी। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम ने कहा कि ईश्वर जानता है कि हम महत्वपूर्ण मामलों में उसके अलावा किसी की शरण में नहीं जाते और कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों में उसके अलावा किसी पर भरोसा नहीं करते। उसने ही हमारी यह आदत डाली है कि जब भी कुछ मांगना होता है तो हम केवल ईश्वर से मांगते हैं और वह हमारी दुआ पूरी कर देता हैं। हमें हमेशा इस बात का डर रहता है कि हम किसी और की ओर उन्मुख हैं और ईश्वर हमसे विमुख हो जाए।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम जब ईश्वर की उपासना करते तो निष्ठा में डूब जाते थे और रो रो कर ईश्वर की प्रशंसा व गुणगान करते थे। ईश्वर से प्रेम और श्रद्धा इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के जीवन में इस तरह झलकती थी कि इब्ने कसीर जैसे ज्ञानी ने उनके बारे में लिखा कि वह महान उपासक व त्यागी थे। ईश्वर से ख़ास संबंध इंसान के भीतर ख़ास वैभव पैदा कर देता है। ईश्वर के भेजे हुए मार्गदर्शक जो ईश्वरीय श्रद्धा में डूबे हुए होते थे असाधारण अलौकिक प्रभाव और शक्ति के स्वामी बन जाते थे। इंसानों के हृदय उनके प्रेम से छलकते थे और उनकी बातें सक्षम दिलों में गहराई तक उतर जाती थीं।

सत्य और सदाचार की ओर से इंसान के मार्गदर्शन के लिए बहुत अधिक ज्ञान की ज़रूरत होती है जिसकी मदद से मार्गदर्शक इंसान के जीवन के सभी पहलुओं से अवगत हो। इमामों के पास यह ज्ञान अपनी चरम सीमा पर था। इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम का एक कथन है ईश्वर के नामों में जो इसमे आज़म अर्थात सबसे महान नाम है उसमें 73 अक्षर हैं। आसिफ़ इब्ने बरख़िया के पास उनमें से एक अक्षर का ज्ञान था जिसकी मदद से उन्होंने अपने और सबा देश के बीच की धरती को समेट दिया और पलक झपकते में रानी बिलक़ीस का तख्त सुलैमान नबी के सामने पेश कर दिया और फिर धरती अपनी पिछली हालत पर आ गई। इस नाम के 72 अक्षर हमारे पास हैं जबकि एक अक्षर एसा है जिसे केवल ईश्वर जानता है।

इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम की नज़र में इंसानों के व्यक्तित्व का निखरता और सदगुणों से सुसज्जित होना बहुत महत्वपूर्ण था। इसी लिए वह अलग अलग अवसरों पर बड़े सूक्ष्म बिंदुओं को बयान करके जीवन गुज़ारने का उत्तम तरीक़ा लोगों को समझाते रहते थे। वह कहते हैं कि जो व्यक्ति ख़ुद को हल्का समझे और अपना महत्व न जाने उसकी बुराई से ख़ुद को बचाओ। उनका एक और कथन है कि जलन नेकियों को मिटा देती है और झूठ दुशमनी का कारण बनता है।

 

Sep ०६, २०१७ १०:०४ Asia/Kolkata
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