उस दिन ईश्वर की ओर से मोहब्बत का संदेश लाने वाले पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, “आज तुम्हारा धर्म संपूर्ण हुआ, नेमतें तुम पर पूरी हुयीं।

पैग़म्बरे इस्लाम की बातें ग़दीर के माहौल में आकाशवाणी की तरह गूंज रही थीं। ”

पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, “हे लोगो! ईश्वर मेरा अभिभावक व सरपरस्त है और मैं तुम्हारा और सभी मोमिन बंदों का अभिभावक हूं। जान लोग कि जिस जिसका मैं अभिभावक हूं अली इब्ने अबी तालिब भी उसके अभिभावक हैं।”

Image Caption

 

पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने अंतिम हज की समाप्ति पर ग़दीर के तालाब के निकट हज़रत अली अलैहिस्सलाम को मोमिनों के लिए अपना उत्तराधिकारी व अभिभावक घोषित किया। इस दिन पैग़म्बरे इस्लाम अपने विशेष तंबु में बैठे बहुत ख़ुश नज़र आ रहे थे। आपने हुक्म दिया कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम दूसरे तंबू में अकेले बैठें। उस दिन सदाचारियों के अगुवा हज़रत अली अलैहिस्सलाम धीरे धीरे क़दम उठाते हुए लोगों के बीच से उस तंबू की ओर बढ़े जिसे इसलिए लगाया गया था कि लोग एक एक करके हज़रत अली को उनके आज्ञापालन का वचन दें। पैग़म्बरे इस्लाम के हुक्म से एक के बाद एक आदमी उस तंबू में जाता। क़बीलों के सरदार, अंसार और मुहाजिरों की बड़ी बड़ी हस्तियां एक एक करके उस तंबू में गयीं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को उनके भविष्य के नेता व इमाम बनने पर बधाई दी।

इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने महिलाओं को भी आदेश दिया कि वे तंबू में जाएं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को पैग़म्बरे इस्लाम का उत्तराधिकारी व मोमिनों का अभिभावक बनने की बधाई दें।  जिसके बाद महिलाओं ने भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम को बधाई दी। पैग़म्बरे इस्लाम के इस आदेश का अर्थ हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बैअत अर्थात उनके आज्ञापालन का वचन लेना था।

उस समय मोमिन बंदो ने अपने अगुवा को उसी तरह पाया जैसा पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया था कि जहां अली हैं वहीं सत्य है और जहां सत्य है वहीं अली हैं। अली इबने अबी तालिब अपने व्यवहार, चरित्र और वजूद से सत्य का ध्रुव हैं।

Image Caption

 

जिस वक़्त पैग़म्बरे इस्लाम मुसलमानों को आपस में एक दूसरे का भाई बना रहे थे तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम अकेले रह गए। आपने पैग़म्बरे इस्लाम से फ़रमाया कि अनुयाइयों में सब एक दूसरे के भाई तय पा गए सिर्फ़ मैं बचा हूं तो पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, “हे अली आप मेरे भाई और मेरे बाद मेरे उत्तराधिकारी हैं। क्या आप इस बात से राज़ी नहीं कि मेरे भाई हों और मेरे बाद मेरे उत्तराधिकारी बनें।”                            

ख़ैबर नामक जंग में जब पैग़म्बरे इस्लाम के दो अनुयायी दो अलग अलग दिन लश्कर के कमान्डर के रूप में जंग के मैदान में भेजे गए और वे मैदान से भागे तो पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, “कल मैं ध्वज ऐसे मर्द को दूंगा जो ईश्वर और उसके पैग़म्बर को दोस्त रखता होगा। ईश्वर और ईश्वरीय दूत भी उसे दोस्त रखते होंगे। वह कभी भी नहीं भागेगा। उसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने लश्कर का ध्वज हज़रत अली अलैहिस्सलाम के हाथ में दिया।”

हज़रत अली अलैहिस्सलाम, पैग़म्बरे इस्लाम पर ईमान लाने वाले पहले व्यक्ति थे। पैग़म्बरे इस्लाम के पैग़म्बर नियुक्त होने के 3 साल बाद शोअरा सूरे की आयत नंबर 214 नाज़िल हुयी जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम को अपने संबंधियों के बीच इस्लाम की दावत देने का आदेश मिला। इस आयत के नाज़िल होने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने एक दावत का प्रबंध किया और अपने संबंधियों को इस्लाम स्वीकार करने का निमंत्रण दिया लेकिन उनके बीच हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सिवा किसी ने जवाब न दिया यहां तक कि यह घटना तीन बार घटी और तीनों बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पैग़म्बरे इस्लाम के निमंत्रण को स्वीकार किया। तब पैग़म्बरे इस्लाम ने फ़रमाया, “बैठ जाओ कि तुम मेरे भाई, मेरे वज़ीर और मेरे बाद मेरे वारिस और उत्तराधिकारी हो।” इसके बाद पैग़म्बरे इस्लाम ने अनेक बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपने उत्तराधिकारी के रूप में पहचनवाया। इसी क्रम की आख़िरी घटना ग़दीर की है। 18 ज़िलहिज सन 10 हिजरी को पैग़म्बरे इस्लाम ने अपनी विशेष ज़िम्मेदारी को पूरा किया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को अपने बाद इस्लामी जगत के अगुवा के रूप में पहचनवाया।

Image Caption

 

इस दिन लोग ख़ुशी से फूले नहीं समा रहे थे। इस दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम से श्रद्धा रखने वालों की आंखों से ख़ुशी के आंसू बह रहे थे। इस दिन 1 लाख 20 हज़ार से ज़्यादा हाजियों के मन में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के प्रति गर्म जज़्बात के पीछे पैग़म्बरे इस्लाम की वह बातें थीं जिसमें आप लोगों का अपने समय के इमाम को पहचानने का आह्वान करते थे।

पैग़म्बरे इस्लाम कहा करते थे, “अगर अली और उनके उन बेटों के साथ रहे कि जिन्हें जनता के मार्गदर्शन का दायित्व सौंपा गया है, तो आपकी आत्मा स्वर्ग की ख़ुशबू से महक उठेगी।”

एक अन्य स्थान पर आपने फ़रमाया, “अली ज़मीन और आसमान वालों के अभिभावक हैं। अगर अली के साथ रहे, उनके मार्ग पर चले और हमेशा उन्हें याद रखा तो लोक-परलोक की नेमतें तुम्हें मिलेंगी।” 

इस्लामी व्यवस्था में पैग़म्बरी के बाद इमामत अर्थात जनता के मार्गदर्शन के ईश्वरीय दायित्व का स्थान है। पैग़म्बर वह होता है जिस पर ईश्वर का संदेश वही उतरता है और वह धर्म की बुनियाद रखता है जबकि इमाम पर ईश्वरीय संदेश नहीं उतरता। इमाम धर्म का संस्थापाक नहीं होता लेकिन पैग़म्बर की सारी ज़िम्मेदारी उसके कंधे पर होती है। पैग़म्बरे इस्लाम ने भी अन्य पैग़म्बरों की तरह धर्म की बुनियादी बातों को बयान किया और उनके स्वर्गवास के बाद इमाम धर्म व शरीआ के रक्षक हैं। इस आधार पर इमाम एक संपूर्ण व्यक्तित्व का स्वामी होता है। उसका वजूद मानवीय गुणों से सुशोभित होता है। वह हर बुराई से पाक होता है। इमाम ईश्वर, प्रलय और स्वर्ग पर आस्था की दृष्टि से यक़ीन के चरण में होता है। धर्म की सच्चाई को अपने वजूद में महसूस करता है, पूरे वजूद से उसे स्वीकार करके अपने व्यक्तित्व में चरितार्थ करता है और धर्मपरायण लोगों के लिए आदर्श हो सकता है ताकि धर्मपरायण लोग नैतिकता और व्यवहार में उसका अनुसरण कर सकें। ये सारी विशेषताएं हज़रत अली के व्यक्तित्व में मौजूद थीं और इस प्रकार वे पैग़म्बरे इस्लाम के वास्तविक उत्तराधिकारी क़रार पाए और उन्हें यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी कि जब पैग़म्बरे इस्लाम न हों तो उनकी ज़िम्मेदारी निभाएं, धर्म की रक्षा करें, इस्लामी जगत को सीधा मार्ग दिखाएं और उसका लोक परलोक में कल्याण करें।

Image Caption

 

हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी इमामत के बारे में कहते हैं, “ग़दीरे ख़ुम में पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम ने इस तरह मेरा परिचय करायाः हे लोगो क्या जानते हो कि ईश्वर मेरा अभिभावक है और मैं तुम मोमिनों का अभिभावक हूं और मुझे तुम्हारे मन पर तुमसे ज़्यादा अधिकार हासिल है? सबने कहा कि ईश्वर के दूत ऐसा ही है। तब पैग़म्बर ने कहा कि अली खड़े हो जाओ! मैं खड़ा हो गया। उस वक़्त उन्होंने फ़रमाया, जिस जिसका मैं अभिभावक व सरपरस्त हूं उस उसके अली भी सरपरस्त व अभिभावक हैं। हे ईश्वर उसे दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे। उसे दुश्मन रख जो अली को दुश्मन रखे।”

पवित्र क़ुरआन में इमाम की एक विशेषता लोगों का ईश्वरीय आदेश की ओर मार्गदर्शन करना है। जैसा कि इस संबंध में पवित्र क़ुरआन के अंबिया सूरे की आयत नंबर 73 में ईश्वर कह रहा है, “और हमने उन्हें इमाम क़रार दिया कि वे लोगों का हमारे आदेश से मार्गदर्शन करते थे। और हमने उन्हें वही के ज़रिए भले कर्म करने, नमाज़ क़ायम करने और ज़कात देने के लिए प्रेरित किया। वे सिर्फ़ हमारी उपासना करते थे।”

इस आयत के बारे में पवित्र क़ुरआन के मशहूर व्याख्याकार अल्लामा तबातबाई कहते हैं, “जिस मार्गदर्शन को ईश्वर ने इमामत से विशेष किया है, उससे अभिप्राय सिर्फ़ रास्ता दिखाना नहीं है। यहां मार्गदर्शन का मतलब कि जिसके लिए इमाम को नियुक्त किया गया है, लोगों को गंतव्य तक पहुंचाने के सिवा कुछ और नहीं हो सकता। इस प्रकार ये लोगों के मन पर एक तरह का ऐसा व्यवहारिक प्रभाव है जो लोगों के मन को परिपूर्णतः तक ले जाने और उन्हें एक से बढ़ कर एक सफलता दिलाने के लिए मार्ग समतल करता है।”           

इमाम ऐसी विशेषताओं का स्वामी होता है जो किसी व्यक्ति में नहीं होती। इमाम की सबसे अहम विशेषता इस्मत कहलाती है अर्थात हर प्रकार की बुराई से मन का पाक होना। पैग़म्बरे इस्लाम के अनुयाइयों में हज़रत अली एकमात्र ऐसी हस्ती थे जिनके व्यक्तित्व में यह विशेषता मौजूद थी। वह बचपन से एकेश्वरवादी थे। इमाम के पास संपूर्ण शरीआ का ज्ञान होता है। इस दृष्टि से हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पास शरीआ का पूरा ज्ञान था। यहां तक कि पैग़म्बरे इस्लाम ख़ुद को ज्ञान का शहर और हज़रत अली अलैहिस्सलाम को ज्ञान के शहर का दरवाज़ा कहा करते थे। दूसरों में धर्म का ज्ञान सीमित है और उसमें ग़लती मुमकिन है।

दूसरी ओर हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शान में अनेक आयतें नाज़िल हुयीं। जैसे कि आले इमरान सूरे की आयत नंबर 61 में हज़रत अली को पैग़म्बरे इस्लाम का नफ़्स अर्थात मन कहा गया है। अहज़ाब सूरे की आयत नंबर 33 में जो आयते ततहीर के नाम से मशहूर है, रवायत के अनुसार, पैग़म्बरे इस्लाम, हज़रत अली अलैहिस्सलाम, हज़रत फ़ातेमा ज़हरा सलामुल्लाह अलैहा और इमाम हसन व इमाम हुसैन अलैहिमस्सलाम की शान में नाज़िल हुयी है। इस आयत में इन हस्तियों को हर तरह की बुराइयों से पाक बताया गया है। इसी तरह पैग़म्बरे इस्लाम के एक मशहूर कथन से जो हदीसे सक़लैन के नाम से मशहूर है, पैग़म्बरे इस्लाम के पवित्र परिजनों के हर बुराई से पाक होने की पुष्टि होती है और इन पवित्र परिजनों में सबसे पहली हस्ती हज़रत अली अलैहिस्सलाम की है।

इन्हीं विशेषताओं ने एंथनी बारा जैसे ईसाई बुद्धिजीवी को यह कहने पर मजबूर कर दिया, “सच तो यह है कि अमीरुल मोमेनीन अली अलैहिस्सलाम न सिर्फ़ मुसलमानों के मार्गदर्शक बल्कि पूरी मानवता के मार्गदर्शक हैं और उस शमा की तरह हैं जिसे पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने स्वर्गवास के बाद अपने अनुयाइयों का मार्गदर्शन के लिए चुना है।”

 

 

Sep १०, २०१७ ०९:५६ Asia/Kolkata
कमेंट्स